तत्त्वचर्चा 16 (9 फरवरी 1999)
तत्त्वचर्चा : क्रमांक 16
(9 फरवरी 1999)
इस चर्चा में उपयोग का स्वरूप, आत्मा और राग का कर्तृत्व, अनुभूति के पूर्व की चिंतन धारा, उपयोग लक्षण आदि विषयों का मार्मिक स्पष्टीकरण किया गया है।
उपयोग में उपयोग है
मुमुक्षु :- बाबूजी कल के प्रश्न में जो उपयोग में उपयोग की बात थी, उसमें उपयोग में भगवान आत्मा है। जब विभावभाव चलते हैं, उसी समय आत्मा उसमें व्यापक कैसे है ?
पूज्य बाबूजी :- विभाव भाव चलते हैं उस समय तो ये मानता ही नहीं है और जानता ही नहीं कि - उपयोग में उपयोग है। ये तो उपयोग में क्रोध है - ऐसा जानता है। उपयोग में उपयोग है - ये भी ज्ञानदशा की ही बात है। ये ज्ञानदशा उत्पन्न होने की विधि है और वो इसको नहीं मानता हुआ अनादि से ही ऐसा मान रहा है कि उपयोग में क्रोध है और क्रोध में उपयोग है अर्थात् दोनों का मिश्रण करता है। सचमुच तो क्रोध जो है वो उपयोग में प्रतिभासमान होता है। प्रतिभासमान होता है माने क्रोध का स्वरूप उपयोग में जानने में आता है। उपयोग में क्रोध नहीं आता है। जब क्रोध उपयोग में नहीं आता तो क्रोध और उपयोग ये दो वस्तु हुईं। अब एक वस्तु की दूसरी वस्तु नहीं होती। इसलिए ज्ञान और क्रोध…क्रोध माने संपूर्ण विभाव; वो दोनों न्यारे-न्यारे हैं, अलग-अलग भाव हैं।
दो भाव न्यारे-न्यारे हैं तो दोनों का सब कुछ न्यारा है। जैसे घर न्यारे-न्यारे तो दरवाजे भी न्यारे-न्यारे। तो उपयोग का दरवाजा अन्य है और क्रोध का दरवाजा उससे विपरीत, अन्य है। इसलिए एक घर में दूसरे घर का सदस्य नहीं आता। क्रोध अचेतन और जड़ है और जो ज्ञान है, उपयोग है वो ज्ञानस्वरूप है, जाननस्वरूप है, जाननभावरूप है। वो जानता है कि मैं ज्ञायक हूँ, चिन्मात्र हूँ - ये उसका जानना वास्तविक है।
ये बात विभाव भाव के समय की नहीं है। विभाव भाव माने अज्ञानदशा और अज्ञानदशा टलकर जब ज्ञानदशा होती है तो उस समय भी विभाव भाव होते हैं - ऐसा कहा जाता है। मुझे विभाव भाव होते हैं - वो ऐसा नहीं मानता। जिसको अनुभूति हुई वो ये नहीं मानता है कि मुझे विभाव भाव होते हैं। कहता अवश्य है तो उसका नाम व्यवहारनय है। लेकिन विभाव भाव होते हैं तो उस समय वो उपयोग से उन विभावों को अलग जानता है, भिन्न जानता है। इसलिए बात तो वही रही न कि उपयोग उपयोग में रहा और क्रोध क्रोध में रहा।
ज्ञानी की जो ज्ञानदशा होती है और विभाव भाव होते हैं, ये उस समय की चर्चा है और इससे पहले जो अज्ञानदशा की चर्चा है उसमें तो वो इस बात को जानता ही नहीं है कि उपयोग जो है वो उपयोग में है। आत्मा ज्ञानक्रिया में है, जाननभाव में रहता है, जानन-क्रिया में रहता है, वो ऐसा जानता ही नहीं है, क्योंकि वो ऐसा जानता है कि क्रोध और उपयोग दोनों एक हैं। क्रोध मेरे जानने में आता है, इस प्रकार क्रोध के अस्तित्व को वो ज्ञान में मानकर और पागल हो जाता है, अज्ञानी बन जाता है।
मुमुक्षु :- बाबूजी! उसी समय जानन-क्रिया तो है कि नहीं ?
पूज्य बाबूजी :- जानन-क्रिया मिथ्या है। वो मिथ्याज्ञान है।
मुमुक्षु :- क्रोध जानने में आता है या नहीं ?
पूज्य बाबूजी :- क्रोध जानने में आता है ये व्यवहारनय का कथन है। निश्चयनय का कथन यह है कि क्रोध का जो स्वरूप है वो ज्ञान में ज्ञानरूप जानने में आता है, वो भी ज्ञान बनकर। वो क्रोध का स्वरूप ज्ञान बनकर ज्ञान में आया है। क्रोध मेरे जानने में आता है ये जो वचन है, इसमें संपूर्णरूप से ज्ञान ही बोल रहा है और वो सारी परिणति ज्ञान ही है। क्रोध की प्रतिभासरूप सारी परिणति ज्ञान ही है।
दोनों दशाओं की बात अलग-अलग है। पहली दशा में तो ये स्वीकार ही नहीं किया इसलिए संवर अधिकार में इसका प्रारंभ किया। संवर अधिकार माने सम्यग्दर्शन। सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति से ही संवर का प्रारंभ होता है।
वो कैसे होता है ? कि जब ये ज्ञान और क्रोध को बिल्कुल न्यारा-न्यारा जाने - दोनों का आधार, दोनों के रहने का स्थान, दोनों के दरवाजे, दोनों के घर बिल्कुल न्यारे-न्यारे जाने तो इसका ज्ञान स्वच्छ हुआ, निर्मल हुआ। और तब ये क्रोध से हटकर, अनासक्त होकर, ममत्व और अहम् को तोड़कर ज्ञान में अहं कर लेता है। तब फिर विभाव मेरे हैं - ये बात कहने मात्र ही रह जाती है, क्योंकि मेरा तो चैतन्य है, क्रोध मेरा नहीं है, राग-द्वेष-मोह मेरे नहीं हैं। ज्ञान मेरा है, चैतन्य मेरा है, उसका स्वर सदा ही ऐसा होता है ।
मुमुक्षु :- तो विभाव दशा में ज्ञान इसी प्रकार परिणमित हुआ है।
पूज्य बाबूजी :- विभाव के समय भी ज्ञान तो परिणमित इसी प्रकार हुआ है लेकिन उसने न्यारा-न्यारा जान लिया है - ये है उसमें मुख्य बात ! ज्ञान पहले भी परिणमित तो ऐसे ही होता था। पहले भी क्रोध ज्ञान में आता नहीं था और ज्ञानदशा में भी क्रोध ज्ञान में नहीं आता है। लेकिन पहले ये आता था ऐसा मानकर तद्रूप होकर अज्ञानी होता था। क्रोध के साथ ये तद्रूप होकर परिणमन करता था, इसका नाम कर्ता-कर्म हुआ। मैं क्रोधी और क्रोध मेरा कर्म, तब वो मैं ज्ञानस्वरूप चैतन्य और ज्ञान मेरा कार्य - ऐसा नहीं बोलता था। मैं क्रोधी और क्रोध मेरा कर्म, मेरा कार्य - ये उसका वचन था। वचन था माने उसकी ऐसी अनुभूति थी। ये अनुभूति मिथ्या थी, मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान-मिथ्याचारित्ररूप अध्यवसान था।
राग दशा होने पर भी आचार्य ने तो इतनी ऊँचाई से कहा है कि ज्ञानी को आस्रव होता ही नहीं है। ज्ञानी को राग-द्वेष-मोह हैं ही नहीं, होते ही नहीं हैं, तो वो किसको हैं? कि आत्मा को तो हैं नहीं और विषयों में भी राग-द्वेष नहीं हैं। ये विषयों में भी नहीं हैं तो फिर किसके हैं? कि किसी के नहीं है अज्ञानी के हैं, अज्ञानी की कल्पना के हैं। शुद्धात्मा में भी राग-द्वेष-मोह नहीं है और विषयों में भी राग-द्वेष-मोह नहीं है। तो फिर राग-द्वेष-मोह हैं तो सही न! तो वो किसके हैं? तो कहते हैं कि वो अज्ञानी की कल्पना के हैं क्योंकि आत्मा में तो उनका रंचमात्र भी निवास नहीं है। वो तो एकदम शुद्धातिशुद्ध है।
मुमुक्षु :- तो वो जानन-क्रिया भी उसी समय मिथ्या है,जब वो स्वीकरता नहीं है?
