चतुर्थ गुण स्थान | Chaturtha Gunsthan

युक्त्यनुशासन : श्लोक 52 (टीका विश्लेषण)

मूल व्याख्याकार: आचार्य विद्यानन्दि
विषय: चतुर्थ गुणस्थान में कथंचित् संयम, अनेकांत और मन की समता की सिद्धि

## मूल सूत्र (श्लोक 52)

एकांतधर्माभिनिवेशमूला, रागादयोSहंकृतिजा जनानाम्।
एकांतहानाच्च स यत्तदेव, स्वाभाविकत्वाच्च समं मनस्ते।।52।।

## शब्दार्थ एवं पारिभाषिक व्याख्या

  • एकांतधर्माभिनिवेश: एकांत धर्म में दृढ़ आग्रह। वस्तु को सर्वथा नित्य मानना, कथंचित् अनित्य न मानना — ऐसा मिथ्यात्वयुक्त श्रद्धान ‘मिथ्यादर्शन’ है।
  • रागादि दोष: एकांत अभिनिवेश मूलक रागादि से क्रोध, मान, माया, लोभरूप चार कषायों (अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, संज्वलन) तथा नोकषायों का ग्रहण होता है।

## शंका-समाधान: रागादि और मिथ्यादर्शन का संबंध

शंका 1: रागादि (लोभादि दोष) मिथ्यादर्शनमूलक कैसे हो सकते हैं? वे तो असंयत सम्यग्दृष्टि से लेकर सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान (10वें गुणस्थान) तक मिथ्यादर्शन के अभाव में भी देखे जाते हैं?
समाधान:
ऐसा कहना समीचीन नहीं है। अनंत संसार के कारणभूत रागादि मिथ्यादर्शन के अभाव में संभव नहीं हैं।

  • मिथ्यादृष्टियों को मिथ्यादर्शन के सद्भाव में ही ऐसे (अनंत संसारी) रागादि होते हैं, अतः उनकी मिथ्यादर्शनमूलकता सिद्ध है।
  • यद्यपि असंयत सम्यग्दृष्टि आदि उच्च गुणस्थानों में क्रमशः असंयम, प्रमाद और कषाय परिणामजन्य लोभादि होते हैं, तथापि मिथ्यादृष्टि में वे लोभादि मिथ्यादर्शन के कारण ही होते हैं।

## अहंकार, ममकार और मोहराज का परिवार

शंका 2: यदि रागादि मिथ्यादर्शनमूलक हैं, तो उदासीन (शांत) अवस्था में भी मिथ्यादृष्टि एकांतवादियों को रागादि उत्पन्न होने चाहिए?
समाधान:
नहीं, क्योंकि वे ‘अहंकृतिजा’ (अहंकार से उत्पन्न) कहे गए हैं।

  • अहंकार: ‘मैं इसका स्वामी हूँ’ — ऐसी आत्म-परिणाम की सामर्थ्य।
  • ममकार: ‘ये मेरे भोग्य हैं’ — ऐसा आत्म-परिणाम।

विशेष नोट: “ममकार और अहंकार — ये दो मोहनीय राजा के मंत्री (सचिव) हैं, जो सदा समस्त रागादि परिवार का पोषण करने में तत्पर रहते हैं।”

अतः मिथ्यादर्शनरूप परिणाम जब ममकार-अहंकार के साथ मिलता है, तब ही वह रागादि को उत्पन्न करता है, उदासीन दशा में नहीं।
शंका 3: मोही जीवों के रागादि अहंकार से उत्पन्न होते हैं, यह ठीक है। परंतु वीतमोही (या सम्यग्दृष्टि) जीवों को अहंकार (अस्तित्वबोध/भूमिकाजन्य विकल्प) होने पर भी रागादि क्यों नहीं होते?
समाधान:
मिथ्यादर्शन से सहित होने पर ही अहंकार में रागादि उत्पन्न करने की सामर्थ्य होती है, उससे रहित होने पर नहीं। जैसे — तुष (भूसी) से रहित किए गए कोयले की अग्नि में किसी को (पुनः अनाज रूप में) उपजाने या जलाने की वैसी सामर्थ्य नहीं होती।

## सम्यग्दर्शन और मन की स्वाभाविक समता

शंका 4: एकांत-अभिनिवेश ही मिथ्यादर्शन है, यह कैसे निश्चित होता है?
समाधान:
चूंकि वस्तु का अनेकांतात्मक स्वरूप ही प्रमाण से सिद्ध है। सम्यग्दृष्टि को एकांत का अभाव होने से और अनेकांत का निश्चय होने से, तज्जनित ‘एकांत-अभिनिवेश’ नहीं होता।

