लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
हमारे ग्रंथों में ‘दान’ को ‘त्याग का पूर्वाभ्यास’ बताया गया है। ‘त्याग’ में जहाँ आत्महित की प्रधानता है, वहीं ‘दान’ में आत्महित के साथ-साथ परहित की भावना प्रधान होती है। साथ ही ‘त्याग’ जहाँ विरक्तों एवं गृह-त्यागियों का धर्म है, वहीं ‘दान’ गृहस्थावस्था में रहते हुये भी परिग्रहरूपी महापाप से स्वयं को बचाकर जनहित, समाजहित व राष्ट्रहित में पुण्योपार्जित-सम्पत्ति का समर्पण है।
‘‘अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्’’ - इस सूत्र में आचार्य उमास्वामी ने जहाँ स्वयं और पर के अनुग्रह के लिये कानूनी तौर पर (वस्तुत: तो कोई किसी परद्रव्य का का स्वामी हो ही नहीं सकता है, मात्र अपनी मान्यता में अपने को पर का स्वामी मान सकता है।) अपने स्वामित्व की वस्तु का अतिसर्ग यानि इस विवेक और सावधानीपूर्वक देना कि जिस निमित्त या प्रयोजन से तुमने उस वस्तु या धन-सम्पत्ति को दिया है, उसकी वह व्यक्ति या संस्था उसी निमित्त व प्रयोजन में सदुपयोग कर रही है या नहीं; क्योंकि उस वस्तु या धन-सम्पत्ति में अपनत्व छोड़ा है; उसका त्याग नहीं किया है कि उसके उपयोग का विचार तक न करें। तभी वह कार्य ‘दान’ संज्ञा के योग्य है। मंच पर सम्मान पाने के लिये प्राय: गैरकानूनी ढंग से कमायी गयी सम्पत्ति को सरकार से छुपाकर करचोरी करके मात्र समाज में मानबढ़ाई के लिये ऊँची बोलियों में अग्रणी बनकर देना ‘दान’ संज्ञा के अन्तर्गत नहीं आता है।
‘दान’ वह महनीय-विधि है, जो सीधे मोक्ष का साधन तो नहीं है; फिर भी ‘दान’ को परम्परा से मोक्ष का साधन जिनवाणी में बताया गया है -
‘‘दानं हि पारम्पर्येण मोक्ष-साधनम्’’
प्रथमानुयोग के ग्रंथों में ऐसे दृष्टान्त भरे पड़े हैं, जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। करणानुयोग के ग्रंथों में भी इसका समर्थन मिलता है। तीर्थंकर-मुनिराज को प्रथम-आहारदान करनेवाला जीव तो अनिवार्यत: उसी भव से मोक्ष जाता है - यह सभी जानते हैं। कुन्दकुन्द आचार्यदेव ने पिछले भव में मुनिराज को शास्त्रदान किया था, उसी के परिणामस्वरूप वे महान् आचार्य बने - यह बात भी सर्वविदित ही है। जिनमंदिर-निर्माण करवाना एवं जिनवाणी समर्पित करने से ‘निधत्त’ और ‘निकाचित’ कर्मों की निर्जरा होती है - यह सिद्धान्तग्रंथों में आया ही है। इसके विपरीत जिन्होंने दान में अन्तराय किया, बाधा डाली; उनकी दुर्दशाओं के वर्णन भी जिनवाणी में प्रचुर-परिमाण में मिलते हैं। अत: साक्षात् मोक्ष-साधन भले ही ‘दान’ नहीं कहा गया है, परन्तु परम्परित-मोक्ष-साधन का साधन तो वह है ही और मोह त्यागे बिना मोह को घटाने और प्रशस्तरूप देने के लिये यह आदर्श-विधि माना गया है। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। इन सभी कथनों से जिनाम्नाय और मोक्षमार्ग में दान का विशिष्ट-महत्त्व भली-भाँति स्पष्ट है।
‘दान’ के प्रकरण में बहुत सारी शर्तें आचार्य उमास्वामी जी ने लगायी हैं, जैसे - ‘‘विधि-द्रव्य-दातृ-पात्र-विशेषाद् तद्विशेषः’’ अर्थात् ‘दान’ देने की विधि या तरीका, ‘दान’ में दिया जाने वाला द्रव्य, ‘दान’ देनेवाला व्यक्ति का चरित्र और जिसे ‘दान’ दिया जा रहा है, उसकी पात्रता - इन सबकी शुद्धता के बिना दिया गया ‘दान’ अपनी सार्थकता को प्राप्त नहीं कर पाता है। इनका स्पष्टीकरण निम्नानुसार है -
- ‘दान’ की विधि - जिस निमित्त ‘दान’ दिया जा रहा है, उसकी गुणवत्ता जानकर अत्यन्त भक्ति, विनय और बहुमानपूर्वक ही दान दिया जाना चाहिये। ‘दान’ की विधि में यदि तनिक भी उपेक्षा का भाव रहा या फिर उसके बदले मानकषाय की पूर्ति की गयी अथवा दान की भावना करते ही उस द्रव्य, धन-सम्पत्ति को समर्पित नहीं किया गया और विलम्ब से दिया या कई बार तकादा करने के बाद दिया, तो वह द्रव्य देना ‘दान’ संज्ञा का पात्र ही नहीं रहा।
