ध्वजा मंगलमय फहरावे, ध्वजा मंदिर में लहरावे ।
भावना निज हित की भाऊँ, धर्म महोत्सव मंगलकारी ।।
जिनवर गुण गावें ।। टेक ।।
श्री जिनधर्म प्रसाद से, नाशें सब संताप ।
रहें सर्व प्राणी सदा, आनन्दमय निष्पाप ।। 1।।
सबसे मैत्रीभाव हो, गुणीजनों में मोद।
दुखियों प्रति करूणा रहे, दुर्जन में नहीं क्षोभ ।। 2 ।।
भेदज्ञान वर्ते सहज, हो विरक्ति सुखकार ।
ध्यावें अन्तर्लीन हो, समयसार अविकार।। 3।।
पावें ध्रुव अनुपम गति, आवागमन नशाय।
नमन करें निष्काम हो, ज्ञाता सहज रहाय।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’