पूज्य बाबूजी :- जानन-क्रिया ही मिथ्या होती है, गुण और द्रव्य, मिथ्या नहीं होते। इसलिए जानन-क्रिया मिथ्यात्व को समाप्त करके सम्यक्त्वरूप हो जाती है क्योंकि परिणमन है न! जिसमें परिणमन होगा वही विभावरूप हो सकेगा। होगा ही, ऐसा नियम नहीं है। विभावरूप हो सकेगा क्योंकि चार अचेतन पदार्थों में विभाव नहीं है और विभाव क्रिया भी नहीं है। सभी अचेतन पदार्थों में स्वभाव क्रिया ही है । लेकिन जीव और पुद्गल में केवल इतनी गुंजाइश है कि वे विभावरूप हो जाते हैं। उनकी पर्याय विभावरूप हो जाती है। परिणमन तो दोनों में ही है। इसमें भी है और उनमें भी है। लेकिन ये जो विभाव है, ये केवल जीव और पुद्गल में होता है। पुद्गल तो जानता नहीं है कि विभाव क्या चीज है। इसलिए उसको तो सुख और दुख नहीं है। लेकिन आत्मा जानता हुआ इस विभावरूप परिणमन करता है, क्रोधादिरूप परिणमन करता है। वो क्रोधादिरूप है नहीं, लेकिन क्रोधादि को आत्मा से तद्रूप मानता हुआ परिणमन करता है, इसका नाम कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति है। उसको कहते हैं कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति!
कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति अर्थात् करनेवाला और कार्य - ऐसा नहीं है। करने वाला कार्य तो सामान्य है। एक इंद्रिय से लगाकर केवलज्ञान तक जो षट्कारक हैं, वो तो सबमें हैं। वहाँ तो जो परिणाम है उसका कर्ता द्रव्य ही कहा जाता है। तो वो धर्म की अपेक्षा से कृत्रिम कर्म हुआ, वो बात अलग है। यहाँ जो कर्ता-कर्म अधिकार है इसमें तो यह अज्ञानी बनता हुआ, अज्ञानी होता हुआ क्रोधादि के साथ और पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश आदि के साथ अपनी कल्पना में तद्रूप परिणमन करता है। परिणमन हो जाता है - ऐसा नहीं है अर्थात् वे पदार्थ चैतन्य रूप हो जाते हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। लेकिन ये अपनी कल्पना में तद्रूपता करता है। इसलिए कल्पना को उड़ाता है तो तद्रूपता उड़ जाती है।
मुमुक्षु :- लेकिन है वो वास्तविक स्थिति ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ! वास्तविक स्थिति यह है कि क्रोधादि और अन्य जो अचेतन पदार्थ हैं, पुद्गल धर्म आदि ये ज्ञान में आते ही नहीं हैं। सदा से ही न्यारे-न्यारे हैं इसलिए इनको न्यारा-न्यारा देखकर ये न्यारे हैं और मेरे किसी प्रयोजन के नहीं हैं - ऐसा जानकर आत्मस्थ होना चाहिए, फिर तो बस वही बचता है। पहले तीन लोक और तीन काल के सारे अचेतन पदार्थ गये और अपने से भिन्न सभी जीव पदार्थ भी गये। अब बचा तो कौन बचा ? कि ये जो पर्याय है, ये तो स्वयं अज्ञानरूप परिणमन कर रही है। तो अज्ञान से जब ज्ञानदशा को प्राप्त होगा, तो वो ज्ञान किसका अवलंबन लेगा ? कौन बचा ? तो स्व का ही अवलंबन लेगा क्योंकि स्व का अवलंबन ही स्वाधीनता और परम और चरम मुक्ति है। मुक्ति में पराधीनता को लेश मात्र भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसलिए वही मुक्ति है।
अच्छा है प्रश्न ! प्रश्न ऐसे ही करने चाहिए !
मुमुक्षु :- वो क्या है बाबूजी ! एक बार ज्ञान में पूरा स्पष्ट नहीं होगा कि ये ही मानते हैं कि मैं ऐसा हुआ ही नहीं हूँ, मैं तो वैसा ही हूँ। लेकिन वास्तव में जीव की ऐसी परिणति हुई है। उसकी जो जानन-क्रिया है वो मिथ्या हुई है।
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! निश्चित मिथ्या हुई है, श्रद्धा में मिथ्यादर्शन हुआ, ज्ञान में मिथ्यात्व हुआ और चारित्र में मिथ्यात्व हुआ। मिथ्यात्व हुआ माने मिथ्या हुए। मिथ्यात्व केवल मिथ्यादर्शन को भी कहते हैं लेकिन तीनों ही मिथ्या हुए हैं। अपने परिणाम में, परिणति में, पर्याय में - श्रद्धा भी मिथ्या, ज्ञान भी मिथ्या और चारित्र भी मिथ्या। ये एक दूसरे के कारण से नहीं बल्कि स्वयं अपने ही उपादान से मिथ्या हुए और अपने ही उपादान से सम्यक् होते हैं, एक दूसरे के कारण से नहीं। निमित्त-नैमित्तिक भाव भले ही बनता जाता हो! वो अपने आप बनता जाता है, वो कोई बनाया नहीं जाता। लेकिन ये निश्चितरूप में मिथ्या हुए हैं।
इसलिए जिस समय ये मानता है कि मैं क्रोधी हूँ और क्रोध मेरा कर्म है, तो उस समय आचार्य इसको क्रोधादि का कर्ता कहते हैं। तो उस समय तक, उस अज्ञानदशा तक तो उसे क्रोधादि भावकर्म का कर्ता ही मानो; जड़ का कर्ता तो वो कदापि है ही नहीं। लेकिन क्रोधादि भावकर्म क्योंकि उसके निकट पैदा होते हैं, उसकी पर्याय में ही पैदा होते हैं, इसलिए उनका कर्ता उसको मानो! जैसे सांख्यमति अकर्ता मानते हैं। उसके ऊपर आचार्य ने कहा कि सांख्य तो आत्मा अकर्ता मानता है। आचार्य कहते हैं कि नहीं! ऐसा नहीं है। जब वो क्रोधादि के साथ तद्रूप होकर अपनी कल्पना में परिणमन करता है तो उस अज्ञानी को कर्ता ही मानो और जिस समय वो क्रोधादि से भिन्न अपने शुद्धात्मा का अनुभव करता है, उस समय उसे सर्वथा अकर्ता ही मानो। वहाँ से लेकर वो सदा के लिए, अनंतानंतकाल के लिए, सिद्ध दशा तक वो अकर्ता हो गया।
ये कर्ता-कर्म अधिकार की बातें हैं, वहाँ केवल परिणमन नहीं है। वहाँ परिणमन का अर्थ ही दूसरा है। वहाँ परिणमन का अर्थ है अपनी कल्पना में अपना मानने में तद्रूप परिणमन होना। अज्ञानी अपनी मान्यता में तद्रूप होकर परिणमन करता है। तद्रूपता होती नहीं है, लेकिन तद्रूप होकर अपनी कल्पना में, अपनी मान्यता में परिणमन करता है। तो वो अपने आप को कर्ता मानता है। इसलिए आचार्य भी उसको कर्ता कहते हैं कि तूने अपना नाम कर्ता रखा है, तो हम भी तुझे कर्ता नाम से बोलेंगे। तूने जो अपना नाम रखा है, उसी नाम से हम तुझे पुकारेंगे। तो तू कर्ता है; कर्ता है अर्थात् पापी है, महापापी है। अकर्ता है अर्थात् महाधर्मात्मा है।
वही पर्याय जो बदली है, क्रोध को भिन्न जानकर शुद्धात्मा में लीन हुई है, जिसे स्वसंवेदन हुआ है, वो अकर्ता परिणाम है, वो स्वसंवेदन है। इसलिए आचार्य कहते हैं कि वो उस समय से लेकर अनंतकाल तक, अकर्ता ही रहेगा। आत्मा तो अकर्ता है ही लेकिन ये पर्याय भी अकर्ता है। पर्याय बोलती है कि मैं अकर्ता हूँ। मैं अकर्ता भाव की करनेवाली हूँ - ऐसा नहीं। मैं अकर्ता हूँ, इस प्रकार आत्मा के साथ तद्रूप होती है।
पहले क्रोध के साथ तद्रूप होकर अपने को क्रोधरूप स्वीकार करती थी, अब आत्मा के साथ, चैतन्य के साथ तद्रूप होकर अपने को अनादि-निरपेक्ष चैतन्य स्वीकार करती है। इसलिए यहाँ तद्रूपता का नाम कर्ता-कर्म है। तद्रूप परिणमन को ही कर्ता-कर्म कहते हैं। तद्रूप परिणमन अतएव कर्तृकर्म।
मुमुक्षु :- इसलिए द्रव्य तो अनादि-अनंत अकर्ता रहा ही है। खाली तूने परिणमन में ऐसा माना नहीं है ?
पूज्य बाबूजी :- द्रव्य तो अकर्ता है ही, और पर्याय कर्ता ही रही है अर्थात् ऐसी युक्ति से अपने को क्रोधादिक भाव का कर्ता मानती रही है कि क्योंकि ये मेरे भीतर पैदा होते हैं - जैसे वहाँ कोर्ट में झूठी युक्तियाँ भी तो होती हैं न ! उसी तरह ये झूठी युक्ति है कि, क्योंकि ये मेरे भीतर पैदा होते हैं इसलिए मैं इनका कर्ता हूँ। लेकिन अपने भीतर पैदा होने वाले सर्व भाव चैतन्य हों और चैतन्य के हों, ऐसा आवश्यक नहीं है। चेतन से जो मेल खाते हों, चेतन से जिनकी समानता हों - वे चेतन हैं। और मैं अकर्ता हूँ - ये चेतन का भाव है। मैं अपरिणामी हूँ - ये चेतन का भाव है। और मैं परिणामी और कर्ता हूँ - ये अचेतन भाव है।
मुमुक्षु :- जड़ भाव है। अचेतन का भाव नहीं, अचेतन भाव है !
