चालीसा श्री चन्द्रप्रभ सोनागिर
(कृपया धीरे-धीरे, अर्थ समझते हुए, मध्यम स्वर से भक्तिपूर्वक पढ़िए )
रचयिता: पं० प्रेमचंद जैन, शिवपुरी
दोहा
सिद्धक्षेत्र तीरथ महा, सोनागिर शिवथान ।
नंग, अनंग कुमार का, हुआ यहाँ निर्वान ॥
मोक्ष गये मुनिवर यहाँ, साढ़े पाँच करोड़ ।
सबको शीश नवाय कर, नमन करूँ कर जोड़ ॥
चन्द्रप्रभ का समोशरण, आया सत्रह बार ।
भव्यों ने समझा यहाँ, मोक्षमार्ग हितकार ॥
छंद - हरिगीतिका
श्री चन्द्रप्रभ जिनराज का, मंदिर मनोहारी यहाँ ।
प्रतिमा दिगंबर वीतरागी, भव्य खड़गासन महा ॥
हे महासेन नरेन्द्र सुत ! तुम, परम पद को पा लिया ।
निज आत्मा में पूर्ण लय हो, कर्म-मल का क्षय किया ॥
अध्यात्म चालीसा जपूं, गुणगान करने आपका ।
चाहूँ यही फल, नाश हो, संसार के संताप का ॥
तुम परम पावन हो प्रभो ! चैतन्य-रत्न-करण्ड हो ।
गुण पिण्ड हो, चित् पिण्ड हो, सुखपिण्ड और अखण्ड हो ॥
अद्भुत अतीन्द्रिय हो अहो ! तुम अनुपमेय, सुरम्य हो ।
अज, अचल, अविनाशी, अजर, अविकार, अनुभव गम्य हो ॥
तुम शुद्ध अन्तः तत्त्व हो, स्वाधीन, वचनातीत हो ।
निर्भय, निरामय, नित्य हो, अविकल्प उदयातीत हो ॥
अकषाय, अनुपम, अमल हो, निर्मोह, नित निर्दोष हो ।
तुम पतित-पावन हो प्रभो ! आनन्द का घन-कोष हो ॥
हे वीतरागी देव ! तुम, अक्षय, अनादि, अनन्त हो ।
निष्कर्म, ब्रह्मा, विष्णु हो, शंकर तथा अरिहन्त हो ॥
ऐसी अजब प्रभुता धरो, जो लेश खण्डित हो नहीं ।
अपने चतुष्टय में रहो, आते न जाते तुम कहीं ॥
निष्क्रिय-स्वभावी हो अतः, निष्कम्प रहते हो सदा ।
रागादि विकृत भाव से, तुम शून्य रहते सर्वदा ॥
चारित्र, दर्शन, ज्ञान, सुख, बल, पूर्ण विकसित हो गये ।
चिद्रूप में तद्रूप हो तुम, अजर, अविनाशी भये ॥
भेदों रहित सामान्य सत्ता, देखते हशि शक्ति से ।
हर वस्तु को सविशेष जानो, ज्ञान की अभिव्यक्ति से ॥
निर्वांच्छ हो अतएव कुछ नहिं, ग्रहण करते, त्यागते ।
हर द्रव्य, गुण, पर्याय को, प्रत्यक्ष युगपत् जानते ॥
अब स्वच्छता ऐसी हुई, सब ज्ञेय झलकें ज्ञान में ।
अविराम आनन्दित रहो, अब क्लेश लेश न आप में ॥
दु:ख-मुक्त, सुख-संयुक्त हो, उदयादिभाव विमुक्त हो ।
परमात्म पद में गुप्त हो, निज आत्म-वैभव युक्त हो ॥
तुम सर्वज्ञानी, सर्वदर्शी सर्वव्यापी बुद्ध हो ।
शाश्वत, स्वयंभू हो प्रभो ! आनंदकंद विशुद्ध हो ॥
दुख-द्वंद-फंद निकन्द हो, त्रयलोक-वंद्य जिनेन्द्र हो ।
मोहांधकार विनाश को तुम, पूर्णमासी चन्द्र हो ॥
हे प्रभु ! निजातम ओर मेरी, रुचि सदा बढ़ती रहे ।
अनुभूति की धारा प्रभो ! उर में सतत बहती रहे ॥
मैं रत्नत्रय को प्राप्त कर, शिवमार्ग पर बढ़ता रहूँ ।
निर्वाण जब तक हो नहीं, निज रूप को भजता रहूँ ॥
विनती यही है हे प्रभो ! मुझ पर अनुग्रह कीजिये ।
मुझ दास को भी शीघ्र ही, अब आप सम कर लीजिये ॥
दोहा
चन्द्रप्रभो ! तम चरण में, विनती है कर जोर ।
मम परिणति प्रतिपल झुके, शुद्धातम की ओर ॥
उपादेय हो स्वात्मा, शेष सभी हों हेय ।
श्रद्धा का श्रद्धेय हो, बने ज्ञान का ज्ञेय ॥