आजकल लोग बोलियों के द्वारा दिये व लिये जाने वाले द्रव्य को ‘दान’ कहते हैं, परन्तु आचार्य उमास्वामीजी के इस निर्देश के अनुसार वह दान की विधि ही नहीं है; क्योंकि उस में दान के योग्य भक्ति, विनय और बहुमान के भाव न होकर विशुद्धरूप से मानकषाय के भाव हैं। मैं तो बोलियों के द्वारा दिये व लिये जाने वाले ‘दान’ को ‘दान’ मानने को ही तैयार नहीं हूँ। यद्यपि यह विधि जैनसमाज के सभी वर्गों में न्यूनाधिक रूप में स्वीकार्य व प्रचलित है; परन्तु मैं आज की समाज की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि जिनागम-सम्मत ‘दान’ की विधि की बात कर रहा हूँ। भले ही किसी को या सभी को बुरा लगे, किन्तु दुनियाँ के डर से मैं जिनवाणी में कथित स्वरूप का अपलाप नहीं कर सकता हूँ। बोलियाँ लगाकर दान लेना व देना - दोनों ही दान की मूल-भावना व स्वरूप के अनुरूप नहीं है।
‘‘मेरे पूर्व-पुण्योपार्जित-द्रव्य में मेरा अनुराग ही ‘परिग्रह’ है, जो सबसे बड़ा पाप है। इस द्रव्य को अत्यन्त भक्ति, विनय और बहुमानपूर्वक समर्पित कर मैं इस परिग्रह के कलंक से मुक्त तो हो ही सकता हूँ, साथ ही अपने परिणामों को विशुद्धतर कर सकता हूँ।’’ - इस पुनीत-भावना से स्वयं अंतरंग- उत्साहपूर्वक उस द्रव्य धन-सम्पत्ति को अत्यन्त प्रमोद-पूर्वक समर्पित कर आनन्दित होता है - यह ‘दान’ की आदर्श विधि है।
सबसे उत्तम विवेकी-जीव तो अपने द्रव्य के दान के लिये सुपात्र व्यक्ति/संस्था/कार्य को उसीप्रकार ढूँढ़कर चुनता है, जैसे कोई लोभी अपनी ब्लैकमनी को व्हाइट करने के लिये इस विद्या में चतुर सी.ए. को तलाशता है अथवा उसे अनचाहे में ही अपराध का आरोप लग जाने पर भी बाइज्जत-बरी करा सकने में समर्थ वकील को ढूँढ़कर चुनता है। उसीप्रकार उत्तम-श्रेणी की दान-विधि में दाता स्वयं विवेकपूर्वक योग्य-परामर्शदाताओं से स्वयं सलाह लेता है और उनके द्वारा बताये गये सुपात्र व्यक्ति/संस्था/प्रयोजन आदि की परीक्षा करके विधिपूर्वक सबहुमान अपना विधि-उपार्जित-द्रव्य समर्पित करते आनंदित होता है। वह दान के सुअवसर को स्वयं ढूँढ़ता है, क्योंकि इसमें उसका ही हित है।
मध्यम-श्रेणी की दान-विधि वह होती है, जिसमें किसी भी सूचनास्रोत के द्वारा ऐसे सुपात्र व्यक्ति/संस्था या अवसर की जानकारी मिलते ही दाता स्वयं ही उसके समीप जाकर, उसकी सुपात्रता का समीचीनरूप से निर्णय करने के बाद अत्यन्त हर्षित होकर सविनय अपना द्रव्य उसे उस कार्य के निमित्त समर्पित करता है।
जघन्य-श्रेणी की दान-विधि वह है, जिसमें कोई व्यक्ति दाता के पास जाकर अपनी संस्था या प्रयोजन की उपादेयता स्पष्ट करके फिर उसके दानराशि देने का अनुरोध करे, तब वह प्रसन्नतापूर्वक आगंतुक को अपेक्षित या यथाशक्ति दान दे।
इन तीनों के अलावा जो भी खींच-तानकर, माँगने पर मोलभाव करके, शर्तें लगाकर जो भी प्रक्रियायें की जाती हैं, वे सभी ‘दान’ संज्ञा की पात्र नहीं हैं।
- ‘दान’ का द्रव्य - दान के द्रव्य की जाँच के लिये आचार्य उमास्वामीजी ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कह दिया है ‘स्वस्य’ अर्थात् अपने द्रव्य को दिया जाये। जो कानूनी तौर पर अपना है ही नहीं, जिसके अपने होने की घोषणा तक आप करने को तैयार नहीं हैं, ऐसा द्रव्य किसी भी स्थिति में ‘अपना’ रह जाने योग्य ही नहीं है। जिस पर सरकार को उचित ‘कर’ अर्थात् टैक्स नहीं चुकाया गया है, वह द्रव्य वैधानिक तौर पर आपका है ही नहीं। वह तो चोरी का धन है और चुराकर दान नहीं किया जाता है। नहीं तो, किसी की जेब काटकर भी मंदिर में वह धन देना ‘दान’ की श्रेणी में आ जायेगा!!