पूज्य बाबूजी :- अचेतन भाव है। द्रव्य-गुण-पर्याय समझ में आ जाए तो सब समझ में आ जाता है।
मुमुक्षु :- इसके लिए बाबूजी यही चर्चा लेते हैं।
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! इसलिए सारा एक क्षण का ही है, क्योंकि वो तो अकर्ता है ही, वो तो अपरिणामी है ही, शुद्ध है ही वो तो ! अकर्ता माने जिसके सिर पर कोई भार नहीं है, निर्भार ! जिसके सिर पर कोई काम नहीं है करने के लिए - ऐसा अकर्ता तत्त्व, वो मैं हूँ। तो उसमें सुख रहेगा कि नहीं रहेगा ? जिसके सिर पर कोई भार नहीं है वो आनंदित रहेगा कि नहीं रहेगा ? इसलिए वो आत्मा तो आनंद स्वरूप ही है, लेकिन उसे भूलकर, उसे न मानकर, उसका परिचय न करके यह जो जानता आया, यह जो मानता आया कि क्रोधादि मेरे भाव हैं - ऐसा कहने की बात नहीं है। कहे तो सही ! कि क्रोधादि भाव मेरे ही कर्म हैं लेकिन माने नहीं कि मेरे कर्म हैं। क्योंकि मेरे कर्म तो वो हैं जो मेरे स्वरूप से मिलते हैं, मेरे स्वभाव से मिलते हैं। मेरे स्वभाव का अनुशीलन करके पैदा होते हों वे मेरे कर्म हैं, जैसे ये ज्ञानादि और सुखादि मेरे कर्म हैं।
पर्याय अपराधिनी है
मुमुक्षु :- लेकिन पर्याय में भी स्वभाव से विपरीत परिणमन तो होता है ?
पूज्य बाबूजी :- और यहाँ क्यों पड़े हैं ? यहाँ क्यों पड़े हैं ? इस पर्याय के अपराध के कारण ही पड़े हैं। पर्याय अपराधिनी है, द्रव्य अपराधी नहीं है। द्रव्य सदैव निरपराध है। उसमें अपराध का नाम-ओ-निशान ही नहीं है। ना उसमें कोई आता है, ना वो कहीं जाता है। ध्रुव है एकदम, निष्क्रिय है।
आदतें ही तो खराब होती हैं या मनुष्य बिगड़ता है ? मनुष्य बिगड़ता है या मनुष्य की आदत खराब होती है ? मनुष्य बिगड़ जाए तब तो वो जो बिगड़ी हुई आदत है वो स्वभाव हुई; वो तो मनुष्यत्व हुआ। लेकिन आदत में तो पाशविकता है। आदत तो पशुता जैसी है, पशुता जैसा व्यवहार है, लेकिन मनुष्य नहीं बिगड़ा है। मनुष्य का जो परिणमन है वो बिगड़ा है, इसलिए वो सुधर जाता है। अरे ! मैं तो मनुष्य हूँ न ! ये पशुता मेरे में क्यों ? ये पशुता मेरी कैसे हो सकती है ? बस ! बदल गया। अरे !
मैं तो जैन-श्रावक हूँ न! ये रात्रि भोजन मेरे क्यों? ये आलू, गाजर, टमाटर मेरे क्यों ? ये मेरे खाने लायक हैं क्या ? ये दही-बड़े मेरे खाने लायक हैं क्या ? ऐसा जानते ही वो श्रावकोचित कर्म में आ जाता है। मैं तो मात्र चिन्मात्र हूँ।
मुमुक्षु :- पर्याय अपराधी है तो फिर पूरे आत्मा को नरक क्यों भेजा जाता है? वो तो उसी समय समाप्त हो गई ?
पूज्य बाबूजी :- पदार्थ एक ही है तो वो भी नरक जाता है लेकिन उसको नरक से कहाँ डर है ? वो तो एक ही पदार्थ के तीन अवयव हैं। ऐसा थोड़े ही है कि एक अंग तो यहाँ रह जाएगा और बाकी अंग नरक चले जायेंगे। और वो पर्याय तो इनकार ही कर देगी कि जिसने नरक उत्पन्न किया था वो तो है ही नहीं। वो तो गई, वो अभी कहाँ है ? अभी तो मान लो अगर सम्यग्दर्शन के पहले नरक आयु का बन्ध कर लिया तो पहले नरक तो जाना ही पड़ेगा। इसलिए वो पर्याय जिसने नरक आयु का बंध किया था वो तो इस समय नहीं है। इस समय तो आत्मा सम्यग्दृष्टि हो गया, तो पर्याय तो मचलेगी कि गया, मर गया वो तो। अब मुझे कैसे ले जाते हो, जिंदा को? तो वो आत्मा ही साक्षी है। हाँ! यही है, वो मेरा ही कर्म था, मैं साथ रहूँगा।
एक अंग कट के थोड़ी ही आता है, अगर कोई अपराधी हो तो! किसी ने अँगुली से किसी की छेड़खानी की है तो उसकी अँगुली काट ली जाए। बस! खतम हुआ या उसकी अँगुली को कोई चोट लगा दी जाए। आदमी को क्यों पकड़ा जाता है पूरा ? पूरा अपराधी है ऐसा माना जाता है, लेकिन वहाँ जाकर भी द्रव्य अपराधी नहीं है। द्रव्य को तो तब दिक्कत हो जब नरक का कुछ उसमें प्रवेश हो जाए। तो वो प्रवेश तो होता नहीं है। पर्याय में भी नरक का प्रवेश नहीं है, लेकिन पर्याय ये मान लेती है कि मैं नारकी हूँ, तो वो वहाँ पर नरकोचित कर्म करती है। और वहीं ये मान लिया जाए कि मैं नारकी नहीं। मैं नरक में नहीं हूँ - आत्मा उसे नहीं कहते कि जो नरक में रहता है। आत्मा कि ये definition (परिभाषा) नहीं है। आत्मा तो उसे कहते हैं जो ज्ञान में रहता है। तो ये बात उसे वहाँ याद आ जाए, तो वहाँ पहले नरक से लेकर सातवें नरक तक सम्यग्दर्शन हो जाता है, अनुभूति हो जाती है।
द्रव्य को क्या डर है? वो इतना स्नेही है, सच में देखा जाए तो पर्याय के साथ इतना स्नेही माने आत्मीयता रखनेवाला है। कारण कहते हैं न, कारण परमात्मा। वो तो कारण परमात्मा है कि कोई समय ऐसा आ जाए कि मैं कारण बन जाऊँ। ये पर्याय मेरी तरफ झाँक ले तो? उस समय अगर मैं नहीं होऊँ तो क्या होगा? और पर्याय तो कभी भी झाँक सकती है जब इसको सुध आ जाए! अभी तो ये गाफिल है। जिस समय इसकी गफलत मिट जाएगी उसी समय ये मेरी तरफ झाँकेगी। तो फिर मैं नारकी हूँ, उसका ये स्वर ही बदल जाएगा। मैं तो शुद्ध चैतन्य हूँ, ये स्वर हो जाएगा सतत्, लगातार। और वो बिगाड़ भी केवल एक समय का है, एक क्षण का है। भूत की पर्यायें गईं, भविष्य की पर्यायें अभी आयीं नहीं। केवल वर्तमान की विद्यमान पर्याय में बिगाड़ है, इतना संसार है।
वर्तमान पर्याय में जो विभाव है, जो विकार है, उसको वर्तमान में ही खतम कर दे, तो उसी समय मोक्ष हो। फिर करणानुयोग के प्रश्न भी नहीं होंगे कि कैसे हो जाएगा? कपड़े पहने होगा? तो कैसे होगा? मुनि नहीं बनेगा? कि वो सब हो जाएगा, तुम उसकी चिंता मत करो। सिर्फ उसकी तरफ देख लो एक बार और उसी में लीन हो जाओ तो फिर सब हो जाएगा जो होना चाहिए। हमको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
मुमुक्षु :- बराबर! बराबर बाबूजी! अद्भुत सिद्धांत मिला बाबूजी कि मनुष्य बिगड़ा नहीं है, आदतें बिगड़ी हुई हैं!
पूज्य बाबूजी :- आदत बिगड़ी है इसलिए सुधर जाता है कि - अरे मैं तो मनुष्य हूँ। बस ! सुधर गया, हो गया। मैं पशु थोड़े ही हूँ जो पशु जैसा कार्य करता हूँ। इसलिये सुधर जाता है।
श्रावक नहीं बिगड़ा है, श्रावक का कर्म बिगड़ा है। जैन नहीं बिगड़ा है, उसके जैनत्व का जो कर्म है वो बिगड़ा है। जैन तो वो सदा ही है। वरना अगर वो उसका जैनत्व बिगड़ जाए तो फिर वो याद किसको करेगा ? किसको याद करके जैन बनेगा ? क्योंकि वो तो बिगड़ गया था, पर्याय के साथ अगर द्रव्य भी बिगड़ जाए तो ! इसलिए वो याद करे तो किसी को तो होना चाहिए न !
