तोड़ तू इस शरीर से राग, तभी होगा सच्चा वैराग।
जिनवृष देव-गुरु पाये हैं, धन्य तुम्हारा भाग।।1।।
काल अनादि से अरे आत्मन्, तूने गोता खाया।
कोई पुण्य का योग मिला, तब मानव गति में आया।।2।।
जाने कितने मिले गात, पर साथ सभी ने छोड़ा।
मरण समय प्राचीन छोड़, नव देह से नाता जोड़ा।।3।।
हाय-हाय वे भी अस्थिर थे, केवल दुःख के कारण।
हुआ विमोहित तन में ही, ना भव का हुआ निवारण।।4।।
अतः मूर्खता ही है भाई, तन से राग लगाना।
राग तो अज्ञानी ही करते, जिन नहीं रूप पहिचाना।।5।।
अरे आत्मन् ! तनिक विचारो, मल से देह बनी है।
हाड़ मांस अरु रुधिर पीव से, इसमें घृणा घनी है।।6।।
अगणित हैं मलद्वार यहाँ, इससे यह महा अशुचि है।
इसका ऊपर से नीचे तक, कोई अंग नहिं शुचि है।।7।।
ऐसे महा अशुचि होने पर भी, क्यों राग रचाते ?
इससे क्यों एकत्व मानते, क्यों भव दुःख बढ़ाते ।। 8 ।।
ये अत्यंत भिन्न आत्मा से, सद्गुरु यही बताई ।
आत्मा की परिणति से, तन की चेष्टा भिन्न ही गाई ।।9।।
इन दोनों को एक मानना, भूल हमारी भारी।
यह तो है मिथ्यात्व महा, इससे भव की तैयारी ।। 10 ।।
ये पुद्गल अरु तू चेतन है, दोनों न्यारे-न्यारे ।
जड़ की क्रिया भिन्न चेतन से, सद्गुरु वचन उचारे ।। 11 ।।
भाववती शक्ति दोनों में, निज-निज कार्य करे है।
एक-दूसरे का अवलम्बन, कोई नहीं धरे है।। 12 ।।
द्रव्य पृथक है, क्षेत्र अलग है, काल भाव भी न्यारे ।
फिर दोनों क्यों होय एक, तू ये तो तनिक विचारे ।। 13 ।।
अतः भव्य अब ये श्रद्धाधर, तन से आत्म अलग है।
तेरी क्रिया तुझमें होती, तन की क्रिया विलग है।। 14 ।।
तन की ओर से दृष्टि हटाकर, निज में दृष्टि लगा ले।
तोड़ सकल जग द्वन्द्व-फन्द, बस भेदज्ञान उपजा ले ।। 15 ।।
निज आतम अनुभूति करे ले, ये ही धर्म महा है।
ये है प्रथम मोक्ष की सीढ़ी, भूषण इसे कहा है।। 16 ।।
अतः ‘आत्मन्’ शीघ्र विचारो, समय बहुत ही कम है।
तन से भिन्न अनुभवो निज को, जिसके बिना न शम है।। 17 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह