दशलक्षण धर्म विधान पूजन आदि
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अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | ACKNOWLEDGEMENT |
| 2 | निवेदन |
| 3 | मूल्य : १०=०० |
| 4 | मुद्रक : |
| 5 | भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत दशलक्षणधर्म |
| 6 | उत्तमक्षमाका लक्षण |
| 7 | मार्दवधर्मका लक्षण |
| 8 | आर्जवधर्मका लक्षण |
| 9 | सत्यधर्मका लक्षण |
| 10 | शौचधर्मका लक्षण |
| 11 | संयमधर्मका लक्षण |
| 12 | उत्तम तपका लक्षण |
| 13 | त्याग धर्मका लक्षण |
| 14 | आकिंचन्य धर्मका लक्षण |
| 15 | ब्रह्मचर्य धर्मका लक्षण |
| 16 | ॐ |
| 17 | श्री दशलक्षण मण्डलविधान |
| 18 | समुच्चय पूजा |
| 19 | अथ जयमाला |
| 20 | (दोहा) |
| 21 | (त्रैसरी छन्द) |
| 22 | उत्तम क्षमा धर्म पूजा |
| 23 | अथाष्टकम् |
| 24 | अथ प्रत्येकार्घ्याणि |
| 25 | उत्तम क्षमा पूजा |
| 26 | (गीता छन्द) |
| 27 | (चौपाई) |
| 28 | जयमाला |
| 29 | (दोहा) |
| 30 | (तेवरी छन्द) |
| 31 | उत्तम मार्दव धर्म पूजा |
| 32 | अष्टाष्टकम् |
| 33 | उत्तम मार्दव धर्म पूजा |
| 34 | अथ प्रत्येकार्घ्याणि |
| 35 | जयमाला |
| 36 | उत्तम आर्जव धर्म पूजा |
| 37 | अथाष्टकम् |
| 38 | (दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा |
| 39 | (उत्तम आर्जव धर्म पूजा) |
| 40 | (दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा |
| 41 | अथ जयमाला |
| 42 | उत्तम सत्य धर्म पूजा |
| 43 | अथाष्टकम् |
| 44 | अथ प्रत्येकधारिणी |
ACKNOWLEDGEMENT
We sincerely express our gratitude to “Shree Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh” from where we have sourced “Daslakshan Dharm Vidhanadi Pooja”.
“Shree Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh” have taken due care, However, if you find any error, for which we request all the reader to kindly inform us at [email protected] or to [email protected] “Shree Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh”
उत्तमक्षमा
उत्तममार्दव
उत्तमआर्जव
उत्तमसत्य
उत्तमशौच
उत्तमसंयम
उत्तमत्याग
उत्तमआकिंचन्य
उत्तमब्रह्मचर्य
दशलक्षणधर्म-विधानादि पूजा
प्रकाशक
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ-३६४२४०
भगवानश्रीकुन्दकुन्द-कहानजैनशास्त्रमाला, पुष्प-८४
ॐ
- नमः सिद्धेभ्यः *
कवि श्री टेकचन्दजी विरचित-
दशलक्षणधर्म-विधानादि
पूजा
- प्रकाशक *
श्री दि० जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ-३६४२४० (सौराष्ट्र)
निवेदन
कविवर पंडित श्री टेकचन्दजी रचित ‘दशलक्षणधर्म-विधानपूजा’ की अनेक आवृत्ति सोनगढ-ट्रस्ट की ओरसे प्रकाशित हो चुकी है। मुमुक्षुसमाजमें इस विधानपूजाकी विशेष माँग होनेसे इसकी यह दशमी आवृत्ति प्रकाशित करते हुए प्रकाशनसमिति प्रसन्नताका अनुभव करती है।
शुद्धात्मतत्त्वदृष्टिप्रधान अध्यात्म साधनाके साथ मुमुक्षु-समाजमें वीतराग देव-गुरु-धर्मकी भक्तिभावभीनी उपासनाका-निश्चय-व्यवहारके सुमेलपूर्वक आराधनाका-प्रचलन अध्यात्मयुगस्रष्टा देव-गुरुभक्त पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामीका ही पुनीत प्रताप है। अध्यात्म-तीर्थधाम सोनगढमें पूज्य गुरुदेवश्रीके पावन प्रभावसे एवं धन्यावतार प्रशममूर्ति पूज्य बहिनश्री चम्पाबेनकी देव-गुरु-भक्तिभीनी मंगल प्रेरणासे आराधनापर्व दशलक्षणपर्वपूजनमें यह पूजा, माँडला माँड करके, जिनमंदिरमें अति भक्तिभावसे नियमित की जाती है। तदनुसार अन्य गाँवोंमें भी मुमुक्षुमण्डलों द्वारा यह उपक्रम चलता है।
'दशलक्षणधर्मविधानपूजा’में १० कोष्ठका रंगोली या रंगीन चावलसे माँडला बनाकर अनुक्रमसे प्रत्येक कोठेमें उत्तम क्षमादि धर्मके जितने अवान्तर भेद हैं उनके प्रतीकके रूपमें ‘ॐ’ पुष्प या छत्र आदिके बिंडे माँडने चाहिये। फिर कलश स्थापन करके वेदीमें दशलक्षणयन्त्रकी स्थापना करें। जिनेन्द्र-अभिषेक करके सकलीकरणविधि (शुद्धि) कर श्री देव-शास्त्र-गुरुपूजाका वा चैवीस
प्रथममावृत्ति ६००० : वीर सं० २४०९
द्वितीयमावृत्ति ११०० : वीर सं० २४८८
तृतीयावृत्ति ११०० : वीर सं० २४९८
चतुर्थावृत्ति ११०० : वीर सं० २५०१
पंचमावृत्ति २१०० : वीर सं० २५०४
षष्ठमावृत्ति २१०० : वीर सं० २५०६
सप्तमावृत्ति १००० : वीर सं० २५१२
अष्टमावृत्ति ३००० : वीर सं० २५१५
नवमावृत्ति २००० : वीर सं० २५२०
दशमावृत्ति ३००० : वीर सं० २५२३
मूल्य : १०=००
मुद्रक :
स्मृति ऑफसेट
सोनगढ-२६४२५०
Phone : (०२८४६) ४४३८१
परम पूज्य अध्यात्ममूर्ति सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामी
जिनकी पूजा करें। तत्पश्चात् इस मंडलविधान पूजा का प्रारम्भ करना चाहिये। मण्डलविधानपूजाके उद्यापन निमित्त अन्तमें साधर्मिकोंको यथाशक्ति प्रभावना बांटकर दान भी करना चाहिये।
इस विधानपूजाकी प्रथम आवृत्ति सुरतनिवासी श्री मूलचन्द किसनदास कापडियाजीके प्रकाशनके आधारसे मुद्रित की गई थी। उस समय स्व० श्री कापडियाजीने सहर्ष सम्मति दी थी, तदर्थ प्रकाशनसमिति उनकी आभारी है।
सोनगढ साहित्यप्रकाशनसमिति
बहिनश्री-चम्पाबेन-८४वीं जन्मजयंति, श्री दि. जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट,
भादो कृष्णा २, वि. सं. २०५४ सोनगढ-३६४२५०
भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत दशलक्षणधर्म
उत्तमखमद्दवज्जवसच्चसउचं च संजमं चेव।
तवचागमकंचिणं बम्हा इदि दसविहं होदि ॥७०॥
उत्तमक्षमाका लक्षण
कोहुप्पत्तिस पुणो बहिरंगं जदि हवेदि सव्वादं।
ण ण कुणदि किंचि वि कोहो तस्स खमा होदि धम्मो त्ति ॥७१॥
मार्दवधर्मका लक्षण
कुलरूवजादिबुद्धि सु तपदुस्सीलेसु गारवं किंचि।
जो ण वि कुणदि समणो मद्दवधम्मं हवे तस्स ॥७२॥
आर्जवधर्मका लक्षण
मोत्तूण कुडिलभावं णिम्मलहियएण चरदि जो समणो।
अज्जवधम्मं तइयो तस्स दु संभवदि णियमेण ॥७३॥
सत्यधर्मका लक्षण
परसंतावकयकारणवयणं मोत्तूण सप्परहियवयणं।
जो वददि भिक्खुसु तुरियो तस्स दु धम्मो हवे सच्चं ॥७४॥
शौचधर्मका लक्षण
कंखभावणिव्वत्ति किच्चा वेरग्गभावणाजुत्तो।
जो वट्टदि परमगुणो तस्स दु धम्मो हवे सोच्चं ॥७५॥
संयमधर्मका लक्षण
वदसमिदिपालणाए दंडच्चाएण इंदियजएण।
परिणममाणस्स पुणो संजमधम्मो हवे णियमा ॥७६॥
उत्तम तपका लक्षण
विसयकसायविणिग्गहभावं काऊण झाणसज्झाए।
जो भावइ अप्पाणं तस्स तवं होदि णियमेण ॥७७॥
त्याग धर्मका लक्षण
णिग्गहेत्तियं भावइ मोहं चइऊण सव्वदव्वेसु।
जो तस्स हवे चागो इदि भणिदं जिणवरिंदेहिं ॥७८॥
आकिंचन्य धर्मका लक्षण
होऊण य णिस्संगो णियभावं णिग्गहिसु सुहृदहृदं।
णिग्गहेण दु वट्टदि अणयारो तस्स किंचण्हं ॥७९॥
ब्रह्मचर्य धर्मका लक्षण
सव्वंगं पेक्खंतो इत्थीणं तासु मुय्यदि दुब्भावं।
सो बम्हचेरभावं सव्वकदि खलु दुद्धरं धरित्तुं ॥८०॥
(द्वादशानुप्रेक्षामेंसे)
ॐ
कविवर श्री टेकचन्दजी कृत
श्री दशलक्षण मण्डलविधान
(जोगीरासा)
नेमीनाथो, दे तो साथो’, भव भव और न चाहूँ।
भक्ति तिहारी, निशिदिन मन वच, काय लाय करि लाऊँ।।
धर्म कह्यो तुम, बानी दश विध, सो मोहि होउ सहाई।
करुणासागर, समरस गर्भित, शीश नमों श्रुति गाई।।१।।
(गीता छन्द)
धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहे।
भवभोग को यह महा औषधि, मरण जामन दुख दहे।।
यह विरत नीका मीत जीका’, करो आदरतै सही।
मैं जजों दशविध धर्मिक अंग, तासु फल है शिवमही।।२।।
(पद्धडि छन्द)
यह धर्म भवदधि नाव जान, या सेयें भव दुख होइ हान।
यह धर्म कल्पतरु सुखपूर, पै पूजों भव दुख करन दूर।।३।।
(गीता छन्द)
यह विरत मन कपि गले माहीं, सांकली सम जानिये।
गज अश्व जीतन सिंह जैसो, मोहतम रवि मानिये।।
१. तुम्हारा साथ। २. जीव का मित्र।
सुरज्ञान माहीं विरत नाहीं, मनुज दू शुभ कुल लहे।
तातै सु अवसर है भलो, अब करो पूजा धुनि कहे।।४।।
(केसरी छन्द)
जाने दशलक्षण व्रत कीना, ते सतपुरुषनमें प्रवीना।
भवसागर फिरनी मिटि जावे, जो नर दशलक्षण वृष भावे।।५।।
(भुजंगप्रयात छन्द)
यही धर्म सारं करै पाप क्षारं, यही धर्म सारं करै सुख अपारं।
यहीधर्मधीरा हरै लोक पीरा, यहीधर्ममीरा करै लोक तीरा।।६।।
(त्रिभंगी छन्द)
यह धर्म हमारा, सब जग प्यारा, जगत् उधारा हितदानी।
यह दशविध गाया, जन मन भाया, उच्च बताया जिनवानी।।
यह शिव करतार, अबधै उद्धार, अबि उद्धारा मुनि धारा।
ताको मैं ध्याऊँ, शीश नवाऊँ, अर्घ चढाऊँ सुखकारा।।७।।
(चौपाई छन्द)
या व्रतकी महिमा कहा वीर, दशविध धर्म हरे भवपीर।
इसी धर्म बिन जग भरमाय, जजबु धर्म अति दुरलभ पाय।।८।।
(दोहा)
दश प्रकारकोधर्म यह, दशविध सुतरु जान।
वांछित पद सेवक लहै, अधिक कहा सुखदान।।९।।
सोरठा-धर्म हमारा नाथ, धर्म जगतका सेहरा।
भव भवमें हो साथ, और न वांछा मनविषे।।१०।।
मण्डलमध्ये परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्।
समुच्चय पूजा
(त्रिभंगी छन्द)
यह धर्म क्षमावा मान गुमावा, सरल सुभावा सतिवानी।
शुचि भाव करावा संजम लाबा, तप करवावा अधिकारी।।
शुचि त्याग बतावे नगन पुजावे, शील बढावे शिवदाई।
यह धर्म हमारा श्राप करारा, पूजन धारा सिरनाई।।११।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
(मृदंगणदकी चाल)
क्षीरसागर तना नीर शुभ लाइये।
कनक झारी विषै धार गुण गाइये।।
मरण उतपत्ति नहीं होय तो फल सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही।।१२।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वापामिति स्वाहा।
नीर संग अग्रु चन्दन सु घिस लाइये।
सुभग पातर विषै धारि श्रुति गाइये।।
जगत् तप तासु फल तुरत नाशये सही।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही।।१३।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वापामिति
स्वाहा।
लेइ अक्षत भले मुक्तिफल से कहे ।
ऊजले अखण्ड सुभग स्वर्ण पातर लहे ।।
अक्षयपद पावने आप मनमें सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
फूल कञ्चनवरन कल्पतरुके भले ।
गंध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले ।।
माल तिन गुंथि कामबाण नाशक सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुगप नैवेद्य मोदक घने लाइये ।
विविध स्वादामय सु धरि भक्ति उर भाइये ।।
भूख-दुःखहरण स्वर्ण-पात्र धारिके सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दीप मणि रतनमय और घृतमय सही ।
धारि कनक थालमें सु आरति जु करि लही ।।
धर्मज्योति मोह अंधकार नाशिका सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
धूप दश अंग मय लायकर सारजी ।
अग्नि संग खेवहूँ सुभक्ति उर धारजी ।
कर्म क्षयकार भव वास नाशन सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
लौंग खारिक सुनारिकेल सुखकरजी ।
और बादाम पुंगी फलादि सार जी ।।
लेइ निज हाथ ये सुभक्ति धरिके सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
नीर गंध अक्षत सु फूल चरू सोई जी ।
दीप अरु धूप फल अरघ संजोड़ जी ।।
पुरट थाली विषै भक्ति करिके सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
धर्म भवकृप तै काढ़ने को रस्सी ।
भव उदधि पार करतार नवका इसी ।।
धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजों शिवमही ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः महार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।
अथ जयमाला
(दोहा)
दश वृष रतन मिलायके, माल करै भव जोय ।
धरै आपने उर विषै, ता सम अवर न कोय ।।१।।
(त्रैसरी छन्द)
दशलक्षण वृष शिवमग दीवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा ।
मुकति दीप पहुँचावन जादा, ये दश धर्म जजों जुत भावा ।।११।।
दशविधि धरम धरे जो कोई, करम नाशि फिरि दुख नहिं होई ।
धरम जु साधन और न कोई, यों दश धर्म जजों मद खोई ।।१२।।
धरम जीव का पालनहारा, धर्म मान का खण्डन वारा ।
धरम थकी जावे कुटिलाई, इमि दश धर्म जजों चितलाई ।।
सांच वचन सम धरम न जानो, धर्म भाव निर्मल पहिचानो ।
धरम जीव रखइ इन्द्रिय जीतै, इमि दश धर्म जजों करि प्रीतै ।।१४।।
तप ही सर्व धर्मका मूला, त्याग धरमते क्षय अघ शूला ।
धरम नगन सम और न कोई, इमि दश धर्म जजों मद कोई ।।१५।।
नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धर्म जगतमें भाई ।
जो दशलक्षण मनमें आने, सो भव तप हरि शिवपद ठाने ।।१६।।
(दोहा)
दशलक्षण व्रत इण विधि कीजे, उत्कृष्टे दश वास करीजे।
जातर बेले पारण भाई, तथा इकंतर वास कराई।।१।।
शक्तिहीन है तो सुन मीता, दश एकंत करो धरि प्रीता।
व्रत दश बरस करे मन लाई, करु उद्यापन मन वच काई।।२।।
नहीं उद्यापन शक्ति तुम्हारा, तो दूणो व्रत करु सुखकारी।
पीछे यथाशक्ति खरचावे, पूजन धर्म उद्योत करावे।।३।।
इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करें दश सार।
पावे सुख मन भावना, अनुक्रम ले भव पार।।४।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
।। इति समुच्चय पूजा ।।
उत्तम क्षमा धर्म पूजा
(अडिल्ल)
जीव तिरस थावर जेते जगमें सही।
देव नरक नर पशु चारि गति की मही।।
तिन सब ऊपर दयाभाव उरमाहि जी।
सो है उत्तम क्षमा, थापि जजुं याहि जी।।१।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मंग! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मंग! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मंग! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अथाष्टकम्
(पद्धड़ी छन्द)
जल गंग नदी को विमल सोइ, धरि रतन प्याले शुद्ध होइ।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।१।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं।
बावन चन्दन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।२।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय संसारतापविनाशनाय चंदनं।
अक्षत मुक्ताफल सम जु लाय, अति उज्ज्वल नखशिख शुद्ध भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।३।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान्।
