रचनाकार: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: दशलक्षण धर्म देशना (श्री वर्द्धमान न्यास, अमायन, भिण्ड — प्रथम संस्करण, जनवरी 2026)
अध्याय 6 — उत्तम सत्य धर्म
उत्तम सत्य धर्म की चर्चा रत्नकरण्ड श्रावकाचार की वचनिका में सत्य वचन के माध्यम से की है। वचन या भाषा भावों की अभिव्यक्ति का साधन है। मुद्रा भावों का दर्पण है। मुद्रा से भाव प्रकट होते हैं और भाषा या वचन भावों की अभिव्यक्ति का साधन है, उनसे भावों का आदान-प्रदान होता है।
सत्य वचन अलग है और सत्य धर्म अलग है। जैसे क्षमावाणी बोलते हैं न! वाणी में क्षमा नहीं है, क्षमा में वाणी नहीं है। वाणी तो पुद्गल की परिणति है और क्षमा भाव आत्मा का परिणाम है, लेकिन क्षमा भाव जिसमें निमित्त है, ऐसे वचनों को क्षमावाणी कह देते हैं। इसीप्रकार जिसके अन्तरंग में सत्य धर्म प्रगट होता है उसके वचन भी सत्य होते हैं और जिन वचनों से सत्य समझा जाता है, सत्य की प्ररूपणा होती है, उन वचनों को भी सत्य वचन कहते हैं।
देखो ! पंचपरमेष्ठी में सिद्ध भगवान को अरहन्त भगवान के बाद लिया गया है। सिद्ध होने के बाद अरहन्त नहीं होते फिर भी णमोकार मंत्र में पहले अरहन्त को नमस्कार किया है, क्योंकि उनके वचनों से धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति होती है। सिद्ध भगवान के स्वरूप को भी तो हम अरहन्तदेव की वाणी से ही समझते हैं। फिर भी वचन और धर्म का अन्तर हमें समझना चाहिये।
यहाँ सत्य धर्म की चर्चा में यह कहा है कि जो सत्य वचन है, वही सत्य धर्म है। शौचधर्म में कहा था कि शौचधर्म तो आत्मा को उज्ज्वल करने से होता है। इसका अर्थ यह था कि उज्ज्वल करना नहीं है, जानना है, समझना है, अनुभवना है। ऐसे ही यहाँ कहा है कि जो सत्य वचन है, वही सत्य धर्म है। इसका अर्थ क्या समझना ? सत्य वचनों के द्वारा जो कहा जाता है, सत्य वचन कहें या जिन-वचन कहें, उनमें धर्म का जो स्वरूप कहा है, वही धर्म है।
श्रावकाचार के दूसरे श्लोक की टीका में पण्डितजी लिखते हैं कि – धर्म तो लोक में सब कहते हैं, धर्म के सम्बन्ध में मिथ्यात्व ही यह है कि जो धर्म है उसे लोग जानते नहीं हैं और जिसे धर्म मानते हैं, वह धर्म है नहीं। धर्म का स्वरूप क्या कहा – ‘सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वरा विदुः ।’ जगत के जीव किसे धर्म कहते हैं, वह हम नहीं कहते लेकिन जो धर्म के ईश्वर हैं, स्वामी हैं, प्रणेता हैं, ऐसे सर्वज्ञ देव किसे धर्म कहते हैं? सत्-दृष्टि, सत्-ज्ञान, सत्-आचरण कहो या सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र कहो एक ही बात है, उसे धर्म कहते हैं, उसे ही मोक्षमार्ग कहते हैं। सत्य धर्म में मूल शब्द है सत्, तो सत्य धर्म का अर्थ हुआ सत् दृष्टि। सत् स्वरूप की दृष्टि हुई, वह सत्य धर्म का मूल है। सत् स्वरूप का अनुभव हुआ वह सत्य है – धर्म के अनुभवन में सत्य धर्म का प्रकाश होता है। ज्ञान प्रकाशक है न।
इस सत्य धर्म का अनुभवन कषायों से रहित है, निर्विकल्प आनन्दरूप है, समता भावरूप है, वीतराग भावरूप है, इसलिये उसका नाम धर्म है। सत्यधर्म किसका नाम है ? सत् दृष्टि है वह धर्म का मूल है। ‘दंसण मूलो धम्मो’ जो सत् ज्ञान है, वह धर्म का प्रकाशक है। ध्यान रखना दर्शन धर्म का मूल है, इसलिये वह धर्म नहीं है - ऐसा नहीं समझना। जैसे वृक्ष का जो मूल है, वह भी वृक्ष है। आयुर्वेद में वृक्ष के जो पंचांग कहे हैं, उसमें मूल है या नहीं ? फिर भी जैसे पत्ते टहनी आदि हैं, वैसे मूल को नहीं समझ लेना। पतझड़ में यदि वृक्ष के सारे पत्ते भी झड़ जाएँ तो भी वृक्ष का कुछ नहीं होगा। दो चार डालियाँ टूट जाएँ तब भी वृक्ष नष्ट नहीं होगा। यदि मूल खोखला हो जाए या सूख जाए तो वृक्ष नष्ट हो जाएगा। मूल वृक्ष का आधार है, एक अंग नहीं, प्रमुख अंग है।
सत्-दृष्टि सत्य धर्म का मूल है। सत्-दृष्टि के बिना सत्य धर्म कहाँ से आयेगा ? धर्म तो सत्य है। क्षमा, मार्दव आदि तो इसके विशेषण हैं। धर्म तो साम्यभावरूप है, वीतरागभाव रूप है। सत्य धर्म का मूल सत्-दृष्टि है ‘जो तू सींचे मूल को, फूले फले अघाय।’ अगर मूल को सींचेंगे तो वृक्ष फलेगा, फूलेगा। मूल के हरे होने पर कैसा चमत्कार है, देखो ! फल बेचने वाला फलों पर दिन भर पानी छिड़कता है फिर भी रस सूखता है, लेकिन जो फल वृक्ष पर लगा है, जेठ की धूप में भी फल का रस सूखता नहीं है। फल में जो रस है, टहनी में जो हरापन है उन सबका कारण मूल में है। मूल में जब तक पानी है तब तक वृक्ष सूखने वाला नहीं है, इसलिये मूल ही आधार है।
सत्य धर्म के लिये हम केवल लौकिक रीति से सत्य वचन बोलते हैं, हम कभी झूठ नहीं बोलते यह अहंकार सत्य धर्म में कहाँ से आ गया ? क्रोध भी सत्य धर्म का विरोधी है, मान, माया, लोभ, भय, कषाय, कामादिक भाव भी सत्य धर्म के विरोधी हैं।
तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य उमास्वामी तो सत्यव्रत की भावनाओं में कहते हैं कि – जिन्हें सत्य व्रत का पालन करना है, सत्य धर्म की निर्दोषता इष्ट है, उन्हें ‘क्रोधलोभभीरूत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचि भाषणं।’ इन सबको आगम के अनुसार समझना एवं बोलना चाहिये। क्रोध में यदि सच्ची बात भी कही जाए तो वह सच्ची नहीं है, यह समझ लेना चाहिए। वस्तुस्वरूप के विपरीत जो श्रद्धा है, वह विपरीत है, सत्-असत् के विवेक बिना जो ज्ञान है, वह कैसा ज्ञान है?
‘सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत्।’ ऐसा होने पर जो ज्ञान है, वह कैसा ज्ञान है ? ‘मतिश्रुतावधयो विपर्ययाश्च’ अर्थात् मति, श्रुत, अवधि ये विपरीत भी होते हैं - कुमति, कुश्रुत, कुअवधि मिथ्या होते हैं।
पं. टोडरमलजी ने लिखा है कि मतवाला यदि माता को माता भी कहे तो वह सयाना नहीं है, वह तो कह गया जो कुछ कहना था, उसे होश नहीं है कि माँ कौन है और पत्नी कौन है ? सत्-असत् का विवेक नहीं होने पर कुछ भी भान नहीं रहता है, विशेष यानि उसकी जाति अलग प्रकार की है। सत्-असत् का विशेष अर्थात् अन्तर नहीं समझने से उन्मत्तवत् यानि जो मन में आया सो माना, जो मन में आया वह सोचा, बोला – ये विपरीत बुद्धि है।
सत्-असत् का ज्ञान नहीं होने पर सम्यग्ज्ञान कैसे हुआ ? ज्यादा पढ़े सो सम्यक् ज्ञान हुआ, ऐसा नहीं है, जिस ज्ञान में सत्-असत् का विवेक हो, उसे अपनी भाषा में यदि कहें तो जिस ज्ञान में आत्मा निजरूप से भासित होता है, शेष सब भिन्न भासित होते हैं, उस ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं। तात्त्विक दृष्टि से देखें तो उसे कोई पदार्थ इष्ट-अनिष्ट भाषित नहीं होते। जगत के होते हुये कार्य, स्वयं होते हुये भासित होते हैं। यदि अपनी इच्छा के अनुकूल कार्य हो भी जाए तो उनमें वर्तने वाले तत्समय का योग-उपयोग को निमित्त कहा जा सकता है, उनमें निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है। वे कार्य भी ज्ञान में स्वतंत्रपने होते हुये भासित होते हैं।
