ध्रुव की धुन | Dhruv ki Dhun

तर्ज : हे चेतन तुम शांत चित्त हो…

मग्न सहज ध्रुव की धुन में ही, अन्य न कुछ करना।

ये ही साधन शिव पाने का, स्वयं स्वतः तिरना ।। टेक ।।

बुद्धि कर्तृत्व की दूर अरे, नहीं विकल्प भी करना।
करना-मरना एकहि जाना, नाहिं भव धरना।। 1।।

पर्यय की पामरता को तो, भिन्न भी नहीं लखना।
सर्वथा अन्तर्मुख होकर, निज प्रभुता ही भजना।। 2।।

स्वाभाविक प्रभुता ध्याते, निज प्रभुता विस्तरना।
तज प्रमाद अब सावधान हो, निज-कारज करना।। 3।।

व्याकुल हो पर चिन्ता में, नहिं आत्मघात करना।
चूक न जाना दुर्लभ अवसर, अनुभव चित धरना।। 4।।

पर हित में भी निमित्त अनुभवी, सहज भाव धरना।
शुद्ध चिद्रूप भावना भाना, थिरता ही धरना।। 5।।

पर भावों में इष्ट-अनिष्ट का नहिं विकल्प करना।
ज्ञानवान हो धैर्यवान हो, समता ही धरना।। 6।।

सहज प्राप्य अपने अन्तर में, ज्ञानामृत पीना।
होकर क्षुब्ध न धर्म लजाना, सहज तृप्त रहना।। 7।।

वस्तु स्वरूप विचार खुशी से, सब संकट सहना।
हूँ निरपेक्ष सहज ज्ञाता प्रभु, ज्ञाता ही रहना।। ८।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह