चातुर्मास स्थापना का महत्त्व | Chaturmas Sthapana Ka Mahattv

चातुर्मास स्थापना का महत्त्व

-प्रो. वीरसागर जैन

चारित्रचक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागरजी महाराज कहा करते थे कि जबतक साधु और श्रावक दोनों मिलते रहेंगे, तबतक जिनधर्म की प्रभावना का रथ निर्बाधरूप से चलता रहेगा, उसमें किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आयेगी, अपितु उससे (साधु और श्रावक के मिलन से) जैनधर्म की और अधिक अभिवृद्धि होती रहेगी । वे बार-बार गाते रहते थे- साधुसंघोऽस्तु मंगलम्, श्रावकसंघोऽस्तु मंगलम् ।

सच है, धर्म की प्रभावना के लिए साधु और श्रावक दोनों का मिलन बहुत आवश्यक होता है, क्योंकि प्रभावना के कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें साधु ही कर पाते हैं, श्रावक नहीं और कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें श्रावक ही कर पाते हैं, साधु नहीं ।

परन्तु बड़ी समस्या तो यह है कि साधु और श्रावक- इन दोनों का एक साथ मिलन हो तो कैसे हो ? यह तो बड़ा ही दुष्कर कार्य है । साधु तो पूर्णनिवृत्ति की भावना वाले और सतत विहारी होते हैं, कभी भी ३-४ दिन से अधिक एक स्थान पर रुकते ही नहीं हैं । जबकि श्रावक नाना प्रवृत्तियों में फँसा हुआ रात-दिन अपने घर-व्यापार आदि में ही उलझा रहता है, उसे साधुओं के समागम का समय ही नहीं मिलता।

लेकिन यह चातुर्मास या वर्षायोग की ही विशेष देन है कि इस समय साधु और श्रावक दोनों का चार महीने के लिए एक साथ मिलन हो जाता है । साधु तो इसलिए एक स्थान पर रुक जाते हैं कि इस समय विहार करने में जीवहिंसा बहुत होती है । और श्रावक इसलिए इनके पास आ जाते हैं कि अब वर्षा के कारण व्यापार-धन्धे, शादी-विवाह आदि के बहुत सारे काम स्वतः ही कम हो जाते हैं।

इस प्रकार चातुर्मास के अवसर पर साधु और श्रावक दोनों का चार मास के लिए ही सही, पर एक स्थाई-सा मिलन हो जाता है और इसीलिए इस अवसर पर धर्म की महती प्रभावना होती है, इतिहास में पहले भी हुई है व आगे भी होगी और यही इस चातुर्मास स्थापना का बड़ा भारी महत्त्व है।

आज का समय विज्ञान का समय है और जैन दर्शन भी एकदम वैज्ञानिक दर्शन है, उसका समस्त आचार और विचार आधुनिक विज्ञान के द्वारा बार-बार पुष्ट हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि आज हम अपनी ऊर्जा को फालतू के या हल्के-फुल्के कार्यक्रम करके नष्ट न करें, अपितु जैनदर्शन के ठोस प्रचार-प्रसार हेतु श्रेष्ठ व्याख्यानों, शिविरों और कार्यशालाओं का आयोजन करें, ताकि हमारी नई पीढ़ी जैनदर्शन को भलीभाँति समझकर स्वीकार कर सके।

आज लोगों में साम्प्रदायिक कट्टरता भी कम हुई है और लोग दूसरे धर्म-दर्शनों को भी सद्भाव के साथ पढ़ना-समझना चाह रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि हम जैनदर्शन के अहिंसा, अनेकान्त, स्याद्वाद, अपरिग्रह, आत्मा, परमात्मा, कर्म, लोक आदि विषयों को भलीभाँति प्रतिपादित करें तो जैनेतर बन्धु भी जैनदर्शन से परिचित एवं प्रभावित हो सकते हैं, और यही जैनदर्शन की सच्ची प्रभावना है।

चातुर्मास के अवसर पर ‘प्राकृतभाषा’ के अध्ययन-अध्यापन की भी कोई सुन्दर योजना चलाई जा सकती है, चलानी ही चाहिए । इससे जैनसंस्कृति का संरक्षण-संवर्धन होगा ।

ध्यान रखने की बात यह है कि हमारे सभी कार्यक्रम अनुशासित और स्तरीय होने चाहिए। हल्के कार्यक्रमों से धर्म-समाज को यश की बजाय अपयश मिलता है।

आशा है, सभी लोग इन महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर ध्यान देंगे।