देव-सत्थ-गुरु-वंदणा | Dev Satth Guru Vandana

देव-सत्थ-गुरु-वंदणा

-प्रो. वीरसागर जैन

सिद्ध-वंदणा
जे सव्वकम्मरहिदा णिच्चं णाणादिभावपरिपुण्णा।
सुद्धा सिद्धा सव्वे णमामि तेसिं तियोगेण ॥1॥

जो सर्वकर्मों से रहित हैं, सदैव ज्ञानादि भावों से परिपूर्ण हैं और पूर्णतया शुद्ध एवं सिद्ध हैं, उनको मैं मन-वचन-काय से प्रणाम करता हूँ।

अरिहंत-वंदणा
जो रायादि ण कुणदि लोए वणितादि-इठ्ठ-विसएसु।
जो दोसं पि ण किंचिवि सत्तू सीहादि-णिठ्ठ-विसएसु ॥2॥
जो सयलं जाणादि जीवमजीवं य धम्मधम्मं य।
आयासं कालं पि य उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं ॥3॥
जो हिदकरमुवएसं करेदि दुक्खेहिं तत्तजीवाणं।
तं वीयरायदेवं णमामि सव्वण्डू सयलहिदकारं ॥4॥

जो स्त्री आदि मनोहर पदार्थों में कभी राग नहीं करते और शत्रु-सिंहादि अनिष्ट पदार्थों में द्वेष नहीं करते, जो जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश एवं काल-इन सर्व षट्विध द्रव्यों को उत्पाद व्यय-धौव्य से युक्त जानते हैं और जो संसार-दुःख से तप्त जीवों को कल्याणकारी उपदेश देते हैं; उन वीतरागी, सर्वज्ञ एवं हितोपदेशी अरिहंत देव को मैं नमस्कार करता हूँ।

सत्थ-वंदणा
जं जिणवयणं एक्कं पोसइ सव्वत्थ वीयरायत्तं।
जेण वि केणवि भावे पोसइ ण कदावि रायादि ॥5॥

सियलंछणं खु होदि सव्वाणं जिणवरिंद-वयणाणं।
णत्थि विरोहो किंचि वि पुव्वापरकहिद-सव्ववयणेसु ।।6।।
जेसु जिणवयणेसु रमंति भव्वा पफुल्लभावेण।
लेंति अदिंदियसुक्खं अत्ताधीणं सयलदुक्खहरं ।।7।।
ताई जिणवयणाई णमामि पूजामि पइदिणं भावें।
करेंतु ते मम कज्जं णिव्वाणपदं पदाणित्ता ।।8।।

जो जिनवचन सर्वत्र एक वीतरागता का ही पोषण करते हैं, कभी भी किसी भी प्रकार रागादि भावों का पोषण नहीं करते हैं; स्यात् 'पद से चिह्नित हैं, जिनमें किंचित् भी पूर्वापर-विरोध नहीं पाया जाता है। जिनमें भव्यजीव अत्यन्त प्रफुल्लित भाव से रमण करते हैं और फिर सकल दुःख हर, आत्माधीन, अतीन्द्रिय सुख को प्राप्त करते हैं, उन जिनवचनों को मैं प्रतिदिन भावपूर्वक प्रणाम करता हूँ, उनकी पूजा करता हूँ। वे मुझे निर्वाण प्रदान कर मेरा कार्य सिद्ध करें।

गुरु-वंदणा

जे आयरिय-उवझाया साहू णिच्चं पि मोक्खमग्गट्ठा।
भवतणभोगविरत्ता झाणज्झयणे सदा णिरदा ।।9।।
सव्वागमस्स सारो अत्ता इदि अत्तभावणा सहिदा।
ताहं पि य पणमामि तेसिं गुणलद्धिकामेण ।।10।।

जो आचार्य, उपाध्याय एवं साधु सदैव मोक्षमार्ग में स्थित हैं, संसार-शरीर-भोगों से विरक्त रहकर सदा ध्यान अध्ययन में ही लीन हैं और ‘सम्पूर्ण आगम का सार एक आत्मा ही है’- ऐसा जानकर सदा आत्मभावना-सहित हैं; उन आचार्य, उपाध्याय एवं साधुओं को भी मैं उनके गुणों को प्राप्त करने की कामना से प्रणाम करता हूँ।