दशलक्षण धर्म विधान पूजन आदि | Dashlakshan Dharm Vidhan Pujan Aadi

दशलक्षण धर्म विधान पूजन आदि

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उत्तमक्षमा
उत्तममार्दव
उत्तमआर्जव
उत्तमसत्य
उत्तमशौच
उत्तमसंयम
उत्तमत्याग
उत्तमआकिंचन्य
उत्तमब्रह्मचर्य

दशलक्षणधर्म-विधानादि पूजा

प्रकाशक
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ-३६४२४०

भगवानश्रीकुन्दकुन्द-कहानजैनशास्त्रमाला, पुष्प-८४

  • नमः सिद्धेभ्यः *

कवि श्री टेकचन्दजी विरचित-

दशलक्षणधर्म-विधानादि
पूजा

  • प्रकाशक *
    श्री दि० जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
    सोनगढ-३६४२४० (सौराष्ट्र)

निवेदन

कविवर पंडित श्री टेकचन्दजी रचित ‘दशलक्षणधर्म-विधानपूजा’ की अनेक आवृत्ति सोनगढ-ट्रस्ट की ओरसे प्रकाशित हो चुकी है। मुमुक्षुसमाजमें इस विधानपूजाकी विशेष माँग होनेसे इसकी यह दशमी आवृत्ति प्रकाशित करते हुए प्रकाशसमिति प्रसन्नताका अनुभव करती है।

शुद्धात्मतत्त्वदृष्टिप्रधान अध्यात्म साधनाके साथ मुमुक्षु-समाजमें वीतराग देव-गुरु-धर्मकी भक्तिभावभीनी उपासनाका-निश्चय-व्यवहारके सुमेलपूर्वक आराधनाका-प्रचलन अध्यात्मयुगस्रष्टा देव-गुरुभक्त पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामीका ही पुनीत प्रताप है। अध्यात्म-तीर्थधाम सोनगढमें पूज्य गुरुदेवश्रीके पावन प्रभावसे एवं धन्यावतार प्रशममूर्ति पूज्य बहिनश्री चम्पाबेनकी देव-गुरु-भक्तिभीनी मंगल प्रेरणासे आराधनापर्व दशलक्षणपर्वपूजनमें यह पूजा, माँडला माँड करके, जिनमंदिरमें अति भक्तिभावसे नियमित की जाती है। तदनुसार अन्य गाँवोंमें भी मुमुक्षुमण्डलों द्वारा यह उपक्रम चलता है।

'दशलक्षणधर्मविधानपूजा’में १० कोष्ठका रंगोली या रंगीन चावलसे माँडला बनाकर अनुक्रमसे प्रत्येक कोठेमें उत्तम क्षमादि धर्मके जितने अवान्तर भेद हैं उनके प्रतीकके रूपमें ‘ॐ’ पुष्प या छत्र आदिके बिंडे माँडने चाहिये। फिर कलश स्थापन करके वेदीमें दशलक्षणयन्त्रकी स्थापना करें। जिनेन्द्र-अभिषेक करके सकलीकरणविधि (शुद्धि) कर श्री देव-शास्त्र-गुरुपूजाका वा चैवीस

प्रथममावृत्ति ६००० : वीर सं० २४०९
द्वितीयमावृत्ति ११०० : वीर सं० २४८८
तृतीयावृत्ति ११०० : वीर सं० २४९८
चतुर्थावृत्ति ११०० : वीर सं० २५०१
पंचमावृत्ति २१०० : वीर सं० २५०४
षष्ठमावृत्ति २१०० : वीर सं० २५०६
सप्तमावृत्ति १००० : वीर सं० २५१२
अष्टमावृत्ति ३००० : वीर सं० २५१५
नवमावृत्ति २००० : वीर सं० २५२०
दशमावृत्ति ३००० : वीर सं० २५२३

मूल्य : १०=००

मुद्रक :

स्मृति ऑफसेट
सोनगढ-२६४२५०
Phone : (०२८४६) ४४३८१

परम पूज्य अध्यात्ममूर्ति सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामी

जिनकी पूजा करें। तत्पश्चात् इस मंडलविधान पूजा का प्रारम्भ करना चाहिये। मण्डलविधानपूजाके उद्यापन निमित्त अन्तमें साधर्मिकोंको यथाशक्ति प्रभावना बांटकर दान भी करना चाहिये।

इस विधानपूजाकी प्रथम आवृत्ति सुरतनिवासी श्री मूलचन्द किसनदास कापडियाजीके प्रकाशनके आधारसे मुद्रित की गई थी। उस समय स्व० श्री कापडियाजीने सहर्ष सम्मति दी थी, तदर्थ प्रकाशनसमिति उनकी आभारी है।

सोनगढ साहित्यप्रकाशनसमिति
बहिनश्री-चम्पाबेन-८४वीं जन्मजयंति, श्री दि. जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट,
भादो कृष्णा २, वि. सं. २०५४ सोनगढ-३६४२५०

भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत दशलक्षणधर्म

उत्तमखमद्दवज्जवसच्चसउचं च संजमं चेव।
तवचागमकंचिणं बम्हा इदि दसविहं होदि ॥७०॥

उत्तमक्षमाका लक्षण

कोहुप्पत्तिस पुणो बहिरंगं जदि हवेदि सव्वादं।
ण ण कुणदि किंचि वि कोहो तस्स खमा होदि धम्मो त्ति ॥७१॥

मार्दवधर्मका लक्षण

कुलरूवजादिबुद्धि सु तपदुस्सीलेसु गारवं किंचि।
जो ण वि कुणदि समणो मद्दवधम्मं हवे तस्स ॥७२॥

आर्जवधर्मका लक्षण

मोत्तूण कुडिलभावं णिम्मलहियएण चरदि जो समणो।
अज्जवधम्मं तइयो तस्स दु संभवदि णियमेण ॥७३॥

सत्यधर्मका लक्षण

परसंतावकयकारणवयणं मोत्तूण सप्परहियवयणं।
जो वददि भिक्खुसु तुरियो तस्स दु धम्मो हवे सच्चं ॥७४॥

शौचधर्मका लक्षण

कंखभावणिव्वत्ति किच्चा वेरग्गभावणाजुत्तो।
जो वट्टदि परमगुणो तस्स दु धम्मो हवे सोच्चं ॥७५॥

संयमधर्मका लक्षण

वदसमिदिपालणाए दंडच्चाएण इंदियजएण।
परिणममाणस्स पुणो संजमधम्मो हवे णियमा ॥७६॥

उत्तम तपका लक्षण

विसयकसायविणिग्गहभावं काऊण झाणसज्झाए।
जो भावइ अप्पाणं तस्स तवं होदि णियमेण ॥७७॥

त्याग धर्मका लक्षण

णिग्गहेत्तियं भावइ मोहं चइऊण सव्वदव्वेसु।
जो तस्स हवे चागो इदि भणिदं जिणवरिंदेहिं ॥७८॥

आकिंचन्य धर्मका लक्षण

होऊण य णिस्संगो णियभावं णिग्गहिसु सुहृदहृदं।
णिग्गहेण दु वट्टदि अणयारो तस्स किंचण्हं ॥७९॥

ब्रह्मचर्य धर्मका लक्षण

सव्वंगं पेक्खंतो इत्थीणं तासु मुय्यदि दुब्भावं।
सो बम्हचेरभावं सव्वकदि खलु दुद्धरं धरित्तुं ॥८०॥

(द्वादशानुप्रेक्षामेंसे)

कविवर श्री टेकचन्दजी कृत

श्री दशलक्षण मण्डलविधान

(जोगीरासा)
नेमीनाथो, दे तो साथो’, भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशिदिन मन वच, काय लाय करि लाऊँ।।
धर्म कह्यो तुम, बानी दश विध, सो मोहि होउ सहाई।
करुणासागर, समरस गर्भित, शीश नमों श्रुति गाई।।१।।
(गीता छन्द)
धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहे।
भवभोग को यह महा औषधि, मरण जामन दुख दहे।।
यह विरत नीका मीत जीका’, करो आदरतै सही।
मैं जजों दशविध धर्मिक अंग, तासु फल है शिवमही।।२।।
(पद्धडि छन्द)
यह धर्म भवदधि नाव जान, या सेयें भव दुख होइ हान।
यह धर्म कल्पतरु सुखपूर, पै पूजों भव दुख करन दूर।।३।।
(गीता छन्द)
यह विरत मन कपि गले माहीं, सांकली सम जानिये।
गज अश्व जीतन सिंह जैसो, मोहतम रवि मानिये।।
१. तुम्हारा साथ। २. जीव का मित्र।

दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा

(२)
सुरज्ञान माहीं विरत नाहीं, मनुज दू शुभ कुल लहे।
तातै सु अवसर है भलो, अब करो पूजा धुनि कहे।।४।।
(केसरी छन्द)
जाने दशलक्षण व्रत कीना, ते सतपुरुषनमें प्रवीना।
भवसागर फिरनी मिटि जावे, जो नर दशलक्षण वृष भावे।।५।।
(भुजंगप्रयात छन्द)
यही धर्म सारं करै पाप क्षारं, यही धर्म सारं करै सुख अपारं।
यहीधर्मधीरा हरै लोक पीरा, यहीधर्ममीरा करै लोक तीरा।।६।।
(त्रिभंगी छन्द)
यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत उधारा हितदानी।
यह दशविध गाया, जन मन भाया, उच्च बताया जिनवानी।।
यह शिव करतार, अबधै उद्धार, अबि उद्धारा मुनि धारा।
ताको मैं ध्याऊँ, शीश नवाऊँ, अर्घ चढाऊँ सुखकारा।।७।।
(चौपाई छन्द)
या व्रतकी महिमा कहा वीर, दशविध धर्म हरे भवपीर।
इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजबु धर्म अति दुरलभ पाय।।८।।
(दोहा)
दश प्रकारकोधर्म यह, दशविध सुतरु जान।
वांछित पद सेवक लहै, अधिक कहा सुखदान।।९।।
सोरठा-धर्म हमारा नाथ, धर्म जगतका सेहरा।
भव भवमें हो साथ, और न वांछा मनविषे।।१०।।
मण्डलमध्ये परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्।

