धर्म और पर्यावरण
-प्रो. वीरसागर जैन
(जैन धर्म के विशेष सन्दर्भ में)
‘पर्यावरण-प्रदूषण’ आज का सबसे अधिक ज्वलन्त मुद्दा है। आज इसने सारे विश्व को चिन्तित होने पर मजबूर कर दिया है।
पर्यावरण-प्रदूषण ने न केवल किसी एक देश विशेष को हानि पहुँचाई है, अपितु समूची जीव-जातियाँ इस भयंकर खतरे की चपेट में आ गई हैं। अनेक प्रजातियाँ तो नष्ट (लुप्त) ही हो गई हैं और अनेक प्रजातियाँ नष्ट होने के कगार पर आ गई हैं। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण आज प्रकृति का सारा सन्तुलन गड़बड़ा गया है।
इतिहास उठाकर देखें तो ज्ञात होता है कि विपदाएँ तो प्राचीन काल में भी बड़ी-बड़ी आई थीं, पर उनसे एक सीमित क्षेत्र में ही नुकसान होता रहा है; परन्तु पर्यावरण-प्रदूषण तो आज एक ऐसे सर्वग्रासी राक्षस के रूप में हमारे सामने आया है, जिसने कहीं भी किसी को भी नहीं छोड़ा है। अनेकानेक सज्जन, निर्दोष लोग और छोटे-छोटे बच्चे तक भी पर्यावरण-प्रदूषण के कारण महादुःख उठाते हुए असमय ही काल के गाल में जा रहे हैं।
दुनिया के किसी भी अस्त्र-शस्त्र, रोग, महामारी, अकाल, तूफान, दैत्य, राक्षस आदि से भी सृष्टि का कभी उतना नुकसान नहीं हुआ होगा, जितना कि आज पर्यावरण-प्रदूषण से हो रहा है।
पर्यावरण-प्रदूषण केवल एक समस्या नहीं है, अपितु अनेकानेक समस्याओं का जनक है, मूल है। इसके ही कारण विश्व में अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। जैसे- ग्लोबल-वार्मिंग (global warming), स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएं, शुद्ध अन्न-जल की समस्या, स्वच्छ-वायु समस्या, इत्यादि।
पर्यावरण-प्रदूषण से आज समाज में स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ बहुत अधिक बढ़ गई हैं। आजकल कहीं भी कोई भी व्यक्ति पूर्णरूप से स्वस्थ नहीं रह रहा है, जबकि गली-गली में आधुनिक चिकित्सालय खुले हुए हैं।
अन्न, जल, वायु आदि में भी प्रदूषण ने अपना भयंकर कुत्सित प्रभाव व्याप्त कर दिया है। आज शुद्ध अन्न, जल, फल, सब्जी आदि कुछ नहीं मिलता। ये सभी शरीर को पोषण देने की बजाय शोषण का कार्य करने लगे हैं। पानी की भी कितनी विकराल समस्या हमारे सामने है- यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इस विषय में विशेषज्ञों का तो यहाँ तक कहना है कि अगर अगला विश्वयुद्ध हुआ तो जल के ही कारण होगा। वायु का भी बड़ा बुरा हाल है। सांस लेने तक के लिए शुद्ध ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। अभी कुछ दिन पूर्व ‘नवभारत टाइम्स’ (हिन्दी दैनिक, नई दिल्ली) में समाचार छपा था कि दिल्ली गैस चेम्बर बन गई है।
इस प्रकार पर्यावरण-प्रदूषण आज एक बड़ी भारी समस्या के रूप में उभर कर विश्व के सामने आया है तथा इससे बचने के लिए आए दिन वैश्विक-स्तर पर शिखर सम्मेलन, पृथ्वी सम्मेलन एवं अनेक सेमीनार आदि आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सभी देशों के समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक आदि बड़े-बड़े बुद्धिजीवी लोग भाग ले रहे हैं और इस समस्या के समाधान पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
इससे ज्ञात होता है कि पर्यावरण एक बड़ा ही गंभीर एवं प्रयोजनभूत विषय है, जिस पर काफी विस्तार से वार्तालाप किया जा सकता है और इसके विभिन्न पहलुओं पर पृथक्-पृथक् भी विस्तार से चर्चा की जा सकती है, की भी जानी चाहिए, परन्तु वह सब आज इन्टरनेट आदि के माध्यम से और समाचार-पत्रों के माध्यम से भी हम सबको दैनिक जीवन में नियमित रूप से प्राप्त हो रही है, अतः यहाँ हम उस विषय को विराम देकर इस महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा करते हैं कि आखिर धर्म की इस विषय में क्या भूमिका हो सकती है? क्या धर्म और पर्यावरण का कुछ रिश्ता है? क्या कोई धर्म पर्यावरण-प्रदूषण की कोई बात कहता है? या फिर सभी धर्मों में पर्यावरण-चेतना पाई जाती है?
