दशलक्षण धर्म पूजन | Dashlakshan Dharm Pujan

दशलक्षण धर्म पूजन

अनुक्रमणिका

स्थापना

(अनुष्टुप)
उत्तमक्षमाद्यन्तं-ब्रह्मचर्य्य-सुलक्षणम्।
स्थापय दशधा धर्ममुत्तमं जिनभाषितम्॥
(अहिल्ल)
उत्तम क्षमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म दश सार हैं,
चहुँगति-दुखंतै काढ़ि मुकति करतार हैं॥
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव - ये भाव कहे
हैं। उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम
त्याग - ये उपायभूत हैं। उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य

  • ये सभी दश धर्म मिलकर धर्म के सार हैं। जो इन्हें अपनी
    आत्मा में स्वभाव रूप ग्रहण करता है, वह चारों गतियों के
    दुःखों से निकलकर मुक्ति को प्राप्त करने वाले मार्ग को प्राप्त
    कर लेता है।

सरल अर्थ

अष्टक

(सोरठा)
भै अषाढ़ की धार, मुनि-वित्र सम रीतनि जुवमि।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
चन्दन केसर नार, होय सुवास जुवति।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
अम्बर कुंकुम नार, जुवतु जुवतु जुवति।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
फूल अनेक प्रकार, महके जुवतु-जोवतो।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
नैवेद्य विविध प्रकार, जुवतु जुवतु-जोवतो।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
दीपति जुवतु जुवति, दीपक-ज्योति जुवति।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
अगर धूप विस्तार, कैके सर्व सुमनता।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
फल की थाली अपार, जुवतु जुवतु-जोवतो।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥
आठों द्रव्य विचार, ‘ज्ञान’ अधिक जुवतु।
भव-आताप निवार, दश-लक्षण पूजौं सदा॥

सरल अर्थ

जल - हिमवान पर्वत से निकलने वाली गंगा-सिंधु की धारा मुनियों के मन के समान निर्मल, शीतल,
सुगंधित है, उसी प्रकार संसार ताप को निवारण करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा
पूजना चाहिए।॥१॥
चंदन - चंदन-केसर आदि जितने भी सभी दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं, उसी प्रकार संसार-ताप का
निवारण करने वाले ऐसे दश धर्म उत्तम शांति हो इसलिए मैं उनको हमेशा पूजता हूँ।॥२॥
अक्षत - मंगलहित, अखंड अक्षत के समान सफेद चावल उत्कृष्ट अक्षय पद की प्राप्ति की भावना भाता
हूँ, उसी प्रकार संसार ताप को निवारण करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा पूजता हूँ।॥३॥
पुष्प - नाना प्रकार के फूलों की माला से सुमन लोग सब सुशोभित हो गए हैं, उसी प्रकार संसार ताप को
निवारण करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा पूजता हूँ।॥४॥
नैवेद्य - नाना प्रकार के उत्तम पकवानों से भोजन करने वालों से सुशोभित हैं, उसी प्रकार संसार तापको
निवारण करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा पूजना चाहिए।॥५॥
दीप - कपूर की बाती वाले दीपक की ज्योति अति मनोहर लगती है, उसी प्रकार संसार ताप को निवारण
करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा पूजना चाहिए।॥६॥
धूप - जिस प्रकार अगरबत्ती का धुआँ पूरे विश्व में फैलकर सभी जगह फैल रही है। ऐसी धूप से संसार-
ताप के निवारण हेतु दशलक्षण धर्म की पूजा करना चाहिए।॥७॥
फल - आम्र, सेब, बेर, मेव की आकृति वाले बहुत अच्छे जाति के फल हैं, उसी प्रकार संसार ताप को
निवारण करने वाले ऐसे दशलक्षण धर्म हैं, इसलिए उनको हमेशा पूजना चाहिए।॥८॥
अर्घ्य - आठों द्रव्यों के समान ज्ञान से भरे, अपने कर्मों को नाश कर निर्वाणिक अत्यधिक उत्साह पूर्वक
संसार-ताप का निवारण करने के लिए दशलक्षण धर्म की मैं पूजन करता हूँ।॥९॥

उत्तम क्षमा धर्म

(सोरठा)
पीड़ैं दुष्ट अनेक, बांधि मार बहुविधि करैं।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा॥
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह-भव जस, पर भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहै अयानो॥
कहै है अयानो वस्तु छीनै, बांधि मार बहुविधि करै।
घर तैं निकारै तन बिदारै, वैर जो न तहाँ धरै॥
ते करम पूरब किये खोटे, सहैं क्यों नहि जीवरा।
अति क्रोध-अग्नि बुझाय प्राणी, साम्य-जल ले सीयरा॥