शुभ फूल कलपतरुके अनूप, करि माला सुभग सुगंध रूप।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।४।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं।
नाना रस पूरित चरु सम्हार, शुभ मोदक आदि अनेक धार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।५।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं।
मणिदीपकसार बनाय लाय, धरि कनक थाल भरि भक्ति भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।६।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं।
ले धूप अगरुजा गंधकार, दुरभाव हुताशन पाहि जार।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।७।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय दुष्टष्टकर्मदहनाय धूपं।
फल नारिकेल बादाम सोइ, पुंगीफल खारिक भक्ति जोइ।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।८।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं।
जल चन्दन अक्षत फूल लाय, चरु दीप धूप फल अरघ भाय।
यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन।।९।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मगाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं।
अथ प्रत्येकार्घ्याणि
(अडिल्ल)
पाप प्रकृति कर जीव अशुभ बंधन कर्यो।
थावर नामा कर्म उदय दुखको भर्यो।।
पृथ्वी माहि सु जाय सहै बहु अघ भला।
तिन का रक्षण-भाव क्षमा उत्तम भला।।१।।
ॐ ह्रीं श्री पृथिवीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घं।
इक इंद्रियके द्वार अतुल विपदा सहै।
तिनको दुखमय जानि मुनि करुणा करै।।
तसु प्रसादे झटिति मोक्ष-वनिता वरै।।२।।
ॐ ह्रीं श्री जलकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मगाय अर्घं निर्वपामी।
अनागिकाय धर जीव एक इन्द्रिय सही।
नाना दुख तन सहै जलै सब जग मही ।।
इन पर करुणाभाव धरै जे भवि सही।
सो ही उत्तम क्षमा मोक्षदाता कही ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री अग्निकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
पवन कायके जीव महा संकट सहै।
हाथ पाँव मुख वचन शको बाधा लहै ।।
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा कही शिव की मही ।।४।।
ॐ ह्रीं श्री वायुकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
हरित कायमें प्राणी अति भेदन लहै।
छेदन भेदन कष्ट महा अघ फल सहै ।।
इन पर समताभाव सुखी इनको चहै।
सो ही उत्तमक्षमा धारी मुनि शिव लहै ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
थावरके पन भेद पाप फलतैं बने।
सूक्ष्म बादर भेद दोय यों जिन भने ।।
इनको दुखमय जानि दया मन लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिरनाय है ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री सूक्ष्मस्थूलपंचथावरपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
लट अरु जोंक गिंडोला इल्ली जानिये।
कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये ।।
उत्तम क्षमा पूजा
इन पर करुणाभाव जती धारै सही।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिव की मही ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
चींटी कुंथा खटमल बीछू दुख मही।
तेइन्द्रिय परजाय पर्ण घुण आदि ही ।।
इनको दुखमय जानि मुनि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सब अघ जरै ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री त्रीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
माखी मच्छर टीड़ी भँवरादिक सही।
बर्षा ततइया मकड़ी चतुरिन्द्रिय कही ।।
इनको दुखिया देखि मुनि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों वसुविधि जरै ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
इन्द्रिय पांचों होय नहीं मन जो लहै।
ते तिज जानि अबेनी अफल दहै ।।
इनको दुख भरिपुर जानि करुणा धरै।
सो ही उत्तम क्षमा जजों शिवफल धरै ।।१०।।
ॐ ह्रीं असंजीपंचेंद्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
नरक जीव अति दुखी पापफलतैं सही।
छेदन भेदन पीर सहै जाति ना कही ।।
इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं।
सो ही उत्तम क्षमा जजों सुखदाय हैं ।।११।।
ॐ ह्रीं नारकीजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
(गीता छन्द)
मनुज क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने।
बहु चाह पीड़ित रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिनै ।।
तिन देख यतिवरद या लावैं, महा दीनदयाल जी।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल जजों, भाग्य विशाल जी ।।१२।।
ॐ ह्रीं मनुष्यजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
परकार चारो देव गतिमें, जीव सुख राचै सही।
लखि देखि परको झुरै नित ही, मानते पीड़ा कही ।।
तिन देखि मुनि उर दया भावै, महा कोमल भावजी।
सो धर्म उत्तम क्षमा पूज्यों, अघते कर चावजी ।।१३।।
ॐ ह्रीं चतुर्गतिदेवजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
(चौपाई)
थावर तिरस जीव सब जोई, चहुंगति करमनके वश होई।
तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम खम धर्म जगाई ।।१४।।
ॐ ह्रीं त्रसस्थावरसमस्तजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मार्घ्यं अर्घ्यं।
जयमाला
(दोहा)
धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय।
जजैं जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय ।।१५।।
(तेवरी छन्द)
सब जीवनमें राग न दोषा, सो है क्षमा धरम निरदोषा।
दुर्जन कृत उपसर्ग लहावै, ताहू पै समभाव रहावै ।।१६।।
मुनिको वचन कहे दुखकारी, मरम छेद छेदे अघ धारी।
मान खण्ड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ॥१॥
जो कोई दुष्ट मुनिनिको मारे, तीक्ष्ण शस्त्र तैं करि परिहारे।
बाधे तनको खेद न पावै, तिन पर क्षमा धर्म मन लावै ॥४॥
अति दुखिया जियको ऋषि जाने, तब मुनि अनुकम्पा मन आनै।
आपा परको हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ॥५॥
उत्तम क्षमा धरम सुखदाई, क्षमा धरम सब जियका भाई।
जब मुनि हू पै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ॥६॥
क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई।
क्षमा समान न बल अति पावै, ताते जती क्षमा वृष भावै ॥७॥
क्षमा धरम शिव राह बताई, क्षमा तात माता अरु भाई।
जाते सिद्ध सुखकोन पावै, ऐसी क्षमा मुनी मन लावै ॥८॥
( सोरठा )
क्षमा आभूषण सार, उरमें जो पहिरे सही।
ते भवसागर पार, जजो धर्म उत्तम क्षमा ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मणाय पूर्णार्घं।
॥ इति उत्तमक्षमा धर्म पूजा ॥
उत्तम मार्दव धर्म पूजा
( षट्पदी छन्द )
मार्दव वृष भाव विचार सोइ, जहां मान भाव दीखे न कोइ।
इस धारी मुनि शिवगामि जानि, मैं जजों शापि मार्दव सुभानि ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय। अत्र अवतर अवतर संवौषट्। अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अष्टाष्टकम्
( मयूणानन्द की चाल )
क्षीर सम नीर शुद्ध गाल करि लाइये।
पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये ॥
जगत् फिरनो मिटे तासु फल तैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय जलं।
स्वच्छ नीर संग चन्दनादि को मिलायजी।
शुद्ध गंध युक्त भक्ति भावतैं चढ़ायजी।
जगत् आताप हर जानि ता फल सही।
धरम मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय चन्दनं।
अक्षत समुज्वल खंड विन जानिये।
सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये ॥
उत्तम मार्दव धर्म पूजा
ध्रौव्य फल दाय मन लाय ध्याऊँ सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय अक्षतान्।
फूल कल्पवृक्षके गंध रंग सारजी।
माल गुंथि शुद्ध भाव भक्ति कर धारजी।
मदन मद हरन सुफल जानि यातैं सही।
धरम मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय पुष्पं।
सुभग सर शुद्ध नैवेद्य मन लाइये।
मोदकादि शुद्ध भक्ति भावतैं चढ़ाइये ॥
धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन बचन तन सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय नैवेद्यं।
दीप रतनन मयी नाश तमको करा।
कनक पातर विषै भक्तिभाव तैं धरा।
नाश अज्ञान है तासु फल तैं सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मणाय दीपं।
धूप दश गंध शुभ लेइ मन मानिये।
अगर चन्दन सबै मेलि शुभ ठानिये ॥
अग्नि संग खेइये कर्म जालन सही।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मगाय धूपं ।
श्रीफलादि लोग पुग्गफलादि जानिये ।
शुद्ध बादाम खारिक भले आनिये ॥
सिद्ध थानक लहे तासु फलंतें सही ।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मगाय फलं ।
नीर चन्दन अखित्त पुप्प चरु दीप जी ।
धूप फल अर्घ कर भाव शुद्ध टीप जी ॥
लोक में फिरन, तन धरन मिट्टे है सही ।
धर्म मार्दव जजों शुद्ध शिवदा मही ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मार्घ्यं ।
अथ प्रत्येकार्घ्याणि
(चाल–मणुयानंद की )
देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही ।
दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं ॥
नमत तिन पद करें धर्म मार्दव कहो ।
सो जजों चारि गति मांहि भरमन दहो ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री वीतरागदेवपदनमन्मार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
वीतराग देव कही बानी सो धर्म है ।
ता सुने जीव निज हरे भाव मर्म है ॥
मन वचन काय श्रुतपाद फिरनाय है ।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री जिनपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
धर्म को सेय तप लेय कर्म जर जी ।
भये सिद्धदेव तन रहित सुखकार जी ॥
लेय इन नाम मन वचन शिर नाय है ।
सो जजों धर्म मार्दव सु शिवदाय है ॥१३॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
धारि छत्तीस गुण सुरि सुखदाय जी ।
धर्म तप भावसों गुप्ति धरि भाय जी ॥
मान तजि नमन इन पद विधि लाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
धारि गुण पांच अरु वीस उवझाय जी ।
और भी अनेक गुण पास तिन थाय जी ॥
मान तजि इन चरण कायको नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
क्षेत्र अतिशय तहाँ धर्म को धाय है ।
नमन बहु जिय करें देव गुण गाय है ॥
मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
देव जिनकी सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी ।
रूप द्युति ध्यान मुद्रा कही जिन जिसी ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं निर्वपामीति
स्वाहा ।
सुरग थानक विषै देव जिनके सही ।
रतनमय जैन बिम्ब विगर किये हैं यही ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१८॥
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसम्बन्धिजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
ज्योतिषी व्यंतरा थान मध्यलोक जी ।
बिन किये चैत्य जिन कहे अघ रोक जी ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥१९॥
ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसम्बन्धिजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
भवन देवन विषै बहुत जिनराय जी ।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पाय जी ॥
मान तजि शीश इन चरण को सु नायो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ॥२०॥
ॐ ह्रीं श्री अधोलोकसम्बन्धिजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मार्घ्यं अर्घं ।
आदि इन पूज्य थानक बहुत है सही।
सिद्धक्षेत्र मोक्ष फलदायक तीरथ मही ।।
मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदनमनमार्दवधर्मार्घाय अर्घ।
जयमाला
(वेसरी छन्द)
मार्दव धर्म मान को खोवै, ता फल जगत् पूज्य पद होवै।
मार्दव सकल दोष निरदारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।११।।
मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजैं, मार्दव धरम भजै अघ धूजैं।
मार्दव मान हरै सुख कारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१२।।
मार्दव धरम महानर ध्यावै, मार्दव धरम मानि नहिं पावै।
यह मार्दव वृष शिव थल धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१३।।
मार्दव सब को राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना।
मार्दव धरम जीव जे धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१४।।
मार्दव धरम सुराग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भव फेरा।
मार्दव उत्तम पुरुष सु धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१५।।
मार्दव मोक्षमार्ग को दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता।
मार्दव वृष गुणवंता धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१६।।
मार्दव धरम कल्पतरु भाई, मार्दव मनवांछित फलदाई।
मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१७।।
मार्दव धरम कनकमें पोना, मार्दव धारि सकै न कमीना।
मान मार मार्दव वृष धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१८।।
मार्दव वृष सब धर्म प्रधाना, मार्दव धर्म मोह मल्लको हाना।
मार्दव भाल पुरुष उर धारै, ता फल आप तरै अनिनि तारै ।।१९।।
(दोहा)
मान मार मार्दव करै, हरे पाप मल सोय।
जगत् छुड़ावै शिव करै, ते मो रक्षक होय ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मार्घाय पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
उत्तम आर्जव धर्म पूजा
(वेसरी छन्द)
जग परपंच रहित जे भावा, सरल चित्त सबतैं निरदावा।
तिनको आरजव भाव सु कहिये, सो हां ध्यापि पूजफल लहिये ।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्मंग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् !
