धर्म की उदार परिभाषा : वत्थुसहावो धम्मो | Dharm Ki Udar Paribhasha Vatthusahavo Dhammo

धर्म की उदार परिभाषा : वत्थुसहावो धम्मो

-प्रो. वीरसागर जैन

यदि एक अपेक्षा से देखा जाए तो जैनदर्शन वस्तुतः कोई मत या सम्प्रदाय नहीं है, अपितु वस्तु के समीचीन स्वरूप को समीचीनतया जानने-मानने का सीधा-सच्चा मार्ग है। यही कारण है कि जैनदर्शन दुनिया के अन्य अनेक दर्शनों की भाँति किसी व्यक्ति-विशेष या ग्रन्थ-विशेष पर आधारित नहीं है, अपितु जो भी व्यक्ति ‘जिन’ हो उसे ही पूज्य या आराध्य मानता है। ‘जिन’ किसी व्यक्ति-विशेष का नाम नहीं है, अपितु जिसने भी अपने को जीत लिया है अर्थात् अपने मोह-राग-द्वेषादि विकारों को जीत लिया है वही ‘जिन’ है, भले ही उसका नाम-ग्राम आदि कुछ भी हो।

जैनदर्शन के अनुसार इस जगत् में अनन्त आत्माएँ हैं और सभी स्वतन्त्र एवं समान हैं, कोई भी किसी का अंश या छोटा-बड़ा नहीं है। अंतर मात्र इतना ही है कि जो जीव मोह-राग-द्वेषादि विकारों से ग्रस्त है वह रोगी की भाँति वस्तुस्वरूप को सही-सही नहीं जानता, नहीं मानता, नहीं कहता और इसीलिए उसका आचरण भी सही नहीं हो पाता, मिथ्या ही रहता है। तथा जो जीव अपने मोह-राग-द्वेषादि विकारों को जीत लेता है, वह स्वस्थ मनुष्य की भाँति वस्तुस्वरूप को सही-सही जान लेता है, मान लेता है, कह देता है और तदनुरूप अपना आचरण भी समीचीन बना लेता है। अतः मोह-राग-द्वेषादि विकारों पर विजय प्राप्त करना ही एक जरूरी कार्य है। यद्यपि यह कार्य कुछ कठिन है, किन्तु आवश्यक भी बहुत है, क्योंकि इसके बिना कोई भी जीव सम्यग्ज्ञानी/सुखी नहीं हो सकता। जैनदर्शन के अनुसार जो जीव अपने इन मोह-राग-द्वेषादि विकारों को जीत लेता है, इनसे मुक्त हो जाता है, वही जिन है और वही दूसरे जीवों का आदर्श है, आराध्य है, उपास्य है।

संक्षेप में, जिस जीव ने अपने मोह-राग-द्वेषादि विकारों को जीत लिया वह ‘जिन’ है और जिस जीव ने ऐसे ‘जिन’ को अपना आदर्श बनाया वही जैन है। तथा मोह-राग-द्वेषादि विकारों को जीतने की समीचीन विधि का ही नाम जैनदर्शन है।

यही कारण है कि जैनदर्शन में धर्म की परिभाषा भी अत्यन्त उदार एवं पूर्णतः वस्तुपरक (objective) प्राप्त होती है, जिसे यदि ठीक से समझ लिया जाए तो धर्म-सम्बन्धी सर्व विवाद सहज ही समाप्त हो सकते हैं। आज लोग धर्म के नाम पर जितना भी कलह या आतंक देख रहे हैं, वह सब इस परिभाषा को समझते ही शीघ्र समाप्त हो सकता है। ठीक ही है, धर्म कलह का कारण नहीं होता, धर्मान्धता (धर्मसम्बन्धी अज्ञानता) ही सर्व कलहों का कारण बनती है।

जैनदर्शन में प्राप्त होनेवाली धर्म की वह अत्यन्त उदार परिभाषा है- ‘वत्थुसहावो धम्मो।’ (कार्तिकेयानुप्रेक्षा, गाथा 476) अर्थात् वस्तु का स्वभाव ही धर्म है।