यदि पण्डितजी अपने को दूसरों को समझाने का कर्त्ता मानें कि हमने समझाया, तो वह समझ गया तब समझ लेना ‘सदसतोर-विशेषात्’ । अरे ! उसकी समझने की योग्यता थी तो वह समझा है, उस समय का योग-उपयोग निमित्त हुआ है, ‘हमने समझा दिया, हम समझा दें, हमने सुधार दिया; इसने बिगाड़ दिया।’ अरे! मैं दूसरों के द्वारा समझाया जाऊँ अथवा मैं किसी को समझा दूँ, ऐसे विकल्प उन्मत्तवत् हैं, यह पागलपन है। कौन किसको समझावे, किसको समझाने से कौन समझे। हिन्दी में एक दोहा है –
कहें दोष कोइ न तजे, तजे अवस्था पाय।
जैसे बालक की दशा, तरुण भये मिट जाय।।
यह पद पंडित बनारसीदासजी ने लिखा है। वे भी नाना प्रकार के चक्करों में पड़ गये थे। सब लोगों ने खूब समझाया, लेकिन नहीं माने, जब उनकी काललब्धि आई और रूपचन्दजी पाण्डे आये तब उन्होंने यह दोहा लिखा था।
बच्चा जब बड़ा हो गया तब स्वयं समझ जाता है कि धूल में नहीं खेलना है। ये बाल चेष्टायें हैं। ‘जैसे बालक की दशा तरुण भये मिट जाय।’ ऐसे ही अज्ञान के साथ में अज्ञानमय समस्त चेष्टाओं का अभाव होता है। चेष्टाओं का अर्थ केवल शारीरिक चेष्टाएँ नहीं लेना चाहिये। मानसिक चेष्टाएँ, विचार, वचन, चेष्टा तीनों को अन्तर्गर्भित समझना।
जब ध्यान की चर्चा आये तब समझना कि सत्य धर्म भी आत्मा के ध्यान से होता है। जब ध्यान शब्द आये तब पहले से समझ लेना चाहिये - श्रद्धान, ज्ञान, ध्यान। सम्यक् श्रद्धान, सम्यक् ज्ञान पूर्वक ही सम्यग्ध्यान होता है। उसके बिना कहाँ से ध्यान होगा? एकाग्र का अर्थ चाहे किसी भी विषय में एकाग्रता होना नहीं है। रमना का अर्थ कहीं भी रमना नहीं है। अपने स्वरूप में एकाग्र होना, अपने स्वरूप में रमना और जब तक स्वरूप का भान नहीं है, दृष्टि नहीं है, तब तक ध्यान कैसे होगा ? तो सत्-दृष्टि धर्म का मूल है और मूल के बिना वृक्ष नहीं होता है। वृक्ष को हरे भरे रखने के लिये, वृक्ष के पुष्प पल्लवित करने के लिये, फलित करने के लिये मूल को सींचना चाहिये अर्थात् हमें अपने अभिप्राय को निर्मल बनाना चाहिये। श्रद्धान को सम्यक् बनाना चाहिये। समस्त तत्त्वविचार इस दृष्टि से करें।
जब हमारा श्रद्धान निर्मल होगा, इन्द्रिय सुख, सुख भासित नहीं होंगे, जब अपना सुख अपने में भासित हो जाएगा तब इन्द्रिय सुख के वशीभूत होकर जो पाप होते हैं, खोटे वचन, खोटे विचार, खोटी चेष्टाएँ होती हैं, वे सब अपने आप मिट जाती हैं; उन्हें अलग से नहीं मिटाना पड़ेगा और यदि मूल को नहीं सीचें, ऊपर-ऊपर के पत्ते सींचते रहें तो क्या होगा ? संसार वृक्ष का अभाव कैसे होगा?
शास्त्रों में वृक्ष भी दो प्रकार के कहे हैं - एक धर्म वृक्ष और एक कर्म वृक्ष। आठ कर्म हैं। इनकी उत्तर प्रकृतियाँ हैं – ये कर्म वृक्ष है। धर्म वृक्ष का मूल सम्यग्दर्शन है क्षमा, मार्दव आदि इसकी शाखायें हैं।
इसीप्रकार दो वृक्ष हैं। एक पाप वृक्ष है, एक धर्म वृक्ष है। जो तुम्हें दुःखदायी लगते हैं, तुम्हें सुहाते नहीं हैं, वह सब पापरूपी वृक्ष के फल हैं और जो-जो तुम्हें सुखदाई लगते हैं, वे धर्मवृक्ष के फल हैं। यहाँ व्यवहार धर्म और निश्चय धर्म का भेद नहीं किया। इस संसार में दो वृक्ष हैं, जो वृक्ष तुझे अच्छा लगता है, उसे सींच लो - ऐसी प्रेरणा की है।
नियमसारजी में बहुत सुन्दर कलश है - समस्त सुकृत (शुभ कर्म) भोगियों के भोग का मूल है। दुष्कृत, सुकृत, अकृत। अकृत यानि स्वाभाविक किसी के द्वारा कराया नहीं है, कृत्रिम परिणाम नहीं है। जो अकृत ज्ञानरूप परिणाम है, वह योगियों के योग का मूल है। समस्त सुकृत यानि पुण्य भोगियों के भोग का मूल है और जो दुष्कृत है वह रोगियों के रोग का मूल है। रोग शारीरिक हो या मानसिक अथवा संसार की उपाधिरूप रोग हो, सब उसमें गर्भित हैं।
