‘चतुर्थ गुणस्थान में आत्मानुभव होता है,’ कृपया इस कथन के आचार्यों द्वारा प्रदत्त आगम-प्रमाण प्रस्तुत करें।
खोज: Chaturth Gunasthan Mein Atmanubhav
‘चतुर्थ गुणस्थान में आत्मानुभव होता है,’ कृपया इस कथन के आचार्यों द्वारा प्रदत्त आगम-प्रमाण प्रस्तुत करें।
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पंचाध्यायी में जो आया है वह इस प्रकार है :
इस प्रकार आया है, मुझे अधिक जानकारी नहीं है, विद्वतजन इसका खुलासा करें | ये सब सारांश बिंदु हैं जिनका प्रमाण नीचे है -
The above reference might be helpful. The PDF of प्रवचनसार (along with तात्पर्यवृत्ति) can be found here (133mb).
Pandit Todarmal ji has also addressed this issue:
तथा द्रव्यानुयोगमें भी चरणानुयोगवत् ग्रहण-त्याग कराने का प्रयोजन है; इसलिये छद्मस्थ के बुद्धिगोचर परिणामों की अपेक्षा ही वहाँ कथन करते हैं। इतना विशेष है कि चरणानुयोग में तो बाह्यक्रिया की मुख्यता से वर्णन करते हैं, द्रव्यानुयोग में आत्मपरिणामों की मुख्यतासे निरूपण करते हैं; परन्तु करणानुयोगवत् सूक्ष्म वर्णन नहीं करते। उसके उदाहरण देते हैंः — उपयोग के शुभ, अशुभ, शुद्ध – ऐसे तीन भेद कहे हैं; वहाँ धर्मानुरागरूप परिणाम वह शुभोपयोग, पापानुरागरूप व द्वेषरूप परिणाम वह अशुभोपयोग और राग-द्वेष रहित परिणाम वह शुद्धोपयोग – ऐसा कहा है; सो इस छद्मस्थ के बुद्धिगोचर परिणामों की अपेक्षा यह कथन है; करणानुयोगमें कषायशक्ति की अपेक्षा गुणस्थानादि में संक्लेशविशुद्ध परिणामोंकी अपेक्षा निरूपण किया है वह विवक्षा यहाँ नहीं है।
- मोक्षमार्ग प्रकाशक, आठवाँ अधिकार, पृ. 285.
https://drive.google.com/file/d/1Rm2XdRmhRQecpRTCLtB-QvqJ5q7k9xKj/view?usp=drivesdk
इस पुस्तक इस विषय कई आधार बनाकर चर्चा की हुई है।एवम शुध्दोपयोग संबंधित अन्य भी चर्चा की हुई है।
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अर्थात चतुर्थ गुणस्थान में आत्मानुभव नहीं है?
आत्मानुभव है, उसका कोई निषेध नहीं है। उपर्युक्त प्रमाण में आचार्य जयसेन का स्पष्ट कथन है - शुद्धोपयोग के बिना दर्शनमोह का क्षय संभव नहीं है।
उपर्युक्त प्रमाण में आचार्य जयसेन का स्पष्ट कथन है - शुद्धोपयोग के बिना दर्शनमोह का क्षय संभव नहीं है।