देव-स्तुति - वीतराग सर्वज्ञ हितंकर | Dev Stuti - Vitrag Sarwagya Hitankar

वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, सविनय शीश नवाऊँ।
यही भावना मेरी भगवन्, तुम समान बन जाऊँ॥१॥

तेरे दर्शन से हे प्रभुवर, अन्तर-ज्योति जलाऊँ।
तेरी वाणी से मैं अद्भुत, भेदज्ञान प्रगटाऊँ ॥२॥

मैं अविनाशी देह विनाशी, ऐसी श्रद्धा लाऊँ।
चाह दाह आकुलता मेटूँ , ज्ञान-विराग बढ़ाऊँ॥३॥

मैं नहिं पर का पर नहिं मेरा, सुख राशी पद पाऊँ।
आपरूप अपना पद पाकर, अपने में रम जाऊँ ॥४॥

ज्ञाता-दृष्टा बनकर पर का, कर्ता-भोक्ता भाव मिटाऊँ।
राग-द्वेष-मोहादिक बन्धन, से छुटकारा पाऊँ ॥५॥

मैं चिद्पिण्ड अखण्ड अमूरति, जन्म-मरण नहिं चाहूँ।
चिदानन्द ध्रुव आतम मेरा, अक्षय सुख भर पाऊँ ॥६॥

परमातम जो शक्ति छिपी है, उसको अब प्रगटाऊँ।
निजस्वभाव में थिर हो स्वामी, भव सागर तिर जाऊँ ॥७॥

Artist: आ.बा.ब्र.रवींद्र जी आत्मन्

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