तत्त्वचर्चा 8 (1 फरवरी 1999)
तत्त्वचर्चा : क्रमांक 8
(1 फरवरी 1999)
इस चर्चा में श्रद्धा का महत्त्व और स्वरूप, पर्याय का वेदन, पर्याय का ज्ञायक, ज्ञान की मध्यस्थता, ज्ञेयाकार में नय विवक्षा, ज्ञान निर्विषय है, पर प्रकाशन में स्व प्रकाशकता आदि विषयों का मार्मिक स्पष्टीकरण किया गया है।
मुमुक्षु :- प्रश्न है बाबूजी! त्रिकाली ध्रुव भगवान आत्मा कूटस्थ-निष्क्रिय है और वेदन पर्याय में होता है। तो एक है दृष्टि का विषय और एक है ज्ञान का विषय, इसमें मुख्य-गौण कैसे होता है और ज्ञान का स्वरूप कैसा है? कृपया समझाइये।
पूज्य बाबूजी :- जो त्रैकालिक ध्रुव आत्मतत्त्व है, वो तो कूटस्थ निष्क्रिय और सम्पूर्ण है। अनन्त शक्तियों का पिण्ड एक चिन्मात्र तत्त्व है और उसका वेदन पर्याय में होता है। वेदन पर्याय में होता है माने ज्ञान की पर्याय में वेदन होता है, अनुभव में आता है और जो ज्ञान की पर्याय में अनुभव में आता है, वही दृष्टि का विषय होता है।
‘यही मैं हूँ’ ऐसे अहम् रूप में वेदन होता है। दृष्टि में भी अहम् रूप में प्रतीति में आता है, श्रद्धा में आता है और ज्ञान में भी अहम् रूप में ही वेदन होता है। श्रद्धा में ज्ञान नहीं है, लेकिन श्रद्धा में भी वो अहम् रूप में प्रतीति में आता है, श्रद्धा में आता है, विश्वास में आता है और ज्ञान में भी अहम् रूप में उसका वेदन, संवेदन अर्थात् आत्मानुभूति होती है। इसलिए श्रद्धा और ज्ञान दोनों का विषय एक ही है।
दृष्टि भी उसी को विषय करती है और ज्ञान भी उसी को विषय करता है और दोनों का स्वर एक है। ज्ञान में इस रूप में वेदन नहीं होता कि ये शुद्धात्मा मेरा है। इसमें तो space (जगह) हो जाती है, अन्तर हो जाता है। लेकिन ‘यही मैं हूँ’ - ऐसा कहकर ज्ञान और श्रद्धा दोनों अदृश्य हो जाते हैं। आत्मानुभूति की पर्याय भी अदृश्य हो जाती है क्योंकि स्वयं आत्मानुभूति की पर्याय, वो आत्मानुभूति का विषय नहीं है। श्रद्धा की पर्याय सविकल्पदशा में ज्ञान का विषय होती है और निर्विकल्पदशा में जो ज्ञान का विषय शुद्धात्मा अर्थात् ‘मैं यही शुद्ध चिन्मात्र हूँ’; और दृष्टि का विषय भी यही होता है कि ‘यही चिन्मात्र मैं हूँ’।
श्रद्धा की उपयोगिता
विश्वास अर्थात् श्रद्धा। इसमें और ज्ञान में जो अन्तर है वो समझ में आना चाहिए क्योंकि कभी-कभी ऐसा भीतर से प्रश्न उठता है कि जब ज्ञान सारा काम कर लेता है तो फिर श्रद्धा की क्या जरूरत है? लेकिन ये हमारे प्रगट अनुभव की बात है कि श्रद्धा की पर्याय लोक में भी अलग से चलती है और ज्ञान की पर्याय अलग से चलती है। भले ही दोनों साथ-साथ चलें और दोनों का विषय भले ही एक हो, लेकिन दोनों का स्वरूप न्यारा-न्यारा है। सिद्धि करें इसकी ?
मुमुक्षु :- हाँ जी बाबूजी! कीजिए न!
पूज्य बाबूजी :- जैसे लोक में हमें बहुत सी बातों का ज्ञान नहीं होता। तो वहाँ केवल श्रद्धा से ही काम चलता है। सारे लोकालोक की बातों का ज्ञान हमको नहीं होता। नहीं होता है न? तो श्रद्धा से ही काम चलता है।
जैसे साक्षात् भगवान की वाणी में भी जो करणानुयोग का विषय है, गणित Mathematics; वो हमारे ज्ञान का विषय नहीं होता है। इतना ही क्षयोपशम है न अपना! अल्प विकास है तो वो ज्ञान का विषय नहीं होता, लेकिन भगवान सर्वज्ञ की वाणी है ऐसा विश्वास अवश्य होता है। होता है न? अज्ञानी को भी होता है। ज्ञानी को तो ज्ञानपूर्वक श्रद्धान होता है। ज्ञानी को ऐसा नहीं है कि वो श्रद्धा अँधी होती हो; तो उसे ज्ञानपूर्वक होता है और अज्ञानी को तो भगवान की वाणी है इस प्रकार विश्वास होता है।
और लोक में देखिए कि हम किसी डॉक्टर के पास जाते हैं। तो हम कहते हैं कि डॉक्टर साहब! हमको तो आपका ही विश्वास है। अब वो जो हमारी व्याधि को देखकर जो निदान करता है, diagnosis करता है और diagnosis करके औषधि देता है, लेकिन हमें उस बात का कुछ पता नहीं है कि इस औषधि में क्या है? वो किसकी बनी हुई है और क्या बनी हुई है? हम तो केवल विश्वास पर उसको लेते हैं। उस डॉक्टर ने क्या जाना ये भी हमको पता नहीं है। लेकिन हमको बता दिया गया है कि तुम्हें ये व्याधि है और तुम ये दवा लो। तो वहाँ ज्ञान नहीं होने पर भी केवल विश्वास काम किया करता है। इसलिए विश्वास की अर्थात् श्रद्धा की कीमत है और श्रद्धा माने अहम् रूप। इसप्रकार जो श्रद्धा की पर्याय ज्ञान से अलग सिद्ध होती है और हमारे इस लोकोत्तर जीवन में भी श्रद्धा की पर्याय अलग चलती है और ज्ञान की पर्याय अलग चलती है।
आत्मानुभूति के समय दोनों का विषय एक ही होता है और अलग-अलग स्वर में होता है। जैसे श्रद्धा भी आत्मा को जानती है - इस शब्द का प्रयोग गलत है। श्रद्धा जानती नहीं है; श्रद्धा प्रतीति करती है, अहम् करती है और ज्ञान भी अहम् करता है, लेकिन वो जानता हुआ अहम् करता है।
श्रद्धा बिना जाने अहं करती है
अब, ये कैसे होता है? श्रद्धा जब जानती नहीं है तो ज्ञान ने जिस आत्मा का निर्णय किया और उस आत्मा में ज्ञान ने अहम् रूप प्रवृत्ति की अर्थात् उसका वेदन किया, उसकी अनुभूति की, तो श्रद्धा वहाँ कैसे चली गई? उसमें तो ज्ञान नहीं था। तो कहें कि ऐसा होता है, क्योंकि ये सब एक ही परिवार के सदस्य हैं सारे के सारे! इसलिए परिवार के एक सदस्य ने जो search light (खोजबत्ती) दिखा दी, तो सारे उसके पीछे-पीछे चल देते हैं। इसलिए जो श्रद्धा है वो ज्ञान के साथ चलती है।
अपन एक उदाहरण से स्पष्ट करेंगे तो अच्छी तरह समझ में आ जाएगा। हमारे सारे शरीर में देखनेवाली आँखें हैं। और कोई है देखनेवाला ? और किसी के हाथ के या पैर के, किसी के भी आँख है ? नहीं है। लेकिन आँख देखती हैं और पैर चलते हैं और पैरों के आँख नहीं है। तो पैर कैसे चलते हैं बिना आँख के ? क्योंकि देखने का काम आँख ने कर लिया और शरीर एक अभेद तत्त्व है न; लौकिक दृष्टि से शरीर एक अभेद तत्त्व है। तो उसके जो सारे अवयव हैं, वो उस आँख के साथ-साथ चलते हैं। तो आँख ने देख लिया और पैर चल पड़े। अगर आँख बन्द हो जाए तो पैर लड़खड़ा जायेंगे, हाथ लड़खड़ा जायेंगे और सारा मनुष्य ही लड़खड़ा जाएगा।
आँख तो ज्ञान के स्थान पर हुई और बाकी जो अंग हैं, वो श्रद्धा के स्थान पर हुए। हम जो भोजन करते हैं तो हाथ के आँख नहीं है। नहीं है न ? लेकिन ये जो हाथ है, ये मुँह को कैसे टटोल लेता है ? निवाला सीधा मुँह में जाता है। और आँख, वो मुँह को देखती नहीं है लेकिन फिर भी चला जाता है क्योंकि ये एक ही परिवार के सदस्य हैं। इसलिए परिवार का एक सदस्य जो समझदार है, तो अन्य में समझ की आवश्यकता भी नहीं है और वो सब उसके पीछे-पीछे चलते हैं।
मिथ्यादर्शन में भी यही स्थिति है और सम्यग्दर्शन में भी यही स्थिति है।
अब, ज्ञान के विषय में मुख्य-गौण कैसे होता है ? वो मुख्य-गौण ऐसे होता है - जिस समय आत्मानुभूति हो रही है, उस समय आत्मा मुख्य है और बाकी दूसरे सारे पदार्थ, सारा जगत उसमें गौण है और जिस समय ज्ञान बाह्य पदार्थों को देख रहा है उस समय देखने में, केवल देखने में वो पदार्थ मुख्य हैं और आत्मा उस समय गौण है। गौण है माने चला गया है, ऐसा नहीं। लेकिन उस समय उसे देखने का काम नहीं हो रहा, जगत को देखने का काम हो रहा है। इसलिए उसको मुख्य कहते हैं और उसको गौण कहते हैं। यह प्रतिपादन की भी एक पद्धति है। तत्त्वार्थसूत्र में आया है अर्पितानर्पितसिद्धेः ( अधिकार 5 सूत्र 32; अर्थ - प्रधानता और गौणता से पदार्थों की सिद्धि होती है।) जो हमारा विषय है उसे अर्पित कहते हैं। जो ज्ञान में चल रहा है वो तो है अर्पित, और शेष विषय ज्ञान में हैं तो सही लेकिन उस समय ज्ञान उनको जान नहीं रहा है; उनका प्रतिपादन नहीं हो रहा और जान नहीं रहा है, तो वो हैं अनर्पित। अनर्पित माने वे गौण हैं - इस तरह ज्ञान में मुख्य गौण होता है।
श्रद्धा में मुख्य और गौण नहीं होता। श्रद्धा में तो मुख्य ही होता है। मिथ्यादर्शन में भी मुख्य और सम्यग्दर्शन में भी मुख्य। मिथ्यादर्शन में जगत मुख्य है, श्रद्धा का आत्मा वही है और सम्यग्दर्शन के समय केवल शुद्धात्मा ही मुख्य है और श्रद्धा में गौण की व्यवस्था नहीं है। ये ज्ञान और श्रद्धा का विश्लेषण हुआ। और कुछ पूछना है?
