धनि जिनधर्म हमारा है, प्राणों से भी प्यारा है | dhani jinadharma hamara hai pranom se bhi pyara hai

धनि जिनधर्म हमारा है, प्राणों से भी प्यारा है।। टेक ।।

भव दुःखों से सहज छुड़ाकर, उत्तम सुख दातारा है।
वस्तु स्वभाव धर्म आनन्दमय, नहीं कुल पक्ष विचारा है ।। 1 ।।

सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, भेद-विज्ञान आधारा है।
है साक्षात् धरम चारित्र सु, वीतराग अविकारा है।। 2।।

परम अहिंसा धर्म जानो, निज-पर को हितकारा है।
है सर्वज्ञ प्रणीत अनादि-अनन्त सु मंगलकारा है ।। 3।।

दशलक्षणमय भाव आपका, पर भावों से न्यारा है।
धर्मी शुद्धातम के आश्रय से, प्रगटे सुखकारा है।। 4।।

अशरण जग में यही शरण है, स्वारथ का संसारा है।
धारो-धारो उत्तम अवसर, पाओ सुख अविकारा है।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’