विविध धर्म-दर्शनों के यथाशक्ति किए गए अध्ययन के आधार पर मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि सभी धर्मों में पर्याप्त मात्रा में पर्यावरण-चेतना पाई जाती है। सभी दर्शनों और धर्मों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी प्रकार से पर्यावरण-संरक्षण का उपदेश दिया है। जैसे- वेदों में जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, सूर्य, चन्द्र आदि को देवता मानकर उनकी उपासना की बात की गई है, इत्यादि।
किसी भी धर्म ने पर्यावरण को प्रदूषित करने का मूलतः कोई निर्देश नहीं दिया है। आवश्यकता आज इस बात की है कि इस विषय को धर्म-ग्रन्थों के उद्धरणों के द्वारा समाज के सम्मुख लाया जाए और जनता में पर्यावरण-चेतना जगाई जाए, क्योंकि आजकल लोग धर्म के नाम पर भी बहुत अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, तीर्थयात्रा, पर्वाराधना आदि अनुष्ठान जो मूलतः पर्यावरण-शुद्धि के लिए ही बनाए गए थे, दुःख का विषय है कि वे ही आज पर्यावरण को प्रदूषित करने के कारण बन रहे हैं। धर्म के नाम पर चल रही इस धर्मान्धता को धर्मग्रन्थों की समीचीन शिक्षा द्वारा रोकना चाहिए।
साथ ही भारत सरकार को भी पर्यावरण को प्रदूषित करने की हर क्रिया पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए, चाहे वह धर्म के नाम पर ही चल रही हो, क्योंकि पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली कोई भी क्रिया धर्म की क्रिया हो ही नहीं सकती, वह तो पाप की क्रिया है, धर्मान्धता है। धर्म और धर्मान्धता में भारी अन्तर होता है।
पर्यावरण को प्रदूषित करना वास्तव में देखा जाए तो एक प्रकार का राष्ट्रद्रोह भी है, समाजद्रोह भी है, आने वाली समस्त पीढ़ियों (अपने ही बच्चों) के प्रति किया गया घोर अन्याय भी है।
यहाँ हमें एक बात और भी ध्यान में रखनी होगी कि भारत एक धर्म-प्रधान देश है और आज भी, इतनी वैज्ञानिक चेतना विकसित होने के बाद भी, लोग वैज्ञानिकों की कम और धर्मगुरुओं की बात अधिक मानते हैं, अतः पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि धर्मगुरु इस विषय में लोगों को जागृत एवं प्रेरित करें। आज यदि सभी धर्मगुरु यह नारा दे दें कि जिस भी क्रिया से पर्यावरण प्रदूषित होता हो वह क्रिया कथमपि धर्म की क्रिया नहीं हो सकती, वह तो पाप की ही क्रिया है, तो हमारा पर्यावरण आज भी बहुत सुन्दर बन सकता है, क्योंकि बहुत सारा प्रदूषण धर्म के नाम पर ही फैलाया जा रहा है। जैसे कि-
- नदियों में शव, अस्थि, नख, केश और मूर्ति आदि विसर्जित करना।
- देवी-देवताओं की पूजा के नाम पर खूब हिंसा करना, जीवों को मारना आदि।
- पूजा के नाम पर पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले यज्ञ, हवन आदि करना।
- पूजा के नाम पर ही बहुत अधिक दूध, दही, घी, पानी आदि बरबाद करना।
- धर्म के नाम पर अस्त्र-शस्त्र बनाकर आतंकवाद फैलाना।
- पर्वों के नाम पर पटाखे, रंग, भंग आदि के माध्यम से भारी प्रदूषण फैलाना।
इत्यादि। अतः आज धर्म के नाम पर प्रदूषण फैलाने की हर कोशिश को हमें रोकना ही होगा और यह काम धर्मों की समीचीन शिक्षा देकर ही अच्छी तरह किया जा सकता है। हमें पृथक्पृथक् सभी धर्म-दर्शनों में पर्यावरण चेतना के सूत्रों को खोजकर प्रस्तुत करना होगा और जनता के समक्ष इस बात को बड़े ही स्पष्ट रूप से रखना होगा कि जो व्यक्ति पर्यावरण को प्रदूषित करे, वह कथमपि धर्मात्मा नहीं है, अपितु पापी है, महापापी है, अनेक निर्दोष जीवों का हत्यारा है।
हत्यारा तो सामान्यतः एक-दो जीवों की ही हत्या करता है, किन्तु पर्यावरण को प्रदूषित करने वाला तो असंख्य जीवों की हत्या का भागी बनता है। धर्म तो जीव-दया का नाम है जैसा कि सभी धर्म ग्रन्थों में बारम्बार जोर देकर कहा है। यथा-
- अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥ - श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥ - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥ - परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥
जिस प्रकार प्राचीन समय में नारा दिया गया था कि हिंसा ही सबसे बड़ा पाप है और अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है, उसी प्रकार आज हमें नारा देना होगा कि पर्यावरण को प्रदूषित करना ही सबसे बड़ा पाप है और पर्यावरण की रक्षा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। तथा यह बात गलत भी नहीं होगी, क्योंकि हिंसा-अहिंसा के पीछे प्राचीन ऋषि-मुनियों की भावना यही थी। यह तो उनकी बात का केवल भाषान्तर ही है।
अब जहाँ तक जैनधर्म का प्रश्न है तो वह तो पर्यावरण-संरक्षण पर और भी अधिक बल देता है। उसकी तो पर्यावरण-चेतना बहुत ही अधिक विकसित है। और यह बात अनेक जैनेतर ग्रन्थ-ग्रन्थकारों ने भी मुक्तकण्ठ से स्वीकार की है। जैसे कि गुरुग्रन्थ-साहिब में लिखा है कि-
‘दया दिगम्बरु देउ विचारी। आप मरै औरे नहिं मारी।।’
-श्री गुरु ग्रन्थ साहब, पहला भाग, महला 1, पृष्ठ 356
अर्थात् दया का उत्कृष्ट रूप दिगम्बर मुनियों में पाया जाता है, क्योंकि वे स्वयं तो मर सकते हैं, पर दूसरे किसी सूक्ष्म जीव को भी नहीं मारते हैं।
दरअसल, जैनधर्म अहिंसा पर बहुत ही अधिक बल देता है। वह किंचित् भी हिंसा को कोई अवकाश नहीं देता। सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की भी हिंसा की स्वीकृति नहीं प्रदान करता है। उसमें साफ-साफ कहा है कि जहाँ अणुमात्र भी हिंसा हो वह धर्म नहीं हो सकता। यथा-
अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमं।
न सा तत्राऽऽरम्भोस्त्यणुरपि च …।।
-आचार्य समन्तभद्र, स्वयंभूस्तोत्र, 21.4
यही कारण है कि जैन धर्म में पर्यावरण-चेतना बहुत अधिक विकसित हुई है। वहाँ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तक को भी एकेन्द्रिय जीव कहा है और उनकी भी हिंसा नहीं करने का सभी को मर्मस्पर्शी उपदेश दिया है। यथा-
कर प्रमाद जल भूमि वृक्ष पावक न विराधे।
-पं. दौलतराम, छहढाला, 4.13
जैनाचार्यों ने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और अन्य भी सूक्ष्म जीवों की हिंसा को ‘आरम्भ’ संज्ञा दी है और उसकी अधिकता को नरकगति का कारण और अल्पता को मनुष्य गति का कारण कहा है-
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः।
अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य।।
-आचार्य उमास्वामी, तत्त्वार्थसूत्र, 6.15-17
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति- इन पांचों में से भी जैनाचार्यों ने वनस्पति की रक्षा पर विशेष बल दिया है, क्योंकि वनस्पति सबका मूल है। वह रहेगी तो सब की रक्षा हो जाएगी और वह गई तो समझो सब कुछ चला गया। वनस्पति वन का पति है। यही कारण है कि आचार्य विद्यानन्द जैसे मनीषी मुनिराज ने एक स्वतन्त्र ही पुस्तक इस विषय में लिखी है- ‘वन का पति वनस्पति’ जो कुन्दकुन्द भारती, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। पूरी पुस्तक इस विषय में गंभीरतापूर्वक पठनीय है।
वनस्पति को चोट नहीं पहुंचाने की यह भावना जैन रामायण ‘पद्मपुराण’ जिसके कर्ता आचार्य रविषेण हैं, में भी इस प्रकार व्यक्त हुई है-
तृणस्यापि न वांछामि पीडां जिनमताश्रितः।
-आचार्य रविषेण, पद्मपुराण