इसका तात्पर्य यह है कि जिस वस्तु का जो स्वभाव है वही उसका धर्म है। जैसे- अग्नि का स्वभाव उष्णता है और वही उसका धर्म है। तथा जो व्यक्ति उसे वैसा ही जानता मानता है वह धर्मात्मा है। तथा जो व्यक्ति उसे उष्ण न मानकर शीतल मानता है, वह अज्ञानी अधर्मात्मा है।

इसी प्रकार जल का स्वभाव शीतलता है और वही उसका धर्म है, मिश्री का स्वभाव मधुरता है और वही उसका धर्म है, नमक का स्वभाव खारापन है और वही उसका धर्म है, मिर्ची का स्वभाव तीखापन है और वही उसका धर्म है, इत्यादि। जो व्यक्ति इनको ऐसा ही अर्थात् अपने-अपने स्वभाव के अनुरूप ही जानता मानता है, वह धर्मात्मा है और जो अन्यथा प्रकार से जानता-मानता है, किसी एक का स्वभाव किसी अन्य का स्वभव जानता-मानता है, वह अधर्मात्मा है। बस, यही धर्म, धर्मात्मा और अधर्मात्मा की संक्षिप्त एवं सारगर्भित परिभाषाएँ हैं। आवश्यकता है कि हम इन्हें गहराई से समझने की कोशिश करें। संसार के किसी भी अन्य दर्शन में धर्म की ऐसी परिभाषा मिलना अतिदुर्लभ है।

वस्तुस्वभाव को धर्म मानने पर तेरा-मेरा के सारे विवाद सहज ही समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि वस्तुस्वभाव में किसी प्रकार का कोई भी पक्षपात किञ्चित् भी नहीं चलता। अग्नि गर्म है तो सभी के लिए गर्म है, सदा गर्म है, सर्वत्र गर्म है, इत्यादि। ऐसा नहीं है कि हिन्दू के लिए गर्म और मुसलमान के लिए ठण्डी, अथवा बालक के लिए गर्म और बूढ़े के लिए ठण्डी, अथवा स्त्री के लिए गर्म और पुरुष के लिए ठण्डी, इत्यादि। इसी प्रकार ऐसा भी नहीं है कि कल ठण्डी थी, आज गर्म है, अथवा आज ठण्डी है पर कल गर्म थी अथवा आज गर्म है, पर कल ठण्डी होगी, इत्यादि। इसी प्रकार ऐसा भी नहीं है कि हिन्दुस्तान में गर्म है, पर पाकिस्तान में ठण्डी अथवा पाकिस्तान में गर्म हो और हिन्दुस्तान में ठण्डी, इत्यादि। कहने का तात्पर्य यह है कि वस्तु के स्वभाव में किसी भी तरह का कोई पक्षपात किञ्चित् भी नहीं चलता।

वस्तुस्वभाव रूप धर्म स्वयं भी किसी हिन्दू या मुसलमान आदि के दायरों में बँधा नहीं होता। सूर्य, चन्द्र, तारे, आकाश, पृथिवी, हिमालय और गंगा आदि सभी पदार्थ न हिन्दू हैं, न मुसलमान, न सिक्ख हैं, न ईसाई, न जैन हैं, न बौद्ध। तथा ये पदार्थ किसी से भी किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करते, समानभाव से सभी के प्रति एक-सा व्यवहार रखते हैं। सूर्य अमीर या हिन्दू के घर पर अधिक रोशनी और गरीब या मुसलमान के घर पर कम रोशनी नहीं डालता। गंगा गाय को welcome और शेर को go out नहीं बोलती, दोनों को समानभाव से पानी पिलाती है। अरे! एक एक रुपए की दवाई क्रोसीन टेबलेट भी हिन्दू-मुसलमानादि का अथवा अमीर-गरीब आदि का भेदभाव नहीं करती, अपितु, समानभाव से सभी का बुखार उतारती है। तब वस्तुस्वभावरूप धर्म में किसी भी प्रकार का भेदभाव कैसे चल सकता है? वह तो समान भाव से सभी का भला करता है।