सदृष्टि को धर्म का मूल समझना। जैसा सुना वैसा कह देना, उसमें सत्य धर्म नहीं होता। सत्य बोलने से पहले सत्य समझना आवश्यक है। सत्य धर्म की प्राप्ति के लिये सबसे पहले सत्य को समझना चाहिये। सत्य में स्वसत् और असत् को समझो ! सत् में अपना स्वरूप, असत् यानि शेष जो बचा। असत् का शब्दार्थ है - जो सत् नहीं है, लेकिन यहाँ असत् का अर्थ है भिन्न सत्, जो अपना सत् नहीं है। सत्-असत् का प्रयोग दो भिन्न द्रव्यों में भी कर सकते हैं। सत्-असत् का प्रयोग द्रव्य-पर्याय में भी कर सकते हैं। द्रव्य स्वभाव जो आश्रय करने योग्य है इसे सत् कहते हैं और परिणाम को असत् कह सकते हैं। असत् दृष्टि में पर्याय दृष्टि आ गई, संयोग दृष्टि आ गई, निमित्त दृष्टि भी आ गई, कर्तृत्व बुद्धि आदि सब उसमें गर्भित हो गयी।
जो सदुपयोग-दुरुपयोग शब्द बोले जाते हैं, उनका अर्थ भी सत् में लगाना। आप अपने जीवन का सदुपयोग करें। जब तक आप उपयोग का सदुपयोग नहीं करेंगे तब तक आप अपने जीवन का सदुपयोग कैसे कर पाएँगे ? ज्ञान का विषय सत् को बनायें, अपने को सत् रूप जानें – यह पहली बात है। जब आप अपने को सत् रूप जानेंगे अर्थात् स्वयं को त्रिकाल ध्रुव स्वरूप अनुभवेंगे, क्षणिक पर्यायरूप नहीं देखेंगे तब आपके ज्ञान का सदुपयोग होगा और ज्ञान जब तक अपने सत् स्वरूप से विमुख होकर क्षणिक पर्याय में उलझा है, क्षणिक भोगों में और दुनिया के कर्तृत्व के बोझ में लगा है, तब तक ज्ञान का दुरुपयोग है। जो समय आत्म आराधना में लगाना था, वह समय तुम्हारा विकथा में जा रहा है, प्रमाद में जा रहा है। विषय-कषाय के पोषण में जो समय जा रहा है, वह समय का दुरुपयोग है।
पुण्य के उदय में धन सामग्री मिली, यदि आप उसका त्याग करके अपने स्वरूप की आराधना में लग जाएँ तो धन्य भाग्य है। उत्तम कार्य तो यही है और यदि नहीं लग पाए तो यह धन वीतराग धर्म की प्रभावना में लगता है, आत्म आराधना में लगता है, आप उधर से निश्चिन्त होकर अपनी आराधना में लगते हैं तो वह धन का सदुपयोग है। यदि आप कषाय के पोषण के लिये विवेक रहित होकर धन खर्च करते हैं तो वह धन का दुरुपयोग है। आप अपना जीवन विषय-कषायों में अविवेक से खर्च कर रहे हैं, बर्बाद कर रहे हैं, यह जीवन का दुरुपयोग है।
आप अपना ज्ञान तत्त्व निर्णय में, तत्त्वविचार में नहीं लगाते हैं, विषयों से विरक्त कैसे हों ? स्वरूप में हम सावधान कैसे हों ? यह बात नहीं सोचते, बस यही सोचते रहते हैं कि पैसा कैसे बढ़े, नाम प्रतिष्ठा कैसे प्राप्त हो, शरीर स्वस्थ कैसे रहे, यदि इनमें ज्ञान लगाते हैं तो यह है ज्ञान का दुरूपयोग ! दु और कु उपसर्ग खोटे अर्थ में होते हैं। जैसे कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्र, कुधर्म - विनय पाठ में कुटेव शब्द का प्रयोग भी हुआ है। सबके साथ लगा है राग ! ‘मेटो राग कुटेव’ - यह आप जो राग का, विषय-कषाय का पोषण करते हैं, वह दुरुपयोग है।
आपने बहुत शास्त्र पढ़े और धारणा ज्ञान बहुत अच्छा है, अच्छा नहीं ज्यादा है ! अच्छा हम नहीं मानते, लोग कहते हैं, इनका ज्ञान बहुत अच्छा है। हम कहते हैं कि अच्छा तो हम तब मानें जब यह ज्ञान आत्माराधना में लग जाए ! कुतर्क देकर तत्त्व का खण्डन करता रहे, अपनी कषाय का, पक्ष का पोषण करता रहे, वह काहे का अच्छा है?