वेदन पर्याय का होता है या द्रव्य का
मुमुक्षु :- पर्याय में पर्याय का वेदन होता है या द्रव्य का वेदन होता है?
पूज्य बाबूजी :- वेदन पर्याय में पर्याय का ही होता है, लेकिन उस समय क्योंकि वो उस द्रव्य के साथ द्रव्य के आकार बन गई है, ज्ञायकाकार बन गई है; तो स्वयं को ज्ञायकाकार अनुभव करती है। वो इस तरह अनुभव करती है कि ‘मैं मात्र ज्ञायक हूँ’ - इस तरह अनुभव करती है तो अभेद हो गई। ये अभेदता हो गई न! अगर वो यूँ कहे कि ‘मैं ज्ञायक का अनुभव करती हूँ’, तो पर्याय न्यारी रही और वो जो ज्ञायकाकार है वो न्यारा रहा है। वो अलग-अलग रहा।
अपन कहते हैं न कि ‘ज्ञान में ज्ञान ही जानने में आता है’ - ये विकल्प दशा है। इस तरह ‘मैं आत्मा का अनुभव करती हूँ’ - ये भी विकल्प दशा है। ‘मैं तो शुद्धात्मा ही हूँ’ - बस इस तरह पर्याय में पर्याय का वेदन होता है और वो ज्ञायकाकार होती है तो उसको ज्ञायक का वेदन होता है और आनन्द होता है, क्योंकि जो व्यवस्था है वो यही है कि एक गुण दूसरे गुण में नहीं जाता और द्रव्य भी गुण में नहीं जाता। तो जो द्रव्य है, ध्रुव-शुद्धात्मा वो अपनी जगह रहता है और पर्याय उसका (द्रव्य का) सारा का सारा चित्र अपने में अपनी सामर्थ्य से उतारकर उसमें एकाकार हो जाती है। वही ज्ञाता और वही ज्ञेय, हो गया ! माने पर्याय में वो ज्ञायक ही ज्ञाता और ज्ञायक ही ज्ञेय हो गया।
मुमुक्षु :- बराबर ! पर्याय में ज्ञायक ही ज्ञाता और ज्ञायक ही ज्ञेय ?
पूज्य बाबूजी :- जब हम इस तरह बोलते हैं कि ‘वो ज्ञायक का अनुभव हो रहा है’, तो द्रव्य पर हमारा ध्यान जाता है न ! तो वो व्यवहार हो जाता है।
मुमुक्षु :- पर्याय को पर्याय में वेदन होता है ?
पूज्य बाबूजी :- पर्याय में होता है - ये निश्चय है।
मुमुक्षु :- द्रव्य का अनुभव हो रहा है, वह व्यवहार कैसे बन गया ?
पूज्य बाबूजी :- वो व्यवहार हो जाएगा न ! क्योंकि निश्चय तो ये है, सम्यग्दर्शन तो इस समय हुआ न ! वो द्रव्य तो पहले भी विद्यमान था, लेकिन सम्यग्दर्शन तो अब हुआ न ! जब पर्याय ने ज्ञायक का आकार अपने भीतर, ज्ञायक का चित्रांकन अपने भीतर किया और फिर उसमें अभेद हो गई अर्थात् ‘मैं हूँ, ये ही मैं हूँ’… तो ‘ये ही मैं हूँ’ इसमें ज्ञाता भी वही और ज्ञेय भी वही। इस तरह ज्ञाता-ज्ञेय अभेद, पर्याय में अभेद हो गया और वो शुद्धात्मा अपने स्थान पर ज्यों का त्यों स्तम्भ की तरह, स्तूप की तरह खड़ा है, क्योंकि यहाँ principle ( सिद्धान्तों ) का खण्डन नहीं होता है, principle ( सिद्धान्तों ) में फर्क नहीं पड़ता है। अगर यहाँ हम फर्क डाल देंगे तो सारे जगत में फर्क पड़ जाएगा और पर-पदार्थ आत्मा में प्रवेश करने के अधिकारी हो जायेंगे।
ज्ञायक पर्याय से भिन्न तत्त्व है, भिन्न माने परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले तत्त्व हैं। वो नित्य है और ये अनित्य है। अगर नित्य अनित्य में आ गया, तो फिर अन्य पदार्थ और अन्य सारा जगत चिल्लायेगा कि तुमने कानून भंग कर दिया। इसलिए अब तुम्हारा दरवाजा खोल दो। अब अचेतन भी चेतन में आएगा और चेतन अचेतन में जाएगा। लेकिन कुदरत का जो संविधान है वो कभी भंग नहीं होता है, चाहे अपने ऊपर apply (लागू) करो या दूसरे पर apply ( लागू ) करो।
पर्याय का ज्ञायक
मुमुक्षु :- पर्याय ने अपना ज्ञायक बना लिया, इसका क्या अर्थ है बाबूजी ?
पूज्य बाबूजी :- बना लिया न! पर्याय ज्ञायक नहीं बनावे तो फिर क्या किया उसने ? उस समय क्या कमाल हुआ फिर ? उसमें क्या कमाल हुआ ? सामने वस्तु जो है, वो देख ली, और फिर पर्याय का सत् क्या हुआ ?
मुमुक्षु :- यदि ऐसा न हो तो ?
पूज्य बाबूजी :- तो फिर पर्याय तो खाली ही रही, वो तो केवल देखनेवाली रही। पर्याय ने अपना ज्ञायकाकार बनाया कहाँ ? वो तो खाली रही और उसको ज्ञायक को देखती रही, लेकिन ऐसा होता नहीं है, क्योंकि वो ज्ञायक में जा नहीं सकती है, पहुँच नहीं सकती है। तो इस तरह जानना होता है कि वो अपने रस से, स्वरस से ज्ञायक का स्वतंत्र आकार बनाती है और उसी में लीन हो जाती है।
वह पर्याय भी सत् है न! वो भी समर्थ है, बहुत सामर्थ्य है उसकी। उसी समय सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्ययक्चारित्र तीनों एक साथ अविनाभावीरूप से जन्मते हैं। इस प्रकार निश्चय रत्नत्रय की उपलब्धि होती है। यदि वह खाली रहेगी तो उसके भीतर क्या रहा?
पर्याय तो हर समय प्रतिभास से भरी हुई होना चाहिये। हमने दूसरे के तो प्रतिभास से इन्कार कर दिया और जहाँ अपना नम्बर आया तो वहाँ हमें सिद्धान्त से इन्कार हो गया। वहाँ हमने उसके विरुद्ध वो बात स्वीकार कर ली कि - नहीं! ज्ञायक का ही अनुभव हो रहा है। यदि ज्ञायक का अनुभव हो रहा है, तो ध्रुव का अनुभव अनित्य में कैसे होगा? ध्रुव अनित्य में कहाँ से आयेगा? और ये अनित्य है, ये ध्रुव में कहाँ से जाएगा? इसलिए ये पर्याय अपना ध्रुव तैयार करती है अर्थात् वह द्रव्याधीन नहीं है।
मुमुक्षु :- यही सत् की अहेतुकता है?
