आदि जिनेश्वर, वीर जिनेश्वर,
अब तुम्हारा दर्शन पाया।
जब-जब तुमको ध्याता हूँ बस,
आत्म ही शरणा पाता।। टेक।।
संसार-विषय सब, मृगतृष्णा सम ही बस दर्शाता।
सुख नहीं जगत में, फिर भी चेतन छलता ही बस रह जाता।।
सुख प्राप्ति हेतु हे वीर! जिनेश्वर, अब तुम्हारी शरणा आया।।
॥ जब-जब तुमको… ॥ 1 ॥
तुम अविनाशी, चैतन्य-विहारी, करुणा-धारी हो प्रभुवर।
सारे जग के कर्ता न धरता, ज्ञाता-दृष्टा हो जिनवर।।
मुक्ति प्राप्ति हेतु हे आदि! जिनेश्वर, अब वाणी सुनने हूँ आया।।
॥ जब-जब तुमको… ॥ 2 ॥
तीन भुवन का सार यही बस, आत्म ही शरणागत है।
तीन लोक का वैभव फीका, इसकी शरण में स्वामी।।
सुख अरु मुक्ति प्राप्त हेतु हे प्रभु, अब आत्म को ध्याऊँगा।।
॥ जब-जब तुमको… ॥ 3 ॥
रचनाकार: पारस जैन (Paras Jain), जबलपुर