अन्याय, अनीति और अभक्ष्य के सेवन की प्रक्रिया से भी जो धन आये, वह भी ‘दान’ के योग्य द्रव्य नहीं कहा जा सकता है। जिन कंपनियों के द्वारा ऐसे धर्मविरुद्ध अनैतिक-कृत्य किये जाते हैं, उनमें यदि धन-निवेश करके उनके शेयरधारक बनकर जो पैसा कमाया जाता है, वह भी ‘दान’ के योग्य द्रव्य नहीं है।
आचार्य उमास्वामीजी ने ‘तत्त्वार्थसूत्र’ ग्रंथजी में जो विरुद्ध-राज्यातिक्रम, हीनाधिक-मानोन्मान, प्रतिरूपक-व्यवहार आदि दोष गिनाये हैं; यदि दाता का द्रव्य उन दोषों से या उनमें से किसी भी एक दोष से दूषित है, तो वह दान के योग्य द्रव्य नहीं माना जा सकता है। इसीप्रकार किसी को सताकर, या मजदूर की मजदूरी मारकर या कम देखकर भी जो द्रव्य संग्रहीत किया गया हो, वह भी कितना भी प्रासुक क्यों न हो; किन्तु दान के योग्य द्रव्य नहीं है। दान के प्रसंग में द्रव्य की प्रासुकता तो बाद में विचार की जाती है, किन्तु उस द्रव्य के उपार्जन में परिणामों की प्रासुकता का विचार पहले किया जाना चाहिये। अन्यथा बाहरी तौर पर प्रासुक और निर्दोष होने पर भी वह द्रव्य शुद्ध नहीं माना जा सकता है।
इसीप्रकार दान के पात्र व्यक्ति की मर्यादा के विरुद्ध यदि किसी भी रूप में कोई द्रव्य दिया जाता है, तो वह भी ‘दान’ के योग्य द्रव्य नहीं है। जैसे कि मुनिराज के लिये ‘उद्दिष्ट-आहार’ देना या ‘राजसी-भोजन-सामग्री’ का आहारदान देना संज्ञा का पात्र ‘दान’ नहीं है।
उपर्युक्त चारों प्रकार के दानों के योग्य द्रव्य में कहीं भी धन-सम्पत्ति, रुपया-पैसा, जमीन-जायदाद आदि की उल्लेख नहीं है। अतः वास्तव में तो ये चीजें ‘दान’-द्रव्य हैं ही नहीं। ये तो ‘दान’-द्रव्य के लिये विनिमय (खरीद-फरोख्त) के साधन हैं; इसीलिये इनकी भी प्रसंगानुकूल-पवित्रता देखी-भाली जाती है। वस्तुतः जड़-पदार्थों में कोई शुद्ध या अशुद्ध नहीं कहा जा सकता है (यहाँ शुद्धता-अशुद्धता से मेरा अभिप्राय उनकी प्योरिटी से है, न कि स्पृश्यता-अस्पृश्यता से), बल्कि दाता के प्रयोजन व उन द्रव्यों के उपार्जन की वैधानिकता और अभिप्राय की विशुद्धि से है। यदि दाता ने उन्हें अवैध-रीति से जुटाया है अथवा वह खोटे-अभिप्राय से दान कर रहा है, तो वह दान तो ‘कुदान’ कहलायेगा ही, वह द्रव्य भी दान के योग्य नहीं माना जायेगा।
यही नहीं, अंतरायकर्म के निमित्त से किसी की निर्धन-स्थिति को देखकर उस पर करुणा या दया करके दिया गया द्रव्य भी ‘दान’-द्रव्य की श्रेणी में नहीं आता है। उसे शास्त्रों में कहीं-कहीं ‘करुणादान’ कहा गया है, किन्तु चतुर्विध-दान (आहारदान, औषधिदान, ज्ञानदान और अभयदान) के अंतर्गत वह नहीं आता है। वह भी ‘करुणादान’ तभी कहलायेगा, जब उपेक्षा या तिरस्कार की भावना से नहीं दिया जाये और न ही उसे देकर अहंकार का पोषण किया जाये। अन्यथा वह द्रव्य भी ‘दान’-द्रव्य नहीं होगा, और वह ‘करुणादान’ भी नहीं कहलायेगा।
- ‘दान’ का दाता - अपने विधिपूर्वक-उपार्जित द्रव्य को भोगने की जगह दान देने के उदात्तभाव जिसको स्वतः जागृत हुये हैं, वह ‘दाता’ कहा जाता है। इसके भी कई विशेष-गुण कहे गये हैं, जिनमें सबसे प्रमुख-गुण है ‘निरभिमानता’। यदि दान देकर मन में अभिमान के भाव का पोषण किया जाता है, तो वह ‘दान’ संज्ञा के योग्य ही नहीं है और उसे देनेवाला भी ‘दाता’ कहलाने का पात्र नहीं रह जाता है।
दान-दाता की एक और महत्त्वपूर्ण-विशेषता है कि वह दान देकर कभी भी मन में खेदखिन्न नहीं होता है। अपितु प्रसन्न ही होता है। कविवर पण्डित द्यानतरायजी ‘षोडशकारणपूजा’ में लिखते हैं - ‘‘दान देय मन हरष विशेखै’’
यहाँ स्पष्ट-शब्दों में लिखा है कि धर्मकार्यों में दान देकर दाता के मन में अन्य सांसारिक कार्यों में दिये जाने वाले द्रव्य की तुलना में विशेषरूप से हर्ष का अनुभव होता है। यदि ऐसा नहीं होता है और दान में खेदखिन्नता का अनुभव होता है, तो वह ‘दान’ का ‘दाता’ है ही नहीं। उसने तो अपना द्रव्य देकर भी मानो किसी पुराने कर्ज का भुगतान किया है - ऐसा मानना चाहिये।
दान के द्रव्य का भौतिक-मूल्य कितना कम या अधिक है - ऐसा यह बात तनिक भी महत्त्व नहीं रखती है; अपितु देनेवाले के भाव कैसे थे तथा वह दान अपने तात्त्विक-प्रयोजन की पूर्ति में कितना समर्थ है ? इसका निर्धारण करना महत्त्वपूर्ण होता है।
आज यह देखा जा रहा है कि कुछ लोग, जिनके आचार-विचार का कोई विवेक ही नहीं है; मात्र पूर्वोपार्जित-पुण्य के उदय से नीति-अनीति किसी भी तरह से प्राप्त सम्पत्ति को देकर अपने को ‘दाता’ मानने लगे हैं। यहाँ तक कि जिनके जीवन में सप्त-व्यसन आदि का निरतिचार-पालन देखने में आता है, मात्र पैसे के बल पर वे ‘दान-शिरोमणि’ बनते देखे जा रहे हैं। यदि ऐसे ‘दाता’ होंगे, तो उनके द्वारा दिया गया द्रव्य कभी भी ‘दान’ संज्ञा के योग्य नहीं हो सकता है। मात्र ‘मान’ के व्यापार का साधन ही उसे कहा जा सकता है कि ‘‘तुमने पैसा दिया, तो बदले में हमने तुम्हारा सम्मान कर दिया।’’ परन्तु यह ‘दान’ जैसी पवित्र संज्ञा का पात्र नहीं है। क्योंकि ‘दान’ मोह को घटाने का एक पवित्र- अनुष्ठान है, जिसमें मात्र समर्पण होता है, ‘प्रतिदान’ अर्थात् बदले में कुछ भी लेने की प्रक्रिया कदापि नहीं होती है। बदले में कुछ लेना, तो व्यापार की प्रविधि है, ‘दान’ की नहीं।
दाता का तीसरा महत्त्वपूर्ण गुण है ‘विनम्रता’। वह दान देते समय अकड़ के भाव नहीं रखता। किसी विवेकी को ऐसे भाव हो भी नहीं सकते हैं; क्योंकि दान अपने हित की भावना से किया जाता है, दूसरे पर ‘उपकार’ या अहसान करने के भाव से नहीं किया जाता है। अत: जिस कार्य में व्यक्ति का स्वयं का हित जुड़ा हुआ हो, उसे करने में वह अकड़ कैसे सकता है? अत: यदि दान करते समय यदि ‘अकड़’ दिखाने या ‘अहसान’ जताने का भाव दिखना तो दूर, मन में उत्पन्न भी हो जाये, तो वह दान ‘दान’ नहीं रह जायेगा। इसलिये दानदाता को दान देने से पहले सुपात्र व्यक्ति एवं उस दान के प्रयोजन से अपने मन को इतना बहुमान से भर लेना चाहिये कि उसकी प्रक्रिया में और दान के बाद भी अकड़ एवं अहसान जैसी अभिमान की प्रतिक्रियाओं की संभावना ही नहीं रहे।
दान की इस पवित्र-विधि की यही अनुपम-विशेषता है कि इसमें देनेवाला इसलिये विनम्र ही रहता है कि संयोगवश जो संसाधन उसके पास जुड़कर उसे परिग्रही बना रहे थे, दान के द्वारा उसे उनसे छुटकारा पाने का सुअवसर मिलता है। इसका अर्थ ऐसा नहीं है कि दान में कोई अशुद्ध या अपवित्र वस्तुयें दी जातीं हैं, दान हमेशा उत्तम-वस्तु का ही होता है। भले ही कुछ दाताओं की दृष्टि में इसका अहसास मिट गया हो, और मंदिर में पूजा के चावल ‘परमल’ तथा घर में भोग के चावल ‘बासमती’ होते हों। यही तो बिडम्बना है कि चढ़ाते समय पढ़ते हैं ‘‘बासमती सुखदास के’’, और चढ़ाते हैं सस्ते ‘परमल’ चावल। - यह दान की दृष्टि ही नहीं है। आज तो दानद्रव्य के विषय में लोगों के मन में ऐसी स्थिर-धारणा बन चुकी है कि ‘‘दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते’’। फिर भी जैनदर्शन की यह स्पष्ट-अवधारणा है कि दान हमेशा श्रेष्ठ-वस्तु का ही किया जाता है, निकृष्ट का नहीं।
एक और बात इस प्रकरण में ध्यान रखने योग्य है, वह यह कि दानद्रव्य में लौकिक-मूल्य की तुलना में गुणवत्ता व पात्र के अनुरूप मर्यादा/पवित्रता का विशेषरूप से ध्यान रखना अनिवार्य है। यहाँ ऊपर जो मूल्यवान् वस्तुओं का संकेत आया है, वह पूजा के सन्दर्भ में कुछ अलग-दृष्टि से कहा गया है। पूजा में ‘अर्घ्य’ शब्द का अर्थ ही ‘मूल्यवान्’ या ‘बेशकीमती’ होता है और पूजा करनेवाले व्यक्ति का उद्देश्य होता है ‘अनर्घ्य’-पद की प्राप्ति अर्थात् लौकिक- मूल्य या भौतिक द्रव्य के बदले जिसे नहीं पाया जा सकता है, वह ‘अनर्घ्य’ है। पर भक्त क्या करे? इसलिये उसे अपने लिये जो-जो पदार्थ सर्वाधिक-मूल्यवान् प्रतीत होते हैं, ‘अर्घ्य’ हैं; उन सबको सविनय समर्पित करके, अपना सर्वस्व समर्पित करके वह अनर्घ्य-पद मोक्ष को पाना चाहता है। वास्तव में वह सांसारिक-पदार्थों के प्रति अपना सम्पूर्ण-मोह छोड़ना चाहता है। इसलिये सभी बहुमूल्य-वस्तुओं के समर्पण की भावना वह व्यक्त करता है। जबकि दान में द्रव्य का मूल्यवान् होना बड़ा मुद्दा नहीं है। बल्कि उसका पात्र की मर्यादा के अनुरूप पवित्र होना अनिवार्य है। जैसे कि मुनिराज को आहारदान के लिये द्रव्य को मुनिराज की आहारचर्या के अनुरूप पवित्र और मर्यादा होना अपेक्षित है। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि ‘‘मैंने इतनी कीमती वस्तुयें आहार में दीं’’; बल्कि यही कहा जायेगा कि ‘‘मुनिराज की मर्यादा के अनुरूप पवित्र-वस्तुयें ही आहार में दीं।’’
‘दान’ के प्रकरण में द्रव्य की गुणवत्ता सर्वोपरि है और उसके लिये ‘विवेक’ का प्रयोग सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाता है। बनियागिरी में मूल्यवान् होना महत्त्वपूर्ण हो सकता है, किन्तु दान और धर्म के प्रकरण में द्रव्य की मर्यादा और शुद्धि बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। हाँ, इतना अवश्य है कि दान के लिये जान-बूझकर हल्की-क्वालिटी के सस्ते द्रव्य नहीं लिये जायें। दान पूरे उत्साह व प्रसन्नता से किया जाता है, अतः उसकी वस्तुयें सर्वोत्तम ही हों, पर वह सर्वोत्तमता लौकिक-मूल्य पर आधारित न होकर उनकी गुणवत्ता व मर्यादा पर केन्द्रित होनी चाहिये।
उदाहरण के तौर पर हम मुनिराज के आहारदान की प्रक्रिया में जुड़े व्यक्तियों को लें। एक व्यक्ति अपनी संपन्नता के हिसाब से बेशकीमती-सामान मुनिराज को आहार में देने के लिये मँगवाता है। सोने के बर्तनों में उन्हें सजवाकर पूरी शानोशौकत से आहारदान की व्यवस्था करता है। जबकि दूसरा व्यक्ति पहले स्वयं की आहारचर्या को मुनिराज जैसी शुद्ध एवं मर्यादित बनाता है, ताकि उद्दिष्ट-आहार देने का दोष नहीं लगे और आहार के लौकिक-मूल्य की तुलना में उसकी समयगत-मर्यादा एवं निर्माण की प्रक्रिया की शुद्धि को सर्वोपरि-प्राथमिकता देता है। वह गरिष्ठ-मेवों व पकवानों की तुलना में मुनिधर्म की मर्यादा के अनुरूप सुपाच्य सादा-दाल-रोटी आदि का आहार बनवाता है। यदि मर्यादा-रहित व गरिष्ठता के कारण अनेकों वायु-विकार आदि को उत्पन्न करनेवाले मेवों एवं पकवानों को मूल्यवान् होने के कारण श्रेष्ठ माना जाये, तो मुनिधर्म के प्रतिकूल होने के कारण वे चीजें आहारचर्या के योग्य नहीं होंगी और सच्चे मुनिराज कभी भी उनका आहार नहीं लेंगे और सात्त्विक-वस्तुओं का विधिपूर्वक दिया गया आहार ही ग्रहण करेंगे - इससे स्पष्ट है कि दान-द्रव्य में लौकिक-मूल्य की तुलना में मर्यादा व शुद्धि अधिक महत्त्वपूर्ण है।
साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि दान कभी भी संकुचित मन से नहीं करना चाहिये। बल्कि यह सोचना चाहिये कि “जन्म-जन्मान्तरों में दुर्लभ मेरे ऐसे भाव हुये हैं, तो मैं अपना सर्वस्व समर्पित करके भी इन भावों की रक्षा करूँगा; इनकी वृद्धि करूँगा। यह संयोग तो अवश्यंभावी-वियोग को साथ लेकर ही आया है, अतः इन पदार्थों का वियोग तो अनिवार्य ही है। यदि इनके प्रति अपनत्व का राग छोड़े बिना इन पदार्थों ने हमें छोड़ दिया अर्थात् इनका वियोग हो गया, तो ये मेरे जीवन में परिग्रहरूपी महापाप कहे जायेंगे, जो नरकायु के निमित्त बनेंगे और यदि इनके द्वारा मेरे साथ/संयोग छोड़ने से पहले ही मैं इनके प्रति मोह छोड़ दूँ, तो ये ‘दान’ की प्रविधि द्वारा मेरे इहलोक एवं परलोक में अभ्युदय व निःश्रेयस् के कारण होंगे। अतः मेरा परम-सौभाग्य है कि परिग्रह के रूप में मेरे साथ संयुक्त हुये ये ही पदार्थ मुझे मोह-त्यागते ही निःश्रेयस-मार्ग का पथिक बनाने में सहायक बन रहे हैं।”
ऐसी परम-उदात्त-भावना से दान की विधि जीवन में किसी किसी सौभाग्यशाली-जीव के घटित होती है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि दान जैसे पवित्र-अनुष्ठान के अनुष्ठाता जीव के परिणामों की जाति कैसी होती है? जन्म-जन्मान्तर के परम-सौभाग्य से ही जीव को ‘दान’ के समीचीन-भाव जागृत होते हैं। अन्यथा तो जीव अपने पापों के अहसास के नीचे दबे हुये किसी न किसी रूप में कभी गृहीत-मिथ्यात्व का, तो कभी मानकषाय का पोषण करते हुये अपना माने हुये द्रव्य को बड़े लालच के दबाव में किसी तरह देकर अपने को दानदाता समझकर आत्मविभ्रम (मुगालते) का शिकार रहते हैं। अतः दान-दाताओं को सावधानीपूर्वक आत्मनिर्णय करना होगा कि क्या वे दान जैसी पवित्र-विधि को अनुष्ठित भी कर सके हैं?
- ‘दान’ के पात्र - दान के योग्य-व्यक्ति को ‘पात्र’ कहा जाता है। इसके लोगों की भाषा में तीन भेद कहे जाते हैं - सुपात्र, कुपात्र और अपात्र।
जिसका अंतरंग और बहिरंग - दोनों स्वरूप निश्छल व निर्दोष होंगे, वे कार्य की गरिमा के अनुरूप ‘सुपात्र’ कहे जाते हैं। जैसे कि भावलिंगी-मुनिराज विधिपूर्वक पड़गाहन करके आहारदान आदि के लिये सुपात्र होते हैं; क्योंकि उनका अंतरंग और बहिरंग - दोनों आचरण पूरी तरह से निर्दोष ही होते हैं।