पूज्य बाबूजी :- हाँ, क्योंकि वह द्रव्य के आधीन नहीं है, नहीं तो वह परतन्त्र बन जाती न!
जब हम अपने द्रव्य में भी इस तरह का थोड़ा भी लिहाज नहीं करते तो पर में कैसे लिहाज करेंगे? हम तो अपने द्रव्य-गुण-पर्याय में ही लिहाज नहीं करते हैं कि ये भी स्वतन्त्र सत् हैं और सभी अपने-अपने कार्यक्षेत्र में अपना-अपना काम करते हैं। यहाँ किसी का लिहाज नहीं है, जैनदर्शन तो इतना बेलिहाज है! बस! स्वतन्त्रता की हद है।
मुमुक्षु :- बाबूजी! ज्ञायक का कितना अकर्तापना रहता है! निर्मल पर्याय हो तो भी वो तो वहाँ का वहाँ, वैसा का वैसा ही रहता है?
पूज्य बाबूजी :- वैसे का वैसा ही रहता है। वो तो ध्रुव है न ! स्तूप है स्तूप बिल्कुल। ज्ञायक जो है वो स्तूप है। ज्ञान का काम उसे उपादेयरूप से जानना है। तो वो उपादेयरूप से जानकर ‘यही मैं हूँ’ बस, यही उसका स्वर है और यही श्रद्धा का स्वर है। पर दोनों का काम न्यारा-न्यारा है। श्रद्धा का काम न्यारा है, कि अहम् करना और ज्ञान भी यहाँ अहम् ही कर रहा है। स्वर दोनों का एक होने पर भी काम दोनों के न्यारे-न्यारे हैं क्योंकि ये ज्ञान अन्य में भी व्यवसाय कर सकता है। अन्य को भी जानता है, लेकिन श्रद्धा में ये नहीं होगा। श्रद्धा के सामने अगर कोई अन्य होगा तो फिर उसका नाम मिथ्यादर्शन होगा। जिस समय ज्ञायक की श्रद्धा हुई, ज्ञायक में अहम् हुआ तो फिर उसके अतिरिक्त फिर पूरे जीवन में, अनन्तानन्तकाल में भी अगर श्रद्धा के सामने कोई दूसरा आ गया तो मिथ्यादर्शन हुए बिना नहीं रहेगा। श्रद्धा ने किसी दूसरे को विषय बना लिया तो मिथ्यादर्शन हो जाएगा। भले ही अन्य पदार्थ हों लेकिन ज्ञायक में अहम् के पश्चात् कोई दूसरा उसका विषय बनता नहीं है।
मुमुक्षु :- ज्ञान भी उपादेयरूप से जानता है ?
पूज्य बाबूजी :- सब उपादेयरूप से ज्ञात होता है। श्रद्धा ने भी उपादेयरूप से ही जाना। इसने भी उपादेयरूप से ही प्रतीति की है। जाना नहीं है, प्रतीति की है।
मुमुक्षु :- ज्ञान में उपादेयरूप से जानना वही ज्ञान का सही स्वरूप है ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! उसमें तो हेय-उपादेय दोनों कोटि होती हैं मगर श्रद्धा में तो एक ही कोटि है। केवल उपादेय अर्थात् अहम्।
मुमुक्षु :- ये ज्ञान का अहम् कैसे होता है बाबूजी ?
पूज्य बाबूजी :- बस वैसा का वैसा ही। ‘यही मैं’ - बस ! हो गया।
मुमुक्षु :- वो तो एकत्वरूप से परिणमन होता है ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ! तो एकत्वरूप परिणमन है, लेकिन स्वर तो वही है न! माने बात तो वही है न एकदम! वो भी उसी तरह वेदन कर रहा है और वो भी उसी तरह प्रतीति कर रही है।
ज्ञान भी कहता है ‘यही मैं’ - सारे गुण ऐसा कहते हैं। सारे गुणों का स्वरूप ऐसा ही है क्योंकि सभी ज्ञायक में ढल जाते हैं न! जिस समय आत्मदर्शन-सम्यग्दर्शन होता है, तो उस समय सारे ही गुण आत्मा की ओर ढल जाते हैं और अपने-अपने योग्य उनकी पर्याय में शुद्धता प्रगट होती है। जैसे चारित्र में किंचित् शुद्धता प्रगट हुई और श्रद्धा और ज्ञान ये दोनों पूरे शुद्ध हो गए। केवलज्ञान की अपेक्षा कमी है वो एक अलग बात है। पर दोनों पूरे हो गए और उधर चारित्र में कमी है, सुख में कमी है और-और बहुत गुण हैं।
ज्ञान की मध्यस्थता
मुमुक्षु :- बाबूजी! यहाँ ज्ञान की मध्यस्थता कहाँ हुई? ज्ञान की मध्यस्थता कौनसे चरण (stage) पर होती है?
पूज्य बाबूजी :- ज्ञान की मध्यस्थता माने सारे जगत के प्रति मध्यस्थ हो गया हो - ये मध्यस्थता। सारे जगत में मेरा कोई नहीं है, सब एक पंक्ति में हैं। एक ओर मैं और एक ओर सारा जगत - ये मध्यस्थता हुई। उसे कोई राग और कोई द्वेष नहीं - ये मध्यस्थता है। जैसे शुद्धात्मा को, अपनी सत्ता को अंगीकार कर लिया तो अन्य जितने भी हैं, वो ज्ञेय-कोटि में चले गए। उसी का नाम मध्यस्थता अर्थात् किसी के प्रति राग और किसी के प्रति द्वेष - ये समाप्त हो गया।
मुमुक्षु :- अन्य को ज्ञेय-कोटि में डाल देने के बाद न किसी के ऊपर राग और न किसी के ऊपर द्वेष?
पूज्य बाबूजी :- कुछ नहीं है। ज्ञान तो निर्णायक है न! ये न्यायाधीश है। Supreme Court (उच्चतम न्यायालय) का न्यायाधीश है, इसका निर्णय फिरता नहीं है। इसलिए सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ है। नहीं कोई इष्ट और नहीं कोई अनिष्ट। कोई राग का विषय नहीं और कोई द्वेष का विषय नहीं। राग और द्वेष ही मेरे नहीं तो उनके विषय का क्या काम? सबके प्रति मध्यस्थ! अपनी पर्यायों के प्रति भी मध्यस्थ।
मुमुक्षु :- कोई पर्याय 100 प्रतिशत शुद्ध हो गई और कोई पर्याय कम होवे, ज्ञान को कोई तकलीफ नहीं?
पूज्य बाबूजी :- हाँ! कैसा भी हो! ज्ञान को उनसे मतलब ही नहीं। उसको एकमात्र उस चिन्मात्र से मतलब रह गया है। श्रद्धा भी उसी की ओर बार-बार जाने का प्रयत्न करती है और ज्ञान भी प्रयत्न करता है।
श्रद्धा के लिए तो वो सार्वकालिक और सार्वदेशिक हो गया। अब अगर जैसे क्षायिक सम्यक्त्व है तो ये तो अनन्तानन्त काल तक केवल एक मात्र उस ज्ञायक को विषय करती रहेगी। बस ज्ञान में है ये बात, क्योंकि उसके विषय अनेक हैं, वो सविकल्प है। श्रद्धा निर्विकल्प होती है। ज्ञान सविकल्प होता है अर्थात् उसमें पदार्थ भेद-प्रभेद सहित अनुभव में आता है। दर्शन निर्विकल्प होता है, तो उसमें भेद-प्रभेद सहित उसका देखना नहीं होता। उसमें केवल सत् रूप में देखना होता है, हर वस्तु केवल सत्, अपना आत्मा भी मात्र सत् रूप में दिखता है।
मुमुक्षु :- श्रद्धा में तो once and for all ( हमेशा के लिए), बस।
पूज्य बाबूजी :- बस! श्रद्धा में तो हमेशा के लिए हो गया। उसमें फरक नहीं पड़ेगा। ज्ञान अन्तर-बाह्य, अन्तर-बाह्य इस तरह से व्यवसाय करता रहता है।
मुमुक्षु :- इसमें सर्वथा लगता है?
पूज्य बाबूजी :- हाँ! श्रद्धा में सर्वथा लगता है।
ज्ञेयाकार में निश्चय-व्यवहार
मुमुक्षु :- प्रश्न है कि स्वपरप्रकाशक ज्ञान की पर्याय का ज्ञेयाकार और ज्ञानाकार धर्म स्वाभाविक है। फिर से, स्वपरप्रकाशक ज्ञान की पर्याय का ज्ञेयाकार और ज्ञानाकार धर्म स्वाभाविक है, तो ज्ञेयाकार धर्म को स्वीकारने से अनुभव होता है कि निषेधने से अनुभव होता है? कृपया समझाईये।
पूज्य बाबूजी :- ज्ञान की जो स्वपरप्रकाशक पर्याय है, वो तो वास्तव में तो स्वप्रकाशक है। वास्तव में जब हम उसका अच्छी तरह से विश्लेषण करते हैं तो वो स्वप्रकाशक ही सिद्ध होती है। अब स्वप्रकाशकता में जो प्रतिभास होता है, उसे ज्ञेयाकार भी कहते हैं और ज्ञानाकार भी कहते हैं। असल में ज्ञेयाकार नहीं है क्योंकि जो ज्ञेयाकार है, वो तो ज्ञेय के पास रहता है। वो ज्ञान के पास नहीं आता, लेकिन उसे ज्ञेयाकर इसलिए कहते हैं कि जैसा ये ज्ञेयाकार अर्थात् ज्ञानाकार, ज्ञान के भीतर हो रहा है, ठीक ऐसा ही ज्ञेय और ज्ञेयाकार बाहर पड़ा हुआ है। इसलिए इसको ज्ञेयाकार कहने से दोनों प्रकार की सिद्धि हो जाती है, निश्चय की भी और व्यवहार की भी। लेकिन पहले निश्चय को जाने। पहले ये जाने कि ये ज्ञेयाकार नहीं बल्कि ज्ञानाकार है। ज्ञानाकार अर्थात् ज्ञान है और मैं हूँ - पहले विकल्प दशा में ये ऐसा निर्णय कर ले! तो फिर उसको ज्ञेयाकार कहने में कोई दिक्कत नहीं है और ज्ञेयाकार कहना चाहिए मगर मानना नहीं चाहिए। उसे ज्ञेयाकार मानना मिथ्यादर्शन और आत्म दर्शन के बाद ज्ञेयाकार कहना व्यवहारनय।
मुमुक्षु :- बहुत सुन्दर! Condition (शर्त) - आत्मदर्शन होने के बाद!
पूज्य बाबूजी :- आत्मदर्शन होने के बाद ही! वरना वो मिथ्यादर्शन है। वो ज्ञेयाकार ही मानता है, ज्ञेय ही मानता है। ज्ञेयाकार और ज्ञेय में कोई फरक नहीं मानता, ज्ञेय ही मानता है।
अधिकांश जिनवाणी में भी ज्ञेयाकार शब्द का प्रयोग हुआ है। लेकिन एक बार कह दिया, फिर बार-बार कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जैसे रेडियो चलता है न तो वो कहते हैं ‘हम दिल्ली से बोल रहे हैं’। अब वो कोई इस बात को दस बार नहीं दोहरायेगा। बीच में एक-आध बार और कह देगा। इस तरह एक बार वो नियम जान लिया कि सचमुच पर का प्रवेश होता ही नहीं है, इसलिए ज्ञानाकार ही है और ज्ञान ही जानने में आता है। ये जितने प्रतिभास हैं वो सब ज्ञान हैं। ज्ञान हैं और वो सभी प्रतिभास जाननभावरूप हैं। वो केवल चित्र नहीं हैं, वो पदार्थों के चित्र नहीं हैं लेकिन वो जाननभावरूप हैं। तो वही जान रहा है और वही जानने में आ रहा है। वो प्रतिभास जो है, वही जान रहा है और वही जानने में आ रहा है, वो ज्ञान ही ज्ञान है।
मुमुक्षु :- ये बात दोहराई जाये बाबूजी कि प्रतिभास जो है…।
पूज्य बाबूजी :- वो स्वयं ज्ञानरूप है और वही जान रहा है और वही जानने में आ रहा है। इसलिए स्वयं ही जानने में आता है, अपनी पर्याय ही जानने में आती है और प्रतिभास वो ज्ञान की पर्याय है। तभी तो हम कह सकेंगे कि ज्ञान की पर्याय ही जानने में आती है।
मुमुक्षु :- प्रतिभास है वो जानन स्वभावरूप है?
पूज्य बाबूजी :- जाननभावरूप है। अपने श्रुतज्ञान में भी पर्याय तो अखण्ड है - एक अखण्ड पर्याय प्रतिभास वाली है, जिसमें अर्थात् जानने में एक तरह से पूरा का पूरा ज्ञेय फैला है। जैसे अणु को जाना या सुमेरु पर्वत को जाना। तो जाना तो सुमेरु पर्वत है। सुमेरु पर्वत है - ये जो वचन है, ये वचन ज्ञान की ओर से देखें तो ज्ञान है। और सुमेरु पर्वत की ओर से कहें तो वो व्यवहार कि सुमेरु पर्वत दिखाई दे रहा है - ये व्यवहार हो गया। ‘सुमेरु पर्वत है’ ज्ञान में ऐसा विकल्प आया, तो ये सुमेरु पर्वत है या ज्ञान है ?
मुमुक्षु :- ज्ञान है।
पूज्य बाबूजी :- दोनों में से क्या है ? ज्ञान है! लेकिन सुमेरु पर्वत की ओर से अगर अपन कहें, क्योंकि उसकी विद्यमानता है न! अब अपन ये दूसरे विकल्प पर ( परप्रकाशकता के विकल्प पर) जाते हैं; तो ये परप्रकाशकता इस तरह सिद्ध हो जाती है कि ‘सुमेरु पर्वत है’। ये बात हमने निश्चय में तो इस तरह जानी कि ये तो ज्ञान ही है, ज्ञानाकार ही है। लेकिन ‘सुमेरु पर्वत है’ इससे ये भी सिद्ध हुआ कि सुमेरु पर्वत नाम की कोई चीज बाहर है और वो जानने में आ रही है, इसका नाम व्यवहार अर्थात् परप्रकाशकता। तो जो परप्रकाशकता है वो स्वप्रकाशकता की ही पर्याय है; माने वो स्वप्रकाशक पर्याय ही है जिसका नाम पर-प्रकाशकता है। अलग से कोई चीज नहीं है। अलग से कोई चीज नहीं है।
दो पर्याय नहीं होती हैं कि एक पर को जान रही हो और एक स्व को जान रही हो - इस तरह दो नहीं होती हैं। उसी के दो विकल्प हैं, स्वप्रकाशकता के ही दो विकल्प ( भेद ) हैं।
परप्रकाशन भी स्वप्रकाशन ही है
मुमुक्षु :- परप्रकाशक है, वही स्वप्रकाशक है।
पूज्य बाबूजी :- वो स्वप्रकाशकता की पर्याय है, जिसे हम ज्ञेय की तरफ से परप्रकाशकता कहते हैं और कहना भी चाहिए; अगर नहीं कहें तो अन्य पदार्थ का लोप होता है क्योंकि निश्चय में तो हम ये कहेंगे कि ‘ज्ञान ही जानने में आ रहा है’। उसका तो एक ही स्वर रहेगा आदि से अन्त तक। क्या जान रहे हो ? कि मैं तो ज्ञान ही जान रहा हूँ, ज्ञान ही जान रहा है ऐसा अगर एकान्त निश्चय रखेगा और उधर व्यवहारनय का जो विषय है कि जगत भी है, तो उसकी सिद्धि कैसी होगी ? तो फिर सर्वज्ञता पर आँच आयेगी, सर्वज्ञ की वाणी पर आँच आयेगी, द्वादशांग पर आँच आयेगी, सब पर आँच आयेगी। इसलिए जो ज्ञानाकार है, असल में जो प्रतिभास है, उस प्रतिभास को ज्ञेय का नाम देना चाहिए और कहना चाहिए, लेकिन मानना नहीं चाहिए।
उसे ज्ञेय मानेगा तो मिथ्यादर्शन हो जायेगा और कहेगा तो व्यवहारनय होगा, वो भी आत्मदर्शन होने की बाद।
मुमुक्षु :- बराबर ! एकदम स्पष्ट! प्रतिभास को ज्ञेयाकार का नाम देना चाहिए !