मिथ्यादर्शन के लिए भी आत्मा का शुद्ध होना आवश्यक है क्योंकि आत्मा शुद्ध नहीं होगा तो फिर मिथ्यादर्शन में अशुद्ध किसको कहेगा ? तभी तो मिथ्यादर्शन होगा। शुद्ध को अशुद्ध मानेगा इसका नाम मिथ्या-दर्शन! शुद्ध की अशुद्ध अनुभूति इसका नाम मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान। इसलिए मिथ्यादर्शन के लिए आत्मा को शुद्ध होना बहुत आवश्यक है, वरना मिथ्यादर्शन ही नहीं होगा।
मुमुक्षु :- हम तो ये समझ रहे हैं कि सम्यग्दर्शन के लिए आत्मा को शुद्ध होने की जरूरत है ?
पूज्य बाबूजी :- आत्मा को दोनों की ही जरूरत नहीं। वह तो सदा काल परिपूर्ण है मिथ्यादर्शन के लिए भी आत्मा का शुद्ध होना जरूरी है।
मुमुक्षु :- नहीं तो ये अशुद्ध है, इस तरह का मिथ्यादर्शन कैसे हो सकता है ?
पूज्य बाबूजी :- कैसे होगा ये ? शुद्ध को अशुद्ध मानेगा उसका नाम मिथ्यादर्शन है। और शुद्ध को शुद्ध मानना वैसी ही अनुभूति करना, इसका नाम सम्यग्दर्शन है, तो पहले शुद्ध तो होना चाहिए! फिर ये अशुद्ध माने तो मिथ्यादर्शन हो गया। उसी का नाम तो है मिथ्या अर्थात् झूठ है।
अनुभूति के पूर्व की चिंतन धारा
मुमुक्षु :- अद्भुत ! बात है पर आत्मा की अनुभूति करने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
पूज्य बाबूजी :- यही बात हो रही है न !
मुमुक्षु :- ये तो स्वाध्याय हो रहा है, लेकिन चिंतन में, भिन्नता में हम क्या करें ?
पूज्य बाबूजी :- ये स्वाध्याय में जो हो रहा है वही चिंतन में है। स्वाध्याय में जो होता है वही चिंतन में होता है। स्वाध्याय में हम जो ये निर्णायक वार्ता कर रहे हैं…निर्णायक वार्ता है कोई बीच की वार्ता नहीं है।
ये जो निर्णायक वार्ता है ऐसा का ऐसा चिंतन चले कि मैं शुद्ध हूँ, एकदम परिपूर्ण, अनादि-निधन, अक्षय, अकर्ता, अपरिणामी - ऐसा चिंतन हो और वो भी महिमापूर्वक हो; शुष्क नहीं हो, रोते हुए नहीं हो, प्रसन्नता से हो। चिंतन में अगर प्रसन्नता नहीं है तो सम्यग्दर्शन होगा ही नहीं, कभी नहीं होगा। और प्रसन्नता अगर कल्पित है, कल्पना से उत्पन्न कर ली है तो भी नहीं होगा क्योंकि वो ये जानता है कि बहुत मजा आ रहा है, बहुत आनंद आ रहा है आत्मा का चिंतन हो रहा है। तो ऐसे विकल्प करता है केवल, प्रसन्नता नहीं होती। प्रसन्नता हृदय से होती है। अंतःकरण से होती है प्रसन्नता मगर उसके बीच में विकल्प नहीं आता है। मैं खा रहा हूँ और स्वाद ले रहा हूँ - इसके बीच में ‘मैं खा रहा हूँ’ यह नहीं आता है।
मुमुक्षु :- बहुत minute बारीक एकदम, बहुत सूक्ष्म बात है।
पूज्य बाबूजी :- ये नहीं आता है। ये जो कहा न ! अगर ये आ गया तो उधर स्वाद चला जाएगा।
मुमुक्षु :- इतने चिंतन में कभी-कभी थोड़ा विकल्प आ जाता है, क्योंकि अभी तो शुरुआत है !
पूज्य बाबूजी :- वो जैसी भी भूमिका हो, ये वस्तुस्थिति है। पहले वस्तु व्यवस्था ये है - ऐसा समझना चाहिए। इसके पहले कुछ भी करना माने कोई चिंतन करना, ध्यान करना और कुछ करना वृथा है। जब तक अपने ज्ञान में स्वरूप बिल्कुल एकदम परिशुद्ध न हो; ज्ञान में जब तक स्पष्टरूप से न जानने में आवे, तब तक उसका चिंतन अशुद्ध ही होगा और मिथ्यादर्शन नहीं जाएगा, मिथ्याज्ञान भी नहीं जाएगा। इसलिए सबसे पहले आत्मा के स्वरूप का निश्चय करना बहुत आवश्यक है। आत्मा का कर्म ज्ञान है, आचार्य को कर्ता-कर्म अधिकार में ये भी कहना पड़ा। अन्यथा तो इस 73 वीं गाथा में क्या कहा ? कर्म जो है उसको तो वहाँ उड़ा दिया और वहाँ भी एक मात्र शुद्ध चैतन्य लिया। लेकिन आत्मा का कर्म राग-द्वेष-मोह नहीं है। आस्रव आत्मा का कर्म नहीं है क्योंकि वो आत्मा से भिन्न हैं - ऐसा कहकर फिर कहा कि तो आत्मा का कर्म क्या है ? ये प्रश्न होगा न ? तो कहा कि आत्मा का कर्म ज्ञान है। इनको जान लेना मात्र ये आत्मा का कर्म है । पर वास्तव में आत्मा का कर्म ये भी नहीं है, क्योंकि आत्मा का कर्म होता ही नहीं है। आत्मा निष्कर्म है, अकर्ता है।
मुमुक्षु :- बराबर ! व्यवहार ये कि आत्मा का जो काम जानना है, ये भी मतलब से ही कहा है ?
पूज्य बाबूजी :- व्यवहार, व्यवहार, वो भी व्यवहार है। मैं ज्ञायक हूँ यह है निश्चय ! मैं चिन्मात्र हूँ यह है निश्चय, परम निश्चय ! यहाँ पर्याय का स्वर बदल गया। पर्याय द्रव्य के स्वरूप में बोलने लगी। द्रव्य का स्वर भरने लगी - आत्मा निष्क्रिय है, मतलब उसमें कोई क्रिया नहीं है। क्रिया हो तो कार्य हो और फिर वो कर्ता कहलायेगा। कर्ता कहलायेगा तो भार होगा। कर्ता अर्थात् जिसके पास कर्म हो.. फिर एक के बाद एक, दूसरा, तीसरा, चौथा ऐसा अनंतकाल तक कर्म ही कर्म जिसके सिर पर है तो वो निश्चिंत कैसे होगा ? निर्भार कैसे होगा ? इसलिए यदि आत्मा निर्भार है यदि तो उसे अकर्ता तो होना ही चाहिए।
मुमुक्षु :- खुद के लिए जो पुरुषार्थ करते हैं वो भी अकर्तापना हुआ ?
पूज्य बाबूजी :- खुद के लिए जो पुरुषार्थ करता है वो पहले ये जाने कि - मैं अकर्ता हूँ तो किस तरह हूँ ? कैसे हूँ अकर्ता ? किसको कहते हैं अकर्ता ? पहले ये जाने कि जिसमें परिणाम न हो, परिणमन न हो, क्रिया न हो वो अकर्ता है। जिसके ऊपर कर्म का कोई भार नहीं है, जो निश्चिंत है, सदा एकरूप है, ध्रुव है, उसका नाम आत्मा है। जो परम परणामिकभाव स्वरूप है उसका नाम आत्मा है, वो आत्मा है। अब ज्ञान इस आत्मा के स्वर में बोले तो वो ज्ञान भी अकर्ता है। वो ज्ञान कोई कर्म बनकर आत्मा को जानता है - ऐसा नहीं। वो ज्ञान आत्मा बनकर आत्मा को जानता है।
मुमुक्षु :- ज्ञान आत्मा बनकर आत्मा को जानता है ?
पूज्य बाबूजी :- आत्मा बनकर आत्मा को जानता है, कर्म बनकर नहीं जानता। कर्म बनकर जानता हो, तो फिर वो आत्मा के ऊपर हुआ कि मैं आत्मा को जानता हूँ, तो तू बड़ा है उससे क्योंकि तेरे जाने बिना वो आत्मा, बिल्कुल ugly था एकदम, कुरूप था ?
मुमुक्षु :- आपने बताया कि निर्णय पक्का होना चाहिए, उसमें बाल मात्र भी फर्क नहीं होना चाहिए। तो ऐसे शुद्धात्मा का निर्णय कैसे करें ? अनुमान और युक्ति से कृपा करके समझाइए !
