धर्म | Dharm (अरविंद जैन शास्त्री जयपुर)

जब छोर ही न मिलेगा
उस अनादि अनंत वस्तु में
तुम्हें कहीं पर
मैं पूछता हूँ
कहाँ से प्रारम्भ करोगे लगाना छैनी
ध्वस्त करने धर्म यह ,
किसे बनाओगे
आख़िर आधार

तुम्हारे घन और हथौड़े
क्या मिटा पाएँगे
अनंत मोटी हो चुकी
तीर्थंकरों की अनादिकालीन सभ्यता ?
तोप के गोले फेंकने
मैं पूछता हूँ
किस भूमि का करोगे
इस्तेमाल तुम ?
खड़े रहोगे जहाँ वह भी तो
होगी सत् वस्तु,
फिर उसे भी तो ध्वस्त करना होगा ?

यदि ध्वस्त कर भी दिए
कुछ देवालय
तब उनके परमाणुओं को भी
मसल पाओगे !?
उनके अस्तित्व पर कैसे करोगे वार

हे! आक्रमणकारियों और आक्रांताओं
जो वस्तु के स्वभाव को ही
मानते हैं अपना धर्म
मैं पूछता हूँ
उसे कैसे मिटाओगे ???

~अरविन्द जैन शास्त्री , खड़ैरी

रचनाकार: अरविंद जैन शास्त्री जयपुर (Arvind Jain), ग्रेटर नोएडा
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