देव शास्त्र गुरू | Dev shastr guru

(दोहा)
निजमणि जानत हो प्रभु, जैनधर्म की ढाल।
करूँ गुणों का स्तवन अब, नमन करूँ मैं त्रिकाल।।
तुम्हीं हो वीतराग से ज्येष्ठ, बने हो आत्मशरण से श्रेष्ठ।
तुम्हीं जानत हो लोकालोक, तुम्हारे सम नाशें भय-शोक।।
तुम्हारी दिव्यध्वनि से हम, लगे हैं पापकर्म में कम।
हुआ श्रद्धान आत्मा-सार, हुए हैं हम सब अब निर्भार।।
अरे! तुम समवशरण से युक्त, हुए संसार-प्रपंच विमुक्त।
न पूजें इस वैभव से हम, करें तव गुण-चिंतन हरदम।।
अरे! जो जिन की वाणी है, न माने वह अज्ञानी है।
दिखाती वस्तुस्वरूप हमें, उसे माने वो ज्ञानी है।।
वही शिवपद की दाता है, वही आध्यात्मिक माता है।
दिलाती है श्रद्धान हमें, आत्मा मोक्ष-प्रदाता है।।
इसका वीतरागता-सार, यही है करण-लब्धि आधार।
इससे होता सम्यक् श्रद्धान, उसी से होता है भवपार।
जिन्होंने त्यागा है संसार, न किंचित है तन पर शृंगार।
मोक्ष-पथ के जो अनुयायी, रीति निज की है अपनाई।
ध्यान-तप में रत रहते हैं, सदा ज्ञानार्जन करते हैं।
सिवा इससे न दूजा काम, सदा अंतर में ठहरते हैं।
देह से छूटा है अपनत्व, गृहस्थी से छूटा है ममत्व।
दिखाना है अंतर में मात्र, आत्मा ही है प्रयोजन-तत्त्व।।

रचनाकार: प्रतिहार्य पंकजकुमार जैन (Pratiharya pankajkumar Jain), औरंगाबाद
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