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
अथाष्टकम्
(वेसरी छन्द)
क्षीर समुद्र का उज्ज्वल नीरा, कनक पियाले धर अति धीरा।
जरा रोग नाशन को भाई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं।
चन्दन बावन जल घसि लाया, कनक पात्र में धरि उमगाया।
शोकानल तप नाशन भाई, आरजव धर्म जजों शिर नाई ।।१२।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं।
अक्षत मुक्ताफलसे जानी, उज्ज्वल खण्ड विवर्जित आनी।
क्षय नहिं होय इसो पद दाओ, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१३।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान्।
फूल सुगंध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया।
तिनकी माल गूंथि करि लाई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१४।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं।
नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्ति तैं लावै।
भूख व्याधिनाशन को भाई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१५।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं।
दीपक रतन थल धरि लीजै, मन वच काय शुद्ध करि लीजै।
घाति अज्ञान ज्ञान दर्शाई, आरजव धर्म जजों शिर नाई ।।१६।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं।
धूप अगरजा चन्दन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी।
कर्मदहन को अगनि जराई, आरजव भाव नमों शिर नाई ।।१७।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय दुष्टष्टकर्मदहनाय धूपं।
ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लोग आदि हितकारी।
सिद्धलोक बाछा मनमाहीं, आरजव धर्म जजों शिर नाई ।।१८।।
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं।
(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
जल चन्दन अक्षत कामागे, चरू दीपक फल धूप विथारी।
अर्ध लेय मन वच तन भाई, आर्जव धर्म जजों शिर नाई ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मंगाय अनर्घ्यपदंप्राप्तयेऽर्घ्यं ।
अथ प्रत्येकार्घाणि
(वेसरी छन्द)
गुण छयालीस जहां प्रभु मेरा, अष्टदश तहां दोष न हेरा।
तिन पद सरल भाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥
ॐ ह्रीं श्री छयालीसगुणसहितजिनचरणमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
मुक्त जीव अरहत श्रुति कीजे, मन वच कुटिल भाव तजि दीजे।
तिन पद सरल भाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीवरहन्तपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
कर्म काटि शिवलोक सिधारे, सिद्ध सु देव हरो अघ सारे।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥३॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
सिद्धशिला पैंतालीस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा।
तन स्थित आतम शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धशिलास्थितमुक्तत्मपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
गुण छत्तीस सु धारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा।
तिन पद सरल भाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
(उत्तम आर्जव धर्म पूजा)
आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणानयुत दूरा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदोत्तमक्षमनमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
गुण पचीस उद्भव सु माहौं, ग्यारह अंग चौदह पुरवाहौं।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥७॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
बहु गुण धर उद्भव सु जानौ, दुरहितें तिन को चित आनौ।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥८॥
ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदोत्तमक्षमनमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
बीस आठो गुण साधन सादा, सो नहिं लहें जगत् की बाधा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥९॥
ॐ ह्रीं श्री साधुपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
दूरहिं है मुनि गुण जु चितारैं, मन वच काया निज वश धारैं।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री साधुपदपरोत्तमक्षमनमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
वरण विहीन सु जिनवर बानी, तिन को सुनि सुख पावै प्रानी।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री जिनध्वनिमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
अतिशय क्षेत्र सु धारक सूरा, यात्रागण कहे पूरै कामा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
(दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
शिखर सम्मेद आदि सिद्धथाना, तहं पुनि लिय शिवकर्मनाशाना।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिव धावे ॥
ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
विगर किये जिनबिम्ब अनूपा, लक्षण चिह्न जानि जिनरूपा।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिरधावे ॥४॥
ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
कृत्रिम जे जिनबिम्ब विराजें, विनय सहित पुन दायक छाजें।
तिन पद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिवधावे ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री कृत्रिमजिनचैत्यपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
इत्यादिक बहु क्षेत्र सु थाना, पूजनीक तीरथ अघ हाना।
जिनपद सरलभाव शिर नावे, सो आरजव वृष जजि शिवधावे ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपदमनार्जवधर्मार्घ्यं ।
अथ जयमाला
(दोहा)
सरल भाव सारे सरस, सुरनर पूज्य महान्।
तातें तजनी कुटिलता, आरजव भाव ल्हान ॥११॥
(वेसरी छन्द)
सरलभाव समता उर आने, सरलभाव सब औगुण भाने।
आरजव भाव धरै जे जोधा, तिनने जिनवानी रस पीवा ॥१२॥
आरजव भाव धरै जे प्राणी, तिनके होनहार शिवरानी।
दोष भाव तिनतें नहिं छोवा, आरजव भाव धरें जे जीवा ॥१३॥
आरजव भाव अमरपद दावे, आरजव में औगुन नहि पावे।
कुटिलभाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१४॥
।
आरतिको आरजव ही खोवे, आरजवभाव पाप मल धोवे।
रोग शोक ताको नहिं छोवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१५॥
आरजव शुद्धभाव जिन पाया, तिनने लहि पुन पाप गमाया।
अनुभव आनंद तानें छोवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१६॥
आर्जव भाव दोष सब खोवे, आरजव कर्म कालिया धोवे।
शुद्ध स्वभाव सु ताने कीया, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१७॥
आरजवभाव सकल को प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतें न्यारा।
ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१८॥
आरजव सुर शिवके सुख ठाने, आरजवभाव पूर्व अघ भाने।
अद्भुत आपापर भिन्न कीया, आरजवभाव धरें जे जीवा ॥१९॥
( दोहा )
अन्तरंग निरदोषके, प्रगटै आरजव भाव ।
जाके फल मरती मिटै, छुटै कर्मको दाव ॥१०॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्मंगाय पूर्णार्घं ।
- इति उत्तम आर्जव धर्म पूजा समाप्त *
( दश लक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
उत्तम सत्य धर्म पूजा
( अडिल्ल छन्द )
सत्य सरीसो धर्म जगत् में है नहीं ।
सत्य धर्म परभाव लहै शिवको मही ।
तातें भवदुख हरण सत्य वृष भाइये ।
यहांपि में जजी सत्य मन लाइये ।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम सत्यधर्मंगाय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ! अत्र
तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
अथाष्टकम्
( त्रिभंगी छन्द )
जो झूठ विनाशो जग बिसवारे, पुण्य प्रकाशो हितदानी ।
सब दोष निवारे समता धारे, शिवपुर कारे गुण थानी ॥
जग आद्वरकारी मोह निवारी, आनंदधारी जग मानी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, जल ले परमा जजि जानी ॥११॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत सौ वृष नाहीं या जगमाहीं, पूज्य कहाहीं शिव थानी ।
सब औगुण धोवे पाप विलोवे, धर्म पिलावे दुख हानी ॥
पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, शुद्ध करतारी भवि मानी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, गंध ले परमा जजि जानी ॥१२॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
या सत्य समानो रतन न आनो, सम्यक् दानो शिवकारी ।
भवदधि को नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी ॥
सियलको नसैनी शिव सुख देनी, ध्यावत जैनी अमलानो ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, अक्षत परमां जजि जानो ॥१४॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
सत सौ नहिं मिटा मेटन चिंता, अघ अरिहंता जसदाई ।
सत जगत् पियारो भव उद्धारो, दुखजल तारो श्रुति गाई ॥
याको मुनि ध्यावें शिवसुख पावें, पाप गमावें भव हानी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, पुष्प परमां जजि जानी ॥१५॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत धर्म सु पूजे सब अघ धूजे, शिवग सुजे अधिकाई ।
याते वृष सारा काज संभारा, अशुभ विहारा सिधिदाई ॥
सत सारा नीका सुखदा जी का, शिवग टीका शुभ आनी ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, ले चरू परमां जजि जानी ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सत धर्म उजाला जगका पाला, विषम टाला धर्म करा ।
यह ज्ञान उजाले अशुभ सु टाले, संजम पाले झूठ हरा ॥
सत प्रीति उपावे वैर गमावे, जो श्रुति लावे उर ज्ञानो ।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमां जजि जानो ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मंगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि० ।
सत धर्म प्रभावे मुनि शिव जावे, जगजस गावे श्रुति लाई ।
सत धर्म जु भूला अध्यक्ष धूला, झूठ कुझूला दह भाई ॥
सत धर्म अनूपा शुभ रस कृपा, पुण्य स्वरूपा मग मानो।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परगा जजि जानो ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मगाय दृष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि०।
सत धर्म अभ्यासी शिव थल बासी, पाप विनासी हितधारी।
गुण ज्ञान बढावे आदर ल्यावे, पुण्य उपावे सत भारी।।
जगमें अति नौका बंधुजी का, शिवतिय पीका गुण थानी।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, ले फल परगा जजि जानो ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति।
जल चन्दन नौका अक्षत टीका, फूल चुनी का माल करो।
चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल मया अर्घ धरो।
उर भक्ति बढ़ाई मुख श्रुति गाई, सत सब भाई पहिचानो।
ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, अर्घ परगा जजि जानो ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मगाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
अथ प्रत्येकधारिणी
(चौपाई)
क्रोध सहित जिय सत नहिं कहै, झूठ वचन तें अघ शिर लहै।
क्रोध रहित जिन वचन प्रमानि, सो सत धर्म चयो जिनवानी ।।११।।
ॐ ह्रीं क्रोधातिचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
लोभ सहित जिय झूठ वखानि, सांच धर्म ताकौ नहिं मानि।
लोभ रहित सत धर्म सुभाय, सो सत धर्म जजों श्रुति गाय ।।१२।।
ॐ ह्रीं लोभातिचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
सांच न कहै भीतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव।
भयते रहित सत्य वच भाख, सो सत धर्म करौ श्रुति लाख ।।१३।।
ॐ ह्रीं भयातिचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
हास्य सत्यको नाशनहार, ताते सहै महा दुख भार।
हास्य रहित सत धर्म कहाय, सो सत धर्म जजों श्रुति गाय ।।१४।।
ॐ ह्रीं हास्याचाररहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन आज्ञा विन भाखै वैन, पूर्वापर वच ठीक कहे न।
ऐसे दोष रहित सत भाय, सो सत धर्म जजों श्रुति गाय ।।१५।।
ॐ ह्रीं जिनाज्ञाल्लंघनारहितसत्यधर्मगाय अर्घं निर्व०।
(गीता छन्द)
जो देश में जिस वस्तु को तिस मानिये सो सत सही।
जिमि भात को गुजरात मालवदेश में चोखा कही।।
करनात में कूलू कहै द्राविड़में चोरु बखानिये।
इमि जानि जनपद सत्यको जजि हर्ष उर में आनिये ।।१६।।
ॐ ह्रीं जनपदसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
(अडिल्ल छन्द)
बहु नर ताको कहै तिसौ ही मानिये।
रंक नाम लक्ष्मीधर जाहि बखानिये।।
तो यह रूढी नाम सत्य संवृत कही।