किन्तु जिनका बाह्यरूप तो ठीक दिखे, फिर भी अंतरंग उस भूमिका के अनुरूप निर्दोष नहीं होता है। जैसे कोई निर्ग्रन्थ-मुनिराज जैसा बाह्यवेष अंगीकार तो कर ले, परन्तु भावलिंगी-मुनिराज जैसी परिणाम-विशुद्धि के अभाव में न तो उनका मन निर्मल होता है और लाख संभालकर करें, तो भी मन, वचन एवं काय से दोषपूर्ण-व्यवहार हो ही जाता है, उन्हें ‘कुपात्र’ कहा गया है। इन्हें ‘कुपात्र’ कहने का कारण यही है कि इनकी बाहरी-मुद्रा देखकर लोग इन्हें सच्चा मानने का भ्रम कर सकते हैं; किन्तु इनकी अंतरंग-परिणति में निर्मलता तो होती ही नहीं है, बाह्यक्रिया भी आगम की मर्यादा में नहीं होती है। अतः प्रथमदृष्ट्या भ्रमोत्पादक होने से इन्हें ‘कुपात्र’ की संज्ञा दी गयी है। इनकी विनय आदि करने एवं दान देने से गृहीत-मिथ्यात्वरूप महापाप का बंध होता है। इनके बाह्यरूप से सच्चे मुनिराज होने का धोखा होता है, इसीलिये इनसे विशेषरूप से सावधान होने के लिये इन्हें ‘कुपात्र’ कहा गया है। ताकि भोले जीव इनसे अधिक सावधान रहें और अपनी श्रद्धा को बिगड़ने से बचा सकें; क्योंकि इन्हें कविवर पं. दौलतरामजी ने ‘संसाररूपी समुद्र में डुबोनेवाली पत्थर की नाव’ की उपमा देकर इनसे सावधान किया है।
मात्र गलत-आचरणवाले मुनिराज ही दान के लिये ‘कुपात्र’ होते हैं -ऐसा नहीं है। अन्य व्यक्ति व संस्थायें, जो सदाचार की बात करती हैं; किन्तु सदाचार के विपरीत विषय-भोगादि कार्यों में दान में प्राप्त द्रव्य का दुरुपयोग करती हैं, वे सब भी दान के लिये ‘कुपात्र’ ही हैं।
आजकल नववर्ष अथवा चातुर्मास-स्थापना, वर्षायोग-निष्ठापन, जिनमंदिर-शिलान्यास या अन्य इसीतरह के कई धार्मिक कहे जाने वाले कार्यों के नाम पर ‘हास्य-कवि-सम्मेलन, पिकनिक-पार्टी, मेला-आयोजन, जादूगर-खेल, बच्चों की खेलकूद-प्रतियोगिता, लकी-ड्रॉ’ आदि भौतिक-मनोरंजन के साथ-साथ जुए जैसी प्रवृत्तियों (लकी-ड्रॉ आदि) के लिये कार्ड व कूपन छपवाकर मुनिपद-धारकों के द्वारा बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर छपवाये जा रहे हैं और विषय-भोग-प्रिय अज्ञानी-जीवों की भीड़ जुटाकर समाज से जबरन-वसूली की तरह दान के रूप में पैसा इकट्ठा करवाकर धर्म का उपहास बनवाया जा रहा है। ये सभी वीतरागी जैनधर्म के विपरीत-कार्य हैं तथा विषय-भोग की पूर्ति एवं मानकषाय की संतुष्टि इनका एकमात्र लक्ष्य है। अतः ऐसे कार्यों के लिये दानस्वरूप कुछ भी सहयोग करना दान को कलंकित करना है। अतः इन्हें दान नहीं देना चाहिये। जो वीतरागी जैनधर्म का लेबल लगाकर विषय-भोगादि की पूर्ति करे, वह भी दान का ‘कुपात्र’ ही है।
इतना ही नहीं, जिन मंदिरों व क्षेत्रों में अतिशय/चमत्कार दिखाने, दरबार लगने, झाड़-फूँक करने, बाधायें दूर करने आदिरूप स्पष्ट-गृहीत-मिथ्यात्व को बढ़ानेवाले काम होने का प्रचार किया जाता है, वे सभी क्षेत्र, संस्थायें, व्यक्ति आदि भी दान के लिये अपात्र हैं। इन्हें दान देकर, इनकी प्रशंसा आदि करके यदि किसी भी रूप में कोई सहयोग किया जाता है, तो वह दान गृहीत-मिथ्यात्व को बढ़ानेवाला होने से संसार-परिभ्रमण का कारण है। जबकि दान तो परम्परा से मोक्ष का निमित्त होता है, तब साफ है कि यह दान है ही नहीं और ऐसे व्यक्ति, संस्थायें, क्षेत्र आदि दान के अपात्र हैं। इन्हें दानस्वरूप द्रव्य देकर अपने अनंत-संसार-परिभ्रमण को बढ़ाना है, बैठे बिठाये आफत मोल लेना है। मन-वचन-काय एवं कृत-कारित-अनुमोदना से इनका परित्याग करना, इनकी छाया से भी बचकर रहना ही उचित है। जो हमारा आचरण बिगाड़े, वह तो कुछ समय तक का नुकसान करता है; किन्तु जो श्रद्धान बिगाड़ता है, वह अनंत-भवों तक भटकाता है; इसीलिये श्रद्धान को बिगाड़नेवाले इन केन्द्रों से बुद्धिपूर्वक बचकर रहने में ही भलाई है। इन्हें दिया गया द्रव्य आपके संसार-परिभ्रमण का कारण तो बनता ही है, जो भोले जीव आपको समझदार मानकर आपकी देखा-देखी आपकी अनुसरण करते हैं, वे भी अपने दुर्लभ-मनुष्यभव को बिगाड़ते हैं। अतः इन दान के लिये अनुचित-क्षेत्रों को दान देकर आप अपना व दूसरों का नरभव बिगाड़नेवाले क्यों बनते हैं?