पूज्य बाबूजी :- शुद्धात्मा तो जैसा है वैसा अपन ने काफी इसकी चर्चा की है कि कैसा है ? सर्व विभाव रहित, सर्व अन्य द्रव्यों से भिन्न, अपनी पर्याय से भी भिन्न है। अपनी अशुद्ध पर्यायों से तो भिन्न है, लेकिन एक बार जब शुद्ध पर्यायों से भी भिन्न मानेंगे, तभी वो अपरिणामी होगा। अपरिणामी होगा तो अकर्ता होगा। इस तरह अपरिणामी और परम शुद्ध चैतन्य ध्रुव मैं हूँ।
ऐसा जो शुद्धात्मा है, वो उसके स्वरूप को पहले यूँ जाने कि वो सबसे रहित है, माने सबसे! एक ओर वो और दूसरी ओर सम्पूर्ण विश्व कि जिसमें अपना पर्याय समुदाय भी आया, अपने विकार भी आए, अपने कर्म भी आए और सारा जगत ये नोकर्म भी आए, ये सब आ गया। ये सब एक ओर और एक ओर मेरा ध्रुव चैतन्य - इस तरह आत्मा को जाने। इसमें जरा भी विकार नहीं है। जिनवाणी में जो उसे विकारी कहा गया है, वो पर्याय को साथ लेकर कहा गया है क्योंकि एक ओर से देखा जाए तो पर्याय भी उस द्रव्य की ही है। अगर हम वह पर्याय द्रव्य की है - ऐसा नहीं मानेंगे.. नहीं मानेंगे अर्थात् अगर ऐसा नहीं कहेंगे तो उस पर्याय को कोई भी अचेतन झपट ले जाएगा।
ये तो पाटी है पहली! ये तो वस्तु व्यवस्था को समझने का ये पहला चरण है कि सचमुच राग-द्वेष का कर्ता आत्मा ही है। अगर आत्मा को राग-द्वेष का कर्ता न मानें तो फिर वो जो कर्म है राग-द्वेष, वो किसी दूसरे के पास चला जाएगा और दूसरा उसका कर्ता हो जाएगा, तो आत्मा सदा अकर्ता हो जाएगा। तो ये तो बनेगा नहीं, संभव नहीं होगा क्योंकि वो तो स्पष्टरूप में कर्ता और अज्ञानी दिखाई देता है।
पहले तो ऐसी वस्तुस्थिति को जाने और फिर इसके बाद ऐसा जाने कि ये जो राग-द्वेष-मोह हैं जिनको मैं अपना कर्म मानता रहा, ये तो आकुलता उत्पन्न करनेवाले दुखमय भाव हैं, जिनको शास्त्र की परिभाषा में आस्रव कहते हैं। आस्रव माने आनेवाला और आकर चला जानेवाला। तो ये भाव आते हैं और चले जाते हैं। अपन यहाँ लोक में भी विकार को आनेवाला और जानेवाला ही कहते हैं। जैसे आँख आ गई, तो कहाँ से आई ? और आँख चली गयी माने अँधा हो गया ? फिर क्या हुआ ? बुखार आया और बुखार चला गया; लोक में भी भाषा ऐसी है, अध्यात्म जैसी भाषा, शास्त्र जैसी भाषा। इस तरह विकार आया, आया माने वो संयोगी है और क्योंकि संयोगी है तो वो जाएगा।
इस तरह सब एक ओर ! सारे विभाव आदि सब एक ओर हैं, क्योंकि वे आत्मा से बिल्कुल विपरीत हैं, अनमेल हैं, भिन्न हैं और एक ओर शुद्धात्मा, जो सत्ता स्वरूप है, ज्ञायक जो एक भाव है, ऐसा सत्ता स्वरूप जो परम पारिणामिकभाव स्वरूप चैतन्य है, कारण परमात्मा है वो मैं हूँ। ऐसा पहले पहले युक्ति से जाने ! क्योंकि वो तो ध्रुव है, तो ध्रुव का परिणाम के साथ कोई बनाव नहीं बनता है, कोई समझौता नहीं हो सकता। इसलिए उसका परिणाम के साथ समझौता नहीं है। पहले जो परिणाम के साथ समझौता कराया वो इसलिए कराया था कि यदि वो विभाव का कर्ता अपने आपको मानेगा तो विभाव को दूर करनेवाला भी अपने आप को मानेगा। अगर विभाव का कर्ता अपने को नहीं मानेगा तो विभाव को दूर करनेवाला भी नहीं रहेगा। तो फिर विभाव रह जाएगा और वो अनंत संसारी हो जाएगा। उसमें से भी इतना निकलता है। उसका इतना गंभीर भाव है कि शुरू में ये जाने कि राग-द्वेष मेरे ही भीतर पैदा होते हैं।
ये जो झाड़ियाँ हैं, ये खेत में धान्य के साथ ही पैदा होती हैं। जहाँ धान्य है वहीं झाड़ी पैदा होगी, लेकिन दोनों कभी भी एक नहीं हुए। तो पहले ऐसा जाने तो कि ये झाड़ी भी पैदा तो यहीं हुई है लेकिन ये धान्य नहीं है, ये चावल नहीं है। इसी तरह ये राग-द्वेष मोह पैदा तो यहीं मेरी पर्याय में हुए हैं। ये कोई पुद्गल की पर्याय में पैदा नहीं हुए, लेकिन पैदा होने पर भी मेरा जो स्वरूप है, मैं जो वास्तव में हूँ, था और रहूँगा - ऐसा जो मेरा त्रैकालिक स्वरूप है उससे ये बिल्कुल न्यारे हैं। क्योंकि जो था, है और रहेगा वो सदा शुद्ध ही होता है। क्योंकि उसमें किसी की मिलावट नहीं होती और सदा एकरूप रहता है।
जब राग-द्वेष-मोह हुए तो वहाँ थम गया और ये जाना कि ये राग-द्वेष-मोह आत्मा से बिल्कुल विपरीत भाव हैं। मेरी आत्मा से बिल्कुल भिन्न भाव हैं, इसलिए ये मैं नहीं हूँ। पहले कहता था कि ये मैं ही हूँ, मेरे ही हैं। रागी-द्वेषी-मोही आत्मा ही है - ये पहला पाठ था । अब दूसरा पाठ ये है कि आत्मा रागी-द्वेषी-मोही होने पर भी राग-द्वेष मोह से आत्मा नाम का जो द्रव्य है, उसका कोई मिलान नहीं होता। ये दोनों विपरीत हैं। दो विपरीत भाव कभी भी एक नहीं होते हैं। उनमें समझौता नहीं हो सकता। इसीलिए राग-द्वेष मोह आत्मा से न्यारे हैं क्योंकि ये आकुलता पैदा करते हैं, इसीलिए न्यारे हैं। तब फिर वो इनसे भी अनासक्त होकर और उधर आत्मा की तरफ झुकता है।
युक्ति, अनुमान और आगम तीनों से निर्णय होता है। ये युक्ति से हुआ न ! अब ये अनुमान से हुआ, क्योंकि मुझमें ज्ञान है इसलिए मैं आत्मा हूँ। जहाँ-जहाँ ज्ञान है, वहाँ-वहाँ आत्मा है। जहाँ आत्मा नहीं है, वहाँ ज्ञान भी नहीं है। अचेतन में ज्ञान नहीं है इसीलिए वो आत्मा नहीं है। ये अनुमान से तय हो गया कि मेरे में ज्ञान है इसीलिए मैं आत्मा हूँ, ये अनुमान हुआ। वो थी युक्ति - जहाँ-जहाँ ज्ञान है वहाँ-वहाँ आत्मा है - ये तो हुआ तर्क - मेरे में ज्ञान है इसीलिए मैं आत्मा हूँ। जहाँ-जहाँ धुआँ है वहाँ-वहाँ अग्नि है - ये तो हुआ तर्क और मेरे रसोई घर में अग्नि है क्योंकि यहाँ पर धुआँ है - ये अनुमान हुआ।
अब आगम से जाने। सत्य आगम की परीक्षा करे और उससे जाने, तो सचमुच आँख खुल जाती है। इसलिए युक्ति से, अनुमान से, आगम से पहले आत्मा जाना जाता है। सद्गुरु के उपदेश को आगम समझ लेना। वहाँ आत्मा का स्वरूप जानने में आया इसके बाद उसके चिंतन में प्रसन्न भाव से तन्मय होता है - चारों ओर उपद्रव हों, उपसर्ग हों, कुछ भी हो माने कैसी भी परिस्थिति हो, लेकिन ये उस समय यदि वो चिंतन वास्तविक है और आत्मानुभव में परिणमित होनेवाला है, तो फिर ये किसी भी परिस्थिति के सामने झुकता नहीं है। मतलब ये कि इसके सामने परिस्थिति नाम की कोई चीज ही नहीं है, वस्तु ही नहीं है क्योंकि परिस्थिति मेरा क्या करेगी ? निर्णय तो इसने ये किया है! किसी भी परिस्थिति में अगर मैं प्रलय में भी बह जाऊँ और मुझे सम्यग्दर्शन हो, तो मेरे सम्यग्दर्शन को प्रलय क्या लूटेगा ? क्या बहायेगा ? मेरी अनुभूति को कैसे बहा सकता है - इस तरह ( आत्मार्थी ) जानता है।
उपयोग लक्षण से आत्मा का निर्णय
मुमुक्षु :-प्रश्न है - जीवतत्त्व का निर्णय करने के लिए उपयोग लक्षण से कथंचित् भिन्न लेना या अभिन्न ?