लोग कहते हैं कि यह भोजन बहुत अच्छा है! अच्छा आपने क्या समझ लिया है ? यह भोजन यदि स्वास्थ्य, संयम बिगाड़ता है, हिंसा, अहिंसा का कुछ विवेक नहीं, फालतू पैसा खर्च होता हो, वह कैसा अच्छा ? अच्छा तो वह है जो हमारे संयम में सहायक हो। जिसके कमाने में हिंसा नहीं हो, बनाने में हिंसा नहीं हो। भोजन की विधि बताई थी, भोजन कैसा होना चाहिए ? पहला – न्याय पूर्वक कमाया गया हो, दूसरा – यत्नाचार और विवेक पूर्वक बनाया गया हो, तीसरा – वात्सल्य पूर्वक खिलाया गया हो, चौथा – अनासक्तता पूर्वक खाया गया हो, वह भोजन संयम में निमित्त होता है, उसे शुद्ध भोजन कहते हैं। शुद्ध भोजन का अर्थ है द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की शुद्धता। उसका उद्देश्य भी तो शुद्ध हो ! तब ही तो चौका कहेंगे। चार के समूह को ही चौका कहेंगे, चार कषायों के समूह को ही चौकड़ी कहेंगे अथवा चार के समूह को ही चतुष्टय कहते हैं।
भरतेश वैभव में आया है, भरत महाराज मुनिराज के अंजुलि में ग्रास रख रहे हैं और देखो उन मुनीश्वर को शोधे हुये भोजन को फिर शोध रहे हैं। लोगों को तो ऐसा लगे कि ये बड़े बहमी हैं, किसी पर इन्हें भरोसा नहीं है, बाई ने शोध कर बनाया, उसने भी शोध कर दिया, भरतजी भी शोध कर रख रहे हैं फिर भी वे शोध रहे हैं। अरे भाई ! तुमने अपना काम किया, हमने अपना काम किया, इसमें क्या परेशानी है? यह इन्द्रिय संयम है, तो मुनिराज ने शोधा ! आपको लगा केवल आहार को शोधा है, लेकिन कुछ और भी शोधा है, यह आहार पौद्गलिक है, इसे पौद्गलिक शरीर को अर्पित कर देते हैं और स्वयं ज्ञानमय आहार को ग्रहण करते हैं। गृद्धता नहीं है, आसक्ति कहाँ से आयेगी बताओ ? प्रीति, रुचि, आत्मा में है - लक्ष्य और भावना यही है कि अनाहारी दशा साध्य है, अपना अनाहारी स्वरूप ध्येय है। ऐसे इन योगीश्वरों को आसक्ति कहाँ से होगी ? आहार ग्रहण करते हुए भी कहते हैं कि - हम साक्षात् अनाहारी हैं।
सत् दृष्टि पूर्वक, सद् ज्ञान पूर्वक जो कषायों से रहित साम्य-भावरूप परिणति है, जिसमें खोटे विचार नहीं हैं, वह सत्य धर्म है। यदि खोटे विचार आते हैं तो आप स्वयं से पूछें कि इन खोटे विचार करने का आपको अधिकार क्या है? आप विपरीत विचारों पर अंकुश लगाना सीखो ! तब विपरीत वचन और विपरीत चेष्टाएँ अपने आप रुक जाएँगी।
दर्शन स्तुति ‘अति पुण्य उदय’ में ऐसी एक लाईन आई है - ‘मन दोष वादन तें भगे’ अर्थात् हम किसी के दोष न कहें। दोषों का कथन वचन से होता है या मन से होता है ! लिखा तो है कि वादन अर्थात् वचन से। आप दोषों का विचार करते रहें, कहें कुछ भी नहीं, लेकिन प्रसंग पड़ने पर वे निकल ही जाते हैं, इसलिये उनका विचार करो ही नहीं, मन पर ही अंकुश लगाओ। खोटे विचार रोकने का उपाय क्या है? ये दुःख के कारण हैं, ये खोटे हैं, धर्मनिंद्य हैं, इनका फल भव-भव में दुःखदाई है - ऐसा विचार करने से खोटे विचारों में थोड़ी मन्दता आती है, लेकिन जब तक सम्यक् विचार नहीं करोगे तब खोटे विचार अपने आप आ जाएँगे, बुलाने नहीं पड़ेंगे।
सत्-असत् का विवेक होने पर स्व-पर का सम्यक् श्रद्धान होने पर, पहले जो पर के लक्ष्य से कषाय की, राग-द्वेष की परिणति होती थी, आकुलता उत्पन्न होती थी, उसका अभाव होकर जो साम्य भाव हुआ उसका नाम ही सत्य धर्म है। इसी का नाम शौच धर्म है। इसी को सत्य धर्म क्यों कह रहे हैं? इसमें असत्यपना नहीं है, मिथ्यापना नहीं है विपरीतता नहीं है। जैसा स्वभाव है वैसा ही है यह परिणाम ! इसलिये इसका नाम सत्य धर्म है।
ऐसा सत्य धर्म प्रगट होने में किसके वचन निमित्त होते हैं, ऐसा सत्य धर्म प्रगट होने पर कैसे वचन निकलते हैं? जिसके अन्तर में कषायों का जहर भरा है, जिन्हें वस्तु स्वरूप का भान नहीं है, विपरीत मान्यता है, उनके वचन ही कषाय गर्भित, असत्य वचन निकलते हैं और जब सम्यक् श्रद्धान हुआ, सम्यक् ज्ञान हुआ, उनके वचन कैसे निकलेंगे ? छहढाला में से जानो –
जग सुहितकर सब अहित हर, श्रुति सुखद सब संशय हौं ।
भ्रम-रोग हर जिनके वचन, मुख चन्द्र तैं अमृत झरें ।।’
जिनके अन्दर अमृत है, तो अमृत निकलेगा, कपूर की शीशी खोलोगे तो उसमें से कपूर की गन्ध निकलेगी, हींग की शीशी खोलोगे तो हींग की गन्ध ही निकलेगी ! जिसके अन्तर में अमृत है, जो यह समझते हैं कि ‘मैं तो अजर, अमर तत्त्व हूँ’ अरे भाई ! क्यों घबड़ाते हो तुम तो अजर, अमर तत्त्व हो ऐसे वचन निकलेंगे और जो अपने को शरीररूप मान रहा है वह तो रोएगा, वचन कैसे निकलेंगे ? लेकिन वचन आप बोल सकते हो क्या ? वचन का, शरीर की चेष्टा का और परिणामों का निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है। जो वीतराग सर्वज्ञ हैं, उनकी निरक्षरी दिव्य-ध्वनि में समस्त वस्तुस्वरूप अपने आप प्रकाशित हो जाता है।
नियमसारजी में कुन्दकुन्द स्वामी कह रहे हैं – ‘रे साधिये निज कार्य अविरल, साधु रत रह मौन में।’ तुम मौन रहकर अपनी आत्मा का हित साधो, अपनी आत्मा का अनुभवन करो ! दुनिया की उलझनों में वाद-विवाद में कोई दम नहीं है, वह तो अहित करने वाला है। रे साधु ! तुमने किसलिये यह जिनशासन पाया है, किसलिये यह घर छोड़ा है, किसलिये इस मार्ग में निकले हो ? दुनिया की बातों में मत आना।
पण्डितजी से पूछो कि यह क्या है? तो वह कहेंगे पुद्गल, और गहराई से सोचो तो पर है। जो आपके ज्ञान में, विचार में आया है, वही तो वचन में निकलेगा! यह क्या है? घर है, यह क्या है? कारागृह है। ‘तन कारागृह, वनिता बेड़ी।’ यह क्या है? परिग्रह। वस्तु तो जैसी है वैसी है, आप वैसा बोलोगे जैसी आपको जचेगी। यह क्या है?
आपने दृष्टान्त पढ़ा होगा! पति और पत्नी जा रहे थे। आर्थिक परिस्थिति कमजोर थी, सोचा दूसरे गाँव में धन्धा करेंगे। पति आगे, पत्नी पीछे आ रही थी। ठोकर लगी। एकदम उसमें से मोहरों से भरा कलश निकल पड़ा, पति उस पर बैठ गया, उसके ऊपर धूल डालने लगा; पीछे से पत्नी आई, पूछा क्यों क्या कर रहे हो ? कुछ नहीं, कुछ नहीं ! बताओ तब चलेंगे। सही बात यह है कि इसमें से कलश निकला, मोहरों से भरा है हमने सोचा कहीं तुम्हारी नीयत न डिग जाए, कहीं एकाध उठा न लो, अपनी परिस्थिति वैसे ही खराब है, पाप का उदय तो है ही, पाप का परिणाम, चोरी का परिणाम नहीं आ जाए, इसलिये इस पर धूल डाल रहे हैं। पत्नी बोली धूल पर धूल डाल रहे हो। तुम्हें ये मोहरें दिख क्यों रही हैं! विचार करो, जब मोहरें दिख रही हैं तो मोहरें ही कही जाती हैं और जब धूल दिखती है तब धूल कही जाती है। उन्हें खेह का खजाना दिखा तो उन्होंने उसे खेह का खजाना कह दिया, तुम्हें सम्पदा दिखी तो तुमने सम्पदा कह दी!
वचन जो होते हैं, उनका परिणामों के साथ निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है। जिनके अन्तर में अमृत झर रहा है, उनके वचनों में भी अमृत झरता है, तत्त्व की प्ररूपणा होती है और जिनको सत् असत् का विवेक ही नहीं है, विषयों में सुख की मान्यता पड़ी है, खूब पढ़ते हैं सुनते हैं। प्रसंगानुसार सच्ची बातें बनाते हैं, लेकिन कोई भोग-संयोग सम्बन्धी बात आ जाए तो ऐसी आँख फट जाती है; दिखाना-दिखाना बहुत अच्छा! अच्छा लगता है तो मुँह से अच्छा निकलता है।
अगर उदासीनता के धारक योगीश्वरों से पूछा भी जाए कि महाराज यह कैसी है? तो वे कहेंगे जैसी है, वैसी है, हम क्या कहें! भिन्न सत् है। उनके श्रीमुख से क्या निकला ! विश्व में कोई खरा नहीं, कोई बुरा नहीं।
सत्य धर्म का और सत्य वचन का ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है। सत्य वचनों से सत्य धर्म पहिचाना जाता है, समझा जाता है, इसलिये सत्य धर्म तो पूज्य है ही, सत्य वचन भी पूज्य कहे गये हैं, जिनवाणी, दिव्यध्वनि, ये सत्य वचन ही तो हैं न! निर्दोष पुरुष के वचन स्वानुभूत प्रसूत होते हैं। उनके वचन सत्य धर्म की प्राप्ति में, तत्त्व की प्राप्ति में, रत्नत्रय की प्राप्ति में निमित्तभूत होते हैं, इसलिये सत्य वचन को भी सत्य धर्म के अन्तर्गत गर्भित किया गया है।
सत्य वचनों के द्वारा सत्य धर्म समझा जाता है और जिन्होंने सत्य धर्म प्रगट किया है, उनके वचनों में ही सत्य धर्म की प्ररूपणा होती है। आदान-प्रदान तो वचनों से ही होता है न ! लेकिन हम पढ़कर या सुनकर वैसा कहना सीख जाएँ तो उसे सत्य धर्म नहीं माना जा सकता। देखा-देखी हम भी कहने लगे, सुख तो निवृत्ति में है ! ‘तो आ जाओ! अब कब निवृत्ति लोगे ?’ लेकिन सच पूछो तो निवृत्ति बाहर से लेने की वस्तु नहीं है। अमृतचन्द्रस्वामी पुरुषार्थसिद्धिउपाय में, निवृत्ति के साथ तत्त्व शब्द का भी प्रयोग किया है ‘तत्त्वं निवृत्ति रूपम्’ अरे ! तत्त्व निवृत्ति स्वरूप ही है ! तत्त्व दृष्टि हो तो निवृत्ति सच्ची होती है और निवृत्ति हो तो तत्त्व की भावना बढ़ती है।
बाहर की निवृत्ति अंतरंग तत्त्व की भावना एवं प्राप्ति के लिए है। निवृत्ति दुनिया में मान प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये नहीं है, पुण्य प्राप्त करने के लिये नहीं है, तत्त्व की साधना के लिये है और तत्त्वाराधना करने पर ही निवृत्ति सफल होती है, नहीं तो खाली-खाली लगेगा। अब क्या करें ? यदि मति व्यवस्थित नहीं होगी तो व्यवस्थाएँ ढूँढ़ते फिरेंगे। व्यवस्थाओं के मोह से, विषयों की चाह से पाप बंध होगा तो व्यवस्थाएँ भी दूर होती चली जाएँगी और जीवन भर हम उसी में उलझे रहेंगे। भाई ! व्यवस्थाएँ मत ढूँढ़ो! मति को व्यवस्थित करो ! तत्त्व की आराधना में अपनी परिणति को समर्पित करो !