या नयते सत जानि जजों वृष सही ।।१७।।
ॐ ह्रीं संवृतसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
काहू नर आकार तथा पशु के सही।
चित्र काष्टमें थापि नाम नर पशु कही।।
यह स्थापन सत भेद शास्त्र में गाइयो।
ताको सत वृष जानि जजों मन लाइयो ।।१८।।
ॐ ह्रीं स्थापनासत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जाको जगमें नाम प्रसिद्ध बखानिये।
सोई ताको नाम सत्य सो मानिये।।
नाम सत्य सो जानि वानि जिन इम कही।
ताको मन वच काय जजों शुभ सुखमही ।।१९।।
ॐ ह्रीं नामसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही।
रूपवान रूप सत्य सो जानि कह्यो जिनवानी जी।
ऐसो सत्य सु जानि जजों सुखदान जी ।।२०।।
ॐ ह्रीं रूपसत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
कही वस्तु यह यातें छोटी है सही।
यातें है यह बड़ी अपेक्षा इमि कही।।
याको नाम प्रतीति सत्य सो जानिये।
ताको भी मैं जजों भक्ति उर आनिये ।।२१।।
ॐ ह्रीं अपेक्षासत्यधर्मगायार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जो नरपति को पुत्र ताहि राजा कहै।
सो नैगमनय जानि सत्य तातें यहै।।
यही सत्य व्यौहार जिनेश्वर धुनि कही ।
मैं जजिहौं कर भक्ति नाय मस्तक मही ।।१२।।
ॐ ह्रीं व्यवहारसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
शक्ति इन्द्रमें इसी लोक उलटो करै ।
सो तो लोक अनादि उलटि कैसे धरै ।।
षै यह शक्ति अपेक्षा वचन प्रमान है ।
यह संभावन सत्य जजौं क्षिति आन है ।।१३।।
ॐ ह्रीं संभावनासत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
जीव अनंत अनादि नजर आवै नहीं ।
द्रव्य अमूर्ती पांच नरक सुर की मही ।।
ये नहिं दीखें नयन सूत्र सों जानिये ।
भाव सत्य सो जानि जजौं मन आनिये ।।१४।।
ॐ ह्रीं भावसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
किसी वस्तु की उपमा जाको लाइये ।
ज्यों दानी नर देखि कलपद्रुम गाइये ।।
याको उपमा सत्य नाम जानौं सही ।
सो मैं पूजौ भक्ति नाय मस्तक मही ।।१५।।
ॐ ह्रीं उपमासत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
इत्यादिक बहु भेद सत्यके जानिये ।
कहे देव जिनराज आपनी वानिये ।।
सो मैं मन वच काय शुद्ध थुति गाइ जी ।
पूजौं सत्य सु धर्म अरथ कर लाइ जी ।।१६।।
ॐ ह्रीं सत्यधर्मांगायार्धं महार्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
सोनगढ साहित्यप्रकाशनसमिति
बहिनश्री-चम्पाबेन-८४वीं जन्मजयंति, श्री दि. जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, भादों कृष्णा २, वि. सं. २०५४ सोनगढ-३६४२५०
भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत दशलक्षणधर्म उत्तमखममद्दवज्जवसच्चसउच्चं च संजमं चेव । तवचागमकिंचण्हं बम्हा इदि दसविहं होदि ।।७०।। उत्तमक्षमाका लक्षण
कोहुप्पत्तिस्स पुणो बहिरंगं जदि हवेदि सक्खादं । ण कुणदि किंचि वि कोहो तस्स खमा होदि धम्मो त्ति ।।७१।। मार्दवधर्मका लक्षण
कुलरूवजादिबुद्धिसु तपसुदसीलेसु गारवं किंचि । जो णवि कुव्वदि समणो मद्दवधम्मं हवे तस्स ।।७२।। आर्जवधर्मका लक्षण
मोत्तूण कुडिलभावं णिम्मलहिदएण चरदि जो समणो । अज्जवधम्मं तइयो तस्स दु संभवदि णियमेण ।।७३।। सत्यधर्मका लक्षण
परसंतावयकारणवयणं मोत्तूण सपरहिदवयणं ।
जो वददि भिक्खु तुरियो तस्स दु धम्मो हवे सच्चं ।।७४।। शौचधर्मका लक्षण
कंखाभावणिवित्तिं किच्चा वेरग्गभावणाजुत्तो । जो वट्टदि परममुणी तस्स दु धम्मो हवे सोच्चं ।।७५।। संयमधर्मका लक्षण
वदसमिदिपालणाए दंडच्चाएण इंदियजएण ।
परिणममाणस्स पुणो संजमधम्मो हवे णियमा ।।७६।। उत्तम तपका लक्षण
विसयकसायविणिग्गहभावं काऊण झाणसज्झाए ।
जो भावइ अप्पाणं तस्स तवं होदि णियमेण ।।७७।। त्याग धर्मका लक्षण
णिव्वेगतियं भावइ मोहं चइऊण सव्वदव्वेसु । जो तस्स हवे चागो इदि भणिदं जिणवरिंदेहिं ।।७८।। आकिञ्चन्य धर्मका लक्षण
होऊण य णिस्संगो णियभावं णिग्गहित्तु सुहदुहदं । णिद्ददेण दु वट्टदि अणयारो तस्स किंचण्हं ।।७९।। ब्रह्मचर्य धर्मका लक्षण
सव्वंगं पेच्छंतो इत्थीणं तासु मुयदि दुव्भावं । सो बम्हचेरभावं सक्कदि खलु दुद्धरं धरिटुं ।।८०।। ( द्वादशानुप्रेक्षामेंसे )
ॐ
कविवर श्री टेकचन्दजी कृत
श्री दशलक्षण मण्डलविधान
(जोगीरासा)
नेमीनाथो, दे तो साथो’, भव भव और न चाहूं । भक्ति तिहारी, निशिदिन मन वच, काय लाय करि लाऊँ ।। धर्म कह्यो तुम, वानी दश विध, सो मोहि होउ सहाई । करुणासागर, समरस गर्भित, शीश नमों श्रुति गाई ।।१।। (गीता छन्द)
धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहै । भवरोग को यह महा औषधि, मरण जामन दुख दहै ।। यह विरत नीका मीत जीका’, करौ आदरतें सही । मैं जजौं दशविध धर्मके अंग, तासु फल है शिवमही ।। २ ।। (पद्धड़ि छन्द)
यह धर्म भवोदधि नाव जान, या सेयें भव दुख होइ हान । यह धर्म कल्पतरु सुक्खपूर, मैं पूजौं भव दुख करन दूर ।।३।। (गीता छन्द)
यह विरत मन कपि गले माहीं, सांकली सम जानिये । गज अक्ष जीतन सिंह जैसो, मोहतम रवि मानिये ।। १. तुम्हारा साथ । २. जीव का मित्र ।
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
सुरथान माहीं विरत नाहीं, मनुज हू शुभ कुल लहै । तातें सु अवसर है भलो, अब करौ पूजा धुनि कहै ।।४।। (वेसरी छन्द)
जाने दशलक्षण व्रत कीना, ते सतपुरुषनिमें परवीना । भवसागर फिरनौ मिटि जावै, जो नर दशलक्षण वृष भावै ।।५।। (भुजंगप्रयात छन्द)
या व्रतकी महिमा कहा वीर, दशविध धर्म हरै भवपीर । इसी धर्म विन जग भरमाय, जजहु धरम अति दुरलभ पाय ।।८।। (दोहा)
दश प्रकारको धर्म यह, दशविध सुतरु जान ।
वांछित पद सेवक लहैं, अधिक कहा सुखदान ।।९।। सोरठा–धर्म हमारा नाथ, धर्म जगतका सेहरा ।
भव भवमें हो साथ, और न वांछा मनविषै ।।१०।।
मण्डलमध्ये परिपुष्पांजलि क्षिपेत् ।
समुच्चय पूजा)
समुच्चय पूजा
(त्रिभंगी छन्द)
यह धर्म क्षमावा मान गुमावा, सरल सुभावा सतिवानी । शुचि भाव करावा संजम लावा, तप करवावा अधिकानी ।। शुचि त्याग बतावै नगन पुजावै, शील बड़ावै शिवदाई । यह धर्म हमारा थाप करारा, पूजन धारा सिरनाई ।।१।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्म ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । (मणुयणाणंदकी चाल )
क्षीरसागर तना नीर शुभ लाइये ।
कनक झारी विषै धार गुण गाइये ।।
मरण उतपति नहीं होय ता फल सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
नीर संग अगुरु चन्दन सु घिस लायजी ।
सुभग पातर विषै धारि थुति गायजी ।।
जगत् तप तासु फल तुरत नाशै सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
लेइ अक्षत भले मुक्तिफल से कहे । ऊजले अखण्ड सुभग स्वर्ण पातर लहे ।। अखयपद पावनै आप मनमें सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।३।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्योऽक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
फूल कञ्चनवरन कलपतरुके भले ।
गंध जुत रंग शुभ लेइ निज कर चले ।। माल तिन गूंथि कामबाण नाशक सही । जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।४।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुगम नैवेद्य मोदक घने लाइये ।
विविध स्वादमय सु धरि भक्ति उर भाइये ।। भूख-दुखहर्ण स्वर्ण-पात्र धरिके सही । जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।५।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दीप मणि रतनमय और घृतमय सही ।
धूप दश अंग मय लायकर सारजी ।
अगनि संग खेवहूँ सुभक्ति उर धारजी । कर्म छ्यकार भव वास नाशन सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।७।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यो दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
लौंग खारिक सुनारिकेल सुक्खकारजी । और बादाम पुंगी फलादि सार जी ।। लेई निज हाथ में सुभक्ति धरिके सही । जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।८।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
नीर गंध अक्षत सु फूल चरु सोई जी । दीप अरु धूप फल अरघ संजोइ जी ।। पुरट थाली विषै भक्ति करिके सही । जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।९।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यःऽनर्घपदप्राप्तयेऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । धर्म भवकूप तैं काढ़ने को रसी । भव उदधि पार करतार नवका इसी ।।
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
धर्म सुख दैन जिमि तात माता सही ।
जानि इमि धर्म दशधा जजौं शिवमही ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः महार्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ जयमाला
(दोहा)
दश वृष रतन मिलायके, माल करै भवि जोय ।
धरै आपने उर विषैं, ता सम अवर न कोय ।।१।।
(वेसरी छन्द)
दशलक्षण वृष शिवमग दीवा, धर्म थकी सुख पावै जीवा । मुकति दीप पहुँचावन जावा, ये दश धर्म जजौं जुत भावा ।।२।। दशविधि धरम धरै जो कोई, करम नाशि फिरि दुख नहिं होई । धरम जु साधन और न कोई, यों दश धर्म जजौं मद खोई ।।३।। धरम जीव का पालनहारा, धर्म मान का खण्डन वारा । धर्म थकी जावै कुटिलाई, इमि दश धर्म जजौं चितलाई ।।४।। सांच वचन सम धरम न जानौ, धर्म भाव निर्मल पहिचानौ । धर्म जीव रख इन्द्रिय जीतं, इमि दश धर्म जजौं करि प्रीतं ।।५।। तप ही सर्व धर्मका मूला, त्याग धरमतें क्षय अघ थूला । धर्म नगन सम और न कोई, इनि दश धर्म जजौं मद कोई ।।६।। नारी त्याग धरम शिवदाई, ये दश धरम जगतमैं भाई । जो दशलक्षण मनमें आनै, सो भव तप हरि शिवपद ठानै ।।७।। उत्तम क्षमा धर्म पूजा )
दशलक्षण व्रत इण विधि कीजै, उत्कृष्टै दश वास करीजै । नातर बेले पारन भाई, तथा इकंतर वास कराई ।।८।। शक्तिहीन है तो सुन मीता, दश एकंत करौ धरि प्रीता । व्रत दश वरस करै मन लाई, करु उद्यापन मन वच काई ।।९।। नहिं उद्यापन शक्ति तुम्हारी, तौ दूनौ व्रत करु सुखकारी । पीछे यथाशक्ति खरचावै, पूजन धर्म उद्योत करावै ।।१०।। (दोहा)
इत्यादिक विधि सहित जो, धर्म करै दश सार ।
पावै सुख मन भावनो, अनुक्रम ले भव पार ।।११ ।। ॐ ह्रीं श्री दशलक्षणधर्मेभ्यः पूर्णार्धं निर्वपामीति स्वाहा । ।। इति समुच्चय पूजा ।।
उत्तम क्षमा धर्म पूजा
(अडिल्ल)
जीव तिरस थावर जेते जगमें सही ।
देव नरक नर पशू चारि गति की मही ।।
तिन सब ऊपर दयाभाव उरमाहिं जी ।
सो है उत्तम क्षमा, थापि जजु याहिं जी ।।१।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांग ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांग ! अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । अथाष्टकम्
(पद्धड़ी छन्द)
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
जल गंग नदी को विमल सोइ, धरि रतन पयाले शुद्ध होइ । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।१ ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं । बावन चन्दन घसि नीर लाय, धरि कनक रकेबी जिन चढ़ाय । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।। २ ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं । अक्षत मुक्ताफल समजु लाय, अति उज्वलनखशिखशुद्धभाय । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।३ ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् । शुभ फूल कलपतरुके अनूप, करि माला सुभग सुगंध रूप । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।४।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मागाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं । नाना रस पूरित चरु सम्हार, शुभ मोदक आदि अनेक धार । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।५ ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं । मणिदीपकसार बनाय लाय, धरि कनक थाल भरि भक्ति भाय । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।। ६ ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं । उत्तम क्षमा धर्म पूजा )
ले धूप अगरुजा गंधकार, दुर्भाव हुताशन मांहि जार । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।७।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मागाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं । फल नारिकेल बादाम सोइ, पुंगीफल खारक भक्ति जोइ । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।८।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं । जल चन्दन अक्षत फूल लाय, चरु दीप धूप फल अरघ भाय । यह धरम छिमा उत्तम सुजान, मैं पूजों मनवच भक्ति आन ।।९।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मागाय अनर्ध्यपदप्राप्तये अर्धं । अथ प्रत्येकार्ष्याणि