समुच्चय पूजा

(३)

समुच्चय पूजा

(त्रिभंगी छन्द)
यह धर्म क्षमावा मान गुमावा, सरल सुभावा सतिवानी।
शुचि भाव करावा संजम लाबा, तप करवावा अधिकारी।।
शुचि त्याग बतावे नगन पुजावे, शील बढावे शिवदाई।
यह धर्म हमारा श्राप करारा, पूजन धारा सिरनाई।।११।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(मृदंगणदकी चाल)
क्षीरसागर तना नीर शुभ लाइये।
कनक झारी विषै धार गुण गाइये।।
मरण उतपत्ति नहीं होय तो फल सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही।।१२।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वापामिति स्वाहा।
नीर संग अग्रु चन्दन सु घिस लाइये।
सुभग पातर विषै धारि श्रुति गाइये।।
जगत तप तासु फल तुरत नाशये सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही।।१३।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वापामिति
स्वाहा।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

लेइ अक्षत भले मुक्तिफल से कहे ।
ऊजले अखण्ड सुभग स्वर्ण पातर लहे ।।
अक्षयपद पावने आप मनमें सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

फूल कञ्चनवरन कल्पतरुके भले ।
गंध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले ।।
माल तिन गुंथि कामबाण नाशक सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

सुगप नैवेद्य मोदक घने लाइये ।
विविध स्वादामय सु धरि भक्ति उर भाइये ।।
भूख-दुःखहरण स्वर्ण-पात्र धारिके सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप मणि रतनमय और घृतमय सही ।
धारि कनक थालमें सु आरति जु करि लही ।।
धर्मज्योति मोह अंधकार नाशिका सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।६।।

(समुच्चय पूजा)

ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

धूप दश अंग मय लायकर सारजी ।
अग्नि संग खेवहूँ सुभक्ति उर धारजी ।
कर्म क्षयकार भव वास नाशन सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

लौंग खारिक सुनारिकेल सुखकरजी ।
और बादाम पुंगी फलादि सार जी ।।
लेइ निज हाथ ये सुभक्ति धरिके सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

नीर गंध अक्षत सु फूल चरू सोई जी ।
दीप अरु धूप फल अरघ संजोड़ जी ।।
पुरट थाली विषै भक्ति करिके सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

धर्म भवकृप तै काढ़ने को रस्सी ।
भव उदधि पार करतार नवका इसी ।।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः महार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

अथ जयमाला

(दोहा)

दश वृष रतन मिलायके, माल करै भव जोय ।
धरै आपने उर विषै, ता सम अवर न कोय ।।१।।

(त्रैसरी छन्द)

दशलक्षण वृष शिवमग दीवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा ।
मुकति दीप पहुँचावन जादा, ये दश धर्म जजों जुत भावा ।।११।।
दशविधि धरम धरे जो कोई, करम नाशि फिरि दुख नहिं होई ।
धरम जु साधन और न कोई, यों दश धर्म जजों मद खोई ।।१२।।
धरम जीव का पालनहारा, धर्म मान का खण्डन वारा ।
धरम थकी जावे कुटिलाई, इमि दश धर्म जजों चितलाई ।।
सांच वचन सम धरम न जानो, धर्म भाव निर्मल पहिचानो ।
धरम जीव रखइ इन्द्रिय जीतै, इमि दश धर्म जजों करि प्रीतै ।।१४।।
तप ही सर्व धर्मका मूला, त्याग धरमते क्षय अघ शूला ।
धरम नगन सम और न कोई, इमि दश धर्म जजों मद कोई ।।१५।।
नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धर्म जगतमें भाई ।
जो दशलक्षण मनमें आने, सो भव तप हरि शिवपद ठाने ।।१६।।

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

(दोहा)
दशलक्षण व्रत इण विधि कीजे, उत्कृष्टे दश वास करीजे।
जातर बेले पारण भाई, तथा इकंतर वास कराई।।१।।
शक्तिहीन है तो सुन मीता, दश एकंत करो धरि प्रीता।
व्रत दश बरस करे मन लाई, करु उद्यापन मन वच काई।।२।।
नहीं उद्यापन शक्ति तुम्हारा, तो दूणो व्रत करु सुखकारी।
पीछे यथाशक्ति खरचावे, पूजन धर्म उद्योत करावे।।३।।

इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करें दश सार।
पावे सुख मन भावना, अनुक्रम ले भव पार।।४।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
।। इति समुच्चय पूजा ।।

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

(अडिल्ल)
जीव तिरस थावर जेते जगमें सही।
देव नरक नर पशु चारि गति की मही।।
तिन सब ऊपर दयाभाव उरमाहि जी।
सो है उत्तम क्षमा, थापि जजुं याहि जी।।१।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मंग! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मंग! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मंग! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अथाष्टकम्