सरल अर्थ

अनेक प्रकार बांधकर, पीटकर या नाना प्रकार के दुष्टों के द्वारा कष्ट
दिए जाने पर भी सज्जन क्रोध नहीं करते हैं एवं क्षमा रूपी विवेक को धारण
करते हैं।
हे भाई! उत्तम क्षमा को धारण करने से इस भव यश में तथा दूसरे भव में
सुख प्राप्त होता है। यदि कोई गाली देता है तो मन में खेद-शोक नहीं लाना
चाहिए। यदि अज्ञानी/मूर्ख लोग अपने गुणों को अवगुण (दोष) भी कहें,
हमारी वस्तु भी छीन लें, इतना ही नहीं, कई प्रकार से सताये जाने पर, बाँधे
मारे जाने पर, घर से निकाल देने पर, शरीर को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी वैर
(दुश्मनी) को धारण नहीं करना चाहिए।
हे जीव! जो पूर्व जन्म में खोटे (पाप) कर्म किए तो सहन करने (भोगने)
ही पड़ेंगे। हे जीव! क्रोध रूपी अग्नि को समता रूपी शीतल जल लेकर बुझाना
चाहिए। यही उत्तम क्षमा धर्म है।

उत्तम मार्दव धर्म

(सोरठा)
मान महाविघ्नरूप, करहि नीच-गति जगत में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावै प्रानी सदा।।
उत्तम मार्दव गुन मन-माना, मान करन को कौन ठिकाना।
बरषों निगोद माँहि तें आया, दुमरी रुंकन भाग बिकाया।।
रुंकन बिकाया भाग बशर्तें, देव इक-इन्द्री भया।
उत्तम मुआ चाण्डाल हुवा, भूप कीड़ों में गया।।
जीतव्य जीवन धन गुमान, कहा करें जल-बुदबुदा।
करि विनय बहु-गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावै उदा।।

सरल अर्थ

मान (अहंकार) हलाहल विष के समान है। यह मान, नीच गतियों को करने वाला है अर्थात् मान के कारण खोटी गतियों में जाना पड़ता है। मार्दव (कोमलता) रूपी अमृत को धारण करने वाला जीव हमेशा सुख पाता है। उत्तम मार्दव की गुण (स्वाभाविक धर्म) मन से माना जाता है और मान करने वाले का कौन-सा ठिकाना है? क्योंकि अनादिकाल से निगोद में रहा, वहाँ से आकर वनस्पति काय का जीव हुआ तो दमरी (दमड़ी) रुक्कन (मुद्रा की सबसे छोटी इकाई) के भाव बिका और कभी-कभी बिना मूल्य के ही बिका। तीव्र पुण्य के उदय से देव हुआ और वहाँ से चलकर फिर एक इंद्रिय हुआ। उत्तम पर्याय के बाद चंडाल हो गया और राजा भी कीड़ों में उत्पन्न हुआ।
हे जीव! जीवन, यौवन और धन-दौलत का क्या घमंड करना! ये सब जल के बुलबुले के समान क्षणभर में नष्ट होने वाले हैं। जो बहुत गुणवान हैं, बड़े हैं; उन महापुरुषों की विनय करनी चाहिए, जिससे ज्ञान प्राप्त होता है।

उत्तम आर्जव धर्म

(सोरठा)
कपट न कीजै कोय, चोरन के पुर ना बसै।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु-सम्पदा।।
उत्तम आर्जव रीति वरखानी, रंचक दुगा बहुत दुःखदानी।।
मन में होय सो वचन उच्चरिये, वचन होय सो तन सो करिये।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने देख निसरल आसी।
मुख करें जैसा लखें तैसा, कपट-प्रीति अंगार-सी।।
नहीं लहै लक्ष्मी अधिक छल करै, करम-बन्ध विशेषता।
भय त्यागि दूध बिलाव पियै, आपदा नहीं देखता।।

