धर्म, दर्शन और न्याय में अन्तर | Dharm Darshan Aur Nyay Men Antar

धर्म, दर्शन और न्याय में अन्तर

-प्रो. वीरसागर जैन

न्यायशास्त्र के विद्यार्थियों को यह भी भलीभांति समझ लेना चाहिए कि वे अब न्याय पढ़ रहे हैं, धर्म-दर्शन नहीं | देखा गया है कि बहुत-से विद्यार्थी अभी धर्म-दर्शन की मानसिकता में ही जीते रहते हैं, उससे ऊपर नहीं उठ पाते हैं, जबकि न्याय की प्रकृति उनसे एकदम अलग है, वह धर्म-दर्शन से काफी ऊपर है और उसे हम तबतक ठीक से नहीं समझ सकते, जबतक उसी की मानसिकता में न आ जाएँ | न्याय को भलीभांति समझने के लिए उसकी प्रकृति को जानना अत्यन्त आवश्यक है |

विचारणीय है कि धर्म, दर्शन और न्याय में क्या अन्तर है |

धर्म विधि-निषेध के उपदेश का नाम है | वह सीधे-सीधे कहता है कि यह करो, यह मत करो | उदाहरणार्थ- सत्य बोलो, झूठ मत बोलो |

इसके बाद धर्म के उपदेश को जिन विचारों द्वारा पुष्ट किया जाता है, उन विचारों को दर्शन कहते हैं | जैसे कि- धर्म के उक्त उपदेश के सम्बन्ध में दर्शन कहेगा कि हमें सत्य इसलिए बोलना चाहिए क्योंकि इससे हमें प्रतिष्ठा मिलती है, अथवा- इससे हमें कारागृह, मृत्यु आदि के राजदंड नहीं मिलते, अथवा- इससे हमें अगले जन्म में स्वर्गादि की प्राप्ति होती है, अथवा- इससे व्यापारवृद्धि होती है, अथवा- इससे सुन्दर समाज की रचना होती है, अथवा- इससे हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है, अथवा- इससे हमारी आत्मा पवित्र होती है, इत्यादि | यह दर्शन है | दर्शन अनेकानेक हो सकते हैं ।

इसके बाद जो दर्शन के विचारों की भी युक्तिपूर्वक परीक्षा करे कि उनमें कौन-सा सत्य है और कौन-सा गलत, उसे न्याय कहते हैं | जैसे कि- सत्य बोलने से प्रतिष्ठा मिलती हो तो सभी सत्य बोलनेवालों को प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए और किसी भी असत्य बोलनेवाले को प्रतिष्ठा नहीं मिलनी चाहिए, इत्यादि |

इस प्रकार धर्म, दर्शन और न्याय तीनों की प्रकृति भिन्न-भिन्न है | धर्म आचारप्रधान है, दर्शन विचारप्रधान और न्याय परीक्षाप्रधान या युक्तिप्रधान |

धर्म, दर्शन और न्याय के अन्तर को हम यहाँ कुछ और उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं | यथा-

  1. धर्म कहेगा कि परिग्रह-संचय मत करो, दर्शन एक विचार देकर इसकी पुष्टि करेगा कि परिग्रह-संचय इसलिए मत करो, क्योंकि परिग्रह से चिन्ता बढ़ती है, किन्तु न्याय इस विचार की भी युक्तिपूर्वक परीक्षा करेगा कि यह बात समीचीन है या नहीं ।
  2. धर्म कहेगा कि दान करो, दर्शन एक विचार देकर इसकी पुष्टि करेगा कि दान इसलिए करो, क्योंकि दान से मोह क्षय होता है, किन्तु न्याय इस विचार की भी युक्तिपूर्वक परीक्षा करेगा कि यह बात समीचीन है या नहीं ।
  3. धर्म कहेगा कि ध्यान करो, दर्शन एक विचार देकर इसकी पुष्टि करेगा कि ध्यान इसलिए करो, क्योंकि ध्यान से कर्मों का क्षय होता है, किन्तु न्याय इस विचार की भी युक्तिपूर्वक परीक्षा करेगा कि यह बात समीचीन है या नहीं ।
  4. धर्म कहेगा कि तीर्थयात्रा करो, दर्शन एक विचार देकर इसकी पुष्टि करेगा कि तीर्थयात्रा इसलिए करो, क्योंकि तीर्थयात्रा से रत्नत्रय की आराधना बलवती होती है, किन्तु न्याय इस विचार की भी युक्तिपूर्वक परीक्षा करेगा कि यह बात समीचीन है या नहीं ।

इसी प्रकार से अन्य भी अनेक उदाहरण स्वयं समझे जा सकते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि न्याय की प्रकृति धर्म-दर्शन से भिन्न है । न्याय ही हमें सत्य-असत्य की समीचीन परीक्षा करना सिखाता है । धर्म केवल उपदेश देता है, दर्शन केवल उसकी पुष्टि करता है, किन्तु वह उपदेश और वह विचार वास्तव में सत्य है या नहीं -इसका विवेक करना और फिर उसमें से असत्य को छोड़कर सत्य को ग्रहण करने की कला हमें न्याय ही सिखाता है । दूध को दूध और पानी को पानी करने की हंस जैसी कला हमें न्याय ही सिखाता है । हीरे को हीरा और कांच को कांच जानने की जौहरी जैसी कला हमें न्याय ही सिखाता है । न्याय में ही वह क्षमता है जो मिथ्या बात को पहचानकर उसका ठीक से खण्डन कर सकता है और सम्यक् बात को पहचानकर उसका भलीभांति मण्डन कर सकता है ।