वस्तुस्वभावरूप ऐसा धर्म किसी से भी किसी भी प्रकार का पक्षपात न करने के कारण किसी को भी परस्पर लड़ने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता, अपितु मिल-जुलकर सत्य (समीचीन वस्तु स्वभाव) को समझने का मार्ग प्रशस्त करता है। दूसरे शब्दों में ऐसा धर्म लोगों को लड़ाता नहीं, समझाता है, तोड़ता नहीं, जोड़ता है।

वस्तुस्वभावरूप इस धर्म में काई दुराग्रह या मिथ्या पूर्वाग्रह भी नहीं चलता, क्योंकि उससे वस्तु का स्वभाव बदल नहीं जाता। यदि कोई अग्नि को शीतल ही मानता रहे तो क्या वह उसे नहीं जलाएगी? हाथ डालने पर क्या उसे नहीं जलाएगी? अतः वस्तुस्वभावरूप यह धर्म समस्त दुराग्रहों या मिथ्या पूर्वाग्रहों का अन्त करने वाला है और सभी को यह पावन शिक्षा देने वाला है कि ‘मेरा सो खरा’ का आग्रह छोड़ो और यदि आग्रह ही करना है तो सत्य का आग्रह करो, ‘खरा सो मेरा’- ऐसी भावना करो।

वस्तुस्वभावरूप यह धर्म अस्त्र-शस्त्रों की अकिंचित्करता को भी रेखांकित करता है। कहता है कि तुम्हारे इन अस्त्र-शस्त्रों से मेरा कुछ भी नहीं बदलने वाला है, तुम व्यर्थ ही लड़-लड़कर मरोगे। मैं तुम्हारे इन अस्त्र-शस्त्रों की भाषा भी नहीं सुनता-समझता, क्योंकि उनके बल पर भी तुम मुझे (वस्तु के स्वभाव को) अन्यथा नहीं कर सकते। अरे! अस्त्र-शस्त्रों से होता ही क्या है? क्या इनसे किसी को जीता जा सकता है? नहीं। अस्त्र-शस्त्र किसी को हरा तो सकते हैं, पर जीत नहीं सकते। जीतने के लिए तो समीचीन संवाद (dialogue) चाहिए। संसार में विजय-प्रदायक अस्त्र संवाद से बड़ा अन्य कोई नहीं है। संवाद से ही समस्या के तह तक पहुंचा जा सकता है और फिर उसे संवाद से ही ठीक भी किया जा सकता है।

वस्तुस्वभावरूप धर्म को समझने का रास्ता कभी किसी के लिए बन्द नहीं होता, सदा सभी के लिए खुला रहता है। कोई समझे या न समझे, पर रास्ता तो सदा सबके लिए ही खुला रहता है। यदि आपने आज तक नहीं समझा तो कोई बात नहीं, उसकी सजा आपने आज तक भोग भी ली। अब यदि आज से आप समझना चाहते हैं तो समझ सकते हैं, वस्तुस्वभावरूप धर्म कोई मना नहीं करता, किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाता, कोई दण्ड या जुर्माना भी आपसे नहीं लेता। बस, समझो और सुखी हो जाओ। इसी प्रकार यदि आप आज भी नहीं समझना चाहते तो मत समझो, कोई बात नहीं, आपसे कोई जबरदस्ती नहीं है। भविष्य में जब भी आपका मन करे आप समझ लेना, तब तक अज्ञानतावश दुःख उठाते रहो। वस्तुस्वभावरूप धर्म को कोई भी कभी भी स्वयं की अंतरंग रुचि से समझ सकता है।

वस्तुस्वभावरूप धर्म में कोई उधार का भी काम नहीं होता। ऐसा नहीं होता कि समझो आज और सुखी होओगे कल। जब समझो तभी सुखी- यही महासिद्धान्त है वस्तुस्वभावरूप धर्म का। इसी प्रकार जो समझे, वही सुखी- यह भी महासिद्धान्त है वस्तुस्वभावरूप धर्म का। जिस प्रकार पति के दवाई खाने से पत्नी के पेट का दर्द ठीक नहीं होता, पत्नी को ही दवाई खानी होती है; उसी प्रकार जिसे सुखी होना हो उसे ही वस्तुस्वभाव को समझना होता है, किसी और समझने से काम नहीं चलता। यदि एक ऋषभदेव के समझने से ही सबका काम चल जाता तो उनका पोता मारीच क्यों इतने दुःख उठाता?