(पद्धड़ी छन्द)
जल गंग नदी को विमल सोइ, धरि रतन प्याले शुद्ध होइ।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।१।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं।
बावन चंदन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।२।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय संसारतापविनाशनाय चंदनं।
अक्षत मुक्ताफल सम जु लाय, अति उज्ज्वल नखशिख शुद्ध भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।३।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान्।
शुभ फूल कलपतरुके अनूप, करि माला सुभग सुगंध रूप।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।४।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं।
नाना रस पूरित चरु सझार, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।५।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं।
मणिदीपकसार बनाय लाय, धरि कनक थाल भरि भक्ति भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।६।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं।

ले धूप अगरुजा गंधकार, दुरभाव हुताशन पाहि जार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।७।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय दुष्टष्टकर्मदहनाय धूपं।
फल नारिकेल बादाम सोइ, पुंगीफल खारिक भक्ति जोइ।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।८।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं।
जल चंदन अक्षत फूल लाय, चरु दीप धूप फल अरघ भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।९।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं।

अथ प्रत्येकार्घ्याणि

(अडिल्ल)
पाप प्रकृति कर जीव अशुभ बंधन कर्यो।
थावर नामा कर्म उदय दुखको भर्यो।।
पृथ्वी माहि सु जाय सहै बहु अघ भला।
तिन का रक्षण-भाव क्षमा उत्तम भला।।१।।
ॐ ह्रीं श्री पृथिवीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घं।
इक इंद्रियके द्वार अतुल विपदा सहै।
तिनको दुखमय जानि मुनि करुणा करै।।
तसु प्रसादे झटिति मोक्ष-वनिता वरै।।२।।
ॐ ह्रीं श्री जलकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घं निर्वपामी।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

अनागिकाय धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुख तन सहै जलै सब जग मही ।।
इन पर करुणाभाव धरै जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री अग्निकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
पवन कायके जीव महा संकट सहै।
हाथ पाँव मुख वचन शको बाधा लहै ।।
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा कही शिव की मही ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री वायुकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
हरित कायमें प्राणी अति भेदन लहै।
छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहै ।।
इन पर समताभाव सुखी इनको चहै।
सो ही उत्तमक्षमा धारी मुनि शिव लहै ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
थावरके पन भेद पाप फलतैं बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भने ।।
इनको दुखमय जानि दया मन लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिरनाय है ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री सूक्ष्मस्थूलपंचथावरपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
लट अरु जोंक गिंडोला इल्ली जानिये।
कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये ।।

उत्तम क्षमा पूजा

इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिव की मही ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
चींटी कुंथा खटमल बीछू दुख मही।
तेइन्द्रिय परजाय पर्ण घुण आदि ही ।।
इनको दुखमय जानि मुनि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सब अघ जरै ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री त्रीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
माखी मच्छर टीड़ी भँवरादिक सही।
बर्षा ततइया मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही ।।
इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों वसुविधि जरै ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
इन्द्रिय पांचों होय नहीं मन जो लहै।
ते तिज जानि अबेनी अफल दहै ।।
इनको दुख भरिपुर जानि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवफल धरै ।।१०।।
ॐ ह्रीं असंजीपंचेंद्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
नरक जीव अति दुखी पापफलतैं सही।
छेदन भेदन पीर सहै जाति ना कही ।।
इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सुखदाय हैं ।।११।।
ॐ ह्रीं नारकीजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

(गीता छन्द)

मनुज क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने।
बहु चाह पीड़ित रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिनै ।।
तिन देख यतिवरद या लावैं, महा दीनदयाल जी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल जजों, भाग्य विशाल जी ।।१२।।
ॐ ह्रीं मनुष्यजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
परकार चारो देव गतिमें, जीव सुख राचै सही।
लखि देखि परको झुरै नित ही, मानते पीड़ा कही ।।
तिन देखि मुनि उर दया भावै, महा कोमल भावजी।
सो धर्म उत्तम क्षमा पूज्यों, अघते कर चावजी ।।१३।।
ॐ ह्रीं चतुर्गतिदेवजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।

(चौपाई)

थावर तिरस जीव सब जोई, चहुंगति करमनके वश होई।
तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम खम धर्म जगाई ।।१४।।
ॐ ह्रीं त्रसस्थावरसमस्तजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।

जयमाला

(दोहा)

धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जजैं जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय ।।१५।।

(तेवरी छन्द)

सब जीवनमें राग न दोषा, सो है क्षमा धरम निरदोषा।
दुर्जन कृत उपसर्ग लहावै, ताहू पै समभाव रहावै ।।१६।।