समयसार की 49वीं गाथा की टीका में बहुत सुन्दर चर्चा आई है - वह टंकोत्कीर्ण आत्मा कैसा है ? जिसने अपना सर्वस्व भेदज्ञानी जीवों को समर्पित किया है। क्यों समर्पित किया है? आप अपनी चाबी किसको सौंपेंगे ! भेदज्ञानी जीवों ने अपना सर्वस्व शुद्धात्मा को सौंपा है, तब शुद्धात्मा का सर्वस्व भेदज्ञानी जीवों को मिलता है। जैसे - जो कन्या अपना सर्वस्व राजा को सौंपती है तो राजा का पूरा अधिकार उस कन्या को मिलता है। शिष्य अपना सर्वस्व गुरु को सौंपता है तो गुरु का सर्वस्व शिष्य को प्राप्त होता है।
भेदज्ञानी जीवों को जिसने सर्वस्व सौंप दिया है, क्यों सौंप दिया है? क्योंकि भेदज्ञानी जीवों ने अपना सर्वस्व आत्मा को सौंप दिया है। हम बाल बच्चों से बहुत बार कहते हैं कि चाबी खींचने की कोशिश मत करो, इस लायक बनो कि चाबी तुम्हें सौंप दी जाए, पिताजी कहें कि लो बेटा सम्भालो और बेटा कहे कि पिताजी इसे आप अपने पास रखो। अभी आप हैं, आपके सामने अभी हम नहीं। यह लोक व्यवहार की बात है।
एक होता है पारमार्थिक सत्य, एक होता है व्यावहारिक सत्य। व्यावहारिक सत्य भी अनेक प्रकार के होते हैं। ये व्यावहारिक सत्य है। पारमार्थिक सत्य नहीं। निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धों पर जो चर्चा आई वह व्यावहारिक सत्य है। लोक व्यवहार में जो चर्चा आती है, वो स्वयं स्वाध्याय में पढ़ना ! स्वाध्याय का पहला चरण है वाचना ! लेकिन क्या करें हमारी दशा उस बाई की तरह है जो अपने लिये रोटी बनाने में तो आलस करती है और दूसरों के लिये दस प्रकार के व्यंजन बनाती है। ऐसे ही यदि हमें सुनाना हो तो पढ़कर आएँगे और सुनना हो तो बिना पढ़े बैठ जाएँगे। दूसरों को सुनाने के लिये हम रातभर तैयारी करते हैं और सुनने के लिये आलसी हैं।
वाचना आपका कर्त्तव्य है और नहीं समझ में आये तो पूछना आपका अधिकार है। पूछने की भी एक विधि है, यदि कुछ पूछना हो तो अति विनयवान होकर पूछता है! गुरुओं के कहे अर्थ पर बारम्बार विचार करना ! पहले कर्त्तव्य है फिर अधिकार है। कर्त्तव्य की झोली में अधिकार है। यदि वाचते नहीं हैं तो आपके पूछने का अधिकार नहीं है। वाचना, पूछना, अनुप्रेक्षा फिर आम्नाय का क्रम है।
आम्नाय का अर्थ होता है मिलाना। कुन्दकुन्द आम्नाय है न ! जो हमने समझा है उसे आगम से प्रमाण करना। अन्त में स्वानुभव से प्रमाण करना। यह तो कुन्दकुन्दाचार्य की आज्ञा है। फिर उसे धारणा में लेना, क्योंकि ये बातें भूलने लायक नहीं हैं। किसी का घर भूल जाने से कोई हानि नहीं है, लेकिन अपना घर यदि भूल गये तो कहाँ भटकोगे ? चार गति चौरासी लाख योनियों में भटक रहे हैं। तत्त्व की भूल होने के फल में यह भटकन हो रही है। यह धारणा ज्ञान तो पर्याय के साथ विनश जाएगा और ये पुण्य भाव, इसमें कोई दम नहीं है। उदयाधीन है, बदलते रहते हैं, अध्रुव हैं। भाई! अपना स्वरूप समझो !