(अडिल्ल)
पाप प्रकृति कर जीव अशुभ बंधन कर्यो ।
थावर नामा कर्म उदय दुखको भर्यो ।।
पृथ्वी माहिं सु जाय सहै बहु अघ भला ।
तिन का रक्षण-भाव छमा उत्तम भला ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री पृथिवीकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मागाय अर्घ । जे जलकायिक जीव ज्ञान विन दुख लहैं ।
इक इन्द्रियके द्वार अतुल विपदा सहैं ।।
तिनको दुखमय जानि मुनी करुणा करें ।।
तसु प्रसादतें झटिति मोक्ष-वनिता वरें ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री जलकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ निर्व० । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
अगनिकाय धर जीव एक इन्द्रिय सही । नाना दुख तन सहैं जलैं सब जग मही ।। इन पर करुणाभाव धरै जे भवि सही ।
हाथ पांव मुख वचन थकी बाधा लहैं ।। इन पर करुणाभाव जती धारै सही ।
इन पर समताभाव सुखी इनको चहै ।
सो ही उत्तमक्षमा धारि मुनि शिव लहै ।।५।। ॐ ह्रीं श्री वनस्पतिकायिकपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्धं । थावरके पन भेद पाप फलतें बने ।
सूक्षम बादर भेद दोय यों जिन भने ।। इनको दुखमय जानि दया मन लाय हैं । सो ही उत्तम छमा जजौं शिरनाय हैं ।।६।। ॐ ह्रीं श्री सूक्ष्मस्थूलपंचस्थावरपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मागाय अर्धं । लट अरु जोंक गिंडोला इल्ली जानिये । कौड़ी शंख दुइन्द्रिय अति दुख थानिये ।। उत्तम क्षमा धर्म पूजा )
इन पर करुणाभाव जती धारै सही ।
सो ही उत्तम छमा जजौं शिव की मही ।।७।। ॐ ह्रीं श्री द्वीन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घं । चींटी कुंथा खटमल वीछू दुख मही ।
तेइन्द्रिय परजाय पई घुण आदि ही ।। इनको दुखमय जानि मुनी करुणा धरै । सो ही उत्तम छमा जजौं सब अघ जरैं ।।८।। ॐ ह्रीं श्री त्रींन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घं । माखी मच्छड़ टीड़ी भंवरादिक सही । बर्र ततझ्या मकड़ी चतुरान्द्रिय कही ।। इनको दुखिया देखि मुनी करुणा धरै । सो ही उत्तम छमा जजौं वसुविधि जरैं ।।९।। ॐ ह्रीं श्री चतुरिन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घं । इन्द्रिय पांचों होय नहीं मन जो लहैं । ते जिय जानि असैनी अघफल अति दहैं ।। इनको दुख भरिपूर जानि करुणा धरै । सो ही उत्तम छमा जजौं शिवथल धरै ।।१०।। ॐ ह्रीं असंज्ञीपंचेन्द्रियजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घं । नरक जीव अति दुखी पापफलतें सही ।
छेदन भेदन पीर सहैं जाति ना कही ।। इन पर करुणाभाव जती अति लाय हैं । सो ही उत्तम छमा जजौं सुखदाय हैं ।।११।। ॐ ह्रीं नारकीजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घं । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
(गीता छन्द)
मनुष क्रोध रु मान माया, लोभवश दुखिया घने । बहु चाह पीड़त रागद्वेषी, अघ घनो उपजे तिने ।। तिन देख यतिवरद या लावैं, महा दीनदयाल जी ।
सो धर्म उत्तम क्षमा निर्मल जजौं, भाग्य विशाल जी ।।१२।। ॐ ह्रीं मनुष्यजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घं । परकार चारों देव गतिमें, जीव सुख राचै सही । लछि देखि परकी झुरै नित ही, मानते पीड़ा कही ।। तिन देखि मुनि उर दया भावै, महा कोमल भावजी । सो धर्म उत्तम क्षमा पूजों, अर्घतें कर चावजी ।।१३।। ॐ ह्रीं चतुर्विधदेवजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ । (चौपाई)
थावर तिरस जीव सब जोई, चहुंगति करमनि के वशि होई । तिनको देखि दया उर लाई, सो उत्तम खम धर्म जजाई ।।१४।। ॐ ह्रीं त्रसस्थावरसमस्तजीवपरिरक्षणरूपोत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ । जयमाला
(दोहा)
धर्म क्षमा उत्तम बड़ो, सब जीवन सुखदाय ।
जजें जीव सो पुनि लहै, करै जु शिवपुर जाय ।।१ ।। (वेसरी छन्द)
मुनिको वचन कहै दुखकारी, मरम छेद छेदै अघ धारी । मान खण्ड किरिया करवावै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ।।३।। जो कोई दुष्ट मुनिनको मारै, तीक्ष्ण शस्त्र तैं करि परिहारै । बांधैं तनको खेद न पावै, तिन पर क्षमा धर्म मन लावै ।।४।। अति दुखिया जियको ऋषि जानै, तब मुनि अनुकम्पा मन आनै । आपा परको हित उपजावै, तब मुनि क्षमा धरम मन लावै ।।५।। उत्तम क्षमा धरम सुखदाई, क्षमा धरम सब जियका भाई । जब मुनि हू पै कष्ट जु आवै, तब मुनि क्षमा धर्म मन लावै ।।६।। क्षमा धरमसी ढाल न होई, क्रोध समान प्रहार न कोई । क्षमा समान न बल अति पावै, तातें जती क्षमा वृष भावै ।।७।। क्षमा धरम शिव राह बताई, क्षमा तात माता अरु भाई । जातै सिद्ध सुखनको पावै, ऐसी क्षमा मुनी मन लावै ।।८।। (सोरठा)
क्षमा आभूषण सार, उरमें जो पहिरे सही ।
ते भवसागर पार, जजौं धर्म उत्तम क्षमा ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमाधर्मांगाय पूर्णार्घं ।
।। इति उत्तमक्षमा धर्म पूजा ।।
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
उत्तम मार्दव धर्म पूजा
(पद्धड़ी छन्द)
मार्दव वृष भाव विचार सोइ, जहां मान भाव दीखे न कोइ । इस धारी मुनि शिवगामि जानि, मैं जजौं थापि मार्दव सुभानि ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । अथाष्टकम्
(मणुयणानंद की चाल )
क्षीर सम नीर शुद्ध गाल करि लाइये । पात्र सुवरण विषै धारि गुण गाइये ।। जगत् फिरनो मिटे तासु फल तैं सही । धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।२।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय जलं । स्वच्छ नीर संग चन्दनादि को मिलायजी । शुद्ध गंध युक्त भक्ति भावतें चढ़ायजी । जगत् आताप हर जानि ता फल सही ।
धरम मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।३।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय चन्दनं । अक्षतं समुज्वलं खंड विन जानिये । सुभग मोती जिसे थाल भरि आनिये ।।
उत्तम मार्दव धर्म पूजा )
ध्रौव्य फल दाय मन लाय ध्याऊं सही । धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।४।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मागाय अक्षतान् । फूल कल्पवृक्षके गंध रंग सारजी ।
माल गूंथि शुद्ध भाव भक्ति कर धारजी । मदन मद हरन सुफल जानि यातें सही । धरम मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।५।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मागाय पुष्पं । सुभग सर शुद्ध नैवेद्य मन लाइये । मोदकादि शुद्ध भक्ति भावतें चढ़ाइये ।। धारि स्वर्णपात्र शुद्ध मन बचन तन सही । धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।६।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय नैवेद्यं । दीप रतनन मयी नाश तमको करा ।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।७।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय दीपं । धूप दश गंध शुभ लेइ मन मानिये ।
अगर चन्दन सबै मेलि शुभ ठानिये ।।
अग्नि संग खेइये कर्म जालन सही ।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।८।। १६ ) ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय धूपं । श्रीफलादि लौंग पुंगीफलादि जानिये । शुद्ध बादाम खारक भले आनिये ।।
सिद्ध थानक लहै तासु फलतें सही ।
धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।९।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय फलं । नीर चन्दन अखित पुष्प चरु दीप जी । धूप फल अर्घ कर भाव शुद्ध टीप जी ।। लोक में फिरन, तन धरन मिटि है सही । धर्म मार्दव जजौं शुद्ध शिवदा मही ।।१०।। ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगायार्घं । अथ प्रत्येकार्ष्याणि
( चाल–मणुयणानंद की )
देव वीतराग सर्वज्ञ तारक सही ।
दोष अष्टादशों तासु माहीं नहीं ।। नमत तिन पद करै धर्म मार्दव कह्यो । सो जजौं चारि गति माहिं भरमन दह्यो ।।१।। ॐ ह्रीं श्री वीतरागदेवपदनमनमार्दवधर्मागाय अर्धं । वीतराग देव कही वानी सो धर्म है । ता सुनै जीव निज हरै भाव मर्म है ।। मन वचन काय श्रुतपाद सिरनाय है ।
सो जजौं धर्म मार्दव सु शिवदाय है ।।२।। उत्तम मार्दव धर्म पूजा )
ॐ ह्रीं श्री जिनधर्मपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्घ । धर्म को सेय तप लेय कर्म जार जी ।
भये सिद्धदेव तन रहित सुखकार जी ।। लेय इन नाम मन वचन शिर नाय है ।
सो जजौं धर्म मार्दव सु शिवदाय है ।।३।। ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्घ । धारि छत्तीस गुण सूरि सुखदाय जी ।
धर्म तप भावसों गुप्ति धरि भाय जी ।। मान तजि नमन इन पद विषै लाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।४।। ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्घ । धारि गुण पांच अरु वीस उवझाय जी ।
और भी अनेक गुण पास तिन थाय जी ।।
मान तजि इन चरण कायको नायवो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइवो ।।५।। ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्घ । क्षेत्र अतिशय तहाँ धर्म को धाय है । नमन बहु जिय करें देव गुण गाय है ।। मान तजि क्षेत्र शुभ जानि शिर नाइयो । धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।६।। ॐ ह्रीं श्री अतिशयक्षेत्रपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्घ । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
देव जिनकी सु प्रतिमा अकृत्रिम इसी । रूप द्युति ध्यान मुद्रा कही जिन जिसी ।। मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।७।। ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुरग थानक विषै देव जिनके सही ।
रतनमय जैन बिम्ब विगर किये हैं यही ।। मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।८।। ॐ ह्रीं श्री ऊर्द्धलोकसम्बन्धीजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्धं । ज्योतिषी व्यंतरा थान मध्यलोक जी । विन किये चैत्य जिन कहे अघ रोक जी ।। मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।९।। ॐ ह्रीं श्री मध्यलोकसम्बन्धीजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्धं । भवन देवनि विषै बहुत जिनराय जी ।
बिम्ब अकृत्रिम कहे सेय तसु पाय जी ।। मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।१०।। ॐ ह्रीं श्री अधोलोकसम्बन्धीजिनचैत्यपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्धं । उत्तम मार्दव धर्म पूजा )
आदि इन पूज्य थानक बहुत है सही ।
सिद्धक्षेत्र मोक्ष फलदायक तीरथ मही ।।
मान तजि शीश इन चरण को सु नाइयो ।
धर्म मार्दव सु तासु फल मोक्ष पाइयो ।।११।।
ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदनमनमार्दवधर्मांगाय अर्घ । जयमाला
(वेसरी छन्द)
मार्दव धर्म मान को खोवै, ता फल जगत् पूज्य पद होवै । मार्दव सकल दोष निरवारै, ता फल आप तरै अनि तारै ।।१।। मार्दव धरम इन्द्र सुर पूजें, मार्दव धरम भजैं अघ धूजैं । मार्दव मान हरै सुख कारै, ता फल आप तरै अनि तारै ।।२।। मार्दव धरम महानर ध्यावै, मार्दव धरम मानि नहिं पावै । यह मार्दव वृष शिव थल धारै, ता फल आप तरै अनि तारै ।।३।। मार्दव सब को राखै माना, मार्दव सब धरमनि में दाना । मार्दव धरम जीव जे धारैं, ता फल आप तरै अनि तारैं ।।४।। मार्दव धरम सुरग सुख केरा, उपद्रव नाशि हरै भव फेरा । मार्दव उत्तम पुरुष सु धारैं, ता फल आप तरै अनि तारै ।।५।। मार्दव मोक्षमार्ग को दाता, मार्दव धर्म सकल जग त्राता । मार्दव वृष गुणवंता धारै, ता फल आप तरै अनि तारैं ।।६।। मार्दव धरम कलपतरु भाई, मार्दव मनवांछित फलदाई । मार्दव धरम मुकुट जो धारै, ता फल आप तरै अनि तारै ।।७।। ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
मार्दव धरम कनकमें मीना, मार्दव धारि सकें न कमीना । मान मार मार्दव वृष धारै, ता फल आप तरै अनि तारै ।।८।। मार्दव वृष सब धर्म प्रधाना, मार्दव मोह मल्लको हाना । मार्दव माल पुरुष उर धारै, ता फल आप तरै अनि तारै ।।९।। (दोहा)
मान मार मार्दव करै, हरै पाप मल सोय ।
जगत् छुड़ावै शिव करै, ते मो रक्षक होय ।।१०।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तममार्दवधर्मांगाय पूर्णार्धं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम आर्जव धर्म पूजा
(वेसरी छन्द)
जग परपंच रहित जे भावा, सरल चित्त सबतैं निरदावा । तिनको आरजव भाव सु कहिये, सो ह्यां थापि पूजफल लहिये ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्मांग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । अथाष्टकम्
(वेसरी छन्द)