जैनाचार्यों ने अहिंसा के परिपालन पर इतना अधिक जोर दिया है कि उसके अनेकानेक सूक्ष्म रूप आज तक भी जैन समाज में प्रचलित दिखाई देते हैं, जिन्हें मैंने अपने एक अन्य आलेख ‘व्यावहारिक जीवन में प्रचलित अहिंसा के सूक्ष्म रूप’ में स्वतन्त्र रूप से संकलित करने का प्रयास किया है। मेरा वह आलेख यद्यपि मूलतः पठनीय है, तथापि उनमें से कतिपय रूप निम्नलिखित हैं-
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रात्रिभोजन नहीं किया जाता और कराया भी नहीं जाता।
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पीने के लिए ही नहीं, स्नानादि के लिए भी पानी को छानकर ही काम में लिया जाता है।
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गर्म पानी में ठण्डा और ठण्डे पानी में गर्म पानी नहीं मिलाया जाता।
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पानी की एक बूँद भी व्यर्थ नहीं गिराई जाती।
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पशु-पक्षी के आकार की मिठाई (Toffees) तक नहीं खाई-खिलाई जाती।
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बासी भोजन नहीं किया जाता।
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विवाहादि भी दिन में ही सम्पन्न करने का प्रयत्न किया जाता है।
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वृक्षों के पत्र, पुष्प आदि नहीं तोड़े जाते। हरी घास पर चलना तक वर्जित माना जाता है।
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मच्छर और जूँ आदि को भी नहीं मारा जाता।
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चित्रात्मक जीव की भी हिंसा नहीं की जाती। जिस पर तितली, चूहा, चिड़िया आदि का चित्र छपा हो- ऐसी चप्पल या मेट आदि किसी भी चीज पर पैर नहीं रखा जाता।
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मन्दिर में भगवान् के आगे भी फल-फूल आदि नहीं चढ़ाए जाते, मात्र चावल आदि शुष्क प्रासुक वस्तुएँ चढ़ाई जाती हैं।
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मन्दिरों में रात्रि के समय घण्टा नहीं बजाया जाता, क्योंकि इससे भी अनेक सूक्ष्म जीवों को पीड़ा होती है।
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रेशमी वस्त्रों (साड़ी आदि) का प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि इनके निर्माण में असंख्य कीटों की हिंसा होती है।
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हिंसा से उत्पन्न सौन्दर्य-प्रसाधनों का उपयोग नहीं किया जाता।
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पटाखे नहीं चलाए जाते, क्योंकि इससे भी असंख्य त्रस-स्थावर जीवों की हिंसा होती है।
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चमड़े की किसी भी वस्तु - जूते, चप्पल, पर्स, बेल्ट, बैग आदि का उपयोग नहीं किया जाता।
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सप्ताह में एक दिन (अष्टमी-चतुर्दशी को) साबुन का प्रयोग नहीं किया जाता। हरी सब्जी का सेवन भी नहीं किया जाता।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जैन धर्म में पर्यावरण-संरक्षण के प्रभूत विचार उपलब्ध होते हैं और उनमें से आज भी बहुत सारे क्रियात्मक रूप में भी जन-जीवन में व्याप्त दिखाई देते हैं। जैन धर्म में पूजा-पाठ आदि किसी धर्म कार्य के लिये भी हिंसा को उचित नहीं ठहराया गया है और यह बात सभी के लिये अनुकरणीय होनी चाहिए।
अन्त में, मैं निम्नलिखित घोष-वाक्य के साथ अपनी बात पूरी करना चाहता हूँ, क्योंकि इसी में पर्यावरण-रक्षा का महत्त्वपूर्ण सन्देश निहित है-
“जब तक पत्ता डाली है। धरती पर खुशहाली है।।”
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