व्यंतर आदि क्षुद्रदेव तो मध्यलोक में प्रायः सर्वत्र पाये जाते हैं। ये अपने आप में समझदारी से मनुष्यों के निवासक्षेत्रों से दूर उजड़े भवनों, खण्डहरों, सूखे पेड़ों आदि में निवास करते हुये अपनी आयु पूर्ण करते हैं। मनुष्य ही इन्हें अपने अज्ञानता के कारण न्यौता देकर अपने जीवन में इन्हें दख़ल देने को बुलाते हैं और फिर सारे जीवन इनकी पूजा-मनौतियाँ कर-करके इनकी गुलामी में अपना नरभव नष्ट करते हैं। तीन लोक के नाथ जिनेन्द्रदेव व जिनवाणी के माध्यम से सम्यग्दर्शन प्राप्त करके ही नरभव का सफलता निश्चित होती है। इन कुदेवों की पूजा-मान्यता से तो सम्यग्दर्शन की प्राप्ति अत्यन्त कठिन ही नहीं, इसके सद्भाव में तो असंभव ही हो जाती है। इनके निमित्त किया गया दान एवं बहुमान - दोनों ही अनंत-संसार-परिभ्रमण का हेतु है। अतः किसी भी रूप में इन्हें दान नहीं देना चाहिये। भले ही वहाँ जिनेन्द्रदेव का मंदिर हो, परन्तु पूज्यता-मान्यता तो कुदेवों की ही होती है न? कभी अवसर पड़ जाये, तो उस मंदिरजी में विराजमान वीतरागी जिनेन्द्रदेव की पूजा-भक्ति करने में कोई बाधा नहीं है; किन्तु दान आदि के संपोषण से इनका समर्थन नहीं करना; क्योंकि वहाँ के लोग मिथ्यात्व का ही प्रचार-प्रसार करते हैं। अतः इन्हें दान आदि से संपोषित करना जिनधर्म की आज्ञा के विरुद्ध है।
ये मनुष्यों को मानसिकरूप से पराधीन तो बनाते ही हैं, स्वावलम्बन छुड़ाकर पुरुषार्थ-विहीन भी बनाते हैं। इन्हें दान देना अपने को अकर्मण्य व पुरुषार्थ-विहीन बनाने की दिशा में धकेलना है। पाप-पुण्य के उदय से जीवन में प्रतिकूलता-अनुकूलता चलती रहती है, वे हमारे द्वारा ही किये गये थे, अब यह नरभव उनके कलंक को मिटाने के लिये है या उसी भवभ्रमण की दुःखद-परम्परा को बढ़ाना चाहते हो? स्वयं विचार करो और दृढ़-निर्णय करके इनसे बुद्धिपूर्वक दूर रहने का संकल्प करो।
तथा जो प्रत्यक्ष ही परिग्रह आदि से सहित होकर विचित्र-वेशभूषायें बनाकर रागादिवर्द्धक-कार्यों में लीन हैं, उन्हें जैनी-लोग अपने विवेक से किसी भी रूप में पूज्य नहीं मानते हैं; अतः अपने बाह्यरूप एवं चर्या से स्पष्टरूप से वीतरागी जिनेन्द्रदेव के मार्ग से विपरीत होने के कारण ऐसे विकृत-वेष-धारकों को दान की दृष्टि से ‘अपात्र’ कहा गया है अर्थात् ये किसी भी प्रकार के दान के योग्य नहीं हैं।
इस श्रेणी में मोक्षमार्ग से विपरीत-कार्यों के लिये दान माँगनेवाले सभी व्यक्ति व संस्थायें भी आयेंगीं और उन्हें दान के लिये ‘अपात्र’ मानना चाहिये।
वर्तमान-परिस्थितियों में ‘दान’ की समीक्षा :-
यहाँ तक अतिसंक्षेप में ‘दान’ के विषय में पारम्परिक विवेचन के बाद अब वर्तमान-परिस्थितियों में ‘दान’ की दशा के विषय में संक्षेप में समीक्षापूर्वक विवेचन अपेक्षित समझता हूँ।
वर्तमान-परिस्थितियों में ‘दान’ जैसी पवित्र-विधि का सर्वाधिक-विरूपतावाली-स्थिति बोलियों के कारण हुई है। इनमें पवित्र-अनुष्ठानों के उत्तरदायित्व के लिये योग्य-दातारों के चयन का आधार उनका चरित्र या गुणवैभव न होकर धन बन गया है, जिसकारण से उन पदों की ‘नीलामी’ जैसी प्रक्रिया बना दी गयी है। इसके परिणामस्वरूप नैतिक या अनैतिक, किसी भी प्रकार से अर्जित-धन को भरी भीड़ में लौकिक मानबढ़ाई के लिये देकर किसी भी प्रकार के आचरण व कुल-शीलवाले लोग मंचासीन होकर; (अपने न्यूनतर-लौकिक-वैभव के कारण निर्धन होते हुये भी सदाचार के धनी कुलीन-जनों को मानों तिरस्कृत करते हुये) धर्मानुष्ठानों की शोभा बनते हैं। इसे देखकर कवि जयवल्लभ सूरि की यह गाथा हठात् स्मरण हो आती है, जिसमें आज के युग में धन की प्रधानता पर व्यंग्य करते हुये कहा गया है कि:
‘‘जाई रूवं विज्जा, तिण्णिवि गच्छंतु कंदरे विवरे।
अत्थं चिय परिवड्ढदु, जेण गुणा पायडा होंति।।’’
अर्थात् उच्च-जाति, श्रेष्ठ-रूप और उत्कृष्ट-विद्यावान् होना, ये सभी योग्यतायें तो किसी गुफा या गड्ढे में चली जायें। मात्र धन ही बढ़े, जिसके होने मात्र से (इस कलयुग में) सारे गुण प्रकट हो जाते हैं।
संभवतः इसीकारण से संस्कृत के नीतिकार को लिखना पड़ा कि ‘‘सर्वे गुणा काञ्चनमाश्रयन्ति’’ अर्थात् आजकल तो सभी गुण धन के गुलाम हैं (जिसके पास धन है, उसके पास सब कुछ है), ऐसा माना जाने लगा है।
मेरे कहने का यह ऐकान्तिक-अभिप्राय कदापि नहीं है कि बोलियाँ लेनेवाले सभी लोग सदाचार-विहीन ही होते हैं। मैं स्पष्टरूप से यह मानता हूँ कि कई कुलीन व सदाचारी लोग भी बोलियाँ लगाकर मात्र इसीलिये दान देते हैं कि उस पवित्र-अनुष्ठान में सम्मिलित होने का सुअवसर वे खोना नहीं चाहते हैं। आजकल बोलियों का माध्यम हो जाने से वे भी विवश होकर इस प्रक्रिया के अंग बनते हैं। किन्तु यह भी सत्य है कि इन बोलियों के माध्यम के कारण ही समाज में होनेवाले धर्मानुष्ठानों में पदों का निर्णय गुणों के आधार पर न होकर धन-देने की सामर्थ्य के आधार पर होने लगा है।