उत्तम क्षमा धर्म पूजा

मुनिको वचन कहे दुखकारी, मरम छेद छेदे अघ धारी।
मान खण्ड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ॥१॥
जो कोई दुष्ट मुनिनिको मारे, तीक्ष्ण शस्त्र तैं करि परिहारे।
बाधे तनको खेद न पावै, तिन पर क्षमा धर्म मन लावै ॥४॥
अति दुखिया जियको ऋषि जाने, तब मुनि अनुकम्पा मन आनै।
आपा परको हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ॥५॥
उत्तम क्षमा धरम सुखदाई, क्षमा धरम सब जियका भाई।
जब मुनि हू पै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ॥६॥
क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई।
क्षमा समान न बल अति पावै, ताते जती क्षमा वृष भावै ॥७॥
क्षमा धरम शिव राह बताई, क्षमा तात माता अरु भाई।
जाते सिद्ध सुखकोन पावै, ऐसी क्षमा मुनी मन लावै ॥८॥

( सोरठा )

क्षमा आभूषण सार, उरमें जो पहिरे सही।
ते भवसागर पार, जजो धर्म उत्तम क्षमा ॥९॥

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मणाय पूर्णार्घं।

॥ इति उत्तमक्षमा धर्म पूजा ॥

उत्तम मार्दव धर्म पूजा

( षट्पदी छन्द )

मार्दव वृष भाव विचार सोइ, जहां मान भाव दीखे न कोइ।
इस धारी मुनि शिवगामि जानि, मैं जजों शापि मार्दव सुभानि ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय। अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अष्टाष्टकम्

( मयूणानन्द की चाल )

क्षीर सम नीर शुद्ध गाल करि लाइये।
पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये ॥
जगत फिरनो मिटे तासु फल तैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय जलं।
स्वच्छ नीर संग चन्दनादि को मिलायजी।
शुद्ध गंध युक्त भक्ति भावतैं चढ़ायजी।
जगत आताप हर जानि ता फल सही।
धरम मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय चन्दनं।
अक्षत समुज्वल खंड विन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये ॥

उत्तम मार्दव धर्म पूजा

ध्रौव्य फल दाय मन लाय ध्याऊँ सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय अक्षतान्।
फूल कल्पवृक्षके गंध रंग सारजी।
माल गुंथि शुद्ध भाव भक्ति कर धारजी।
मदन मद हरन सुफल जानि यातैं सही।
धरम मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय पुष्पं।
सुभग सर शुद्ध नैवेद्य मन लाइये।
मोदकादि शुद्ध भक्ति भावतैं चढ़ाइये ॥
धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन बचन तन सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय नैवेद्यं।
दीप रतनन मयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्तिभाव तैं धरा।
नाश अज्ञान है तासु फल तैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय दीपं।
धूप दश गंध शुभ लेइ मन मानिये।
अगर चंदन सबै मेलि शुभ ठानिये ॥
अग्नि संग खेइये कर्म जालन सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥८॥

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मगाय धूपं ।
श्रीफलादि लोग पुग्गफलादि जानिये ।
शुद्ध बादाम खारिक भले आनिये ॥
सिद्ध थानक लहे तासु फलंतें सही ।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मगाय फलं ।
नीर चन्दन अखित्त पुप्प चरु दीप जी ।
धूप फल अर्घ कर भाव शुद्ध टीप जी ॥
लोक में फिरन, तन धरन मिट्टे है सही ।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मार्घ्यं ।

अथ प्रत्येकार्घ्याणि

(चाल–मणुयानंद की )
देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही ।
दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं ॥
नमत तिन पद करें धर्म मार्दव कहो ।
सो जजों चारि गति मांहि भरमन दहो ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री वीतरागदेवपदनमन्मार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
वीतराग देव कही बानी सो धर्म है ।
ता सुने जीव निज हरे भाव मर्म है ॥
मन वचन काय श्रुतपाद फिरनाय है ।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है ॥१२॥

उत्तम मार्दव धर्म पूजा

ॐ ह्रीं श्री जिनपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
धर्म को सेय तप लेय कर्म जर जी ।
भये सिद्धदेव तन रहित सुखकार जी ॥
लेय इन नाम मन वचन शिर नाय है ।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
धारि छत्तीस गुण सुरि सुखदाय जी ।
धर्म तप भावसों गुप्ति धरि भाय जी ॥
मान तजि नमन इन पद विधि लाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
धारि गुण पांच अरु वीस उवझाय जी ।
और भी अनेक गुण पास तिन थाय जी ॥
मान तजि इन चरण कायको नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
क्षेत्र अतिशय तहाँ धर्म को धाय है ।
नमन बहु जिय करें देव गुण गाय है ॥
मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

देव जिनकी सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी ।
रूप द्युति ध्यान मुद्रा कही जिन जिसी ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं निर्वपामीति
स्वाहा ।
सुरग थानक विषै देव जिनके सही ।
रतनमय जैन बिम्ब विगर किये हैं यही ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१८॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसम्बन्धिजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
ज्योतिषी व्यंतरा थान मध्यलोक जी ।
बिन किये चैत्य जिन कहे अघ रोक जी ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१९॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसम्बन्धिजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
भवन देवन विषै बहुत जिनराय जी ।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पाय जी ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥२०॥
ॐ ह्रीं श्री अधोलोकसम्बन्धिजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।

उत्तम मार्दव धर्म पूजा

आदि इन पूज्य थानक बहुत है सही।
सिद्धक्षेत्र मोक्ष फलदायक तीरथ मही ।।
मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदनमनमार्दवधर्मार्घाय अर्घ।

