देखा-देखा अनंग रूप जिनवर का, देखन-जाननहार।
देखन-जाननहार, केवल देखन-जाननहार॥ टेक॥
शुद्धातम ज्ञानादिक गुणमय, केवल जाननहार।
निज स्वरूप में लीन विराजे, तिहुँ जग तारणहार॥ 1॥
पर से भिन्न स्वयं में तन्मय, निज के जाननहार।
लोकालोक सहज प्रतिभासे, सर्वज्ञ कहो व्यवहार॥ 2॥
दर्पण सन्मुख ज्यों जगवासी, देखे मुख अविकार।
सन्मुख जगी प्रतीति, मैं भी देखन-जाननहार॥ 3॥
नहीं उपजे-मरता नाहिं, बंध-मोक्ष करतार।
दिखा स्वतः परमार्थ दृष्टि से, केवल जाननहार॥ 4॥
जाननहार जनाय सहज ही, प्रगटे तृप्ति अपार।
अहो! प्रभो परमार्थ रूप लख, हुआ सहज भवपार॥ 5॥
दुवेदन सब मिटे, प्रगट भयो स्व-संवेदन सार।
नहीं विकल्प वंद्य-वंदक का, वंदन हो अविकार॥ 6॥
आ० बा० ब्र० रवीन्द्र जी आत्मन्