सम्यग्दर्शन का विषय (द्वितीय)
(पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी एवं उनका जीवन-दर्शन )
‘अहंमय ध्रुव’ श्रद्धा का श्रद्धेय नहीं होता। श्रद्धा का श्रद्धेय इतना पूर्ण एवं सर्वोपरि होता है कि वह उसमें अपने को मिलाने का अवकाश नहीं पाती। वास्तव में ‘पूर्ण’ में ‘पूर्ण के अहं’ के मिलने की भी कोई गुंजाइश नहीं है।
और तो और सम्यग्दर्शन के घर में स्वयं सम्यग्दर्शन के रहने के लिए भी कोई जगह नहीं है। उसने अपना कोना-कोना ध्रुव के लिए खाली कर दिया है।
पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी इस युग के एक महान् एवं असाधारण -व्यक्तित्व हैं। उनके बहुमुखी-व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने सत्य से बहुत दूर जन्म लेकर स्वयं-बुद्ध की तरह स्वयं सत्य का अनुसंधान किया एवं अपने प्रचण्ड-पौरुष से जीवन में उसे आत्मसात् किया। इस जीवन में शुद्ध-अन्तस्तत्त्व की देशना के लिए उन्हें किन्हीं गुरु का योग नहीं मिला, फिर भी उन्होंने तत्त्व को पा लिया; क्योंकि सद्गुरु की देशना को वे इस जीवन से पूर्व ही उपलब्ध कर चुके थे। पूर्व-देशना से प्राप्त उनका तत्त्वज्ञान इतना परिपूर्ण एवं परिमार्जित था कि वह इस भवान्तर तक भी उनके साथ रहा और उसी ने उन्हें आलोक दिया। उन्होंने तो आगम की नैसर्गिक पद्धति में तत्त्व को उपलब्ध कर ही लिया, किन्तु मेरी कल्पना यह है कि इस युग में अन्तस्तत्त्व के बोध के लिए यदि वे किसी को अपना गुरु स्वीकार कर भी लेते, तो भी उन्हें तत्त्व की उपलब्धि सम्भव नहीं थी; उस समय यह तत्त्व प्रायः अभावग्रस्त था। यहाँ तक कि जीवन के सहज-क्रम में जो दीक्षा-गुरु उन्हें मिले थे, तत्त्व की शोध एवं उपलब्धि के लिए उनका मोह भी उन्हें छोड़ना पड़ा।
सौराष्ट्र के ‘उमराला’ ग्राम में जन्मे ‘उजम्बा’ एवं ‘मोती’ के ये लाल बाल्यकाल से ही विरक्त-चित्त थे और एकमात्र ज्ञान एवं वैराग्य के प्रकरण ही उन्हें पंसद थे। अपनी उदात्त, लोकोत्तर-आकांक्षाओं के समक्ष उन्हें कामिनी का माधुर्य परास्त नहीं कर सका; फलस्वरूप किसी भी मूल्य पर वे उसे जीवन में स्वीकार करने को सहमत नहीं हुए। अन्तर में भोगों से विरक्ति बढ़ती ही गई और अन्त में 24 वर्ष की भरी जवानी में वे ‘स्थानकवासी-सम्प्रदाय’ में साधु-पद पर दीक्षित हो गये। दीक्षा के नियमानुसार घर-बार, कुटुम्ब-परिवार, धन-सम्पत्ति सब छूट ही गये और दीक्षा के आचार का भी दृढ़ता से पालन होने लगा; किन्तु ‘शान्ति की हूक’ शान्त नहीं हुई, शोध की प्रेरणा प्रशान्त नहीं हुई और अन्तर्द्वन्द्व चलता ही रहा। अतः अधिक समय तक वह प्रतिबन्ध सह्य न हो सका और एक दिन (वि.स. 1991) मस्त-मतंग की तरह उसे भी छोड़कर चल दिये एवं तत्त्व की मस्ती में घूमते श्री कानजीस्वामी का स्वर्णपुरी (सोनगढ़) सहज ही विश्राम-स्थल बन गया।
श्री कानजीस्वामी के जीवन का यह स्थल सर्वाधिक-मार्मिक, स्तुत्य, लोक-मांगल्य-विधायक एवं वरेण्य है, जहाँ उन्होंने जीवन के सबसे भयंकर-शत्रु ‘मताग्रह’ को खुली चुनौती दी और अन्त में विजयी हुए। जीवन में गृह-कुटुम्ब, कंचन-कामिनी, पद एवं प्रतिष्ठा सभी कुछ तो छूट जाते हैं; किन्तु महान् से महान् ऋषि, मुनि एवं मनीषियों का बौद्धिक-धरातल इस मताग्रह के प्रचंड-पाश से मुक्त नहीं हो पाता। फलस्वरूप दृष्टि निष्पक्ष नहीं हो पाती और असंख्य-प्रयत्नों में भी सत्य आत्मसात् नहीं होता।