पूज्य बाबूजी :- जीवतत्त्व का निर्णय करने के लिए उपयोग लक्षण से युक्त लेना। भिन्न नहीं लेना। उससे युक्त लेना क्योंकि ये उपयोग अर्थात् ज्ञानक्रिया, जानन-क्रिया मुझमें प्रतिसमय चल रही है, इसलिए मैं जीवतत्त्व हूँ। इसलिए मैं जीव नाम का तत्त्व हूँ - ऐसा उससे युक्त लेना।
मुमुक्षु :- दूसरा प्रश्न था उसमें कि कथंचित् अभिन्न लेना ? कथंचित् भिन्न लेना या सर्वथा भिन्न लेना ?
पूज्य बाबूजी :- नहीं ! सर्वथा अभिन्न लेना । जीव का जहाँ निश्चय करना है तो वहाँ ज्ञान-क्रिया को आत्मा से सर्वथा अभिन्न लेना तब निर्णय होगा । कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न में उलझ जाएगा तो वो निर्णय ही नहीं होगा, क्योंकि लक्षण और लक्ष्य सर्वथा अभिन्न होते हैं ।
मुमुक्षु :- बाबूजी ! यहाँ ‘सर्वथा अभिन्न’ का मतलब क्या ?
पूज्य बाबूजी :- अभिन्न माने मेरे में ज्ञान है इसलिए मैं आत्मा हूँ । माने ज्ञानमय आत्मा हूँ मैं - यह अभिन्न हुआ ।
मुमुक्षु :- तो ये तो अनंत गुणमय आत्मा ही हुआ न ?
पूज्य बाबूजी :- अनंत गुणमय तो है ही । यहाँ तो ज्ञान पर्याय की बात करते हैं ।
मुमुक्षु :- उपयोग लक्षण से ही कथंचित् भिन्न लेना कि कथंचित् अभिन्न लेना ?
पूज्य बाबूजी :- अभिन्न लेना ! पहले आत्मा को जानने के लिए, आत्मा की सत्ता स्वीकार करने के लिए अभिन्न लेना । और उपयोग को तो आत्मा ही कहा है, उससे भिन्नत्व का क्या सवाल है ? हाँ ! वो जानन-क्रिया से भिन्न है आत्मा क्योंकि जानन-क्रियारूप नहीं है । आत्मा तो जाननभाव स्वरूप, जाननभाव का केन्द्र-कोष, ज्ञानगुण से युक्त है; लेकिन जानन-क्रिया आत्मा में नहीं है ।
जहाँ कोई इस तरह का प्रश्न होता है कि जैसे वो क्रोधादि का कर्ता नहीं है और घट आदि का कर्ता नहीं है, तो फिर किसका कर्ता है ? कि तो वो ज्ञान का कर्ता है, जाननभाव का कर्ता है - ये उत्तर आता है । लेकिन जाननभाव का कर्ता हूँ यहाँ रुक नहीं जाता । इससे आगे बढ़ता है और जाननभाव से मैं ज्ञायक हूँ बस! वहाँ पहुँच जाता है। ये वास्तविक रीति है।
जाननभाव क्या है? जाननभाव बस ये कि ये राग-द्वेष-मोह मेरे नहीं हैं। यदि इसमें रुक गया तो आत्मा तक पहुँचकर उसकी उपलब्धि कैसे होगी? वो तो राग-द्वेष-मोह को जानने में लग गया तो वहाँ से सड़ान की बू आएगी। इसलिए ये मेरे नहीं है ऐसा कहकर एकदम turn (घूम) लेता है कि मैं तो चिन्मात्र ज्ञायक हूँ।
मुमुक्षु :- आपने ये कहा कि उपयोग को सर्वथा अभिन्न लेना और जानन-क्रिया को भिन्न लेना?
पूज्य बाबूजी :- वो जानन-क्रिया ही उपयोग है। जानन-क्रिया वो नहीं है जो उस गाथा में आया कि उपयोग में उपयोग है - उसमें तो उपयोग वो आत्मा ही है। उसमें तो उपयोग को आत्मा ही कहा क्योंकि आत्मा ज्ञानस्वरूप है - आचार्य ने ये प्रक्रिया सर्वत्र ही ली है न! ज्ञानमय, ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व है वो मैं हूँ। ये ज्ञान है सो मैं हूँ - इस तरह से बताया है। इसलिए अभिन्न ही लेना। भिन्न तो उस समय लेना कि जिस समय क्रिया की बात, परिणाम की बात आई! परिणाम की बात आवे उस समय भिन्न है। उसमें जानन-क्रिया भी आ गई। उसमें राग नहीं है।
मुमुक्षु :- उपयोग शब्द का अर्थ ये भी है कि वो आत्मा है?
पूज्य बाबूजी :- आत्मा है।
मुमुक्षु :- हाँ, तो ज्ञानस्वरूप है तो वो सर्वथा अभिन्न लेना। पर क्रिया की बात आ गई तो सर्वथा भिन्न लेना।
पूज्य बाबूजी :- भिन्न ही लेना।
मुमुक्षु :- उपयोग शब्द और जानन-क्रिया इन दोनों शब्दों में इतना फर्क महसूस नहीं होता। जब उपयोग बोलते हैं तब दोनों एक लगते हैं ?
पूज्य बाबूजी :- नाम एक हैं न ! नाम एक हैं, लेकिन भाव दो हैं। अब वहाँ तो भाव भी दो नहीं हैं। वहाँ तो कहते हैं कि आत्मा यहाँ उपयोग में रहता है। आत्मा क्रोध में नहीं रहता है, यहाँ रहता है - ऐसा जानता है। यहाँ, रहता है - ऐसा जानकर इस भाव को पलट देता है, और मैं ज्ञायक हूँ ऐसा जानता है।
मुमुक्षु :- बराबर ! वहाँ रुकता नहीं है। बहुत सुंदर ! यहाँ रहता है उतना जानकर उस भाव को पलट देता है कि मैं ज्ञायक हूँ। ये पलटा देना बहुत मुश्किल लगता है ?
पूज्य बाबूजी :- असली चीज तो पलटना ही है।
मुमुक्षु :- आप जितनी सरलता से पलटाने की बात कर रहे हैं उस समय तो थोड़ा सा समझ में आ जाता है ?
पूज्य बाबूजी :- नहीं ! वो है सरल, लेकिन क्योंकि बहुत उलझा हुआ है न ! ऐसा है कि जैसे कर्जा बहुत हो और पास में पैसा भी हो लेकिन नियत खराब हो तो कैसे काम चले ?
मुमुक्षु :- बराबर ! अरे ! कर्जा भी है, पैसा भी है और नियत भी खराब है, ये जवाब बराबर है। अब नहीं पूछेंगे प्रश्न कर्ताबुद्धि का !
पारिणामिक भाव और परम पारिणामिक भाव
उपयोग पर्यायार्थिकनय का पारिणामिक भाव है। वह जब पर को लक्ष करके जानता है तब पारिणामिकभाव की क्या स्थिति होती है ?
पूज्य बाबूजी :- पारिणामिकभाव माने यहाँ पर परिणमन करनेवाला; पारिणामिकभाव माने द्रव्य नहीं। पर्यायार्थिकनय कहा न ! पर्यायार्थिकनय का पारिणामिकभाव माने परिणमन करनेवाला क्योंकि ‘सर्व भावा पारिणामिकः’ ऐसा वाक्य है। सभी भाव पारिणामिक हैं। चार भाव पारिणामिक हैं इसलिए पाँचवे भाव को परम पारिणामिक कहा। अब वैसे पारिणामिक ही कहते हैं। जहाँ परम लगाने की आवश्यकता नहीं हो, वहाँ पारिणामिक पर्याप्त होता है। लेकिन चार भाव पारिणामिक हैं, मतलब परिणमन करनेवाले हैं। औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशम और क्षायिक - ये सब परिणमन करते हैं और वो अपरिणामी है, मैं वो पारिणामिक (परम पारिणामिक) हूँ।
यहाँ तो पर्यायार्थिकनय से पारिणामिकभाव नहीं बताया। पारिणामिक-भाव तो उसका स्वरूप है। जानन-क्रिया पदार्थ का स्वरूप है। वो पदार्थ का स्वरूप है, तो इस ओर से उसे पारिणामिक कह सकते हैं; लेकिन वो पारिणामिक नहीं। त्रिकाल निरावरण जिसको कहते हैं वो ऐसा त्रिकाल परम पारिणामिक नहीं है।
मुमुक्षु :- तो इस परम पारिणामिकभाव की क्या स्थिति है? उसका अर्थ ये है कि वो विषय नहीं है।
पूज्य बाबूजी :- उस क्रिया में परम पारिणामिक नहीं आएगा। उपयोगरूप जो जानन-क्रिया है उसका कोई परम पारिणामिकभाव है - ऐसा नहीं है । जानन-क्रिया पारिणामिक है क्योंकि परिणमन करता है।
मुमुक्षु :- जानन-क्रिया का एक पारिणामिकभाव और दूसरा परम पारिणामिकभाव द्रव्य स्वभाव…
पूज्य बाबूजी :- दोनों में बहुत अंतर है। एक अपरिणामी है और एक परिणामी है।
मुमुक्षु :- तो उसकी क्या स्थिति है? वो तो वैसा का वैसा ही है, उसका मतलब ये हुआ।
पूज्य बाबूजी :- वो तो वही का वही है। वैसा का वैसा तो ये जानन-क्रिया भी हो सकती है। पर वैसा का वैसा तो और भी हो सकते हैं। उत्पन्न होने के बाद श्रद्धा तो वैसी की वैसी रहती है, सम्यग्दर्शन हो जाने पर जो क्षायिक सम्यक्त्व हुआ, वो अनंतानंत काल तक वैसा का वैसा रहता है और ये वही का वही है।
मुमुक्षु :- इसलिए इसमें कोई फेरफार नहीं है ?
