देखो हमने नर भव पाया, कुछ तो ऐसा पुण्य किया,
जिनधर्म की शरण है पाई, ऐसा अपना भाग्य जगा।
सच्चे देव हमारे देखो, रागी नहीं न द्वेषी हैं,
सब दुनियाँ को एक टक देखें, निस्पृह हैं हितोपदेशी हैं।
खिरी समवशरण में उनकी वाणी, गणधर अंग जो गुंथे थे,
हो उद्धार हम सब का जग में, लिखे शास्त्र वो अनूठे थे।
कृपा रही गुरुओं की हम पर, स्व-पर कल्याण का भाव धरा,
जीवन का सच्चा मार्ग दिखाते, महावीर का मार्ग चुना।
ऐसे रत्नों को सदा पहचानो, अनुकरण इन्हीं का सदा करो,
काँच में अपनी चमक जान कर, जीवन को न व्यर्थ करो।
रचनाकार: अनुराग जैन (Anurag Jain), ग्वालियर
Instagram: @anurag_Jain10