यहाँ यद्यपि ऐसा भी लगता है कि दर्शन का उद्भव भी प्रारम्भ में इसीलिए हुआ होगा कि धर्म-कथनों की परीक्षा हो सके, उनमें जो असत्य हों उनको छोड़कर जो सत्य हों उनको भलीभांति स्थापित किया जा सके, वे केवल आज्ञामात्र या अन्धविश्वास जैसे न रहें; किन्तु बाद में अनेकानेक दर्शन खड़े हो जाने या अन्य किसी कारण से उस प्रयोजन की पूर्ति दर्शन से नहीं हो पा रही होगी, अतः न्यायशास्त्र का उद्भव-विकास हुआ होगा । जो भी हो, न्याय का महत्त्व असाधारण है, वह हमें पूरी ईमानदारी से सत्यासत्य की परीक्षा करना सिखाता है, अतः हमें उसे सावधानी से समझने का प्रयत्न करना चाहिए ।

धर्म, दर्शन एवं न्याय में ऐसा ही कुछ अन्तर न्यायशास्त्र के धुरन्धर विद्वान् डॉ. दरबारीलाल कोठिया ने भी अपनी कृति ‘जैन न्याय की भूमिका’ में पृष्ठ 8 एवं 9 बताया है, जो पठनीय है | यथा-

“आचार का नाम धर्म है और धर्म का जिन विचारों द्वारा समर्थन एवं संपोषण किया जाता है वे विचार दर्शन हैं तथा धर्म के संपोषण के लिए प्रस्तुत विचारों को युक्ति-प्रतियुक्ति, खंडन-मंडन, प्रश्न-उत्तर एवं शंका-समाधानपूर्वक दृढ़ करना न्याय है, प्रमाणशास्त्र है।

इन तीनों के पार्थक्य को समझने के लिए यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है | सब जीवों पर दया करो, किसी जीव की हिंसा न करो, सत्य बोलो-असत्य मत बोलो आदि विधि और निषेधरूप आचार का नाम धर्म है। जब इसमें ‘क्यों’ का सवाल उठता है तो उसके उत्तर में कहा जाता है कि जीवों पर दया करना कर्तव्य है, गुण (अच्छा) है, पुण्य है और इससे सुख मिलता है; किन्तु जीवों की हिंसा करना अकर्त्तव्य है, दोष है, पाप है और उससे दुःख मिलता है। इसी तरह सत्य बोलना कर्त्तव्य है, गुण है, पुण्य है और उससे सुख मिलता है; परन्तु असत्य बोलना अकर्त्तव्य है, दोष है, पाप है और उससे दुःख प्राप्त होता है। इस प्रकार के विचार दर्शन कहे जाते हैं और जब इन विचारों को दृढ़ करने के लिए यों कहा जाता है कि यतः दया करना जीव का स्वभाव है, यदि इसे स्वभाव न माना जाए तो कोई भी जीव जीवित नहीं रह सकता, सब सबके भक्षक या घातक हो जाएंगे। परिवार में, देश में और विश्व के राष्ट्रों में अनवरत हिंसा रहने पर शान्ति और सुख कभी उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। इसी प्रकार सत्य बोलना मनुष्य का स्वभाव न माना जाए तो परस्पर में अविश्वास छा जाएगा और लेन-देन आदि के सारे लोक-व्यवहार लुप्त हो जाएंगे और वे अविश्वसनीय बन जायेंगे । इस तरह धर्म के समर्थन में प्रस्तुत विचाररूप दर्शन को दृढ़ करना न्याय (युक्ति या प्रमाणशास्त्र) है।

तात्पर्य यह कि धर्म जहाँ सदाचार के विधान और असदाचार के निषेधरूप है, वहाँ दर्शन उनमें कर्त्तव्याकर्त्तव्य, पुण्यापुण्य और सुख-दुःख का विवेक जाग्रत करता है तथा न्याय दर्शन के रूप में प्रस्तुत विचारों को हेतुपूर्वक मस्तिष्क में बिठा देता है।

वस्तुतः न्यायशास्त्र से दर्शनशास्त्र को जो दृढ़ता मिलती है वह स्थायी, विवेकयुक्त और निर्णयात्मक होती है। यही कारण है कि सभी भारतीय (जैन, बौद्ध और वैदिक) धर्मों में दर्शनशास्त्र और न्यायशास्त्र का पृथक्-पृथक् प्रतिपादन किया गया है तथा दोनों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इतना ही नहीं, उन पर बल देते हुए उन्हें विकसित एवं समृद्ध किया गया है।”

धर्म, दर्शन और न्याय के अन्तर को गहराई से समझने की प्रेरणा मुझे डॉ. दरबारीलाल कोठिया जी के इस उपर्युक्त कथन से ही मिली है, अतः मैं उनका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ, यद्यपि उनसे तो मैंने बहुत कुछ सीखा है, जिसे गिनाया नहीं जा सकता, वे मेरे साक्षात् गुरु न सही, पर उससे कम भी मुझे नहीं लगते | मैं उनको विनम्र प्रणाम करता हूँ ।