वस्तुस्वभावरूप धर्म में कोई रिश्वतखोरी और खुशामदगिरी भी नहीं चलती। किसी को रिश्वत देकर या किसी अन्य प्रकार से उसकी खुशामद करके वस्तुस्वभावरूप धर्म को बदला नहीं जा सकता। उसे तो मात्र समझा जा सकता है, स्वीकार किया जा सकता है और वह भी अपने उत्तम विवेक से ही, अन्य किसी प्रकार से नहीं।

आजकल अनेक लोग समझौतावादी बनने लगे हैं। वे कहते हैं कि थोड़ा तुम झुको और थोड़ा तुम, और समझौता करके शांति से रहो। किन्तु वस्तुस्वभाव रूप धर्म में ऐसे समझौते भी नहीं चलते, क्योंकि समझौतों से वस्तुस्वभाव नहीं बदलता। वस्तुस्वभाव को तो सही-सही समझ की जरूरत होती है, समझौतों की नहीं। जरा सोचिए कि यदि कुछ ऐसा समझौता करें कि अग्नि 50 प्रतिशत गर्म होगी और 50 प्रतिशत ठंडी तो क्या अग्नि उनका समझौता स्वीकार करेगी? कदापि नहीं। अतः वस्तुस्वभावरूप धर्म को तो निष्पक्ष होकर समझने का ही प्रयत्न करना चाहिए। यही सुख-शांति का मार्ग है।

अब यहाँ इस सन्दर्भ में कुछ प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं, अतः उनका भी समाधान करने का प्रयत्न करते हैं । यथा-

प्रश्न 1:- यदि जिस वस्तु का जो स्वभाव है वही उसका धर्म है तो क्या यदि किसी जीव का स्वभाव हिंसा करना है तो वह भी उसका धर्म कहा जाएगा ?

उत्तरः- यह बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इसके समाधान हेतु हमें स्वभाव और विभाव का भलीभाँति ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि यहाँ वस्तु के स्वभाव को धर्म कहा है, विभाव को नहीं। विभाव तो अधर्म है। हिंसा किसी भी जीव का स्वभाव नहीं होता, अपितु उसका विभाव होता है। जिस प्रकार पानी गर्म हो तो भी गर्म होना उसका स्वभाव नहीं होता, स्वभाव तो शीतलता ही होता है, गर्म होना तो उसका विभाव होता है; उसी प्रकार हिंसा करना किसी भी जीव का स्वभाव नहीं हो सकता। प्रत्येक जीव का स्वभाव तो मूलतः अहिंसा ही है। हिसा उसने ऊपर से ओढ़ी हुई होती है। इसीलिए हिंसा उसके जीवन का लक्ष्य भी नहीं होता, लक्ष्य तो अपनी या अपनों की रक्षा करना ही होता है। सिंहादि पशु और बधिकादि मनुष्य भी जो विपुल हिंसा करते रहते हैं; वे भी वस्तुतः अपनी और अपने परिजनों की रक्षा के भाव से ही करते हैं, भले वह गलत ही हो। अतः सिद्ध होता है कि अहिंसा ही प्रत्येक जीव का असली स्वभाव है और इसीलिए उसे ही जीव का धर्म कहा गया है- ‘अत्ता चेव अहिंसा’ -जयधवला ।

प्रश्न 2:- यदि वस्तु का स्वभाव ही धर्म है तो धर्म करो, धर्म करो- ऐसा क्यों कहा जाता है?

