चेतावनी | Chetaavani

तर्ज : आत्मन् अपनी वैभव गाथा…

काल अनादि से अरे आत्मन् ! मोह नींद में सोते हो।
इसीलिए इस भव-सागर में, खाते फिरते गोते हो।। 1।।

याद करो तुम वे दिन चेतन, जब निगोद में पड़े हुए।
एक श्वांस के अल्प समय में, बार अठारह जिए-मुए।। 2।।

एक बार के जन्म-मरण में, दुख कितना सोचो चेतन।
इसप्रकार वहाँ काल अनन्ता, दुःख में गँवाया है चेतन।। 3।।

दो हजार सागर साधिक तो, त्रस पर्यायों में आये।
एक वे ते चऊ इन्द्रिय होकर, बहुत दुःख तुमने पाये।। 4।।

पंचेन्द्रिय असंज्ञी हो, आतम हित नहीं कर पाये।
संज्ञी भी हो गये अगर, तो मोह विजय नहीं कर पाये।। 5।।

पाप भाव से मरण हुआ और नरक गति में जन्मे जा।
वहाँ पर दुःख बहुत से पाये, कहें कहाँ तक उनको हा।। 6।।

नरक से निकले भव में घूमे, देव गति में पहुँचे हम ।
भोग-विलासों में रम करके, तृष्णा खूब बढ़ाई हम ।। 7।।

माला मुरझी हुई देखकर, मृत्यु समय को आता देख।
करने लगे विलाप अनेकों भाँति, नाहिं आत्मा को पेख ।। 8 ।।

बड़े पुण्य से ये मनुष्य भव, हमने आज उपाया है।
हाय यहाँ पर भी मिथ्यात्व में फँस, बहु समय गँवाया है ।। 9 ।।

बड़ा भाग्य है आज हमारा, सच्चा धर्म मिला हमको ।
यही धर्म है सर्वश्रेष्ठ अरु यही मेटता भव दुःख को।।10।।

जैन धर्म पा आत्म-धर्म ही, मुक्ति सुख का दाता है।
पर को त्याग लगो निज में, यह कार्य सुख का दाता है ।। 11 ।।

सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, इसको पहले अपनाओ।
देव-शास्त्र-गुरु सप्त तत्त्व की, सत्य प्रतीति हृदय लाओ ।। 12 ।।

जो सर्वज्ञ देव ने गाया, सप्त तत्त्व का रूप अहा।
उनको वैसा ही तुम श्रद्धो, तब होगा कल्याण महा।। 13।।

वीतराग हित उपदेशी प्रभु, यही एक शिक्षा देते।
निज स्वभाव में ही रहकर, प्राणी सच्चा सुख अनुभवते ।। 14 ।।

अब भी अरे ! समय है चेतन, सोने का कुछ काम नहीं।
जिसमें तन्मय बने हुए हो, वह है तेरा धाम नहीं।।15।।

अतः भव्य निज भाव सम्हारो, सब कर्मों का नाश करो।
यह दुर्लभ अवसर मत चूको, सम्यग्दर्शन प्राप्त करो।। 16 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

खोज: Chetavani