दशलक्षण धर्म गाथा | Dashlakshan Dharm Gatha

क्रोध है दु:खमंय, निज क्षमा शान्तिमय।
क्रोध निज को जलाये, क्षमा मुक्ति है॥1॥

मान से हो अधोगति, जगत् में सदा।
मान है भव भ्रमण, मार्दव मुक्ति है॥2॥

मायाचारी से तिर्यञ्च, नारीपना।
माया अतिक्लेशमय, आर्जव मुक्ति है॥3॥

झूठ वादी का विश्वास, सब ही तजें।
झूठ तो दुःखमय, सत्य ही मुक्ति है॥4॥

लोभ तो पापमय, नरक का हेतु है।
लोभ संताप है, शौच ही मुक्ति है॥5॥

होती तृष्णा असंयम से अति तीव्र है।
है असंयम करम, संयम ही मुक्ति है॥6॥

शान्ति तप से मिले, इच्छा दुःख मूल है।
तप बिना जग रुले, उत्तम तप मुक्ति है॥7॥

ग्रहण भावक लघु, दान-दाता गुरु।
ग्रहण से बन्ध है, त्याग ही मुक्ति है॥8॥

पर को निज में मिलाना ही संसार है।
व्यर्थ चिन्ता बुरी, आकिंचन मुक्ति है॥9॥

भोग हैं नाग सम, दुःखदायी सदा।
ब्रह्म है सुखमय, ब्रह्मचर्य मुक्ति है॥10॥

धर्म दशधा कहे, मात्र व्यवहार से।
लक्ष्य इनका तजो, निज में ही लीन अब॥11॥

राग ही मूल है सब दुःखों का सही।
शुद्ध आत्मा लखो, जो सहज मुक्ति है॥12॥


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह