चारों कषायों से भिन्न अप्रभावी आत्मा | Charon kashayon se bhinn aprabhavi atma

चारों कषायों से भिन्न अप्रभावी आत्मा,
चारों कषायों से भिन्न अप्रभावी आत्मा,
हूँ मैं ज्ञायक आत्मा

क्रोध हो पर क्रोधी नहीं, मैं क्षमा धर्मी आत्मा,
मान हो पर मानी नहीं, मैं मार्दव धर्मी आत्मा,
यह जो द्वेष की अगन, यह जो द्वेष की अगन,
न जलावे आत्मा, न कसावे आत्मा ।।१।।

माया हो पर मायी नहीं, मैं आर्जव धर्मी आत्मा,
लोभ हो पर लोभी नहीं, मैं शौच धर्मी आत्मा,
यह जो राग की छलन, यह जो राग की छलन,
न लुभावे आत्मा, न कसावे आत्मा ।।२।।

हो हास्य पर हँसता नहीं, मैं परमानंदी आत्मा,
रति हो पर रत नहीं, मैं सहजानंदी आत्मा,
यह जो हास्य का दहन, यह जो रति का रुदन,
न रिझावे आत्मा, न कसावे आत्मा ।।३।।

शोक पर शोकित नहीं, मैं नित्यानंदी आत्मा,
अरति पर अरत नहीं, मैं ज्ञानानंदी आत्मा,
यह जो शोक का रौरव, यह जो अरति का आस्रव,
न खिजावे आत्मा, न कसावे आत्मा ।।४।।

भय हो पर भीत नहीं, निर्भय वर्ते यह आत्मा,
जुगुप्सा होते भी रहता, निर्विचित्सक आत्मा,
यह जो भय का आतंक, यह घृणा का प्रपंच,
न तड़पावे आत्मा, न कसावे आत्मा ।।५।।

वेद हो पर वेदी नहीं, मैं स्वसंवेदी आत्मा,
भोगों में आसक्त नहीं, अभोक्ता मैं आत्मा,
अब्रह्म का यह जाल, निर्दयी काम बाण,
न फँसावे आत्मा, न कसावे आत्मा ।।६।।

कषायें हैं स्वभाव नहीं, मेरा स्वभाव बस जानना,
पर्याय में होती भले हों, अपने से भिन्न मानना,
जिनवाणी की यह बात, निर्ग्रंथता का मार्ग,
अपनावे आत्मा, हो जाये परमात्मा ।।७।।

“परमात्मा हूँ नक्की कर”, “परमात्मा हूँ निर्णय कर”,
“आत्मा हूँ कर आनंद”, “परमात्मा हूँ अनुभव कर”,
जिनगुरुओं की यह बात, हृदय में उसे उतार,
पा जाऊँगा ध्रुवधाम, जपते ‘शुद्धातम’ नाम
पा जाऊँगा ध्रुवधाम, जपते ‘शुद्धातम’ नाम ।।८।।

चारों कषायों से भिन्न अप्रभावी आत्मा,
हूँ मैं ज्ञायक आत्मा
हूँ मैं ज्ञायक आत्मा

सोहम शाह, अहमदाबाद

आ. बा. ब्र. पं. श्री सुमतप्रकाश जी द्वारा रचित “आठों कर्मों के बीच सुरक्षित आत्मा” भजन से प्रेरणा लेकर, उनके द्वारा अपने अनेक प्रवचन, लेखनी, कथा, चर्चा में जो हमेशा प्रमुख रहता है ऐसा “अप्रभावी ध्रुव आत्मा” की अद्भुत बात को अपने कुछ शब्दों में भजन के रूप में लिखने का प्रयास किया है; जिससे हमें सभी परिस्थिति में परिस्थितियों से पार व्यस्थित वस्तु व्यवस्था को मात्र जानने वाला अप्रभावी ज्ञायक आत्मा का नित्य स्मरण हो, ऐसी मंगल भावना है।

रचनाकार: सोहम शाह (Soham Shah), अहमदाबाद
Instagram: @soham.tsx