जयमाला

(वेसरी छन्द)

मार्दव धर्म मान को खोवै, ता फल जगत पूज्य पद होवै।
मार्दव सकल दोष निरदारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।११।।
मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजैं, मार्दव धरम भजै अघ धूजैं।
मार्दव मान हरै सुख कारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१२।।
मार्दव धरम महानर ध्यावै, मार्दव धरम मानि नहिं पावै।
यह मार्दव वृष शिव थल धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१३।।
मार्दव सब को राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना।
मार्दव धरम जीव जे धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१४।।
मार्दव धरम सुराग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भव फेरा।
मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१५।।
मार्दव मोक्षमार्ग को दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता।
मार्दव वृष गुणवंता धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१६।।
मार्दव धरम कल्पतरु भाई, मार्दव मनवांछित फलदाई।
मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१७।।

मार्दव धरम कनकमें पोना, मार्दव धारि सकै न कमीना।
मान मार मार्दव वृष धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१८।।
मार्दव वृष सब धर्म प्रधाना, मार्दव धर्म मोह मल्लको हाना।
मार्दव भाल पुरुष उर धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१९।।

(दोहा)

मान मार मार्दव करै, हरे पाप मल सोय।
जगत छुड़ावै शिव करै, ते मो रक्षक होय ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मार्घाय पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम आर्जव धर्म पूजा

(वेसरी छन्द)

जग परपंच रहित जे भावा, सरल चित्त सबतैं निरदावा।
तिनको आरजव भाव सु कहिये, सो हां ध्यापि पूजफल लहिये ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्मंग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् !
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।

अथाष्टकम्

(वेसरी छन्द)

क्षीर समुद्र का उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धर अति धीरा।
जरा रोग नाशन को भाई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं।

चन्दन बावन जल घसि लाया, कनक पात्र में धरि उमगाया।
शोकानल तप नाशन भाई, आरजव धर्म जजों शिर नाई ।।१२।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं।
अक्षत मुक्ताफलसे जानी, उज्ज्वल खण्ड विवर्जित आनी।
क्षय नहिं होय इसो पद दाओ, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१३।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान्।
फूल सुगंध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया।
तिनकी माल गूंथि करि लाई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१४।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं।
नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्ति तैं लावै।
भूख व्याधिनाशन को भाई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१५।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं।
दीपक रतन थल धरि लीजै, मन वच काय शुद्ध करि लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दर्शाई, आरजव धर्म जजों शिर नाई ।।१६।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं।
धूप अगरजा चन्दन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्मदहन को अगनि जराई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१७।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय दुष्टष्टकर्मदहनाय धूपं।
ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लोग आदि हितकारी।
सिद्धलोक बाछा मनमाहीं, आरजव धर्म जजों शिर नाई ।।१८।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा

जल चन्दन अक्षत कामागे, चरू दीपक फल धूप विथारी।
अर्ध लेय मन वच तन भाई, आर्जव धर्म जजों शिर नाई ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय अनर्घ्यपदंप्राप्तयेऽर्घ्यं ।

अथ प्रत्येकार्घाणि
(वेसरी छन्द)
गुण छयालीस जहां प्रभु मेरा, अष्टदश तहां दोष न हेरा।
तिन पद सरल भाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥
ॐ ह्रीं श्री छयालीसगुणसहितजिनचरणमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
मुक्त जीव अरहत श्रुति कीजे, मन वच कुटिल भाव तजि दीजे।
तिन पद सरल भाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीवरहन्तपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
कर्म काटि शिवलोक सिधारे, सिद्ध सु देव हरो अघ सारे।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥३॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
सिद्धशिला पैंतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तन स्थित आतम शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धशिलास्थितमुक्तत्मपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
गुण छत्तीस सु धारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
तिन पद सरल भाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।

(उत्तम आर्जव धर्म पूजा)

आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणानयुत दूरा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदोत्तमक्षमनमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
गुण पचीस उद्भव सु माहौं, ग्यारह अंग चौदह पुरवाहौं।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
बहु गुण धर उद्भव सु जानौ, दुरहितें तिन को चित आनौ।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदोत्तमक्षमनमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
बीस आठो गुण साधन सादा, सो नहिं लहें जगत की बाधा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री साधुपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
दूरहिं है मुनि गुण जु चितारैं, मन वच काया निज वश धारैं।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री साधुपदपरोत्तमक्षमनमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
वरण विहीन सु जिनवर बानी, तिन को सुनि सुख पावै प्रानी।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री जिनध्वनिमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
अतिशय क्षेत्र सु धारक सूरा, यात्रागण कहे पूरै कामा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा

शिखर सम्मेद आदि सिद्धथाना, तहं पुनि लिय शिवकर्मनाशाना।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥

ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
विगर किये जिनबिम्ब अनूपा, लक्षण चिह्न जानि जिनरूपा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिरधावे ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
कृत्रिम जे जिनबिम्ब विराजें, विनय सहित पुन दायक छाजें।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिवधावे ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री कृत्रिमजिनचैत्यपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
इत्यादिक बहु क्षेत्र सु थाना, पूजनीक तीरथ अघ हाना।
जिनपद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिवधावे ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।

अथ जयमाला

(दोहा)
सरल भाव सारे सरस, सुरनर पूज्य महान।
तातें तजनी कुटिलता, आरजव भाव ल्हान ॥११॥
(वेसरी छन्द)
सरलभाव समता उर आने, सरलभाव सब औगुण भाने।
आरजव भाव धरै जे जोधा, तिनने जिनवानी रस पीवा ॥१२॥
आरजव भाव धरै जे प्राणी, तिनके होनहार शिवरानी।

उत्तम आर्जव धर्म पूजा

( २५

दोष भाव तिनतें नहिं छोवा, आरजव भाव धरें जे जीवा ॥१३॥
आरजव भाव अमरपद दावे, आरजव में औगुन नहि पावे।
कुटिलभाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१४॥

आरतिको आरजव ही खोवे, आरजवभाव पाप मल धोवे।
रोग शोक ताको नहिं छोवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१५॥
आरजव शुद्धभाव जिन पाया, तिनने लहि पुन पाप गमाया।
अनुभव आनंद तानें छोवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१६॥
आर्जव भाव दोष सब खोवे, आरजव कर्म कालिया धोवे।
शुद्ध स्वभाव सु ताने कीया, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१७॥
आरजवभाव सकल को प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतें न्यारा।
ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१८॥
आरजव सुर शिवके सुख ठाने, आरजवभाव पूर्व अघ भाने।
अद्भुत आपापर भिन्न कीया, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१९॥
( दोहा )
अन्तरंग निरदोषके, प्रगटै आरजव भाव ।
जाके फल मरती मिटै, छुटै कर्मको दाव ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्मंगाय पूर्णार्घं ।

  • इति उत्तम आर्जव धर्म पूजा समाप्त *

( दश लक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
२६ )

उत्तम सत्य धर्म पूजा

( अडिल्ल छन्द )
सत्य सरीसो धर्म जगत में है नहीं ।
सत्य धर्म परभाव लहै शिवको मही ।
तातें भवदुख हरण सत्य वृष भाइये ।
यहांपि में जजी सत्य मन लाइये ।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम सत्यधर्मंगाय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ! अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

अथाष्टकम्

( त्रिभंगी छन्द )
जो झूठ विनाशो जग बिसवारे, पुण्य प्रकाशो हितदानी ।
सब दोष निवारे समता धारे, शिवपुर कारे गुण थानी ॥
जग आद्वरकारी मोह निवारी, आनंदधारी जग मानी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, जल ले परमा जजि जानी ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत सौ वृष नाहीं या जगमाहीं, पूज्य कहाहीं शिव थानी ।
सब औगुण धोवे पाप विलोवे, धर्म पिलावे दुख हानी ॥
पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, शुद्ध करतारी भवि मानी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, गंध ले परमा जजि जानी ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

( २७
या सत्य समानो रतन न आनो, सम्यक दानो शिवकारी ।
भवदधि को नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी ॥
सियलको नसैनी शिव सुख देनी, ध्यावत जैनी अमलानो ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, अक्षत परमां जजि जानो ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
सत सौ नहिं मिटा मेटन चिंता, अघ अरिहंता जसदाई ।
सत जगत पियारो भव उद्धारो, दुखजल तारो श्रुति गाई ॥
याको मुनि ध्यावें शिवसुख पावें, पाप गमावें भव हानी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, पुष्प परमां जजि जानी ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत धर्म सु पूजे सब अघ धूजे, शिवग सुजे अधिकाई ।
याते वृष सारा काज संभारा, अशुभ विहारा सिधिदाई ॥
सत सारा नीका सुखदा जी का, शिवग टीका शुभ आनी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, ले चरू परमां जजि जानी ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत धर्म उजाला जगका पाला, विषम टाला धर्म करा ।
यह ज्ञान उजाले अशुभ सु टाले, संजम पाले झूठ हरा ॥
सत प्रीति उपावे वैर गमावे, जो श्रुति लावे उर ज्ञानो ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमां जजि जानो ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि० ।
सत धर्म प्रभावे मुनि शिव जावे, जगजस गावे श्रुति लाई ।
सत धर्म जु भूला अध्यक्ष धूला, झूठ कुझूला दह भाई ॥

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

सत धर्म अनूपा शुभ रस कृपा, पुण्य स्वरूपा मग मानो।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परगा जजि जानो ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मगाय दृष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि०।
सत धर्म अभ्यासी शिव थल बासी, पाप विनासी हितधारी।
गुण ज्ञान बढावे आदर ल्यावे, पुण्य उपावे सत भारी।।
जगमें अति नौका बंधुजी का, शिवतिय पीका गुण थानी।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, ले फल परगा जजि जानो ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति।
जल चन्दन नौका अक्षत टीका, फूल चुनी का माल करो।
चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल मया अर्घ धरो।
उर भक्ति बढ़ाई मुख श्रुति गाई, सत सब भाई पहिचानो।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, अर्घ परगा जजि जानो ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मगाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

