स्थापना (ज्ञानोदय)
जय-जय श्री अरिहंत जिनेश्वर, हरे घातिया चारों जो ।
हे! छ्यालीस मूलगुणधारी, हमको जरा निहारो तो॥
रत्नत्रय दे समवसरण में, थोड़ी जगह हमें दे दो।
अपने जैसा हमें बनाने, अपनी शरण हमें ले लो॥
दोहा
व्रत चारित्र शुद्धि करें, अरिहंतों को पूज।
श्रद्धा गृह में आ वसो, गूँजें नमोऽस्तु गूंज॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिन् ! अत्र अवतर-अवतर…। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः…।
अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट्… । (पुष्पांजलिं…)
जोगीरासा
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, जनम-मरण दुख पीते।
रत्नत्रय के अमृत जल से, शुद्धातम को सींचें॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को प्रासुक जल ले, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, भव ज्वाला सुलगाते ।
रत्नत्रय का चंदन लेकर, चिदानन्द महकाते॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को चंदन लेकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यः संसारताप-विनाशनाय चंदनं…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, दर-दर दुख से घूमें।
रत्नत्रय के अक्षत लेकर, सिद्ध शहर में झूमें॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को पुंज चढ़ाकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान्… ।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, होते रागी कामी।
रत्नत्रय से निज रमणी के, हों दूल्हे आगामी ॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को पुष्प चढ़ाकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यः कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पाणि…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, जड़ रस भोजन चाहें।
रत्नत्रय की बना रसोई, निज रस चेतन चाखें॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को नेवज लेकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यः क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, पाते घोर अँधेरे ।
रत्नत्रय के दीप जलाकर, करते ज्ञान सबेरे॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को दीप जलाकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, सहें कर्म की जेलें।
रत्नत्रय के न्याय धरम से, मुक्ति बाग में खेलें ॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को धूप चढ़ाकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, बीज पाप के बोते।
रत्नत्रय की खेती करके, मोक्ष महल में होते॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को फल अर्पित कर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं…।
बिन चारित्र शुद्धि के प्राणी, अपने से अनजाने।
रत्नत्रय के रत्न अर्घ्य से, पाते आत्म खजाने॥
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, शुद्धि हेतु पथ खोजें।
अरिहंतों को अर्घ्य चढ़ाकर, करके नमोऽस्तु पूजें॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्यं…।
जाप्य मंत्र-ॐ ह्रीं अर्ह अ सि आ उ सा चारित्रशुद्धि व्रतेभ्यो नमः ।
जयमाला
दोहा
कर चारित्रशुद्धि मिले, महा मोक्ष सुख धाम ।
जयमाला गाकर करें, नमोऽस्तु नम्र प्रणाम॥
चौपाई
जय-जय श्री अरिहंत जिनन्दा, भक्तों के हो परमानन्दा।
समवसरण के ईश निराले, हो छ्यालीस मूलगुण वाले॥१॥
धर्मचक्र के जिनवर स्वामी, सिद्ध चिदातम हो आगामी ।
दोष अठारह के जय कर्त्ता, मोक्षमार्ग तत्त्वों के नेता॥२॥
रत्नत्रय के पालक दाता, शुद्ध ब्रह्म वैदेही ज्ञाता।
आप रहे चारित्र खजाने, सो कमलासन आसन थामे॥३॥
परिग्रह के हो आप विजेता, सो सिंहासन चरणों लेटा।
मुक्तिवधू भी राह निहारे, नत नयना हो चरण पखारे॥४॥
अतः शरण में हम भी आए, रत्नत्रय पर हम ललचाए।
तेरह विध चारित्र धरें हम, पाँच महाव्रत को पालें हम॥५॥
पाँच समितियाँ तीन गुप्तियाँ, इस बिन किसकी हुईं मुक्तियाँ।
बारह सौ चौंतीस व्रतों की, करें शुद्धि चारित्र पदों की॥६॥
मिले स्वरूपाचरण चरित्रा, करें चेतना शुद्ध पवित्रा।
हे ! चारित्र शिरोमणि ज्ञानी, सुनो ! हमारी करुण कहानी॥७॥
सदाचार की शिक्षा दे दो, रत्नत्रय की दीक्षा दे दो।
अंत समाधिमरण कराना, ‘सुव्रत’ के व्रत शुद्ध बनाना॥८॥
दोहा
जो चारित्र शुद्धि करे, पाए पद अरिहंत।
बने सिद्ध सो कर रहे, नमोऽस्तु ‘सुव्रत’ संत॥
ॐ ह्रीं द्वादश-शताधिक चतुःत्रिंशत् (१२३४) रूप चारित्रशुद्धि शिरोमणि
श्री अरिहंत परमेष्ठिभ्यो अनर्घपद-प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्य… ।
दोहा
करें पूज्य अरिहंत जी, विश्वशान्ति कल्याण।
प्रासुक जल की धार दे, हम पूजत भगवान्॥
(शान्तये शान्तिधारा)
कल्पवृक्ष के पुष्प सम, पुष्पांजलि पद लाए।
भव दुःखों को मेंट दो, अरिहंता जिनराय॥
(पुष्पांजलिं…)
Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)