पूज्य बाबूजी :- देना चाहिए ! इसलिए देना चाहिए कि पदार्थ तो अनेक हैं न। और हर पदार्थ का भिन्न-भिन्न प्रतिभास होता है और अपन केवलज्ञान को लें तो ज्ञान की पर्याय एक अखण्ड है।
जैसे अनन्तानन्त पदार्थ हैं और सबका भिन्न-भिन्न प्रतिभास है, क्योंकि सब भिन्न-भिन्न हैं न! सबका एक ही पर्याय में भिन्न-भिन्न प्रतिभास होता है - इसका अर्थ ये है कि वो एक ही पर्याय सारे पदार्थों के स्वरूप को जान रही है। ये परमाणु है, ये मेरु है, ये घड़ा है, ये कपड़ा है - एक ही पर्याय सबको जान रही है। तो ये घड़ा है, ये कपड़ा है, ये सब प्रतिभास अर्थात् सबके आकार हैं। मानो एक ही ज्ञान पर्याय में अनन्त आकारों का मेला लग गया है; तो वो ज्ञान की पर्याय किस समय कौन से पदार्थ को जान रही है - ये निर्णय कैसे होगा ? क्योंकि एक ही पदार्थ अनेक तरह से होता है। जैसे परमाणु अनेक हैं।
इसी प्रकार निश्चय-व्यवहार पदार्थ में थोड़ी न होता है! ये तो यहाँ अपने ज्ञान में होता है। वहाँ निश्चय-व्यवहार थोड़े ही है। यहाँ तो स्वयमेव स्वतः ज्ञान की सामर्थ्य से अलग-अलग, सब जानने में आ रहा है - अलग-अलग भी और सब सम्मलित और एक भी। पर्याय की ओर से देखें तो एक और ज्ञेयों की ओर से देखें तो न्यारे-न्यारे, सब अलग-अलग, इसतरह जानने में आ रहे हैं।
अपन जब स्वपरप्रकाशकता का निर्णय करते हैं तो अपने को निश्चय-व्यवहार प्रगट होता है। ज्ञान ही जानने में आता है - ये निश्चय; और ज्ञान का विषय उस समय कौन है - इसका नाम व्यवहार क्योंकि असल में ज्ञान को कोई विषय नहीं होता।
भाई! ज्ञान का क्या होगा? ज्ञान का तो ज्ञान ही है न! ज्ञान का कोई सम्बन्ध है क्या किसी से? क्योंकि ज्ञान का विषय कहने से सम्बन्ध प्रगट होता है न? तो क्या ज्ञान किसी के साथ कोई सम्बन्ध वाला है? नहीं है। इसलिए पहले तो ये मानकर चलो कि ज्ञान का कोई विषय नहीं है। वह स्वयं ही उसका विषय है - ये भी व्यवहार है।
वो तो ज्ञायक ही है, अन्त में तो वहाँ जाना है। इसलिए उसको नाम देना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि जैसे किसी ने प्रश्न किया कि भाई! अपने ज्ञान में, श्रुतज्ञान में कौन जानने में आ रहा है? तुम्हारे यहाँ पर जो है सामने 50 घड़े हैं। उन 50 घड़ों में से कौनसा घड़ा जानने में आ रहा है? तो ज्ञान में वो बात निश्चित होना चाहिए न! क्योंकि 50 जानने में आ रहे हैं तो उनमें से वो 50 वाँ कौनसा है? इसलिए वो जो ज्ञान की पर्याय है, उसमें हम point out ( अंकित ) कर देते हैं कि ये है वो; ये घड़ा है वो जो ज्ञान में है। इसका नाम व्यवहार हो गया, परप्रकाशकता हो गया और सिद्धि हो गयी कि बाहर भी 50 घड़े हैं और ज्ञान में भी वैसे के वैसे 50 घड़े बन रहे हैं।
मुमुक्षु :- निगोद के जीव का भी ज्ञान…।
पूज्य बाबूजी :- निगोद के जीव का भी ज्ञान ऐसा का ऐसा ही है। वो भी ऐसे ही जानता है, लेकिन मिथ्या जानता है कि ‘देह मैं हूँ’।
मुमुक्षु :- उसे ज्ञेयों का ज्ञान हो जाता है क्या ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! क्यों नहीं होगा ? ये देह मैं हूँ - उसे ये मान्यता रात और दिन है न ! उसके पास निरन्तर यही तो है और है भी क्या ? कोई परिग्रह नहीं है उसके पास, तो भी निष्परिग्रह नहीं है, महापरिग्रही है।
मुमुक्षु :- मतलब बाबूजी ! ये पूरा जाननभावरूप ही है।
पूज्य बाबूजी :- पूरा जाननभावरूप ज्ञान ही है। आचार्यों ने आत्मा को तो ज्ञानमात्र ही कहा है न ! क्योंकि वह ज्ञान ही है और फिर उसका analysis (विश्लेषण) भी किया, उसका स्पष्टीकरण भी किया कि आत्मा को सिर्फ एक ज्ञान गुणवाला नहीं मान लेना। हाँ ! ये ज्ञान के साथ लिहाज नहीं कर रहे हैं हम। अनन्त गुणवाला है लेकिन ज्ञान ही है ऐसा कहने में जो आत्मा के अनन्त गुण हैं वो भी ज्ञान में ही प्रतिभास्यमान होते हैं। इसलिए सिर्फ ज्ञान को देख लो या अन्य गुणों को देख को या जगत को देख लो, किसी को भी देख लो। सिर्फ ज्ञान देख लो, ज्ञान की एक पर्याय देख लो, बस।
मुमुक्षु :- या तो अन्य गुणों को देख लो या तो समस्त विश्व को देख लो ?
पूज्य बाबूजी :- सबको देख लो। सिर्फ एक ज्ञान की पर्याय को देख लो, इसमें सब कुछ आ गया। अपने अनन्त गुणों का प्रतिभास, अपनी अनन्त पर्यायों का प्रतिभास, अपने द्रव्य का प्रतिभास और सारे जगत का प्रतिभास एक अखण्ड पर्याय में होता है। उन प्रतिभासों के कारण ज्ञान खण्डित नहीं होता क्योंकि ज्ञान तो जाननरूप है। वो सारा प्रतिभास ही जाननरूप है; जाननेरूप है और ज्ञेय भी स्वयं ही है।
मुमुक्षु :- तो बाबूजी! परप्रकाशकपना मात्र पर के अस्तित्व की सिद्धि करता है, बस इतना ही मानें क्या ?
पूज्य बाबूजी :- बस, इतना। अस्तित्व की सिद्धि करना चाहिए न! नहीं करेगा तो ज्ञान निर्मल होना तो दूर है, स्वच्छ भी नहीं रहेगा। इसके ज्ञान ने स्वीकार किया न कि जगत है। ‘जगत है’ तो जगत की ओर से देखेंगे तो इसको ‘जगत का ज्ञान’ कहते हैं और ‘जगत है’ इसको ज्ञान की ओर से देखें तो वो ज्ञान ही है - अन्तर्मुख होने की प्रक्रिया वही है।
मुमुक्षु :- प्रक्रिया वही है बस! प्रयोजनभूत बात वो ही है।
पूज्य बाबूजी :- हाँ! पर को जानता है इसमें तो कर्ता-कर्म भाव पैदा होता है। कर्ता-कर्म भाव का अज्ञान और मिथ्यादर्शन पैदा होता है, क्योंकि ये जानने वाला और पर इसका कर्म। जबकि नियम ये है कि कर्ता और कर्म का अनन्यत्व होता है; वो एक ही पदार्थ में एक ही जगह रहते हैं और कर्ता जो है वो कर्म में व्यापक होता है। तो जानने में अगर किसी दूसरे को मानेंगे तो वो हो गया कर्म और ये हो गया कर्ता। तो दोनों में व्याप्य-व्यापकभाव होकर दोनों एक हो गये, जड़ और चेतन। इससे तो वस्तु व्यवस्था ही खतम हो गयी। इसलिए ज्ञान का ज्ञेय…ज्ञान का ज्ञेय कहना ये सारा व्यवहार है; ये सब व्यवहार-कथन है। कहने मात्र का कथन - ऐसा; मानने का बिल्कुल नहीं। ज्ञान का कोई ज्ञेय नहीं होता, स्व ही ज्ञेय है।
ज्ञान निर्विषयी है
मुमुक्षु :- ये जरा स्पष्ट समझाए कि ज्ञान निर्विषयी है।
पूज्य बाबूजी :- हाँ! क्योंकि ज्ञान ही विषय है। ज्ञान निर्विषयी है अर्थात् ज्ञान का जगत में कौन है? क्या उत्तर है इस प्रश्न का ? जगत में ज्ञान का कौन है?
अगर हम कहें कि ज्ञान के विषय हैं, तब तो ज्ञान के विषय अचेतन हो गये तो ज्ञान से सम्बन्ध हो गया। इसलिए ज्ञान का तो ज्ञान ही है और अन्त में ज्ञान का आत्मा है बस ! ज्ञान का कौन हो सकता है ? कौन है हमारा अच्छा ! हम ज्ञान को गौण करें और आत्मा के लिए पूछें कि आत्मा का जगत में कौन है ? कोई नहीं है। तो ज्ञान का कौन है ?
मुमुक्षु :- आत्मा के अनन्त गुणों को जानने की चेष्टा जो प्रतिभासरूप होती है, तो उसे अभेदरूप जाने जाते हैं कि भेदरूप ?
पूज्य बाबूजी :- भेदरूप भी है और अभेदरूप भी है। भेदरूप भी अभेदरूप भी इस तरह से है कि सबका स्वरूप भिन्न-भिन्न है और वो ज्ञान की एक पर्याय अखण्ड है - इसतरह भेद और अभेद दोनों हैं। अन्त में अभेद कर लेना चाहिए क्योंकि ज्ञान ही है, इसमें क्या देखूँ मैं ? इसमें मुझे क्या देखना है ?
कोई पदार्थ मेरे जानने में आता है इसको तो स्पष्टरूप से मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान-मिथ्याचारित्ररूप अध्यवसान कहा है। अध्यवसान !