क्षीर समुद का उज्वल नीरा, कनक पियाले धर अति धीरा । जरा रोग नाशन को भाई, आरजव भाव नमौं शिर नाई ।।२।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं । उत्तम आर्जव धर्म पूजा ) (२१
चन्दन बावन जल घसि लाया, कनक पात्र में धरि उमगाया । शोकानल तप नाशन भाई, आरजव धर्म जजौं शिर नाई ।।३।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं । अक्षत मुक्ताफलसे जानो, उज्वल खण्ड विवर्जित आनो । क्षय नहिं होय इसो पद दाई, आरजव भाव नमौं शिर नाई ।।४।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् । फूल सुगंध कल्पद्रुम लाया, तथा सुवर्ण रजतमय भाया । तिनकी माल गूंथि करि लाई, आरजव भाव नमौं शिर नाई ।।५।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं । नाना रस नैवेद्य करावै, मोदक आदि भक्ति तें लावै । भूख व्याधि नाशन को भाई, आरजव भाव नमौं शिर नाई ।।६।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं । दीपक रतन थल धरि लीजै, मन वच काय शुद्ध करि लीजै । घाति अज्ञान ज्ञान दर्शाई, आरजव धर्म जजौं शिर नाई ।।७।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं । धूप अगरजा चन्दन भीनी, गंध सहित निज करमें लीनी । कर्मदहन को अगनि जराई, आरजव भाव नमौं शिर नाई ।।८।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मागाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं । ले नारियल बादाम सुपारी, खारिक लोंग आदि हितकारी । सिद्धलोक वांछा मनमांही, आरजव धर्म जजौं शिर नाई ।।९।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
जल चन्दन अक्षत कामारी, चरु दीपक फल धूप विथारी । अर्घ लेय मन वच तन भाई, आर्जव धर्म जजौं शिर नाई ।।१०।। ॐ ह्रीं श्री आर्जवधर्मांगाय अनर्ध्यपदप्राप्तयेऽर्घ । अथ प्रत्येकार्घाणि
( वेसरी छन्द )
गुण छ्यालीय जहां प्रभु मेरा, अष्टादश तहां दोष न हेरा । तिन पद सरल भाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।। ॐ ह्रीं श्री छयालीसगुणसहितजिनचरणनमनार्जवधर्मागायार्धं । मुक्त जीव अरहत थुति कीजे, मन वच कुटिल भाव तजि दीजे । तिन पद सरल भाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।२। ॐ ह्रीं श्री मुक्तजीवअरहन्तपदनमनार्जवधर्मांगायार्घ । कर्म काटि शिवलोक सिधारे, सिद्ध सु देव हरो अघ सारे । तिन पद सरल भाव शिव नावै, सो आरजव वृष जजि शिवधावै ।३ ॐ ह्रीं श्री सिद्धपदनमनार्जवधर्मांगायार्धं । सिद्धशिला पैंतालिस लाखा, योजन विस्तृत जिन वच भाषा । तत्र स्थित आतम शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।४। ॐ ह्रीं श्री सिद्धशिलास्थितमुक्तात्मपदनमनार्जवधर्मांगायार्धं । गुण छत्तीस सु धारक सूरा, आचारज सब गुण भरपूरा । तिन पद सरल भाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।५ ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदनमनार्जवधर्मांगायार्धं । उत्तम आर्जव धर्म पूजा )
आचारज सब गुण भरपूरा, आचारादि गुणनयुत दूरा । तिन पद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।६ ॐ ह्रीं श्री आचार्यपदपरोक्षनमनार्जवधर्मांगायार्धं । गुण पचीस उवझाय सु माहीं, ग्यारह अंग चौदह पुरवाहीं । तिन पद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।७ ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदनमनार्जवधर्मांगायार्धं । बहु गुण धर उवझाय सु जानौ, दूरहितें तिन को चित आनो । तिन पद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै ।८ ॐ ह्रीं श्री उपाध्यायपदपरोक्षनमनार्जवधर्मांगायार्धं । वीस आठ गुण साधन साधा, सो न
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
शिखर सम्मेद आदि सिद्ध थाना, तहं मुनि लिय शिवकर्मनशाना । तिन पद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिव धावै । ॐ ह्रीं श्री सिद्धक्षेत्रपदनमनार्जवधर्मांगायार्धं । विगर किये जिनबिम्ब अनूपा, लक्षण चिह्न जानि जिनरूपा । तिन पद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिर धावै ।१४ ॐ ह्रीं श्री अकृत्रिमजिनचैत्यपदनमनार्जवधर्मांगायार्घ । कृत्रिम जे जिनबिम्ब विराजैं, विनय सहित पुन दायक छाजैं । तिन पद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिवधावै ।१५ ॐ ह्रीं श्री कृत्रिमजिनचैत्यपदनमनार्जवधर्मांगायार्घ । इत्यादिक बहु क्षेत्र सु थाना, पूजनीक तीरथ अघ हाना । जिनपद सरलभाव शिर नावै, सो आरजव वृष जजि शिवधावै ।१६ ॐ ह्रीं श्री सकलपूज्यस्थानकपदनमनार्जवधर्मांगायार्धं । अथ जयमाला
(दोहा)
सरल भाव सारै सरस, सुरनर पूज्य महान् ।
तातें तजनी कुटिलता, आरजव भाव लहान ।।१।।
(वेसरी छन्द)
सरलभाव समता उर आनै, सरलभाव सब औगुन भानै ।
आरजव भाव धरै जे जीवा, तिनने जिनवानी रस पीवा ।।२।। आरजव भाव धरै जे प्राणी, तिनके होनहार शिवरानी । उत्तम आर्जव धर्म पूजा )
दोष भाव तिनतें नहिं छीवा, आरजव भाव धरै जे जीवा ।।३।। आरजव भाव अमरपद द्यावै, आरजव में औगुन नहिं पावै । कुटिलभाव विष जिन नहिं पीवा, आरजवभाव धरैं जे जीवा ।।४। ।
आरतिको आरजव ही खोवै, आरजवभाव पाप मल धोवै । रोग शोक ताको नहिं छीवा, आरजवभाव धरै जे जीवा ।।५। आरजव शुद्धभाव जिन पाया, तिनने लहि पुन पाप गमाया । अनुभव आनंद तानें छीवा, आरजवभाव धरैं जे जीवा ।।६।। आर्जव भाव दोष सब खोवै, आरजव कर्म कालिमा धोवै । शुद्ध स्वभाव सु तानै कीया, आरजवभाव धरैं जे जीवा ।।७।। आरजवभाव सकल को प्यारा, आरजवभाव भ्रमणतें न्यारा । ताकों और रुचे न मतीवा, आरजवभाव धरै जे जीवा ।।८।। आरजव सुर शिवके सुख ठाने, आरजवभाव पूर्व अघ भाने । अद्भुत आपापर भिन कीया, आरजवभाव धरैं जे जीवा ।।९।। (दोहा)
अन्तरंग निरदोषके, प्रगटै आरजव भाव ।
जाके फल मरनौ मिटै, छुटे कर्मको दाव ।।१०।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमआर्जवधर्मांगाय पूर्णार्थं । * इति उत्तम आर्जव धर्म पूजा समाप्त *
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
उत्तम सत्य धर्म पूजा
(अडिल्ल छन्द)
सत्य सरीसो धर्म जगत् में है नहीं ।
सत्य धरम परभाव लहै शिवकी मही ।
तातैं भवदुख हरण सत्य वृष भाइये ।
यहाँ थापि में जजौं सत्य मन लाइये ।
ॐ ह्रीं श्री उत्तम सत्यधर्मांग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् ।
अथाष्टकम्
(त्रिभंगी छन्द)
जो झूठ विनाशै जग विसवासै, पुन्य प्रकाशै हितदानी । सब दोष निवारै समता धारै, शिवपुर कारै गुण थानी ।। जग आदरकारी मोह निवारी, आनंदधारी जग मानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, जल लै परमा जजि जानौ ।।२।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । सत सौ वृष नाहीं या जगमाहीं, पूज्य कहाहीं शिव थानी । सब औगुण धोवै पाप विलोवै, धर्म मिलावे दुख हानी ।। पावत शिवनारी मुनिजन प्यारी, सुख करतारी भवि मानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, गंध लै परमा जजि जानौ ।।३।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मागाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा । उत्तम सत्य धर्म पूजा )
या सत्य समानौ रतन न आनौ, सम्यक् दानौ शिवकारी । भवदधि को नावा अशुभ गमावा, सरल स्वभावा दुखहारी ।। सिधलोक नसैनी शिख सुख दैनी, ध्यावत जैनी अमलानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, अक्षत परमा जजि जानौ ।।४।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । सत सौ नहिं मिंता मेटन चिंता, अघ अरिहंता जसदाई । सत जगत् पियारो भव उद्धारो, दुखजल तारो थुति गाई ।। याको मुनि ध्यावें शिवसुख पावें, पाप गमावें भव हानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, पुष्पं परमा जजि जानौ ।।५।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मागाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । सत् धर्म सु पूजै सब अघ धूजै, शिवमग सूजै अधिकाई । यातें वृष सारा काज संबारा, अशुभ विहारा सिधिदाई ।। सत सारा नीका सुखदा जी का, शिवमग टीका शुभ आनौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, ले चरु परमा जजि जानौ ।। ६ ।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । सत धर्म उजाला जगका पाला, विभ्रम टाला धर्म करा । यह ज्ञान उजालै अशुभ सु टालै, संजम पालै झूठ हरा ।। सत प्रीति उपावे वैर गमावे, जो थुति लावे उर ज्ञानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, दीपक परमा जजि जानौ ।।७।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि० । सत धर्म प्रभावे मुनि शिव जावे, जगजस गावे श्रुति लाई । सत धर्म जु भूला अघक्षय थूला, झूठ कुसूला दह भाई ।। ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
सत धर्म अनूपा शुभ रस कूपा, पुण्य स्वरूपा मग मानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, धूप जु परमा जजि जानौ ।।८।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि० । सत धर्म अभ्यासौ शिव थल वासौ, पाप विनासौ हितधारी । गुण ज्ञान बढ़ावे आदर ल्यावे, पुण्य उपावे सत भारी ।। जगमें अति नीका बंधूजी का, शिवतिय पीका गुण थानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, ले फल परमा जजि जानौ ।।९।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति । जल चन्दन नीका अक्षत ठीका, फूल चुनी का माल करौ । चरु दीप सु लाया धूप बनाया, श्रीफल मया अर्घ धरौ । उर भक्ति बढ़ाई मुख थुति गाई, सत सब भाई पहिचानौ । ऐसो सत धर्मा काटत कर्मा, अर्घ परमा जजि जानौ ।।१०।। ॐ ह्रीं श्री सत्यधर्मांगाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा । अथ प्रत्येकार्घाणि
( चौपाई )
क्रोध सहित जिय सत नहिं कहै, झूठ वचन तैं अघ शिर लहै । क्रोध रहित जिन वचन प्रमानि, सो सत धर्म चयो जिनवानी ।।१।। ॐ ह्रीं क्रोधातिचाररहितसत्यधर्मांगाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । लोभ सहित जिय झूठ वखानि, सांच धर्म ताकौ नहिं मानि । लोभ रहित सत धर्म सुभाय, सो सत धर्म जजौं थुति गाय ।।२।। ॐ ह्रीं लोभातिचाररहितसत्यधर्मांगाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । उत्तम सत्य धर्म पूजा )
सांच न कहै भीतियुत जीव, बोले असत सु वचन सदीव । भयतें रहित सत्य वच भाख, सो सत धर्म करौ थुति लाख ।।३।। ॐ ह्रीं भयातिचाररहितसत्यधर्मांगाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । हास्य सत्यको नाशनहार, तातें सहै महा दुख भार । हास्य रहित सत धर्म कहाय, सो सत धर्म जजौ थुति गाय ।।४।। ॐ ह्रीं हास्याचाररहितसत्यधर्मांगाय अर्धं निर्वपामीति स्वाहा । जिन आज्ञा विन भाखै वैन, पूर्वापर वच ठीक कहै न । ऐसे दोष रहित सत भाय, सो सत धर्म जजौं थुति गाय ।।५।। ॐ ह्रीं जिनाज्ञोल्लंघनातिचाररहितसत्यधर्मांगाय अर्घ निर्व० । (गीता छन्द)
करनाट में कूलू कहै द्राविड़में चौरु बखानिये । इमि जानि जनपद सत्यको जजि हर्ष उर में आनिये ।।६।। ॐ ह्रीं जनपदसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा । (अडिल्ल छन्द)
बहु नर ताको कहें तिसो ही मानिये ।
रंक नाम लक्ष्मीधर जाहि बखानिये ।।
तौ यह रूढ़ी नाम सत्य संवृत कही ।
या नयतें सत जानि जजौं सत वृष सही ।।७।।
ॐ ह्रीं संवृतसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
काहू नर आकार तथा पशु के सही ।
चित्र काष्टमें थापि नाम नर पशु कही ।। यह थापन सत भेद शास्त्र में गाइयो । ताकों सत वृष जानि जजौं मन लाइयो ।।८।। ॐ ह्रीं स्थापनसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा । जाको जगमें नाम प्रसिद्ध बखानिये । सोई ताको नाम सत्य सो मानिये ।।
नाम सत्य सो जानि वानि जिन इम कही । ताकों मन वच काय जजौं शुभ सुखमही ।।९।। ॐ ह्रीं नामसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा । पीत श्याम अरु रक्त श्वेत गोरा सही । रूपवान इत्यादि अंग बहुतें कही ।। रूप सत्य सो जानि कह्यो जिनवानी जी । ऐसो सत्य सु जानि जजौं सुखदान जी ।।१०।। ॐ ह्रीं रूपसत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा । कही वस्तु यह यातें छोटी है सही । यातें है यह बड़ी अपेक्षा इमि कही ।। याको नाम प्रतीति सत्य सो जानिये । ताकों भी मैं जजौं भक्ति उर आनिये ।।११।। ॐ ह्रीं अपेक्षासत्यधर्मांगायार्धं निर्वपामीति स्वाहा । जो नरपति को पुत्र ताहि राजा कहै । सो नैगमनय जानि सत्य तातें यहै ।। उत्तम सत्य धर्म पूजा )
कहे देव जिनराज आपनी वानिये ।।
जयमाला
(वेसरी छन्द)
