तर्ज : प्रभो ! आप सा कोई दाता
दया कर-दया कर दया धर्म, हम आए हुए हैं शरण में तिहारी ॥ टेक ॥
नहीं हमने अपना समयसार जाना, सदा पर पदार्थों में अपनत्व माना।
उन्हें याद करते रहे रात-दिन हम, जिन्हें सर्वदा के लिए था भुलाना ॥
अहो ! मूल में ही रही भूल भारी ॥ हम. ॥ 1 ॥
प्रभो ! कर्म मेरे घिरे आश्रवों से, रही प्रीति मेरी सदा अध्रुवों से ।
मिलेगा उन्हें देव विस्तार कैसे, बहे लोक सागर में टूटे प्लावों से ॥
संभालो खिवैया यह नैया हमारी ॥ हम. ॥ 2 ॥
सुलभ हो मुझे भेद-विज्ञान अपना, पृथक् पुद्गलों से समय का परखना।
करूँ आत्म चिन्तन तरूँ जन्म सागर, वरूँ मोक्ष लक्ष्मी को निर्वाण पाकर ॥
कृपा नाथ तुमसा बनूँ सिद्धिधारी ॥ हम. ॥ 3 ॥
सुना देव तारण-तरण नाम तेरा, इसी से लिया है चरण में बसेरा।
तुम्हीं सुप्रभातं, तुम्हीं हो सबेरा, तुम्हीं ने प्रभो कर्म पथ को निवेरा ॥
कहाँ तक कहें नाथ महिमा तुम्हारी ॥ हम. ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’