उत्तरः- धर्म तो वस्तु के स्वभाव का ही नाम है, किन्तु हम लोग वस्तुओं के स्वभावों को समझते नहीं अथवा अन्यथा समझते हैं, यथा- चेतन को अचेतन और अचेतन को चेतन, इत्यादि। अतः हमसे कहा जाता है कि धर्म करो। धर्म करो का अभिप्राय है कि हम वस्तुस्वभाव को सही-सही समझें। जो वस्तु जैसी है, उसे वैसी ही जानें, मानें और तदनुसार ही प्रवृत्ति करें।

प्रश्न 3:- कहते हैं कि धर्म से सुख-शांति मिलती है। यदि वस्तु का स्वभाव ही धर्म है तो वह तो सबके लिए समान भाव से विद्यमान है ही, फिर हमें उससे सुख-शांति क्यों नहीं मिलती?

उत्तर:- क्योंकि हम उसे सही-सही समझते नहीं।

प्रश्न 4 :- वस्तुस्वभाव को हमारी समझ की क्या जरूरत है? हम समझें या न समझें, उसे क्या फर्क पड़ता है?

उत्तरः- उसे तो कोई फर्क नहीं पड़ता, किन्तु हम तो तभी तदनुसार प्रवृत्ति कर पाएंगे न, जब उसका स्वभाव ठीक-ठीक समझेंगे; अन्यथा तो तद्विरुद्ध प्रवृत्ति करके हमें दुःखी ही होना पड़ेगा न! उदाहरणार्थ कोई व्यक्ति नमक को मीठा समझकर दूध आदि में डाले तो दुःखी ही होगा और यदि खारा समझकर सब्जी आदि में उसका उपयोग करे तो सुखी होगा।

प्रश्न 5:- वस्तु के स्वभाव का नाम धर्म है या उसे सही-सही समझ कर तदनुसार प्रवृत्ति करने का नाम धर्म है?

उत्तर:- यह भी बड़ा महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, जिसे सावधानी से समझना आवश्यक है। धर्म तो वास्तव में वस्तु के स्वभाव का ही नाम है, किन्तु उसे सही-सही समझकर तदनुसार प्रवृत्ति करना भी धर्म कहा गया है, क्योंकि वह (दर्शन-ज्ञान-चारित्र) आत्मा का स्वभाव है, आत्मा का धर्म है। इस प्रकार शास्त्रों में हमें दो प्रकार से धर्म की परिभाषाएँ मिलती हैं- १. सभी वस्तुओं की अपेक्षा से- वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। (‘वत्थुसहावो धम्मो।’- कार्तिकेयानुप्रेक्षा, गाथा 476) २. आत्मवस्तु की अपेक्षा से- सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ही धर्म है। (‘सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्म धर्मेश्वराः विदुः।’- रत्नकरण्ड, 3); परन्तु वास्तव में इन दोनों परिभाषाओं में कोई विरोध नहीं है।

‘वत्थुसहावो धम्मो’ परिभाषा में निहित संदेश

  1. धर्म किसी विशेष व्यक्ति, जाति, देश, काल आदि से बंधा नहीं है, उनका आग्रह मत रखो।

  2. धर्म के लिए अस्त्र-शस्त्र, वाद-विवाद, आग्रह-दुराग्रह, निन्दा-प्रशंसा आदि की भावना व्यर्थ है। धर्म को शान्तिपूर्वक निष्पक्ष (अनाग्रह) भाव से समझा जा सकता है।

  3. वस्तु के स्वभाव को नष्ट नहीं किया जा सकता, अन्यथा भी नहीं किया जा सकता। जैसा है वैसा जानकर, मानकर और तदनुरूप प्रवृत्ति कर सुखी हुआ जा सकता है।

  4. स्वभाव और विभाव का अन्तर समझो, क्योंकि स्वभावरूप परिणमन करना ही धर्म है और विभावरूप परिणमन करना ही अधर्म है।

  5. किसी बाह्य क्रिया का नाम धर्म या अधर्म नहीं है। जिस बाह्य क्रिया से हमारा स्वभावरूप परिणमन हो उसे धर्म और जिससे हमारा विभावरूप परिणमन हो उसे अधर्म कहते हैं।