पूज्य बाबूजी :- तद्भावरूप से अव्यय है ये ! तद्भावरूप से माने वही, वही, वही, वही, वही, वही - इसमें ऐसा लगता है और उस पर्याय में लगेगा वो नहीं, वो नहीं, वह नहीं, वह नहीं, वह नहीं। वही नहीं, वही नहीं, वही नहीं, वही नहीं; द्रव्य में लगेगा वही, वही, वही, वही, वही का वही !
मुमुक्षु :- और पर्याय में वैसा का वैसा ?
पूज्य बाबूजी :- पर्याय में, शुद्ध दशा में वैसा का वैसा हो सकता है, अशुद्ध दशा में नहीं।
मुमुक्षु :- परम पारिणामिकभाव तो अपरिणामी है। तो उसको परम पारिणामिकभाव क्यों कहा ?
पूज्य बाबूजी :- इसीलिए परम पारिणामिक कहा क्योंकि वो अन्य पारिणामिक से भिन्न है, अपरिणामी है, लेकिन अन्य जो पारिणामिक हैं उनसे ये अन्य प्रकार का है इसीलिए इसे परम पारिणामिक कहा। तो परम पारिणामिक कहने से हमें जान लेना चाहिए कि ये उन पारिणामिक से भिन्न है अर्थात् अपरिणामी है।
मुमुक्षु :- आहा ! और मेरे लिए परम है।
पूज्य बाबूजी :- जैसे कि तत्त्व और परम तत्त्व। तो तत्त्व में तो जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष ये आ जाते हैं और परम तत्त्व में शुद्ध जीवास्तिकाय आता है। वो सात तत्त्व से भिन्न हो जाता है।
मुमुक्षु :- पर्याय का पारिणामिकभाव क्या होता है ?
पूज्य बाबूजी :- पर्याय का पारिणामिक अर्थात् बदलना, पर्याय का परिणमन होना वो पारिणामिक है।
मुमुक्षु :- माने परिणमन हुए बिना रहे नहीं, वो उसका पारिणामिक भाव होता है ?
पूज्य बाबूजी :- वो उसका पारिणामिक भाव है। वो पारिणामिक कहलाता है - पारिणामिकभाव कोई अलग से नहीं होता है, पर वो पारिणामिक कहलाता है, क्योंकि वो परिणमन करता है। जानन-क्रिया भी पारिणामिक है, परिणमन करती है। परम-पारिणामिक से ये सब न्यारे हैं, बिल्कुल न्यारे हैं क्योंकि ये नये-नये उत्पन्न होते हैं। जो परम पारिणामिक है वो वही का वही है। उसमें कभी भी बदलाव नहीं होता, वो द्रव्य ही है - परम पारिणामिक माने द्रव्य, शुद्धात्म तत्त्व।
मुमुक्षु :- तो बाबूजी ये पर्याय का पारिणामिकभाव किस तरह से प्रयोजनभूत है ?
पूज्य बाबूजी :- पर्याय का पारिणामिकभाव क्या होता है कि परिणमन करना वही है बस पारिणामिक। उसको पारिणामिक कहते हैं। उसका कोई पारिणामिकभाव अलग से नहीं है। वो तो द्रव्यत्व गुण है उसका, वो द्रव्यत्व गुण है कि जिसके सहारे से वो प्रतिसमय परिणमन करता है। सामान्य गुणों में द्रव्यत्व गुण है न ! तो वो परिणमन करता है।
षट्गुणी हानि-वृद्धि और इसके साथ में वो भिन्न पर्याय है, लेकिन वो पर्याय में ही है। वो पर्याय के साथ ही अभेद है चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध हो, लेकिन हर पर्याय में षट्गुणी हानि-वृद्धि होती है, संसार दशा में और सिद्ध दशा सब में और अगुरुलघुत्व नाम का सामान्य गुण उसका हेतु है - वो अगुरुलघुत्व का ही प्रकार है। अगुरुलघुत्व एक तो सामान्य गुण है। एक अगुरुलघुत्व नाम-कर्म होता है और एक अगुरुलघुत्व जो है, वो गोत्र-कर्म होता है; जो गोत्र-कर्म के अभाव में अगुरुलघुत्व गुण सिद्धों को पर्याय में प्रगट होता है। इस प्रकार ये तीन होते हैं।
अगुरुलघुत्व नाम के सामान्य गुण की पर्याय षट्गुणी हानि-वृद्धि में निमित्त होती है, अर्थात् एक ही समय में छह गुणी हानि और छह गुणी वृद्धि और पदार्थ का ज्यों का त्यों रहना, वैसा का वैसा, वही का वही; माने उसमें गुरुता और लघुता नहीं होना। पर्याय में गुरुता-लघुता होने पर भी जो द्रव्य है, वो वही का वही रहता है और पर्याय भी पूरी रहती है। षट्गुणी हानि-वृद्धि हो जाती है और पर्याय पूरी रहती है।
जैसे समुद्र में ज्वार आया फिर भाटा आया, माने tides; और समुद्र वही का वही रहा। माने जिस समय वो ज्वार आया उस समय वो समुद्र बड़ा नहीं है और जिस समय भाटा आया उस समय वो घटा नहीं है, लेकिन वो पर्याय भी पूरी है।
षट्गुण हानि-वृद्धि हर पर्याय में होती है। वो पर्याय उसमयी है। भले मिथ्यात्व की पर्याय हो लेकिन वो षट्गुणी हानि-वृद्धि की पर्याय उसमय है, इसलिए सब गुणों की पर्याय में ये षट्गुणी हानि-वृद्धि होती है। और उसका निमित्त जो है वो अगुरुलघुत्व गुण की पर्याय है, जो सामान्य गुण है।
मुमुक्षु :- छह प्रकार के विभाग हैं?
पूज्य बाबूजी :- हाँ! बारह प्रकार के हो गए न, हानि और वृद्धि।
द्रव्य और गुणों का परिणामी और अपरिणामी स्वरूप
मुमुक्षु :- जीव द्रव्य के गुण शुद्ध हैं, फिर भी पर्याय अशुद्ध होती है। जीव में या उसके ऐसे कौन से गुण में ऐसी शक्ति है कि उसकी पर्याय अशुद्ध हो सके ? (और) उस शक्ति का सिद्ध अवस्था में क्या स्वरूप रहता है ?
बाबूजी :- जीव में ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि उसमें विकार हो, क्योंकि सारे गुण शुद्ध हैं। लेकिन ये बताने के लिए कि ये जो पर्याय है ये कौन से गुण की है, कौन से गुण से मिलती है - ये पर्याय कौन से गुण के कार्य को प्रगट करती है, ये बताने के लिए उसको उस गुण की पर्याय कहा जाता है। है भी उस गुण की पर्याय लेकिन गुण स्वयं परिणमन नहीं करता। परिणमन पर्याय में ही होता है, गुण में परिणमन नहीं होता है। लेकिन वो उस गुण का कार्य क्या है - ये पर्याय में व्यक्त होता है, ये पर्याय में जाना जाता है। इस तरह हर गुण की पर्याय को कहा है और उस पर्याय से उस गुण का पता चलता है कि मेरी पर्याय के पीछे ये ऐसी एक अनंत शक्ति पड़ी है जो कभी कम और अधिक नहीं होती। षट्गुणी हानि-वृद्धि गुणों में नहीं होती, द्रव्य में नहीं होती, वो भी अगुरुलघुत्व गुण के कारण से पर्याय में होती है।
मुमुक्षु :- यानि वर्तमान पर्याय से गुण अछूता है ?
पूज्य बाबूजी :- अछूता है। हाँ ! कथंचित् अछूता है। बिल्कुल न्यारा मान लेंगे क्या ? बिल्कुल न्यारा मान लेंगे तो दो द्रव्य हो जायेंगे न !
मुमुक्षु :- कहने में तो ये आता है कि श्रद्धा गुण का परिणमन, ज्ञान गुण का परिणमन ! पर गुण तो अपरिणामी है, फिर ऐसा क्यों कहा जाता है ?
पूज्य बाबूजी :- फिर अनेकांत का क्या होगा ? पहले ये कहते हैं कि गुण परिणमन करता है और फिर कहते हैं कि गुण परिणमन नहीं करता है - ये दोनों बात अनेकांत में आ जायेंगी। भाई! अनेकांत ऐसे समय में ही तो रक्षा करता है कि तुमने पहले तो ये कहा था न कि आत्मा ही रागी-द्वेषी है। अब कहते हो कि राग-द्वेष पुद्गल के हैं। तो कहते हैं कि हमारा अनेकांत है उसकी ध्वजा हमेशा ऐसी लहराती है। वो कभी चुनौती नहीं पाता है। उसकी जो अपेक्षायें हैं, उसके जो angle हैं, वो angle तुम समझते नहीं हो कि हम कौनसे angle से बोले !
