मैं तो अनादि से भटक रहा ,
अगृहीत नशा सेवन करके ।
भूल आत्मा का स्वभाव ,
मिथ्या देवों को भज करके ।
धारे हैं इक ने अस्त्र-शस्त्र,
पर मोह शत्रु न हरा सका ।
वो दे उपदेश भव तिरने का ,
जो खुद न भव को मिटा सका ।
यदि चाहत हो हित आतम का,
और मुक्ति वधु के वरने को ।
अरहंतों का उपदेश सुनो,
अपने स्वभाव में जमने को ।
जो वीतराग सर्वज्ञ हितंकर ,
इन गुण से लवलीन हुए ।
वे छोड़ जगत संबंधों को,
स्वाधीन हुए स्वाधीन हुए ।
उन वीतराग की वाणी ही ,
माँ जिनवाणी कहलाती है ।
हिंसा का जिसमें अंश नहीं,
सतमार्ग सदा दिखलाती है ।
हे ज्ञान ध्यान में तिष्ठ गुरु,
उपदेश तुम्हार सुन करके ।
मैं भी सुख अनंत पाऊँ,
अपने आतम में रम करके ।।
मरती इंसानियत
दुनिया की इस चकाचौंध में, बस एक नजरिया देखा है।
रास्ता चाहे जो भी हो, सबने कमाने का जरिया देखा है।
हिंदू-मुस्लिम , मंदिर-मस्जिद भेद अनेकों कर डाले ।
उन सबके दिल में लड़ने का, उफनाता दरिया देखा है।
जिनके उर में मायाचारी का, इक काला सूर्य चमकता है।
फिर कैसे उन महापुरुषों का, पुरुषत्व महां हो सकता है।।
आज सड़कों पर पशुओं से ज्यादा, मानव भूखे फिरते है।
मानव ही मानव की मानवता का शीश कुचलते है।
लगता है हर मत में नर स्वांग में सर्प भरे पड़े है ।
कम्बख्त फिर भी कुछ अपने ही अपनों को डंसते हैं।
जो हैसियत बनाने को इंसानियत मिटा सकता है।
फिर कैसे उन महापुरुषों का पुरुषत्व महां हो सकता है।।
दिल में कपट नहीं सच्ची नियत होनी चाहिए।
कीमत वसीयत की नहीं सख्सियत की होनी चाहिए।
धन-धर्म ,हिन्दू-मुस्लिम बहुत हुआ अब बंद करो ।
इंसान में हैवानियत नहीं , इंसानियत होनी चाहिए।।
रचनाकार: कपिल जैन (Kapil Jain), पथरिया, सागर, म.प्र.
Instagram: @100kapilJain