सरल अर्थ

कोई भी छल-कपट, मायाचारी मत करो, क्योंकि ऐसा करने वालों अर्थात् चोरों आदि के नगर कभी नहीं बने (बसे)। तात्पर्य यह है कि छल-कपट चोरों आदि करने से नगरों में नहीं रह पाये। और जो सरल स्वभाव वाले होते हैं, उनके घर में बहुत संपत्ति होती है।
उत्तम आर्जव धर्म परंपरा से जीव का सरल स्वभाव कहा गया है। और थोड़ा-सा भी छल-कपट बहुत-से दुःख, कष्ट देने वाला होता है। इसलिए उससे बचने के लिए ही मन में जो हो, सो शब्दों में कहना चाहिए, जो शब्दों में कहा जाये, उसे शरीर से भी करना चाहिए।
इस प्रकार अपने तीनों योगों (मन-वचन-काय) को सरल/एक जैसा कीजिए। जैसे स्वच्छ दर्पण में जैसा हमारा मुख होता है, वैसा ही दिखता है। छल-कपट से प्रीति करना अंगारों से प्रीति करने के समान है। कोई भी अधिक मायाचारी करके धन-संपत्ति प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु ऐसा करने से अधिक कर्मों का बंध होता है। छल-कपट करते समय वह कर्मबंध का ध्यान नहीं करता है। जैसे बिल्ली दूध पीते समय भय का त्याग करती है, वह ध्यान नहीं रखती कि पीछे से मार पड़ेगी; उसी प्रकार छल-कपट करने वाला भी कर्म-बंध एवं आपत्ति का ध्यान नहीं रखता है।

उत्तम सत्य धर्म

(सोरठा)
कठिन वचन मति बोल, पर-निन्दा झूठ हठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में जुझौ।।
उत्तम सत्य-व्रत पालीजै, पर-विश्वासघात नहीं कीजै।
साँचे-झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखौ।।
पेखौ तिहायत पुरुष साँचै को दुरब सब दीजिये।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा, साँच गुन लख लीजिये।।
ऊँचे सिंहासन बैठि बलु नृप, धरम का भूपति भया।
वच झूठ सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया।।

सरल अर्थ

कठिन (कठोर) वचन कभी नहीं बोलना चाहिए। दूसरों की निंदा और झूठ वचनों का त्याग करो। सत्यरूपी जवाहर रत्न का उपयोग करने वाला और सत्य बोलने वाला प्राणी, संसार में सुखी रहता है। अतः उत्तम सत्य धर्म का पालन करना चाहिए और दूसरों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। जगत में सच्चे-झूठे मनुष्यों का स्वरूप जानने वाले व्यक्ति, झूठ बोलने वाले अपने पुत्र पर भी विश्वास नहीं करते और सत्य बोलने वाले अन्य का विश्वास कर धन भी देते हैं। सच्चे गुणों या सत्य धर्म को ग्रहण करने से मुनिराजों और श्रावकों की प्रतिष्ठा (सम्मान) होती है। ऊँचे आसन पर बैठकर राजा वसु न्याय क्रिया करता था और मात्र एक झूठ बोलने से नरक में चला गया तथा सत्य बोलने वाला नारद स्वर्ग गया।

उत्तम शौच धर्म

(सोरठा)
धरि हिरदै सन्तोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निर्दोष, धरम बड़ो संसार में॥
उत्तम शौच सर्व जन जाना, लोभ पाप को बाप बखाना।
आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी॥
प्रानी सदा शुचि शील जप तप, ज्ञान ध्यान प्रभावनं।
नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि-दोष सुभावतं॥
ऊपर अमल मल भज्यो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहै।
बहु देह मैली सुगुन-थैली, शौच-गुन साधू लहै॥

सरल अर्थ

हृदय में संतोष धारण करके, शरीर से तपस्या करनी चाहिए। निर्दोष शौच धर्म ही सर्व जगत में प्रसिद्ध है। आशा अर्थात् इच्छा रूपी नाग महादुख को देने वाला है। संतोष को धारण करने वाले प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। यह जीव शील, जप, तप, ज्ञान, ध्यान के प्रभाव से पवित्रता प्राप्त करता है। गंगा-यमुना आदि नदियों एवं समुद्रों में निरंतर नहाने से भी पवित्रता नहीं होती; क्योंकि इस शरीर का स्वभाव ही अपवित्र (अशुचि) है। यह शरीर ऊपर से तो मल रहित पवित्र दिखाई देता है, परंतु इसके भीतर मल भरा हुआ है। तब ऐसे शरीर को किस प्रकार से पवित्र कहा जाए। जिनका शरीर तो बहुत मैला है, परंतु जो उत्तम गुणों के भंडार हैं। ऐसे महाव्रती साधु ही इस उत्तम शौच गुण को प्राप्त करते हैं।