अथ प्रत्येकधारिणी

(चौपाई)
क्रोध सहित जिय सत नहिं कहै, झूठ वचन तें अघ शिर लहै।
क्रोध रहित जिन वचन प्रमानि, सो सत धर्म चयो जिनवानी ।।११।।
ॐ ह्रीं क्रोधातिचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
लोभ सहित जिय झूठ वखानि, सांच धर्म ताकौ नहिं मानि।
लोभ रहित सत धर्म सुभाय, सो सत धर्म जजों श्रुति गाय ।।१२।।
ॐ ह्रीं लोभातिचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

उत्तम सत्य धर्म पूजा )

सांच न कहै भीतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव।
भयते रहित सत्य वच भाख, सो सत धर्म करौ श्रुति लाख ।।१३।।
ॐ ह्रीं भयातिचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
हास्य सत्यको नाशनहार, ताते सहै महा दुख भार।
हास्य रहित सत धर्म कहाय, सो सत धर्म जजों श्रुति गाय ।।१४।।
ॐ ह्रीं हास्याचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन आज्ञा विन भाखै वैन, पूर्वापर वच ठीक कहे न।
ऐसे दोष रहित सत भाय, सो सत धर्म जजों श्रुति गाय ।।१५।।
ॐ ह्रीं जिनाज्ञाल्लंघनारहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्व०।

(गीता छन्द)
जो देश में जिस वस्तु को तिस मानिये सो सत सही।
जिमि भात को गुजरात मालवदेश में चोखा कही।।
करनात में कूलू कहै द्राविड़में चोरु बखानिये।
इमि जानि जनपद सत्यको जजि हर्ष उर में आनिये ।।१६।।
ॐ ह्रीं जनपदसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।

(अडिल्ल छन्द)
बहु नर ताको कहै तिसौ ही मानिये।
रंक नाम लक्ष्मीधर जाहि बखानिये।।
तो यह रूढी नाम सत्य संवृत कही।
या नयते सत जानि जजों वृष सही ।।१७।।
ॐ ह्रीं संवृतसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।

(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा)

काहू नर आकार तथा पशु के सही।
चित्र काष्टमें थापि नाम नर पशु कही।।
यह स्थापन सत भेद शास्त्र में गाइयो।
ताको सत वृष जानि जजों मन लाइयो ।।१८।।
ॐ ह्रीं स्थापनासत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जाको जगमें नाम प्रसिद्ध बखानिये।
सोई ताको नाम सत्य सो मानिये।।
नाम सत्य सो जानि वानि जिन इम कही।
ताको मन वच काय जजों शुभ सुखमही ।।१९।।
ॐ ह्रीं नामसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही।
रूपवान रूप सत्य सो जानि कह्यो जिनवानी जी।
ऐसो सत्य सु जानि जजों सुखदान जी ।।२०।।
ॐ ह्रीं रूपसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
कही वस्तु यह यातें छोटी है सही।
यातें है यह बड़ी अपेक्षा इमि कही।।
याको नाम प्रतीति सत्य सो जानिये।
ताको भी मैं जजों भक्ति उर आनिये ।।२१।।
ॐ ह्रीं अपेक्षासत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जो नरपति को पुत्र ताहि राजा कहै।
सो नैगमनय जानि सत्य तातें यहै।।

उत्तम सत्य धर्म पूजा

यही सत्य व्यौहार जिनेश्वर धुनि कही ।
मैं जजिहौं कर भक्ति नाय मस्तक मही ।।१२।।
ॐ ह्रीं व्यवहारसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
शक्ति इन्द्रमें इसी लोक उलटो करै ।
सो तो लोक अनादि उलटि कैसे धरै ।।
षै यह शक्ति अपेक्षा वचन प्रमान है ।
यह संभावन सत्य जजौं क्षिति आन है ।।१३।।
ॐ ह्रीं संभावनासत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
जीव अनंत अनादि नजर आवै नहीं ।
द्रव्य अमूर्ती पांच नरक सुर की मही ।।
ये नहिं दीखें नयन सूत्र सों जानिये ।
भाव सत्य सो जानि जजौं मन आनिये ।।१४।।
ॐ ह्रीं भावसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
किसी वस्तु की उपमा जाको लाइये ।
ज्यों दानी नर देखि कलपद्रुम गाइये ।।
याको उपमा सत्य नाम जानौं सही ।
सो मैं पूजौ भक्ति नाय मस्तक मही ।।१५।।
ॐ ह्रीं उपमासत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
इत्यादिक बहु भेद सत्यके जानिये ।
कहे देव जिनराज आपनी वानिये ।।
सो मैं मन वच काय शुद्ध थुति गाइ जी ।
पूजौं सत्य सु धर्म अरथ कर लाइ जी ।।१६।।
ॐ ह्रीं सत्यधर्मांगायार्धं महार्घ निर्वपामीति स्वाहा ।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


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स्रोत: Gyata संग्रह।

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