धर्मात्मा सदा ही प्रसन्न रहता है | Dharmatma Sada Hi Prasann Rahata Hai

धर्मात्मा सदा ही प्रसन्न रहता है

-प्रो. वीरसागर जैन

चित्तप्रसाद या आनन्द भारतीय संस्कृति का सर्वोच्च जीवन मूल्य है, संदेश है, सभी संतों और शास्त्रों का एक मात्र अंतिम कथ्य है - येन-केन प्रकारेण सदा आनन्दित रहो, कभी भी किंचित् भी दुखी मत होओ | दुखी होने से दुःख मिटता नहीं, अपितु बढ़ता है, आगामी दुःख का कारणभूत घोर कर्मबंध भी होता है | दुखी व्यक्ति तत्त्वचिन्तनादि रूप धर्मध्यान भी नहीं कर पाता | यही कारण है कि सभी जैन-ग्रन्थों में यत्र-तत्र-सर्वत्र सदैव प्रसन्न रहने की शिक्षा दी गई है | जरा देखिए-

  1. जं चिंतदि साणंदं तं धम्मं उत्तमं ज्झाणं | -कार्तिकेयानुप्रेक्षा,480
  2. दुःखशोकतापा … असद्वेद्यस्य । - तत्त्वार्थसूत्र
  3. एकान्ते सामयिकं … परिचेतव्या प्रसन्नधिया | - रत्नकरंड श्रावकाचार
  4. न हि विषादो विधेयात्र तद्धि वैदुष्यजं फलम् | -पांडवपुराण,
  5. मनःप्रसाद्यं श्रुतैरमृतैः | -आत्मानुशासन
  6. चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् | मैत्रायणी आरण्यक
  7. प्रसन्नात्माssत्मनि स्थित्वा सुखमव्ययमश्नुते | -मैत्रायणी आरण्यक
  8. नंदिसम्पन्नोऽहम् | - ध्यानमन्त्र
  9. आनन्दो मे वर्षति | - ध्यानमन्त्र
  10. तत् ज्ञानं यत् प्रतिसमयमानन्दायते |
  11. सदा दिवाली संत के, आठ पहर आनन्द |
  12. ज्ञानानंद =ज्ञान वही है जो आनन्द प्रदान करे |
  13. ज्ञान समान न आन जगत् में सुख को कारन |- छहढाला
  14. मोद क्रिया -आचार्य जिनसेन
  15. बाहर नारक कृत दुख भुगते अंतर सुख रस गटागटी |- दौलतराम
  16. अब मेरे समकित सावन आयो | -भूधरदास
  17. अब हम अमर भये न मरेंगे | -द्यानतराय
  18. आनन्दस्रोत बह रहा मन क्यों उदास है ? पानी में रहके भी अरे मछली को प्यास है ||

होली, दिवाली आदि सभी त्यौहारों का संदेश है - खुश होओ, खुश रहो |

भूत-भविष्य की व्यर्थ कल्पनाओं को भूल जाना चाहिए, वर्तमान में जीना चाहिए |

भूत-भविष्य की अधिक चिंता व्यर्थ एवं दुखद है - डॉक्टर बनाऊँगी, इंजीनियर बनाऊँगा | भूतकाल सपना, भविष्य काल कल्पना,वर्तमान अपना | “शानदार भूत था, भविष्य भी महान् है, अगर हम संभाल लें जो कि वर्तमान है ।” अपने नाम, गाँव, शक्ल आदि की हीन भावना भी छोड़ो - चोखो ठनठनपाल

सारे कर्तृत्व का बोझा उतार दो- कौन धुनेगा, कौन बनेगा ?

चिता चिंता समा उक्ता…

हंसो, पर किसी की हंसी मत उड़ाओ | अंधे का पुत्र अंधा… रोग की जड़ खांसी लड़ाई की जड़ हांसी | ज्ञानियों की हंसी घोर कर्मबंध का कारण है ।

धर्म का अविष्कार हमको खुश करने के लिए ही हुआ था, पर लोगों ने धर्म को भी उदासीनता या दुख का कारण बना लिया - यह आश्चर्य की बात है |

एक जोकर हजारों को प्रसन्न कर देता है, पर हमारे पास कोई बैठे तो दुखी हो जाए, हमारा कैसा धर्म ? हमारे पास जो बैठे वह खुश हो जाए -

सज्जन दूसरे का दुःख दूर करते हैं - केला-सेव-संवाद | “मत व्यथित हो पुष्प किसको सुख दिया संसार ने, स्वार्थमय सबको बनाया जगत् के व्यवहार ने ।”

काँटों में गुलाब की तरह खिलो - सब खत्म हो जाए, मात्र दो पैसे बचे तो भी एक पैसे का एक गुलाब खरीदो |

दुःख आये तो उसको भी वरदान समझो - दुःख भी मानव की सम्पत्ति है …/मत व्यथित हो पुष्प किसको …/ निष्कारणं वैरिणो जगति/सुख के ऊपर सिल परो..

दुनिया में कितना गम है, मेरा तो कितना कम है

संसार अटवी है- जन्माटवीषु कुटिलासु | अत्यंत अशरण और असार है |

संसार में दुःख नहीं, संसार दुखमय है - अग्रे व्याधः करधृतशरः पार्श्वतो जालमाला | पृष्ठे वह्निर्दहति नितरां वामतो सारमेयः || एणी गर्भादलसगमना बालकैरुद्धपादा |एणी हिरणाद् ब्रवीति दुःखे किं करोमि क्व यामि ?

सीता आदि खूब रोने वाली या दुखी नहीं थीं, कवियों ने सब कल्पना की है ।