ज्ञान का कौन विषय है ? ज्ञान की जो पर्याय है वो अत्यन्त निरपेक्ष पैदा होती है। उसको विषय से क्या मतलब है ? उसका विषय अगर हो तो क्या विषय उसे मदद करता है ? या उसे प्रभावित करता है ? सहायता करता है ? क्या कारण होता है विषय ? तो ज्ञान को विषय की कहाँ जरूरत है ? ज्ञान में तो स्वतः ही सारा जगत आ पड़ता है, अपने आप ही। तो फिर ज्ञान को कहाँ जरूरत है किसी को विषय बनाने की ? ये तो स्वयं स्वतन्त्र, स्वाधीन बिल्कुल निरपेक्ष सबसे, अन्य गुणों से भी निरपेक्ष और आत्मा से भी निरपेक्ष है।
मुमुक्षु :- आत्मा से भी निरपेक्ष हो तो आत्मा में अहंभाव कैसे होता है ? जब ज्ञान आत्मा से निरपेक्ष हुआ तब वो ज्ञायक में अहंभाव कैसे कर सकता है ?
पूज्य बाबूजी :- हो गया न ज्ञायक में अहंभाव तो, वो तो पहले ज्ञायक ही अहम् करने लायक है - ये पहले निश्चय कर लिया। ये तो जिस समय द्रव्य-गुण-पर्याय का विचार किया, तो उस समय ये निश्चय हो गया कि तीनों में से अहम् करने लायक कौन है, उपादेय बनाने लायक कौन है। अपनी पर्याय की जो श्रद्धा है और अपनी पर्याय का जो अहम् है, उसका नाम मिथ्यादर्शन है और मिथ्यादर्शन का फल निगोद होता है।
अपनी पर्याय में अहं मिथ्यादर्शन क्यों
अब हम इस बात पर गहराई से विचार करें कि अपनी पर्याय की श्रद्धा अगर हमने कर ली तो क्या अनर्थ कर दिया ? और आचार्य उसको मिथ्यादर्शन कहकर हमको निगोद भेज रहे हैं। तो हमने क्या बिगाड़ कर लिया अपनी पर्याय की श्रद्धा कर ली तो ? इसका उत्तर कौन देगा उत्तर, अच्छा बताओ ! अपनी पर्याय की श्रद्धा, स्वयं अपनी पर्याय, भले ही निर्मल पर्याय, उसकी श्रद्धा कर ली तो उसका नाम मिथ्यादर्शन है और उसका फल निगोद है। तो क्यों है ? ये इतना बड़ा दण्ड क्यों है ?
मुमुक्षु :- एक समय की पर्याय में अहंभाव किया न उसने ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! तो किया तो किया, उसकी थी वो। क्या झगड़ा पड़ गया उसमें ? इतना बड़ा दण्ड कैसे होना चाहिए ?
मुमुक्षु :- मिथ्यादर्शन कहा…
पूज्य बाबूजी :- हाँ ! तो यही कमी है कि हम सुयुक्ति से निर्णय नहीं करते। बस हाँ में हाँ मिलाते हैं। सुयुक्ति से निर्णय हो कि क्यों है ये बात कि पर्याय में अगर हमने अहम् कर लिया तो वो मिथ्यादर्शन है… मिथ्यादर्शन सबसे बड़ा पाप है, तो उसका फल निगोद होता है। तो क्यों होगा ऐसा ?
मुमुक्षु :- उसकी एक समय की आयु है बाबूजी !
पूज्य बाबूजी :- वो तो एक समय की है, तो है इससे क्या मतलब ? है तो हमारी न ! एक समय ही है तो क्या हो गया ?
मुमुक्षु :- उसका स्थायीपना नहीं है न। अनित्य का, अनित्य पर्याय का… ।
पूज्य बाबूजी :- वो नहीं है कुछ! ये ज्ञान का धर्म है कि वो द्रव्य-गुण-पर्याय में से उपादेय का निर्णय करे और क्योंकि उसने गलत निर्णय किया है इसलिए ये अपराध हुआ। उसने सारे चैतन्य के स्वरूप को बदल दिया, सारे जीवलोक का स्वरूप बदल दिया।
ये ज्ञान का धर्म है कि वो तीनों में से हेय-उपादेय का निर्णय करे, भले उसी के हैं। वरना वो ज्ञान अपराधी है। क्योंकि उसने, जो उपादेय था उसके स्थान पर हेय को चुन लिया; हेय का वरण कर लिया। तो ये फिर सारे जीवलोक का स्वरूप हो गया न। तो उसने स्वरूप ही बदल दिया सारा, तो बहुत बड़ा अपराध है।
मुमुक्षु :- ज्ञान अपने धर्म से च्युत हुआ!
पूज्य बाबूजी :- च्युत हुआ बिल्कुल! कर्तव्य से च्युत हुआ!
मुमुक्षु :- धर्म से नहीं, कर्तव्य से च्युत हो गया। जिसको हेय करना था उसको उपादेय मान लिया, वही उसका बहुत बड़ा अपराध हो गया क्या?
पूज्य बाबूजी :- उसको उपादेय मान लिया, यह बहुत बड़ा अपराध है क्योंकि सारे ही जीवलोक का स्वरूप बदल गया न। सबका स्वरूप बदल गया माने मोक्ष का कपाट (दरवाजा) बन्द कर दिया। समस्त विश्व के प्रति अपराध हो गया, इसलिए जैनदर्शन में किसी का थोड़ा भी लिहाज नहीं है; सिद्ध दशा का भी लिहाज नहीं है।
हर चीज युक्ति से होनी चाहिए। तत्त्वज्ञान में बिना युक्ति के काम चलता ही नहीं है। हर कदम में सुयुक्ति। कुयुक्तियाँ तो कोर्ट में चलती हैं अथवा अज्ञानी की कुयुक्तियाँ चलती हैं। छह दर्शनों की भी कुयुक्तियाँ चलती हैं, वो जैनदर्शन को गालियाँ देते हैं; लेकिन यहाँ सुयुक्ति से निर्णय होता है।
मुमुक्षु :- बाबूजी ! ज्ञान पर्याय की श्रद्धा को मिथ्यादर्शन कहा - ये जरा फिर से बताइये ! क्योंकि एक ज्ञान की पर्याय में अपनापना माना तो ज्ञायक को भूल गया तो ज्ञायक की श्रद्धा छूट गई, परन्तु ज्ञायक और ज्ञान की पर्याय तो एक ही है। एकत्वभाव से एक ही है न !
पूज्य बाबूजी :- ज्ञायक की श्रद्धा छूट गई - ये बात दूसरे नम्बर पर है। पहले नम्बर पर ये है कि ज्ञान को इन तीनों में से हेय-उपादेय का निर्णय करना चाहिए - ये उसका कर्तव्य है क्योंकि वो आँख वाला है। अन्य गुणों को दोष नहीं दिया जाता है। आँख वाला अगर अंधे से टकरा जाए तो आँख वाले को सजा होगी अंधे को सजा नहीं होगी।
इसलिए ज्ञान को निर्णय करना चाहिए कि भले ही ये मेरे हैं, पर मेरे होने पर भी मुझे सदा के लिए कौन निभा सकेगा; ये निर्णय ज्ञान को करना चाहिए। इसमें वो भूल गया, चूक गया; और चूककर उसने हेयतत्त्व कि जो आकुलता पैदा करनेवाला था, उसमें वो ममत्व कर बैठा, अहम् कर बैठा, उपादेयता कर बैठा तो इसलिए अपराधी हुआ। उसने सम्पूर्ण चेतनतत्त्व का सारा स्वरूप ही बदल दिया न कि - वो पर्याय में अहम् करे तो मोक्ष हो जाएगा।
ज्ञान का जो भ्रम और भूल है, उसी से तो सारा संसार खड़ा है। फिर वो चाहे अपने में चूके चाहे पर में चूके। अपने में चूका है तो अपने में जो उपादेय था, जो अनन्तकाल के लिए उसका सहारा था उसको तो वो चूक गया। और जो एक क्षण भी उसको नहीं निभा सकता, पर्याय में अहं करने से उसका सुहाग हर क्षण टूटता है, चूड़ियाँ फूटती हैं; और इसलिए रोता है, चिल्लाता है, सिर फोड़ता है, उसमें अहम् कर बैठा है, तो गलत नहीं हुआ ये ? जैसे परतत्त्व में अहम् कर लिया, पुद्गल के साथ अहम् कर लिया, इसी तरह से ये भी समान कोटि का मिथ्यादर्शन है। समान कोटि का मिथ्यादर्शन ! पुद्गल में अहम् करो या पर्याय में अहम् करो, बराबर का मिथ्यादर्शन है।
मुमुक्षु :- गलती तो एक ही है।
पूज्य बाबूजी :- एक ही गलती है। Miss (छूटा) हुआ, कि कहीं तो रिपटकर उसका सिर फूट गया, कोई जो है नदी में ही बह गया। कुछ भी हुआ लेकिन Miss (छूटा) हुआ तो ये उसकी सजा है।
यथार्थ निर्णय का महत्त्व
मुमुक्षु :- बाबूजी ! वास्तव में आज ये पता चलता है कि यथार्थ निर्णय का महत्त्व क्या है और कितना है। जहाँ तक ये निर्णय नहीं होगा वहाँ तक…
पूज्य बाबूजी :- एक कदम भी आगे नहीं बढ़ेगा। जरा भी ! थोड़ा भी, निर्णय में एक बाल मात्र अगर फरक होगा तो आगे नहीं बढ़ सकेगा और शुद्धतत्त्व नहीं मिलेगा।
मुमुक्षु :- थोड़ा सा compensation (मुआवजा) तो रखिए। कुछ आप रखते ही नहीं हैं।
पूज्य बाबूजी :- अगर कुदरत रखे तो अपन रखें। कुदरत का संविधान कैसे भंग होगा ? ये तो कुदरत का संविधान है कि क्षणिक के साथ ममत्व मत करो, चाहे वो तुम्हारा हो ! क्योंकि वो तुम्हें सदा के लिये निभा नहीं सकेगा। तुम्हारा चूड़ा फूटता ही रहेगा हर समय, सुहाग टूटता ही रहेगा।
मुमुक्षु :- निर्णय के स्वरूप में बालमात्र भी फेर नहीं।
पूज्य बाबूजी :- बालमात्र भी फेर नहीं, इसलिए ज्ञान पहले इतना स्वच्छ होना चाहिए, फिर उसके बाद में निर्मल होता है।
ज्ञान पर्याय में ज्ञायक भाव
मुमुक्षु :- ज्ञान की पर्याय में से ज्ञायकभाव कैसे उभरता है ? कैसे निकलता है ?