सत्य धरम जग पूज्य बताया, सत्य श्रेष्ठ व्रत जिन धुनि गाया । सत्य धरम भवदधि को नावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।१।। सत्य धरम वर अंग प्रवीना, सत्य धरम ज्यौं कञ्चन मीना । सत्य धर्मका सबको चावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।२।। सत्य धरमका राखन हारा, सत्य धर्म मुनिजनको प्यारा । सत्य शिरोमणि धर्म कहावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।३।। सत्य समान और नहिं मिंता, सत्य धर्म मेटे भव चिंता । सत्य करै अघतें निरदावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।४।। सत्य धर्म अपयश खयकारी, सत्य सुरक्षा करै हमारी । सतहीका सुरनर जस गावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।५।। सत्य सहित सब सार्थिक धर्मा, तासौं कटैं चिरंतन कर्मा । सत्य समान और नहिं ठावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।६।। सत्य जगत् में पूजा पावै, सत्य धरम शिव राह बतावै । सत्य जजौं सति धर्म लहावा, सो सत धर्म जजौं शुद्ध भावा ।।७।। धर्म सरोवरमें सत नीरा, सत्य धर्म खोवै सब पीरा । सत्य धर्म सो कुगति न पावा, सो सत धर्म जजौं शुध भावा ।।८।। दोहा-- सत सागर में जे रमें, ते वृषनायक जोय ।
जजैं धर्म सत को सही, मन वच काया सोय ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमसत्यधर्मांगाय पूर्णार्धं निर्वपामीति स्वाहा । * इति उत्तमसत्यधर्म पूजा *
उत्तम शौच धर्म पूजा )
उत्तम शौच धर्म पूजा
(वेसरी छन्द)
शौच धर्म पर चाह निवारै, तनतै हू ममता निरवारै । जग वाँछा तजि निर्मल भावा, शौच धर्म पूजौं करि चावा ।।१ ।। ॐ ह्रीं श्री उत्तमशौचधर्मांगाय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । अथाष्टकम्
(पद्धड़ी छन्द)
जल क्षीरसमुद्र को सुभग लाय, धरि कनक पात्रमें भक्ति भाय । तन धरन मिटै यह फल सुजान, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।२। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मागाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति० । घसि बावन चन्दन नीर आन, अलि गुञ्जत मानों करत गान । धरि कनक पियाले भक्ति आन, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।३। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मागाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति० । उज्वल अखण्ड शुभ गंध दाय, अक्षत अनूप लखि शशि लजाय । कन पात्र विषै धरि भक्ति आन, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।४। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तयेऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । ले फूल कल्पद्रुम के मनोग, आसक्त भ्रमर थित करत भोग । तिन गूंथि माल उर भक्ति ठान, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।५। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
शुभ मोदक आदि अनेक भाय, रसनारंजन नैवेद्य लाय ।
धरि पुरट थाल मैं भक्ति ठान, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।।६।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति० । मणि दीपक वा घृतमय संजोय, मनु निबिड मोहतम नाश होय । अरु ज्ञान प्रकाश करे महान्, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।।७।। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मागाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । शुभ धूप अरगजा गंध लाय, कन धूपायन ताकों खिवाय ।
मिस धूम मनों वसु विधि उडान, मैं शौच धरम जजि हर्ष आन ।८। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मागाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । ले फल बदाम खारक अनूप, अरु पुंगीफल आदिक स्वरूप । धरि भक्ति भाव मनमांहि सोय, मैं शौच जजौ शुध भाव होय ।९। ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । जल गंधाक्षत वर कुसुम होय, चरु द्वीप धूप फल सुभग जोय । कर अरघ धरों कन पात्र लाय, मैं जजौं शौच वर भक्ति भाय ।१० ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगायार्धं अनर्घपद प्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा । अथ प्रत्येकार्घाणि
( चाल–मुणयणानंद की )
देव के सकल सुख जानि चंचलमयी ।
आयु पल्य सागर तनी तुरत क्षय गयी ।।
जान सब अथिर उर भाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१।।
उत्तम शौच धर्म पूजा )
ॐ ह्रीं देवसुखवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । चाह चक्री तने सुखन की उर नहीं ।
सहस छिनवै तिया और षट् खण्ड मही ।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै । पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।२।। ॐ ह्रीं चक्रियपदभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । खण्ड तीन को जु राज नारि बहु जानिये । चारि विध सैन सुर नर खगादि मानिये ।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै । पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।३।। ॐ ह्रीं नारायणपदभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । कामदेव को सुरूप देखि देव मन हरे । भोगवांछित सकल देव सेवा करै ।।
जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै । पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।४।। ॐ ह्रीं कामदेवपदभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । आठ परकार सपरस विषै जानिये ।
द्रव्य क्षेत्र काल अनुसार भाव मानिये ।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै । पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।५।। ॐ ह्रीं स्पर्शनेन्द्रियभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
पांच परकार रस जानि शुभ सार जी ।
भोग वांछै सभी जगत् दुखकार जी ।।
जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।६।। ॐ ह्रीं रसनेन्द्रियभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । घ्राण इन्द्रियतने गंध दो हैं सही । ताहि अनुकूल पाय जीव साता लही ।।
जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।७।। ॐ ह्रीं घ्राणेन्द्रियभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । चक्षु इन्द्रियतने पांच रूप भोग हैं । ताहि चाहें अमर नाहिं तन रोग हैं ।। जानि सब अथिर उर भाव निर्मल करै । पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।८।। ॐ ह्रीं चक्षुरिन्द्रियभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । राग संगीत इन आदि सुर साजिये ।
सप्त स्वरभेद कर्ण भोग मन राजिये ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।९।। ॐ ह्रीं कार्णेन्द्रियभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । भोग वांछित घने चित्त आधार जी ।
ताहि सेय सेय जीव सुख लहैं अपार जी ।। उत्तम शौच धर्म पूजा )
जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१०।। ॐ ह्रीं मनवांछितभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । तन अशुभ आपको सु चाम मय जानिये ।
सप्त मल धात पूरित सु घिन आनिये ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।११।। ॐ ह्रीं तनसम्बन्धिभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । रतन नवधादि भरपूर घर में सही ।
कोटि नित दान देते सु क्षय हो नहीं ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१२।। ॐ ह्रीं धनवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । रूपमें शची समान नारि घर में घनी । शीश आज्ञा धरै प्रीति रसमें सनी ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१३।। ॐ ह्रीं वनिताभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । कामदेवके समान पुत्र रूप धार जी । विनयवान सर्व बलवंत तेज सार जी ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१४।। ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
ॐ ह्रीं पुत्रभोगवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । भ्रात बहु विनय जुत आनि पालक सही । संग तिन भोग भोगि जीव साता लही ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१५।। ॐ ह्रीं भ्रातृसुखवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । मन्त्र दाता विपति मांहि मित्र सार जी । प्रेम अन्तरंग धारि नित्य रहें लार जी ।। जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१६।। ॐ ह्रीं मित्रानुबन्धवांछाविहीनशौचधर्मांगायार्धं । मित्र तिय पुत्र सब घरतने दासिया । आदि परिजन सकल और घरवासिया ।।
जानि सब अथिर उरभाव निर्मल करै ।
पूजि शौच धर्म को जु शौच थानक धरै ।।१७।। ॐ ह्रीं सकलपरिजनानुकारित्ववांछाविहीनशौचधर्मांगायार्घ । अथ जयमाला
(दोहा)
शौच सकल उर सुख करै, हरै लोभ मल सोइ । मोक्ष धरै मरनो टरै, ताहि जजैं शिव होइ ।।१।। उत्तम शौच धर्म पूजा )
( वेसरी छन्द )
शौच भाव तैं पुण्य बड़ोई, कटै पाप जग में जस होई । शौच भाव संतन को प्यारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ।।२।। शौच भाव पर चाह निवारै, शौच भाव दुख शोक विडारै । शौच सरव कों बड़ा सहारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ।।३।। शौच सांच के बड़ा सनेहा, शौच मुनिव्रत की इक देहा । शौच भाव मंगल करतारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ।।४।। शौच भाव में नाहिं कषाया, शौच भाव सब जग को भाया । शौच धर्म का शरण गहारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ।।५।। शौच धर्म को मुनिगण सेवैं, ता फल स्वयं सिद्ध थल लेवें । शौच धर्म समतारस धारा, जजौं शौच यह धर्म हमारा ।।६।। शौच समान और नहिं मिंता, शौच भाव टारै सब चिंता । शौच सदा सब जिय का प्यारा, शौच जजौं यह धर्म हमारा ।।७।। ( दोहा )
शौच सार संसार में, करै पवित्र जु भाव ।
तातें धारो शौच को, भलौ मिलो यह दाव ।।८।।
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मागाय पूर्णार्धं ।
- इति उत्तम शौचधर्म पूजा *
( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
उत्तम संयम धर्म पूजा
( अडिल्ल छन्द )
संजम धर्म अनूप दोय विधि जानिये ।
एक रक्षा षट् काय दया उर आनिये ।।
मन इन्द्रिय वश करै दूसरो संयमा ।
सो मैं पूजौं थापि लहौं उत्तम रमा ।।१।।
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांग ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । अथाष्टकम्
( वेसरी छन्द )
निर्मल नीर भाव कर भीजै, मन मनोग्य वासन धरि लीजै । जिनको जन्म मरण गद जावे, जो संयम वृष जजि शिर नावे ।।२।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि० । चन्दन शीतल भावन भाया, तापर मन भंवरा जु लुभाया ।। जग आताप तासु नशि जावे, सो संयम वृष जजि शिर नावे ।।३।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय संसारतापविनाशनाय चन्दनं नि० । शाल अखण्ड अखत ले भाई, शुभ परिणति भाजन भरवाई । जो अखण्ड थानक ले धावे, सो संयम वृष जजि शिर नावे ।।४।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय अक्षयपदाप्राप्तयेऽक्षतान् निर्व० । फूल प्रफुल्लित भाव सु लीजे, भक्ति तारमें माल करीजे । मदन बाण हरिसो बल पावे, सो संयम वृष जजि शिर नावे ।।५।। उत्तम संयम धर्म पूजा )
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि० । भाव अवांछित कर नैवेद्यं, नाना रस मय ले निरखेद्यं । भूख नाशि चित साता पावै, जो संयम वृष जजि शिर नावै ।। ६ ।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्व० । सम्यग्ज्ञान दीप करि भाई, शुद्ध भाव भाजन धरवाई । ताके फल अज्ञान मिटावे, जो संयम वृष जजि शिर नावे ।।७।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्व० । कर्म आठ मय धूप करीजे, धरम सु ध्यान अगनि खेवीजे । ता फल दुष्ट कर्म नशि जावे, जो संयम वृष जजि शिर नावे ।। ८ ।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० । उत्तम परिणति कौ फल कीजे, शुद्ध भाव कन थान धरीजे । तातें मनवांछित फल पावे, जो संयम वृष जजि शिर नावे ।।९।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० । आठों द्रव्य अमोलिक जानी, प्रासुक भाव सहित हित दानी । पद आनर्ध्या तासु फल पावे, जो संयम वृष जजि शिर नावे ।१०। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ प्रत्येकार्घाणि
( चौपाई छन्द )
ताल कूप खाई न खुदाय, भूमिकाय तब दया पलाय ।
पृथविकाय की रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।। १ ।। ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
ॐ ह्रीं पृथिवीकायिकजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । अनगालो जल वरतें नाहिं, नदी तलाब फुडावै नाहिं । जलकायिक जिय रक्षा करै, संयमवृष जजि शिव-तिय वरै ।।२।। ॐ ह्रीं जलकायिकजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । अगनि जलावन काज न करै, नाहिं बुझावै करुणा धरै । अगनिकाय जिय रक्षा होय, संमय धर्म जजौं शुचि होय ।।३।। ॐ ह्रीं अग्निकायिकजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । पवनकाय की रक्षा सार, पंखा आदि काज नहिं धार । पवनकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।४।। ॐ ह्रीं वायुकायिकजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । फूल पात तरु तोड़ै नाहिं, वन बागादि लगावै नाहिं । हरितकाय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।५।। ॐ ह्रीं वनस्पतिकायिकजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । इल्ली जोंक गिडौला जान, बाला आदि जीव पहिचान । वे इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौ मद खोय ।।६।। ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । चीटी कुन्थुआ खटमल लीक, जुआं तिबूला जिय करि ठीक । ते इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।७।। ॐ ह्रीं त्रीन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । माखी भवरा टीडी जान, मच्छर आदि जीव पहिचान । चउ इन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।८।। ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । उत्तम संयम धर्म पूजा ) (४३
जीव असैनी बहुत प्रकार, जलचर सर्प आदि निरधार ।
पंचेन्द्रिय जिय रक्षा होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।९।। ॐ ह्रीं असंज्ञिपंचेन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । नर सुर नारिक सब जिय संज्ञि, तिर्यंचगतिमें संज्ञि असंज्ञि । संज्ञी जिय की रक्षा होय, संयम धर्म जजौ मद खोय ।।१०।। ॐ ह्रीं संज्ञिपंचेन्द्रियजीवरक्षणरूपसंयमधर्मांगायार्धं । सपरस इन्द्रिय विषम निवार, वीतरागता बरतै सार ।
शीत उसन उर चाह न होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।११।। ॐ ह्रीं स्पर्शनेन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयमधर्मांगायार्धं । रसनेन्द्रिय पांच भट जान, तिन वश भये सकल गुण हान । रसनेन्द्रिय के वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।१२।। ॐ ह्रीं रसनेन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयमधर्मांगायार्धं । घ्राणेन्द्रिय के भट दुइ जान, तिन प्रसाद जिय दुःख लहान । घ्राणेन्द्रिय के वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।१३।। ॐ ह्रीं घ्राणेन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयमधर्मांगायार्धं । चक्षु विषय भट जानों पांच, ते दुख देय सकल जिय सांच । चक्षु अक्ष के वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।१४।। ॐ ह्रीं चक्षुरिन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयमधर्मांगायार्धं । कर्णेन्द्रिय शुभाशुभ वैन, ता वश होंय सुरासुर ऐन । शब्द शुभाशुभ वश नहिं होय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।१५।। ॐ ह्रीं कर्णेन्द्रियविषयवर्जनरूपसंयमधर्मांगायार्धं । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
मन चंचल कपि की गति जिसौ, ताके वश जगजिय दुख फंसौ । मनके वश कबहूँ नहिं होय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।१६।। ॐ ह्रीं मनोविषयवर्जनरूपसंयमधर्मांगायार्धं । सब जियमें धरि समताभाव, तप संयम करिवे को चाव । आरत रौद्र भाव नहिं होय, संयम भाव जजौं शुचि होय ।।१७।। ॐ ह्रीं सामायिकरूपसंयमधर्मांगायार्धं ।
जो प्रमादवश संयम जाय, प्रायश्चित ले पुनि थिर थाय । छेदोथापन नामा सोय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।१८।। ॐ ह्रीं छेदोपस्थापनारूपसंयमधर्मांगायार्धं । दोय कोश नित गमन कराय, तन निहार नहिं बहु रिध पाय । सो परिहारविशुद्धी जोय, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।१९।। ॐ ह्रीं परिहारविशुद्धिरूपसंयमधर्मांगायार्धं । सकल कषाय नाश है जाय, नाम मात्र कछु लोभ रहाय । सूक्षम सांपराय है सोय, संयम धर्म जजौं मद खोय ।।२०।। ॐ ह्रीं सूक्ष्मसांपरायरूपसंयमधर्मांगायार्धं । सकल मोह नाशे जिस काल, या उपशमै मोह जंजाल । जथारथवाद में रहे न मोह, संयम धर्म जजौं शुचि होय ।।२१।। ॐ ह्रीं यथाख्यातरूपसंयमधर्मांगायार्धं ।
( अडिल्ल )
इस प्रकार बहु विधि को संयम जानिये ।
शिव सुखदायक होय दया की खानिये ।।
उत्तम संयम धर्म पूजा )
पूरण मुनि के होय धर्म हितदाय जी ।
ताहि जजौं मैं अर्घ थकी जश गाय जी ।।२२।।
ॐ ह्रीं उत्तम संयमधर्मांगाय महार्घ ।
जयमाला
(वेसरी छन्द)
संयम सार जगतमें भाई, संयमतें जिय शिव सुख पाई । संयम सब का राखनहारा, संयम है शिरताज हमारा ।।१ ।। संयम सकल जीव सुखदाई, संयम सकल जीव बड़भाई । संयम जगत् गुरुनि को प्यारा, संयम है शिरताज हमारा ।।२।। पूरण संयम मुनि जग पावै, संयम तै ही शिवमग धावै । संयम अघनाशन असिधारा, संयम है शिरताज हमारा ।।३।। संयम मुकुट धर्म धर धारै, संयम तैं विषधर उर हारै । संयम जामन मरण निवारा, संयम है शिरताज हमारा ।।४।। संयम के सब दास बताये, संयम बिना जगत् भरमाये । संयम मोह सुभट को मारा, संयम है शिरताज हमारा ।।५।। संयम मन का जीतनहारा, संयम इन्द्रिय रोग निवारा । पाप बेलि को नाशनहारा, संयम है शिरताज हमारा ।।६।। संयम जग विरक्त जिय भावै, संयम को मुनि जग जस गावै । संयम धर्म बहू अघ जारा, संयम है शिरताज हमारा ।।७।। संयम भवसागर नवका सी, संयम धरि जिय शिवपुर जासी । संयम कर्म-कलंक निवारा, संयम है शिरताज हमारा ।।८।। ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
( दोहा )
संयम जग का बंधु है, संयम मात रु तात । संयम भव भव शरण है, नमों टेक अघ जात ।।९।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय पूर्णार्घं । * इति उत्तम संयम धर्म पूजा *
उत्तम तप धर्म पूजा
( अडिल्ल छन्द )
अंतर बाहर भेद कहे तप सार जी ।
दुविध भाव अघहार करन भव पार जी ।
तप बारह परकार कर्म-गज केहरी ।
मैं पूजौं इस थानि जानि नित शुभ धरी ।।१।। ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मागाय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सतिहितो भव भव वषट् । अथाष्टकम्
( चौपाई )
भवजल तरण नाव तप भाव, करि अघ नाश जु देव उछाव । ऐसो तप निर्मल जल लाय, पूजौं जामन मरण नशाय ।।२।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व० । उत्तम तप धर्म पूजा )
त्रिभुवन में तप तिलक समान, याको मुनि धारें हित ठान । तपहर चन्दन सुभग मंगाय, मैं पूजौं भव तप नशि जाय ।।३ ।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय संसारतापविनाशनाय चंदनं नि० । (वेसरी छन्द)
तप में निरत लखे बहुतेरे, तप को तपें जु साहब मेरे । ऐसो तप अक्षत शुभ आनो, पूजौं फल अक्षय उपजानो ।।४।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मागाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि० । (पद्धड़ी छन्द)
यह तप त्रिभुवन में पूज्य सार, यह तप नाना मंगल सुधार । ऐसो तप बहु शुभ फल सु लाय, मैं पूजौं तसु फल मदन जाय ।५। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि० । तप सुर वंछै पै नाहि पाय, तातें सुर पूजें तप सुभाय । ऐसो तप चरु ले भक्ति लाय, मैं पूजौं तसु फल क्षुधा जाय ।। ६ ।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मागाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० । तप कल्पवृक्ष वांछित सुदेइ, तप-दीप अनोपम तम हरेइ । ता तप को दीपक रतन लाय, मैं पूजौं तसु फल ज्ञान पाय ।।७।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं नि० । तप ही तैं तीर्थंकर जु होय, तप ही तैं शिव लहि कर्म खोय । ऐसो तप को शुभ धूप लाय, मैं पूजौं विधि-ईंधन जराय ।। ८ ।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय दुष्टाष्टकर्मदहनाय धूपं नि० । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
तप पूजत जग करि पूज्य होय, तप औषधि दुखगद हरन जोय । ता तप को बहुविधि फल मंगाय, मैं पूजौं तसु फल शिव लहाय । ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति० । तपतैं उर करुणाभाव होय, तप तपें जगत् में पूज्य सोय । ता तप को उत्तम अर्घ लाय, मैं पूजौं पद अनरघ लहाय ।।१०।। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घ नि० । अथ प्रत्येकार्घाणि
(गीता छन्द)
तप सार जगमें भेद बारह, भव उदधि को नाव है । पाप दाहक तप करन हित, साधु मन उच्छाव है ।।
तप देय सुख दुख दूरि करि है, और कहं लग गाइये । इमि जानि पूजौं अर्घ लेकर, तासु फल शिव जाइये ।१। ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्मांगायार्धं ।
(वेसरी छन्द)
जिन गुण सम्पति है तप मीता, त्रेसठ वास होय जिन गीता । भिन भिन तिथियनमें सुखदाई, यह तप अनशन जजि गुण गाई ।२ ॐ ह्रीं जिनगुणसम्पत्तितपधर्मांगायार्घ ।
कर्म क्षपण तपके उपवासा, इकसौ अड़तालिस जिन भासा । भिन भिन तिथियनमें सुखदाई, यह तप अनशन जजि गुण गाई ।३ ॐ ह्रीं कर्मक्षपणतपधर्मांगायार्धम् ।
उत्तम तप धर्म पूजा )
(चाल–जोगीरासा)
सिंहनिक्रीड़त तप दिन सौ अरु जान सतत्तरि भाई । तिनमें इकसौ जानि पैंतालिस बास कहे सुखदाई ।। बाकी बत्तिस जान पारणा यह विधि जिन धुनि माहीं । यह अनशन तप जानि जजौं मैं अन्त लेय हित ठांही ।४। ॐ ह्रीं सिंहनिष्कीडिततपधर्मांगायार्धं ।
भद्र सर्वतो तप के शुभ दिन एक सैकड़ा जानों । हैं उपवास पचत्तरि अद्भुत पारण पचविस मानों ।। इसकी विधि भिन भिन जिन भासी सो तप अनशन गाया । अर्घ लेय मैं पूजौं मन वच काय भक्ति जुत भाया ।।५।। ॐ ह्रीं सर्वतोभद्रतपधर्मांगायार्धं ।
महा सर्वतो भद्र बड़ो तप दिन दोसै पैंताली । इकसौ छिनवै बास कहे जिन पारण गिन नव चाली ।। ताकी विधि जिन शासन में लखि, विधिजुत करना भाई । यह अनशन तप जानि जजौं मैं, अर्घ लेय हितदाई ।।६।। ॐ ह्रीं महासर्वतोभद्रतपधर्मांगायार्धं ।
लघु निष्कीडित के दिन जिन धुनि बीसी चारि कहे हैं । तिनमें बीस जु कहे पारणा साठि उपास लहे हैं ।। करने की विधि जिन धुनिमें लखि ताको करिये भाई । यह तप अनशन जानि जजौं मैं अर्घ आनि सुखदाई ।७। ॐ ह्रीं लघुनिष्कीडिततपधर्मांगायार्धं । ( दशलक्षणधर्म-व्रतविधान पूजा
( वेसरी छन्द )
नव पारन उपवास पचीसा, दिन चौंतीस कहे जगदीसा । मुक्तावलि तपविधि जिन जाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई । ॐ ह्रीं मुक्तावलितपधर्मांगायार्धं ।
मास मास के छह उपवासा, एक वरस दुई सत्तरि खासा । यह कनकावलि विधि श्रुत गाई, यह तप अनशन जजि सुखदाई । ॐ ह्रीं कनकावलितपधर्मांगायार्धं ।
सौ अनशन पारन उनईसा, इकसौ उनइस दिन शुभ दीसा । जिन भाषित आचामल भाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई ।१०। ॐ ह्रीं आचाम्लतपधर्मांगायार्धं ।
चौवीस वास पारना चौई, सब दिन अड़तालीस हीनोई । तप जु सुदरशन विधि श्रुत जानो, यह अनशन तप जजि सुखदानो । ॐ ह्रीं सुदर्शनतपधर्मांगायार्घ ।
एक बरस तक बास करंता, उत्तम तप जिनवाणि भणंता । ताके भेद बहुत हैं भाई, यह अनशन तप जजि सुखदाई ।१२। ॐ ह्रीं उत्कृष्टतपधर्मांगायार्धं ।
भूख प्रमाण थकी लघु खइये, सो अवमौदर तप वरनइये । यह तप विधि भूधर पविमाना, सो मैं जजौं अरघ कर आना ।१३। ॐ ह्रीं अवमौदर्यतपधर्मांगायार्धं ।
आज इसी विधि भोजन पइये, तौ हम लेय नतर थिर रहिये । ऐसी विधि परतज्ञा ठानै, सो तप जजौं कर्मगिरि भानै ।१४। ॐ ह्रीं व्रतपरिसंख्यानतपधर्मांगायार्धं ।
उत्तम तप धर्म पूजा )
त्यागै इक दुई त्रय रस भाई, चार पांच पट् तजि नहिं खाई । ऐसो रस परित्याग सु ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै ।१५। ॐ ह्रीं रसपरित्यागतपधर्मांगायार्धं ।
आसन दिढ़ भू सोधि करावै, थिरता भजै सु तन न हिलावै । शय्याशन तप या विधि ठानै, सो तप जजौं कर्म गिरि भानै ।१६। ॐ ह्रीं विविक्तशय्यासनतपधर्मांगायार्धं । काय कसैं मन आनंद पावै, सो तप कायकिलेश कहावै । शोक हरै सुख करै महानों, सो तप जजौं कर्मगिरि भानै ।१७। ॐ ह्रीं कायक्लेशतपधर्मांगायार्धं ।
(अडिल्ल छन्द)
मुनि को जो परमादवशी दूषण लगै ।
ततक्षण गुरु पै जाय जु प्रायश्चित मगै ।। जो आचारज दण्ड देंय सो लेय ही ।
तप प्रायश्चित जजौं अरघ शुभ देय ही ।।१८।। ॐ ह्रीं प्रायश्चित्ततपधर्मांगायार्धं । देव धर्म गुरु और थान जो पूज हैं ।
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 3082.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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