उत्तम संयम धर्म

(सोरठा)
काय छहों प्रतिपाल, पंचेंद्रिय मन वश करौ।
संयम-रतन संभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं॥
उत्तम संयम गह मन मेरौ, भव-भव के भाजैं अघ तेरौ।
सुरग-नरक-पशुगति में नाहीं, आलस-हरन करन सुख ठांई॥
ठांई पृथिवी जल आग मारुत, रूख त्रस करना धरौ।
सपरसन रसना घ्राण नैना, कान मन सब वश करौ॥
जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तू रुत्यो जग-कींच में।
इक घरी मत विसरौ करौ नित, आयु जम-मुख बीच में॥

सरल अर्थ

यह काय के जीवों की रक्षा और पांच इंद्रियों एवं मन को वश में करना चाहिए। विषय-कषाय रूपी चोर बहुत घूम रहे हैं, इसलिए संयम रूपी रत्न संभाल कर रखो। हे मेरे मन! उत्तम संयम धर्म को ग्रहण करो, जिसके कारण अनेकानेक भवों के पाप नष्ट हो जाएंगे। आलस्य को हरने वाला और सुख को देने वाला यह उत्तम संयम धर्म देव, नरक, तिर्यंच (पशु) गति में नहीं होता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति – ये पांच स्थावर और त्रस – इन छह काय के जीवों की दया धारण कर स्पर्शन (त्वचा), रसना (जीभ), घ्राण (नाक), चक्षु (आंखें), कर्ण (कान) एवं मन को वश में करो। इस संयम के अभाव में जिनराज (तीर्थंकर) भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाए अर्थात् जब तक तीर्थंकर गृहस्थ अवस्था में थे, उन्होंने संयम अंगीकार नहीं किया था, तब तक वे मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सके थे।
इसलिए हे जीव! इस संयम को ग्रहण न करने के कारण से ही तुम संसार रूपी कीचड़ में फंसे हो। हम निरंतर मृत्यु रूपी यमराज के मुख की ओर जा रहे हैं। इसलिए उत्तम संयम धर्म को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए।

उत्तम तप धर्म

(सोरठा)
तप चाहें सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादशविधि सुखदाय, क्यों न करै निज सकतिसम॥
उत्तम तप सब मांहिं बखाना, करम-शैल को वज्र-समाना।
बरस्यो अनादि निगोद मंझारा, भूविकल्प पशु तन धारा॥
धारा मनुष तन महादुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता।
श्रीजैनवानी तत्त्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता॥
अति महा दुर्लभ त्याग विषय-कषाय जो तप आदरे।
नर-भव अनूपम कनक घर पर, मणिमयी कलश धरै॥

सरल अर्थ

उत्तम तप धर्म को देवों के राजा (इंद्र) भी चाहते हैं। यह तप कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए वज्र के समान है। ये बारह प्रकार के तप सुख को देने वाले हैं तो क्यों न उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार धारण करें। कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए उत्तम तप धर्म वज्र के समान सभी शास्त्रों में कहा है। यह जीव अनादि काल से निगोद में रहा है। वहां ये निकलकर पृथ्वी आदि स्थावर एवं उसके बाद दो इंद्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय आदि हुआ। फिर तिर्यंच (पशु) का शरीर धारण किया। अब यह मनुष्य पर्याय बड़ी कठिनता से धारण की। उसमें भी उत्तम कुल, पूर्ण आयु, निरोगी शरीर, जिनवाणी का संयोग, तत्त्वज्ञान, आत्मचिंतन में उपयोग बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुआ। जो जीव महा कठिन विषय और कषाय का त्याग कर तप को आदर पूर्वक ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य भव रूपी अलौकिक स्वर्ण घर पर, नीलमणि आदि रत्नमय कलश चढ़ाते हैं अर्थात् मनुष्य जन्म को सार्थक बनाते हैं।

उत्तम त्याग धर्म

(सोरठा)
दान चार प्रकार, चार संघ को दीजिए।
धन बिजुली उनहार, नर-भव लाही लीजिए।।

उत्तम त्याग कहो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचैं राग-द्वेष निवारै, ज्ञाता दोनों दान सँभारै।।
दोनों सँभारै कूप-जल सम, दुरब घर में परिनिया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया।।
धनि साधु शास्त्र अभय दिवैया, त्याग राग विरोध को।
बिन दान श्रावक साधु दोनों, लहें नाहीं बोध को।।