हमने एक व्यक्ति को अनेक नामों से पुकारा तो उसमें एक-एक angle से उसको पुकारते हैं। उसको पिता पुकारते हैं तो वो पुत्र की ओर से पुकारते हैं। उसको पति पुकारते हैं तो पत्नी की ओर से पुकारते हैं। उसे मामा, काका, भांजा, जो कुछ भी हो, ये इतने धर्म उसके भीतर हैं। तो ये angle हैं सारे के सारे कि एक व्यक्ति इतने अनेकरूप हो सकता है, लेकिन उसके angle हैं। इसी तरह से अनेकांत के angle होते हैं और हम द्रव्य को उस ओर से पुकारते हैं कि द्रव्य परिणामी भी है और अपरिणामी भी है। इसलिए दोनों में से हम selection ( चुनाव ) करेंगे तो वास्तव में अपरिणामी है। लेकिन अगर परिणामी नहीं कहेंगे तो परिणाम किसी दूसरे के घर चला जाएगा और आत्मा परिणामहीन होकर शून्य हो जाएगा।
मुमुक्षु :- वास्तव में हम selection ( चुनाव) करेंगे तो अपरिणामी का करेंगे।
पूज्य बाबूजी :- जब उसका स्वरूप जानेंगे तो अपरिणामी सिद्ध हो जाएगा। और यदि वो द्रव्य भी परिणमन करने लगे और पर्याय भी परिणमन करने लगे तो दोनों में क्या अंतर रहा ? दोनों ही पर्याय हुए। फिर द्रव्य कहाँ रहा ? और अपरिणामी में हमारा कल्याण है, परिणामी में कल्याण नहीं है क्योंकि परिणाम जो है वो तो पर्याय है और द्रव्य परिणामी है - ऐसा कहने में भी परिणाम की याद आती है। तो परिणामी कहने में कोई ऐसा अनर्थ नहीं है लेकिन उसे परिणामी मत बोलो, अपरिणामी बोलो तो परिणाम से दृष्टि हट जाएगी और परिणामी कहते ही परिणाम की याद आएगी। पर्याय परिणाम है, परिणामी नहीं - ऐसा बोला तो परिणामी नहीं है; माने हमने परिणामी बोला तो तुरंत परिणाम की याद आ जाएगी। इसलिए वास्तव में अपरिणामी है - तब फिर परिणाम मात्र एक ओर रह जाता है और वो फिर द्रव्य बनकर आता है।
मुमुक्षु :- परिणाम मात्र एक ओर हो जाता है और फिर द्रव्य बनकर आता है।
पूज्य बाबूजी :- वो द्रव्य बनकर आता है। जब वास्तविक दशा उत्पन्न होती है, तो द्रव्य बनकर आता है, मैं तो चिन्मात्र ज्ञायक हूँ, वो द्रव्य बन गया !
मुमुक्षु :- पर्याय मात्र को परिणाम कहो, परिणामी मत कहो - ये कहना है ?
पूज्य बाबूजी :- परिणामी द्रव्य को कहते हैं। लेकिन परिणामी कहने से परिणाम की याद आती है, इसलिए अपरिणामी कहो और वही उसका वास्तविक स्वरूप भी है।
मुमुक्षु :- परिणामी कहता है कि मैं अपरिणामी हूँ। द्रव्य को परिणामी कहा कि पर्याय को ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! ये पर्याय बोली। अपरिणामी बोलता नहीं है। अपरिणामी बोले तो वो तो परिणामी हो जाए।
मुमुक्षु :- तो फिर परिणामी शब्द क्यों बोला ? पर्याय - ऐसा शब्द क्यों नहीं बोला ?
पूज्य बाबूजी :- परिणामी नहीं बोले तो वो पर्याय द्रव्य से बिल्कुल अलग हो जाएगी और द्रव्य से अलग होकर टूट जाएगी, तो द्रव्य का ही नाश हो जाएगा। इसलिए पहली बार में तो परिणामी बोलना पड़ेगा, बल्कि ऐसा जानना चाहिये। जानना चाहिए, मानना चाहिए भी कहते हैं कि पहले इसको परिणामी ही मानना चाहिए क्योंकि द्रव्य-गुण-पर्याय को जब तक नहीं समझेगा तब तक फिर उसमें से selection ( चुनाव ) नहीं होगा।
मुमुक्षु :- बहुत सुंदर ! पहले उसको परिणामी ही मानना चाहिए क्योंकि द्रव्य-गुण-पर्याय प्रमाण की सत्ता को स्वीकार करना चाहिए !
पूज्य बाबूजी :- स्वीकार करना चाहिए। पहले प्रमाण को स्वीकार करे और उसके बाद उसमें से selection ( चुनाव ) करे।
मुमुक्षु :- परिणामी कहने से अनुभव की प्रक्रिया में आ गया न ?
पूज्य बाबूजी :- आ सकता है यदि आसन्न-भव्य हो तो !
मुमुक्षु :- आ गया नहीं, आ सकता है।
पूज्य बाबूजी :- लेकिन अपरिणामी मानकर ही आएगा ! परिणामी को भी अपरिणामी मानकर ही आएगा, परिणामी मानकर नहीं आएगा।
मुमुक्षु :- इन दोनों शब्दों की रमत से बहुत सूक्ष्म बात अंदर से बाहर आ जाती है। पर्याय को परिणाम कहो और यदि द्रव्य को परिणामी कहते हो तो परिणाम की बू आ जाती है; तो अपरिणामी जानो !
पूज्य बाबूजी :- अपरिणामी जानो और वास्तव में वो अपरिणामी है।
मुमुक्षु :- हमें तो ये तीन शब्दों का कोई ज्यादा फरक महसूस नहीं होता ?
पूज्य बाबूजी :- फरक है इसलिए वो शब्द बने हैं।
पाँच समवाय
मुमुक्षु :-पाँच समवाय में से पुरुषार्थ को ही मुख्यता दी जाती है। तो बाकी के समवाय की, जैसे कि निमित्त की हाजिरी वगैरह का क्या योगदान है ? योगदान न हो तो समवाय कैसे कहलाये ?
पूज्य बाबूजी :- योगदान भी नहीं है और वे होते भी हैं - दोनों बात हैं। निमित्त का कोई योगदान नहीं है लेकिन निमित्त का योग अवश्य होता है। योगदान नहीं होता।
मुमुक्षु :- मात्र योग होता है तो उसको समवाय में क्यों गिना ?
पूज्य बाबूजी :- समवाय में इसलिए गिना कि वो होता है। काम ऐसी परिस्थिति में होता है, ज्ञानी इस बात को जानता है क्योंकि वो तो जाननेवाला है इसलिए हर बात को जानेगा। तो ऐसी परिस्थिति में कार्य होता है ये ज्ञान को बताना आवश्यक है। लेकिन ये बताना भी आवश्यक है कि उस परिस्थिति का असर नहीं होता है।
मुमुक्षु :- बहुत सुंदर ! बाकी के समवाय होते भी तो हैं न !
पूज्य बाबूजी :- हाँ! होते हैं, तो सबको कहा है न! जो होते हैं उनको सबको कहा है, पर प्रधानता पुरुषार्थ की है। क्योंकि ये पहले सारा का सारा मिथ्या पुरुषार्थ कर रहा था न! उसमें भी प्रतिसमय पुरुषार्थ था क्योंकि गलत रास्ते जाने पर भी आखिर श्रम तो उतना ही होता है। लेकिन सही रास्ते जाने पर श्रम तो होता ही है लेकिन प्रसन्नता भी होती है।
मुमुक्षु :- क्योंकि सुख का फल आ जाता है न !
पूज्य बाबूजी :- सुख का फल आ जाता है उसको, सही का फल आ जाता है। इसलिए श्रम तो होता ही है, पर थकान महसूस नहीं होती।
पूज्य बाबूजी :- अब ये जो सही रास्ते का श्रम कर रहा है, तो सही रास्ते में ये घबराता इसलिए नहीं है कि मेरे कदम जिस तरह से बढ़ने हैं, उसी तरह से बढ़ेंगे। इसलिए इसको बार-बार ये नहीं आता कि कब आएगा, कब आएगा, कब आएगा ? ऐसा चिंतातुर नहीं होता, ऐसी घबराहट नहीं होती। और ये जानता है कि वो तो इतने बजे आएगा। इतने बजे आएगा - ये जानकर निश्चिंत हो जाता है और उसका चलना जो है वो स्वाभाविकरूप से और प्रसन्नतापूर्वक चलता रहता है। तो वो जो पुरुषार्थ है, उसके साथ काललब्धि भी आई कि नहीं आई ? चलेगा जरूर और उसमें श्रम होगा, वो तो पुरुषार्थ है। लेकिन वो श्रम करने पर भी उसे यदि चार बजे पहुँचना है तो वो चार बजे ही पहुँचेगा। चार बजे के पहले और चार बजे के पीछे नहीं, इसका नाम काललब्धि है।
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