दर्शन पाठ
देव आपके दर्शन पाकर उमंगा है उर में उल्लास ।
सम्यक् पथ पर चलकर मैं भी आऊँनाथ आप के पास ।।१।।
भक्ति आपकी सदा हृदय में रहे अडोल अकम्प समंत ।
तुम्हें जानकर निज को जानूँ यही भावना है भगवंत ।।२।।
रागादिक विकार सब नाशूँ दुष्प्रवृतियॉ कर संहार ।
मोक्ष मार्ग उपदेष्टा प्रभु तुम भव्य जनों के हो आधार ।।३।।
प्रभो आपके दर्शन का फल यही चाहता हूँ दिन रात ।
स्व पर भेद विज्ञान प्राप्त कर पाऊँमंगलमयी प्रभात ।।४।।
जय हो जय हो जय हो जय हो परमदेव त्रिभुवन नामी ।
ध्रुव स्वभाव का आश्रय लेकर बन जाऊँशिव पथगामी ।।५।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २८३