जब आम्नाय नाम का स्वाध्याय हो गया तब आप धर्मोपदेश के अधिकारी हुए। सत्य स्वरूप को समझने पर ऐसा करुणा भाव आता है कि जगत के सब जीव इस मार्ग को समझें। करुणा भाव से निस्पृह भाव से, विनय भाव से, सहज भाव से, दातार के सात गुणों से युक्त होकर ज्ञानदान देना वह धर्मोपदेश है। पण्डिताई के लिये, अभिमान के लिये सम्मान के लिये, प्रदर्शन के लिये, रौब के लिये, कुछ भी कह देना, वह धर्मोपदेश नहीं है।
तत्त्व का स्वरूप करुणा भाव से जगत के जीवों को बताने का भाव आता है। इधर से कहा तो करुणा भाव, उधर से कहें तो निस्पृह भाव। बदले में कोई अपेक्षा नहीं, वह धर्मोपदेश नाम का स्वाध्याय है। ऐसा सत्य वचन कहलाता है। लौकिक सत्य अलग है, पारलौकिक सत्य अलग है, पारलौकिक सत्य में भी व्यवहार सत्य अलग है और पारमार्थिक सत्य अलग है। एक आत्मा को समझने के लिये है। जिसकी जिस जगह पर उपयोगिता है, वहाँ वैसा समझ लेना चाहिये।
‘सदृष्टिज्ञानवृत्तानि’ उसी का नाम सत्य धर्म है, उसमें वस्तु का जैसा स्वरूप है, वैसा माना है। सत् को सत् मानना। सत् को असत् नहीं मानना। विद्यमान को अविद्यमान नहीं मानना । अविद्यमान को विद्यमान नहीं मानना। अन्यथा नहीं मानना। गर्हित वयन नहीं बोलना। ‘पर-वधकार कठोर निंद्य, नहिं वयन उचारै। पर-वधकार कठोर निंद्य, नहिं भाव विचारै।’ जैसा स्वरूप है वैसा समझना और वैसा समझ करके राग-द्वेष की निवृत्ति होना वह सत्य धर्म है।
राग-द्वेष की निवृत्ति होने पर जो सत्य वचन निकले वह उपचार से सत्य धर्म है। सत्य वचन से सत्य धर्म समझा जाता है। सत्य धर्म प्रगट होने में वे बाह्य निमित्त हैं। सत्य धर्म प्रगट होने पर सहज प्रवृत्ति ज्ञानी के जीवन में होती है। वचनों की सावधानी के लिये कहा कि जिन्होंने अपने वचन बिगाड़े उन्होंने यह समझो अपना भव ही बिगाड़ लिया। हमारे वचनों की प्रामाणिकता होनी चाहिये। कई बार हम कुछ भी कह देते हैं लेकिन जिससे कहा है वह भी आदमी है।
ज्ञानी की बातों का अनादर करना वह भगवान का अनादर है क्योंकि उनके वचनों से धर्म तीर्थ प्रवर्तता है, उनके वचनों का आदर करने से, उनके वचनों का श्रवण करने से, उनके वचनों का निर्णय करने से, श्रद्धान करने से, धर्म तीर्थ की प्रवृत्ति होती है। वचनों से ही तो धर्म तीर्थ की प्रवृत्ति होती है।
जिनेन्द्र भगवान के वचनों का अनादर करने से अर्थात् सुनी-अनसुनी करने से संसार की प्रवृत्ति होती है। जो जिन-वचनों को नहीं सुनते हैं, निर्धार नहीं करते, उपेक्षा करते हैं, ऐसे अधर्म परिणामों से पाप की प्रवृत्ति होती है, दुःख की प्रवृत्ति होती है। धर्म वचनों से तीर्थ की प्रवृत्ति होती है। धर्म वचनों से तीर्थ की प्रवृत्ति और कुवचनों से कुतीर्थ की प्रवृत्ति होती है।
वचन की प्रमाणता से पुरुष की प्रामाणिकता होती है और पुरुष की प्रमाणता से ही वचन की प्रामाणिकता होती है। यह न्याय शास्त्र का वाक्य है। तात्पर्य यह है कि सत्य धर्म और सत्य वचन के स्वरूप को भलीप्रकार समझकर सत्यधर्म को प्रकट करने के लिये जीवन में निरन्तर पुरुषार्थ रहना चाहिये। हमें सत्यग्राही भी बनना है और सत्याग्रही भी बनना है, दुराग्रही नहीं, हठाग्रही नहीं, सत्याग्रही रहना है। सत्याग्रह का अर्थ है – सत्य पर दृढ़ रहना। सत्य का पक्ष निडर होकर करना चाहिये । सत्य की प्ररूपणा निर्भय रहकर करना चाहिये। सत्य को समझते समय कोई प्रकार का भय नहीं रखना चाहिये। सत्य केवल वचनों तक नहीं, सत्य तो वस्तु का स्वरूप ही समझो। विचारना !
ॐ नमः सिद्धेभ्यः ।
सहजानन्दी शुद्ध स्वरूपी अविनाशी मैं आत्म स्वरूप ।
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