  • स्वाभाविकत्व: आत्मा का यथार्थ दर्शन ही सम्यग्दर्शन का सद्भाव है और यही आत्मा का स्वाभाविक रूप है।
  • मन की समता: आत्मा का स्वाभाविकपना होने से समतास्वरूप मन की भी सिद्धि होती है। हे अर्हत् प्रभु! आपके ‘युक्त्यनुशासन’ में सम्यग्दृष्टि का समतास्वरूप मन इसी न्याय से सिद्ध होता है।

गुणों की स्वाभाविकता का वर्गीकरण (तुलनात्मक तालिका)

आत्मिक गुण आत्मिक अवस्था / स्वरूप स्वभाव का प्रकार
सम्यग्दर्शन औपशमिक, क्षायोपशमिक या क्षायिक कर्मोपशम/क्षय जन्य होने पर भी आत्मस्वरूप होने से स्वाभाविक है।
सम्यग्ज्ञान क्षायोपशमिक या क्षायिक आत्मस्वरूप होने से स्वाभाविक है।
सम्यक्चारित्र औपशमिक, क्षायोपशमिक या क्षायिक सम्यग्दर्शन के समान ही स्वाभाविक है।

:warning: महत्वपूर्ण तथ्य: यहाँ इन गुणों को ‘पारिणामिकभाव’ रूप स्वाभाविक नहीं समझना चाहिए, क्योंकि पारिणामिक भाव कर्मों की अपेक्षा से सर्वथा निरपेक्ष (मुक्त) होता है।

## गुणस्थानों में संयम और असंयम की व्यवस्था (कथंचित् संयम)

शंका 5: असंयत सम्यग्दृष्टि (चतुर्थ गुणस्थान) को तो मन में असंयमरूप राग-द्वेष रहता है, तो वहाँ मन की समता कैसे संभव है?
समाधान:
चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीव को किसी एकांत धर्म में राग या द्वेष न होने से विवक्षित एकांतों में उदासीनता होती है। जितने अंश में उसके राग का अभाव है, उतने मात्र मन के समत्व (समता) का सद्भाव वहाँ माना जाता है।
शंका 6: इस प्रकार तो चतुर्थ गुणस्थानवर्ती (अविरत) को भी ‘संयत’ (मुनि जैसा) मानने का प्रसंग आ जाएगा, क्योंकि मन की समता ही संयम है?
समाधान:
“चतुर्थ गुणस्थान में भी कथंचित् संयम होता है…”
अविरत सम्यग्दृष्टि को सर्वथा संयम का अभाव नहीं होता। उसे अनन्तानुबन्धी कषायात्मक असंयम का अभाव होने से (उतने अंश में) संयतपने की सिद्धि होती है।

गुणस्थान अनुसार संयम-असंयम का विभाजन

  1. चतुर्थ गुणस्थान (असंयत सम्यग्दृष्टि):
  • संयम अंश: अनन्तानुबन्धी कषाय जनित असंयम का अभाव।
  • असंयम अंश: शेष 12 प्रकार के मोह (अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन आदि) का सद्भाव होने से इसे ‘असंयत’ कहा जाता है।
  1. पंचम गुणस्थान (संयतासंयत / देशव्रती):
  • संयम अंश: अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यान कषाय का अभाव।
  • असंयम अंश: प्रत्याख्यान और संज्वलन कषाय का सद्भाव। अतः यह ‘संयतासंयत’ है।
    शंका 7: यदि ऐसा है, तो छठे (प्रमत्तसंयत) से लेकर दसवें (सूक्ष्मसाम्पराय) गुणस्थान तक भी ‘संयतासंयत’ ही माना जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ भी संज्वलन कषाय और नोकषाय का सद्भाव है?
    समाधान:
    नहीं, ऐसा नहीं है (कषायप्राभृत शास्त्र के अनुसार):
  • छठे आदि गुणस्थानों में संज्वलन कषाय की ‘असंयमरूप’ से विवक्षा नहीं है।
  • वहाँ कषाय ‘पानी की रेखा’ के समान अत्यंत मंद होती है।
  • वह कषाय 12 प्रकार के मोह के अभावरूप संयम की विरोधी नहीं है, बल्कि परम संयम (यथाख्यात चारित्र) की प्राप्ति के अनुकूल है।

## निष्कर्ष (अनेकांत शासन की जय)

जैसे चतुर्थ गुणस्थानवर्ती को अपनी अवस्था के अनुरूप मनःसाम्य (समता) सिद्ध होती है, वैसे ही पंचम गुणस्थानवर्ती को नौ प्रकार से (देशव्रत रूप) सिद्धि होती है।

सिद्धांत सूत्र:
“जितना-जितना रागादि का निमित्त नहीं होता है, उतना-उतना मन के समत्व का निमित्त होता है।”

यही अनेकांतरूप युक्ति का वास्तविक अनुशासन है।