सरल अर्थ

दान चार प्रकार का है। ये चार संघ अर्थात् मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविका को देना चाहिए। धन, सम्पत्ति, वैभव, बिजली की चमक की तरह है। अतः दान देकर मनुष्य भव का लाभ ले लेना चाहिए।
समस्त संसार में उत्तम त्याग धर्म श्रेष्ठ कहा गया है। औषधि-दान, शास्त्र-दान, अभय-दान, आहार-दान - ये तो व्यवहार त्याग के रूप में हैं। राग और द्वेष का निवारण करना (त्यागना) निश्चय त्याग है।
बुद्धिमान लोग दोनों दान (व्यवहार और निश्चय) करते हैं। कुएँ का पानी नहीं निकालने पर ख़राब हो जाता है और उससे अधिक बढ़ता भी नहीं है तथा निकालने पर ख़राब नहीं होता एवं जितना निकालते हैं, उतना फिर से भर जाता है। उसी प्रकार घर में धन, वैभव की दान के अभाव में स्थिति बनती है। इसलिए धन-सम्पत्ति को अपने हाथ में दान देकर साथ में ले लीजिए। धन-वैभव खाने-पीने में खर्च करना तो वह जाने के समान है, वह नष्ट हो जायेगा; लेकिन साथ रहने वाला नहीं है। धन्य हैं वे साधु, जो ज्ञानदान, अभयदान देने वाले हैं और राग-द्वेष इत्यादि विकारों का त्याग करने वाले हैं। दान के बिना श्रावक और साधु सम्यग्ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।

उत्तम आकिंचन्य धर्म

(सोरठा)
परिग्रह चौबिस भेद, त्याग करें मुनिराजजी।
तिरसना भाव उछेड़, घटती जान घटाड़िए।।

उत्तम आकिंचन्य गुण जानो, परिग्रह-चिन्ता दुरख ही मानो।
फाँस तनक-सी तन में सालै, चह लँगौटी की दुख भालै।।
भालै न समता सुख कबहुँ कर, बिना मुनि-मुद्रा धरै।
धनि नगन पर तन-नगन ठाड़े, सुर-असुर पायनि परै।।
घर माहिं तिसना जो घटावै, रुचि नहीं संसार सों।
बहु धन बुरा हू भला कहिये, लीन पर-उपगार सों।।

सरल अर्थ

परिग्रह के चौबीस भेद होते हैं। उनका त्याग मुनिराज करते हैं और तृष्णा भाव को क्षय करते हैं। इसी प्रकार श्रावकों को भी धीरे-धीरे दोनों प्रकार के (अंतरंग और बहिरंग) परिग्रहों को कम करना चाहिए। उत्तम आकिंचन्य उत्कृष्ट गुण जानना चाहिए। परिग्रह की चिंता दुःख देने वाली मानो। जिस प्रकार छोटी-सी फाँस लग जाने पर पूरे शरीर में कष्ट देती है, उसी प्रकार एक लँगोटी की इच्छा दुःख देने वाली है। दिगंबर मुनि की मुद्रा को धारण किए बिना मनुष्य कभी समता और सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। वे मुनिराज धन्य हैं जो पर्वतों पर नग्न खड़े रहकर तप करते हैं, उनके चरणों की सुर-असुर आदि अर्चना करते हैं। घर में रहते हुए भी जो अपनी तृष्णा को घटाते हैं और संसार में अपनी रुचि नहीं रखते हैं, वे श्रावक भी धन्य हैं। बहुत धन-सम्पत्ति तो बुरी ही होती है, परंतु जो धन परोपकार में लगता है, वह फिर भी श्रेष्ठ कहा गया है।

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

(सोरठा)
शीत-बाढ़ नौ राख, ब्रह्म-भाव अन्तर लखौ।
करैं दोनों अभिलाख, कहहु सफल नर-भव सधौ।।

उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ, माता बहिन सुता पहिचानौ।
सहें बान-बरषा बहु सूरै, टिकैं न नैन-बान लखि कूरै।।
करैं तिया के अशुचि तन में, काम-रोगी रति करै।
बहु मृतक सड़ाहिं मसान माहीं, कान ज्यों चोंचें भरै।।
संसार में विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वर।
‘द्यानत’ धरम पैड़ी चढ़ि कै, शिव-महल में पग धरा।।