तीन लोक के नाथ जिनेन्द्रदेव के पवित्र-अनुष्ठानों में विधियाँ सम्पन्न करने के लिये आवश्यकता जहाँ गुणों को अंगीकार करने की होनी चाहिये, वहाँ उन गुणों की पूरी तरह से उपेक्षा करना असहनीय है। ज्ञातव्य है कि तीर्थंकर-परमात्मा के दीक्षा-कल्याणक के पावन-प्रसंग पर जब देवों एवं मनुष्यों में पहले पालकी उठाने का विवाद-प्रसंग हुआ कहा जाता है, तब निर्णय यही दिया गया था कि ‘‘जो भगवान् के साथ दीक्षा लेकर वैराग्य के पथ पर चलने को तैयार हो, वही पहले पालकी को उठायेगा।’’ तब संयम के सुपात्र-मनुष्यों को ही पहले पालकी उठाने का सुअवसर मिलता है और अपार-सम्पदा के धनी देवगण सर्वप्रथम पालकी उठाने के उस सौभाग्य से वंचित रह जाते हैं।
क्या यह प्रसंग हमें यह नहीं सिखाता कि धर्मानुष्ठानों में संयम, शील व सदाचार आदि गुणों की प्रधानता होती है, न कि धन के बल पर मानकषाय के पोषण के साथ उच्चपदों को खरीदने की। मैंने एक जगह पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव में इन्द्र आदि पदों के लिये पात्रता के रूप में धन के स्थान पर संयम व सदाचार की प्रमुखता पायी। उसमें इन्द्रों के पदों के लिये वर्ष भर के तीनों दसलक्षण पर्व, तीनों अष्टाह्निका पर्व, तीनों सोलहकारण पर्व के साथ-साथ अष्टमी और चतुर्दशी तिथियों में यथायोग्य संयमपूर्वक रहने व धर्मध्यान करने का संकल्प लेने की अनिवार्यता की गयी थी। फिर उनकी जितनी सामर्थ्य थी और जितनी धनराशि उन्होंने स्वेच्छापूर्वक दान भी की, उसे आयोजकों ने सहर्ष बिना किसी भेदभाव के स्वीकार किया गया। इसतरह आर्थिक-मानदण्ड न बनाकर सदाचार को मानदण्ड बनाया गया - यह बात मुझे बहुत अपील की।
इसीप्रकार एक जगह जिनबिम्ब को वेदी में विराजमान कराने के निमित्त यह कहा गया कि ‘‘जो भी श्रीजी का वर्ष भर में कम से कम 300 दिन प्रक्षाल-पूजन शुद्धविधि से करने का संकल्प ले, वह जिनबिम्ब विराजमान करने आगे आये।’’
जिनवाणी को भी विराजमान करने के लिये इसीप्रकार कहा गया कि ‘‘जो सज्जन प्रतिदिन जिनवाणी के स्वाध्याय का नियम लें, उनके ही हाथों से जिनवाणी विराजमान करायी जायेंगी।’’
शुभ-संकल्प लेने वालों की ओर से अन्तःप्रेरणा से सहर्ष दी जानेवाली कम धनराशि को भी अत्यन्त बहुमानपूर्वक स्वीकार किये जाने का उदात्त-व्यवहार मुझे उनके प्रति आदरभाव से भर गया।
आज कहा जाता है कि ‘‘यदि ऐसा ही होने लगे, तो फिर धर्मानुष्ठानों में होने वाले खर्च के लिये धन कहाँ से आयेगा?’’ यह भावनात्मक-भयादोहन (इमोशनल-ब्लैकमेलिंग) के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अभी इस वीतराग-शासन का पुण्य इतना क्षीण नहीं हुआ है कि इस भयादोहन से डरकर हमें ‘नीलामी’ जैसी प्रक्रिया अपनाने को विवश होना पड़े। उतना आलीशान टेंट नहीं लगेगा, तो कुछ कम लग जायेगा। छप्पन-भोग नहीं परोसे जाकर सात्त्विक-शुद्ध भोजन कराया जायेगा। दिखावे कम होंगे, पर धर्मविधि कम नहीं होगी; बल्कि सच्चे धर्मानुरागियों की प्रधानता होने से अधिक समर्पित व शुद्ध-विधि होगी।
लेकिन तब ‘धर्म का धंधा’ करनेवाले धनार्थी कतिपय प्रतिष्ठाचार्यों, विधानाचार्यों, गृहस्थाचार्यों का क्या होगा ? असल में तो धन की प्रधानता का यह खटराग इन्हीं की देन है। ये बोलियाँ लगवाकर पैसा इकट्ठा करवाते हैं, फिर निर्लज्जतापूर्वक उस निर्माल्य-द्रव्य में से अपना मोटा हिस्सा माँगते हैं। ये ही वे लोग हैं, जो समाज के लोगों को यह कहकर हमारे मुनिधर्म को लांछित करते हैं कि ‘‘फलां मुनिराज/आचार्य को निमंत्रित कर लें, उनसे कोई तर्क-वितर्क मत करना। वे जो भी कहें, चुपचाप स्वीकार करते जाना। वे तुम्हें अपने चेलों से इतना पैसा दिलवा देंगे कि तुम्हारा सारे कार्यक्रम का खर्च तो निकल ही आयेगा, तुम्हें आगे के लिये भी मोटा-पैसा बच जायेगा।’’
और साथ ही उन महाराजजी से अपनी सैटिंग की विशेषता बताते हुये निर्लज्जतापूर्वक यह कहने में नहीं चूकते कि ‘‘प्रतिष्ठा या अनुष्ठान में इतनी तो मेरी फीस रहेगी और इतना बोलियों का मेरा कमीशन पूरी कमाई में रहेगा। यदि मंजूर है, तो बात करो; वर्ना मुझे निमंत्रित करनेवाले बहुत हैं।’’
उनकी धृष्टता यही नहीं रुकती है, वे अत्यन्त निर्लज्जतापूर्वक कहते हैं कि ‘‘हम तो धर्म की खरी-कमाई खाते हैं। जो पाप की कमाई खाते होंगे, वे डरें।’’ अर्थात् उनकी भाषा में ‘निर्माल्य-द्रव्य’ का भोग-सेवन करना ‘धर्म की कमाई खाना’ है!!!
ऐसे बेधड़क-पापियों को तो निर्माल्य-सेवन के दोष बताने या धर्मकार्यों का व्यापार न करने की बात समझाने की चेष्टा भी ‘अंधे के आगे रोना’ या ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ - जैसी उक्तियों को चरितार्थ करता है।
स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 72-92
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