पूज्य बाबूजी :- कैसे निकले ? वो तो ज्ञायकाकार हो ही गया।
ज्ञायकाकार होते ही ‘यही मैं हूँ’ बस, ये स्वर पैदा हो गया। क्या निकालना है उसमें से ? ज्ञायक अपनी जगह है। ज्ञान की पर्याय का धर्म ये है कि वो प्रतिभासरूप होती है। वो स्व के प्रतिभासरूप हुई और उसी में अहम् हुआ।
प्रतिभासरूप होती है तो स्व में अहम् हो गया। सारी बात एक ही साथ है। ज्ञायक का प्रतिभास माने ज्ञायक का अहं। उसका दूसरा नाम ही ये है। उसमें अन्तर नहीं है एक क्षण का भी। ज्ञान की पर्याय में ज्ञायक का प्रतिभास हो गया तो श्रद्धा और ज्ञान दोनों तत्काल बोल उठे कि ‘यही मैं, यही मैं’। बस! हो गया सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र; तीनों हो गए।
मुमुक्षु :- क्या ये लक्षपूर्वक होता है बाबूजी ?
पूज्य बाबूजी :- लक्ष तो है ही सही। लक्ष हुआ न! यही, इसी को लक्ष कहते हैं। लक्षपूर्वक और क्या होता है? इसी को लक्ष कहते हैं - ऐसा नहीं है कि वो उसकी ओर देख रही है, इसका नाम लक्ष हो! ये अपने भीतर ही भीतर स्वलक्षी हुई।
ज्ञायक का स्वरूप
मुमुक्षु :- कृपया करके थोड़ा ज्ञायक का स्वरूप समझाइये ?
पूज्य बाबूजी :- ज्ञायक माने जो सदा रहनेवाला त्रैकालिक, जिसमें ज्ञान भरा है उसका नाम ज्ञायक है। सबको जानने की शक्तिवाला उसका नाम ज्ञायक है। अनन्त गुणात्मक, अनन्त शक्तिमय, अविनाशी-अक्षय परमतत्त्व उसका नाम ज्ञायक है। ज्ञायक के कई नाम होते हैं - नित्य, जो अक्षय है बस एकरूप है, जिसका रूप कभी बदलता नहीं। पर्याय का रूप प्रतिसमय बदलता है; भले ही वो वैसे की वैसे होती हो पर बदलती है न! जो पहले चली गई वो गई, अब वो अनन्तकाल में दुबारा नहीं आएगी। वैसी आ सकती है लेकिन वो नहीं आएगी; वो तो गई। जो लहर एक बार समुद्र में मिल गई वो दुबारा आने वाली नहीं है। दूसरी तो दूसरी ही आएगी, और इन सारे परिवर्तनों में वो एकरूप रहेगा, एकरूप चलेगा। नदी एकरूप सारी और लहर जो है, वो आने और जाने वाली।
मुमुक्षु :- सिद्ध परमेष्ठी की पर्याय में भी वही है?
पूज्य बाबूजी :- ये का यही है, यही है। सिद्ध परमेष्ठी की पर्याय में भी यही है बिल्कुल। कुछ फरक नहीं है। ज्ञान ने जो निर्णय किया, उसका निर्वाह सिद्ध परमेष्ठी तक होता है। ये निर्णय ऐसा जबरदस्त होता है। यहाँ जो काम इसने किया वही सिद्ध परमेष्ठी कर रहे हैं। वो भी ज्ञायक की ओर झाँक रहे हैं और ये भी ज्ञायक की ओर झाँकता है।
मुमुक्षु :- उनकी पर्याय भी वही का वही काम करती है ?
पूज्य बाबूजी :- वही का वही काम कर रही है। जहाँ से मोक्षमार्ग शुरू हुआ तो मोक्ष में जाकर वहाँ कुछ बदलाव हो जाए, तो इसका अर्थ ये हुआ कि मोक्षमार्ग दो तरह का हो गया और मोक्षमार्ग बदल गया। यहाँ से जो प्रारम्भ हुआ तो पूर्णता भी ठीक वैसी होगी ही और उसी विधि से होगी; इसलिए आत्मानुभूति कह दिया उन्होंने। आत्मानुभूति एक ही मोक्षमार्ग है, दूसरा नहीं।
मुमुक्षु :- तो हर समय की ज्ञान की पर्याय में ज्ञायकभाव मौजूद है ?
पूज्य बाबूजी :- कहने को, कहने को है। वास्तव में नहीं है। माने तो, तब तो निहाल ही हो गया।
मुमुक्षु :- अनुभूति में आनन्द आता है। तो और गुणों का स्वाद क्यों नहीं ? अकेला आनन्द क्यों आता है ?
पूज्य बाबूजी :- वो आनन्द सब गुणों के निचोड़ को ही कहते हैं। सारे गुणों की जो निर्मल पर्याय हुई उसके निचोड़ का नाम आनन्द है।
मुमुक्षु :- तो ज्ञान में आनन्द आता है न !
पूज्य बाबूजी :- ज्ञान में आनन्द जाना जाता है। आता नहीं है। वो नियम, वो रेखा नहीं टूटेगी। वो रेखा नहीं टूटेगी। वो जो ज्ञान के चारों ओर जो रेखा है, उसका भंग कोई नहीं कर सकता। उसका द्रव्य भी नहीं कर सकता, तो और की क्या बात ?
मुमुक्षु :- बाबूजी ! आपने जो भाई के प्रश्न का जवाब दिया कि ज्ञान में ज्ञायकभाव हर समय मौजूद है। तो आपने बोला कि ये मात्र कहने का है, तो मतलब वास्तविक क्या है ?
पूज्य बाबूजी :- मौजूद होता तो सभी सम्यग्दृष्टि हुए। तो मिथ्यादृष्टि कौन हुआ फिर जगत में ? निगोदिया जीव भी सम्यग्दृष्टि हुआ क्योंकि ज्ञायकभाव मौजूद है उसकी ज्ञान की पर्याय में। कहने को है, क्योंकि वो जानता है कि हाँ ! जाननेवाला हूँ, मैं जानता हूँ। लेकिन वो उसका स्वरूप नहीं जानता। न ज्ञान का स्वरूप जानता है और न जानने वाले का स्वरूप जानता है कि क्या है। वो मिलावट करके जानता है, ज्ञान को मिलावट करके मानता है।
मुमुक्षु :- ज्ञेयों से मिलावट करके मानता है ?
पूज्य बाबूजी :- इसलिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उसको ज्ञायक का प्रतिभास नहीं होता। वास्तव में नहीं होता। ज्ञायक के प्रतिभास का तो नाम ही सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान है। एक बार हो गया फिर क्या है ? यही तो कमी थी अनादिकाल से। ज्ञान आज तक ज्ञायकाकार हुआ ही नहीं।
मुमुक्षु :- अज्ञानी को शक्तिरूप है वो ?
पूज्य बाबूजी :- सभी को शक्तिरूप है, शक्तिरूप क्या होता है उसमें ? शक्तिरूप तो वो स्वयं ज्ञायक मौजूद है। और क्या शक्तिरूप ?
मुमुक्षु :- परमपारिणामिकभाव को पर्याय के बिना का बोला जाता है, वो किस अपेक्षा से कहा ?