सरल अर्थ

शील की रक्षा नौ बाड़ों को लगाकर करनी चाहिए (व्यवहार ब्रह्मचर्य) और अंतर में आत्मचिंतन करना चाहिए। (निश्चय ब्रह्मचर्य) निश्चय एवं व्यवहार ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के इच्छुक होकर मनुष्य जन्म सार्थक करना चाहिए। मन में ब्रह्मचर्य धारण कर माता, बहिन, पुत्री की पहचान करना चाहिए। वीरों के द्वारा होने वाली बाणों की वर्षा को यह जीव सहन कर लेता है, परंतु कुशील स्त्रियों के विकारी नेत्र रूपी बाण को सहन नहीं कर पाता। ऐसे काम रूपी रोग से पीड़ित स्त्री के अपवित्र शरीर में उसी प्रकार रति (प्रेम) करता है; जिस प्रकार श्मशान भूमि में सड़े हुए मृतक शरीर को कौआ प्रेमपूर्वक चोंच भरकर खाता है।
संसार में नारी को विष-बेल के समान कहा गया है, जिसका सभी मुनिराजों ने त्याग कर दिया है। यहाँ कवि द्यानतरायजी कहते हैं कि दश धर्म रूपी सीढ़ियाँ चढ़कर जीव मोक्ष रूपी महल में प्रवेश हो जाता है।
(स्त्रियों को विष-बेल कहने का अभिप्राय स्त्रियों के प्रति काम की इच्छा रखना है, बहिन अथवा माता के प्रति राग रखना नहीं है।)

समुच्चय जयमाला

(दोहा)
दश लच्छन वन्दों सदा, मनवांछित फलदाय ।
कहीं आरती भारती, हम पर होहु सहाय ।।

(चौपाई)
उत्तम छिमा जहाँ मन होई, अन्तर-बाहिर शत्रु न कोई ।
उत्तम मार्दव विनय प्रकासे, नाना भेद ज्ञान सब भासे ।।
उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुरगति त्यागि सुगति उपजावे ।
उत्तम शौच लोभ-परिहारी, सन्तोषी गुण-रतन भण्डारी ।।
उत्तम सत्य-वचन मुख बोले, सो प्रानी संसार न डोले ।
उत्तम संजम पाले ज्ञाता, नर-भव सफल करें, ले साता ।।
उत्तम तप निरवांछित पाले, सो नर करम-शत्रु को टाले ।
उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई ।।
उत्तम आकिंचन व्रत धारे, परम समाधि दशा विसतारे ।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नर-सुर सहित मुकति-फल पावे ।।

(दोहा)
करें करम की निरजरा, भव पींजरा विनाशि।
अजर अमर पद को लहैं, ‘द्यानत’ सुख की राशि ।।

सरल अर्थ

दशलक्षण धर्म की मैं हमेशा वंदना करता हूँ। ये मन के अनुकूल
(मनवांछित) फल को देने वाले हैं। मैं दशधर्मों की आरती को कहता हूँ। हे
भगवन ! हम पर कृपा करें।
जिसके मन में उत्तम क्षमा होती है, उसके मन में अंतरंग एवं बहिरंग
दोनों प्रकार के राग-द्वेष आदि विकारी भाव, आत्मा के अंदरूनी शत्रु और
बाहरी शत्रु नहीं रहते हैं। उत्तम मार्दव धर्म, विनय गुण को प्रकाशित करके
सम्यग्ज्ञान के नाना प्रकार के (आठ प्रकार) के भेदों का प्रकाश कराता है।।1।।
उत्तम आर्जव धर्म मायाचारी छल-कपट आदि को मिटाकर एवं खोटी
गतियों से हटाकर उत्तम गतियों में उत्पन्न करवाता है। मुख से जो कोई उत्तम
सत्य वचन बोलता है, वह प्राणी संसार में घूमता नहीं है।।2।।
लोभ कषाय को दूर करने वाला उत्तम शौच धर्म है। संतोषी प्राणी गुणों
के भंडारी होते हैं, जो ज्ञानीजन उत्तम संयम धर्म को धारण करते हैं, वे सुख-
शांति को प्राप्त करके मनुष्य जन्म को सार्थक करते हैं।।3।।
जो उत्तम तप को इच्छा रहित होकर पालता है, वह मनुष्य कर्म रूपी
शत्रुओं को नष्ट कर देता है और जो व्यक्ति उत्तम त्याग धर्म का पालन करते
हैं, वे भोगभूमि और स्वर्ग के सुख को भोगकर मोक्ष-सुख को प्राप्त करते
हैं।।4।।

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है

इस पूजन की एक रिकॉर्डिंग:

स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।