दशलक्षण धर्म | Dashlakshan dharm

दशलक्षण धर्म का, यह मंगल अवसर।
ज्ञान ध्यान आराधना का, यह पावन अवसर।
उत्तम क्षमा का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
क्षमा अभाव सो क्रोध होय, धर्म अराधन न थाय।।
बैर त्याग मन शांत होय, मोक्ष रमणी उलसाय।
सम्यक्त्व सहित क्षमा होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम मार्दव पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
मार्दव अभाव सो मान होय, मृदुता कहाँ से आय।।
मान समान दीनता होय, सहजता न थाय।
सम्यक्त्व सहित मार्दव होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम आर्जव पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
आर्जव अभाव सो माया होय, ऋजुता कहाँ से आय।।
मन-वच-काय एक होय, स्थूल कथन कहलाय।
सम्यक्त्व सहित क्षमा होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम शौच का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
शौच अभाव सो लोभ होय, शुचिता कहाँ से आय।।
नाम, यश, आरोग्य, भोग, सब लोभ कहलाय।
सम्यक्त्व सहित शौच होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम सत्य का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
सत्यता सुखरूप होय, असत्य दुख उपजाय।।
सत्य वचन पुद्गल होय, सत्य आत्म सहाय।
सम्यक्त्व सहित सत्य होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम संयम का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
केवल प्राणी-इन्द्रिय नहीं, आत्म संयम कहलाय।।
निश्चय सहित व्यवहारता, संयमन हो जाय।
सम्यक्त्व सहित संयम होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम तप का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
जल-आहारादि त्याग ही तप नहीं कहाय।।
‘स्वाध्याय परमं तपः’ आतम में समाय।
सम्यक्त्व सहित तप होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम त्याग का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
दान से पुण्य होय, धर्म त्याग से थाय।।
परद्रव्यों के ममत्त्व का त्याग, त्याग कहलाय।
सम्यक्त्व सहित त्याग होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम आकिंचन्य का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
किंचित परिग्रह न रहे, यही मार्ग बताय।।
वस्तु नहीं, मूर्छा त्याग ही अपरिग्रह कहलाय।
सम्यक्त्व सहित आकिंचन्य होय, परम मुक्ति को पाय।।
उत्तम ब्रह्मचर्य का पर्व होय, आतम को नित ध्याय।
केवल स्पर्शन विजय ब्रह्मचर्य न थाय।।
ब्रह्म में विचरण ही ब्रह्मचर्य कहलाय।
सम्यक्त्व सहित ब्रह्मचर्य होय, परम मुक्ति को पाय।।

रचनाकार: मानस जैन (Manas Jain), बांसवाड़ा
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