पूज्य बाबूजी :- उसका नाम द्रव्य है, क्योंकि भावों में जब उसकी गिनती की गयी, तो भाव में अगर मान लो केवल चार ही कहते हैं हम, तो आत्मा केवल क्षणिक ही क्षणिक होता। इसलिए एक भाव ऐसा भी है कि जो क्षणिक नहीं है बल्कि नित्य रहने वाला है। उसको परम-पारिणामिकभाव कहा। उसी का नाम ज्ञायक और चिन्मात्र तत्त्व-आत्मद्रव्य। परमपारिणामिकभाव द्रव्यरूप होता है।
मुमुक्षु :- अनन्त गुणों के अंश का ज्ञान होता है, श्रद्धा होती है, और केवली को पूर्ण-सम्पूर्णपने अनन्त का ज्ञान होता है ?
पूज्य बाबूजी :- नहीं ! श्रद्धा में फेर नहीं होता। ज्ञान में सिर्फ इतना होता कि ज्ञान में वे अलग-अलग नहीं दिखाई देते। जैसे केवली के ज्ञान में अलग-अलग जानने में आते हैं, उस तरह से श्रुतज्ञान में अलग-अलग जानने में नहीं आते।
मुमुक्षु :- लेकिन केवली का ज्ञान सम्पूर्ण कहा जाता है और छद्मस्थ का आंशिक कहलाता है क्या ?
पूज्य बाबूजी :- सम्पूर्ण का अर्थ यही कि सारे पदार्थों की पर्यायें - ये सब जानने में आ रही हैं इसलिए सम्पूर्ण कहा जाता है। लेकिन वो जो एक ही पर्याय सारे जगत को और सारी पर्यायों को जान रही है, वही आत्मलीन है। इसलिए केवलज्ञान का स्वरूप आत्मलीनता है वास्तव में, छह द्रव्यों का जानना नहीं है। छह द्रव्य को जानना सम्यग्ज्ञान नहीं है; आत्मलीनता सम्यग्ज्ञान है। केवलज्ञान का स्वरूप ही ये है कि जो स्वरूप में केवते हैं अर्थात् क्रीड़ा करते हैं, उसका नाम है केवलज्ञान।
केवलज्ञान और श्रुतज्ञान
मुमुक्षु :- तो फिर बाद में सम्यग्दृष्टि को आंशिक ज्ञान क्यों कहा ?
पूज्य बाबूजी :- आंशिक ज्ञान माने वो तो थोड़ा है। क्षयोपशम ज्ञान है! थोड़ा है इसलिए आंशिक ज्ञान कहा। वो तो आगम की दृष्टि है, वो अध्यात्मदृष्टि नहीं है।
अध्यात्मदृष्टि में तो केवलज्ञान में और श्रुतज्ञान में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि ये भी वही क्रीड़ा करता है और वो भी वही क्रीड़ा करता है और जगत से कोई मतलब नहीं है कि जगत को कितना जानें और कितना नहीं जानें। एक बार जान लिया कि पर है और मेरा नहीं है, बस; तो तीनलोक-तीनकाल को जान लिया, बस!
ज्ञान में यही मुख्य है! स्व और पर का विभाग कि ‘ये चैतन्य ही मैं हूँ’ और इसके अतिरिक्त जितने हैं वो सब पर हैं; ये स्व-पर का विभाग कहलाता है और केवलज्ञान का स्वरूप भी यही है, लेकिन उसमें भिन्न-भिन्न आ जाते हैं। इसमें श्रुतज्ञान में भिन्न-भिन्न नहीं आते, कम आते हैं। तो क्या फर्क पड़ता है उससे? उसमें क्या फर्क पड़ता है। हम यहाँ बम्बई में सबको कितना जानते हैं? कितने लोगों को जानते हैं? बस यही जानते हैं कि सब पराये हैं, अपने मतलब के कोई नहीं हैं।
मुमुक्षु :- पर को अधिक जाना या कम जाना…परन्तु जाना तो पर को ही न!
पूज्य बाबूजी :- हम पर्याय की ओर से तोलने लगते है न! क्योंकि पर्यायदृष्टि पड़ी है इसलिए वो बार-बार वहीं ले जाती है वो; यहाँ भी, परम-अध्यात्म में भी।
यहाँ तो क्या है कि वो जो ध्रुव है, वो उसका प्राण बन गया। मेरा प्राण जो है, ‘मेरा प्राणाधार ये है’ और सिद्ध भी कहते हैं ‘मेरा प्राणाधार ये है’। अब क्या फर्क रहा बताओ आप? और वो भी उसी का वेदन करते हैं, ये भी उसी का वेदन करता है। क्या फर्क रहा सिद्ध में और इसमें? यहाँ आगमदृष्टि को गौण करना पड़ेगा। उससे क्या मतलब है हमें? आगमदृष्टि से कोई सिद्धि ही नहीं होती यहाँ। ये दोनों बराबर हैं। श्रुतज्ञान और केवलज्ञान में अन्तर नहीं है, कुछ अन्तर नहीं है। जैसा ये ज्ञायक को जान रहा है, ठीक वैसे ही सिद्ध जान रहे हैं। कोई अन्तर नहीं है।
हाँ! Quality ( गुणवत्ता ) वही है। Quantity ( मात्रा ) का फर्क नहीं करना, ( नहीं तो ) ; वो भी वही पर्यायदृष्टि होगी। कुछ फर्क नहीं करना।
वो तो अपनी आदत पड़ी हुई है न! जिस समय ये प्रकरण चले न! उस समय तो हमारी आँखें आसमान पर होनी चाहिए। उस समय पिछली बातें याद नहीं आना चाहिए। उस समय आगम याद नहीं आना चाहिए। उसमें आगम का लोप नहीं है बल्कि आगम का आदर है क्योंकि आगम अध्यात्म के लिए ही होता है। आगम से जब हम द्रव्य-गुण-पर्यायवाले पदार्थ को जानते हैं, तो फिर उसी में से हम अध्यात्म निकालते हैं। इसलिए आगम अध्यात्म के लिए ही होता है। पहले आगम होता है फिर अध्यात्म होता है। तो जब आगम जान लिया, तो फिर अध्यात्म में बीच-बीच में क्यों उसको लाना ?
शादी तो हो रही है और सारे घर में उल्लास है। अब घर का एक व्यक्ति बोला कि ठहर जाओ! अभी फेरे नहीं होंगे, शादी नहीं होगी अभी। पहले अपने घर में जितने ( भूतकाल में ) मरे हैं, उन सबको रोओ। ये विवाह है ये ? ये विवाह है ? और ऐसा होता है विवाह में ? याद ही नहीं आती है। उल्लास ही उल्लास! तो हम भी ऐसा ही करते हैं कि जहाँ अध्यात्म की ऊँचाइयाँ चलती हैं, वहाँ आगम को ले आते हैं, तो बिगड़ जाता है वो। वहाँ आगम परतत्त्व है, परतत्त्व है वो!
मुमुक्षु :- इसलिए बाबूजी भावश्रुतज्ञान को जैनशासन कहा ?
पूज्य बाबूजी :- हाँ! जैनशासन है। बराबर है!
मुमुक्षु :- बहुत जल्दी हो रही है आज! घड़ी की गति तेज हो जाती है।
पूज्य बाबूजी :- जल्दी नहीं है इसमें तो देर लगी और अगर वही हो जाए असली, तो फिर अनन्तकाल बीतता है। उसमें कहाँ एक घण्टा है और कहाँ देरी है ?
विवेक की प्रेरणा
मुमुक्षु :- बाबूजी ! सम्यग्दर्शन के बाद जो ज्ञान होता है न उसको ही हम सम्यग्ज्ञान कहते हैं। लेकिन एक समय पहले भी उतना ही, ऐसा ही ज्ञान होता है न तो उसको सम्यग्ज्ञान नहीं कहा ?¹
पूज्य बाबूजी :- लिखकर लाना, लिखकर लाना। इधर दे देना लिखकर। ये असल में गुरुदेव की मर्यादा के विरुद्ध है। गुरुदेव सम्मिलित कक्षा पर सहमत नहीं थे। मैं क्योंकि पूछता नहीं हूँ इसलिए ये प्रवचन जैसा हो जाता है। नहीं तो, मैं भी इसका विरोध करता हूँ कि सम्मिलित कक्षा नहीं होना चाहिए। वो बहुत दूरदर्शिता की बात है, आगम की बात है। उसका बहुत ख्याल रखना चाहिए। इसलिए ये महिला-पुरुष के बीच जगह रखना, ये करना - ये बहुत आवश्यक है। अगर हम इतना ही नहीं कर पाते, तो विवेक को तो हमने कुएं में डाल दिया, अगर हम ये नहीं सोच पाते तो क्योंकि व्यवहार ही हमारा इतना अपवित्र है तो निश्चय कहाँ से प्रगट होने वाला है ?
मुमुक्षु :- तो बाबूजी ! इसका मतलब तो ये कि जब हम जैन-मन्दिर में जाते हैं, तो वहाँ अरिहंत भगवान के सिवाय किसी का गुणगान नहीं होना चाहिए न ? कोई लोग मंदिर में जय बुला देते हैं, ऐसा वास्तव में नहीं होना चाहिए न। दूसरे का कुछ भी…वो विवेक होना चाहिए न।
पूज्य बाबूजी :- होना तो चाहिए।
- यह प्रश्न किसी बहिन ने किया है ?