श्री कानजीस्वामी इस युग के एक शुद्ध आध्यात्मिक-क्रान्ति-दृष्टा-पुरुष हैं। उन्होंने जिस क्रान्ति का सूत्रपात किया, ऐसी क्रान्ति पहिले शताब्दियों में भी नहीं हुई। जैन-लोक-जीवन की श्वासें रूढ़ि, अन्धविश्वास, पाखंड एवं कोरे-कर्मकांड की कारा में घुट रही थीं। इसके आगे धर्म कोई वस्तु ही नहीं रह गया था। इन महापुरुष ने शुद्ध-जिनागम का मन्थन कर इन जीवन-विरोधी-तत्त्वों को ‘अधर्म’ घोषित किया और इस निकृष्ट-युग में शुद्ध-आत्मधर्म की प्राण-प्रतिष्ठा की। उन्होंने जन-जीवन को एक सूत्र दिया “स्वावलंबन अर्थात् निज-शुद्ध-चैतन्यसत्ता का अवलंबन ही धर्म है। परावलम्बन में धर्म अथवा शान्ति घोषित करनेवाली सभी पद्धतियाँ ‘अधर्म’ हैं; फलस्वरूप विश्वसनीय नहीं हैं।”
जिस समय भारत-वसुधा पर पूज्य श्री कानजीस्वामी का अवतरण हुआ, उस समय भी आध्यात्मिक-चिंतन का रिवाज तो था; किन्तु उस चिंतन में अध्यात्म नहीं था। आध्यात्मिक-चिंतन का यह स्वरूप हो चला था कि आत्मा को कहा तो शुद्ध जाता था; किन्तु वास्तव में माना अशुद्ध जाता था अथवा यदि शुद्ध माना भी जाता था, तो आगम-भाषा के दासत्व के कारण शुद्ध-निश्चयनय से शुद्ध माना जाता था और व्यवहारनय से ‘अशुद्ध’। इसतरह श्रद्धा के लिए कोई धरती ही नहीं रह गयी थी और दो नयों की चक्की में धान की तरह पिसकर आत्मा की मिट्टी-पलीत हो रही थी। बड़े से बड़े विचारक, महान्-प्रतिभायें, त्याग और वैराग्य के आदर्श ‘नय की इस चक्रीयता’ में इसतरह मुग्ध थे, कि न तो उसमें से निकलने का उनका मन था और न सामने कोई रास्ता। सौराष्ट्र के इस संत ने जंगलों के निर्जनों में ‘समयसार’ एवं ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ जैसे परमागमों एवं ग्रन्थों का गम्भीर-अवगाहन कर इस आध्यात्मिक-समस्या का सरलतम-समाधान प्रस्तुत किया।
वस्तुतत्त्व-दर्शन
उन्होंने कहा-‘‘विश्व के सभी जड़-चेतन पदार्थ स्वयं-सिद्ध अनंत-शक्तिमय एवं पूर्ण हैं। वे एक-दूसरे से अत्यंत-भिन्न अपनी स्वरूप-सीमा में ही रहते हैं और एक-दूसरे का स्पर्श तक नहीं करते। अतः सभी जड़-चेतन सत्तायें नितान्त-शुद्ध हैं। आत्मा भी एक ऐसी ही स्वयंसिद्ध, निरपेक्ष, शुद्ध चैतन्य-सत्ता है। श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र, आनन्द आदि उसकी असाधारण-शक्तियाँ अथवा स्वभाव हैं, जो शाश्वत उसी में रहते हैं। वह अपने में परिपूर्ण एवं अन्य से अत्यन्त-भिन्न है। अतः वह एक शुद्ध एवं स्वतन्त्र-सत् है; क्योंकि जो सत् अथवा सत्ता है, वह स्वतन्त्र, पूर्ण एवं पवित्र होना ही चाहिए; अन्यथा वह सत् कैसा ? जो जड़ है, वह पूरा जड़ हो एवं चेतन पूरा चेतन। अपूर्ण-जड़ अथवा अपूर्ण-चेतन का स्वरूप भी क्या हो ? अतः भिनन्त्व, पूर्णत्व एवं एकत्व ‘सत्’ का स्वरूप ही है।
विश्व के दर्शनों में जैनदर्शन का यह एक मौलिक-अनुसंधान है। अपने अनुसंधान में उसने कहा - ‘‘वस्तु का एकत्व ही उसका परम-सौन्दर्य है। संबंध की वार्ता विसंवाद है।’’
विश्व के प्रत्येक पदार्थ के दो अवयव हैं-एक उसकी अनन्त-शक्तिमय ध्रुव-सत्ता, जिसे ‘द्रव्य’ कहते हैं और दूसरी उसकी प्रतिसमय बदलनेवाली पर्याय। आत्म-पदार्थ के भी इसीप्रकार दो अवयव हैं-एक उसकी श्रद्धा, ज्ञान, आनन्द आदि अनन्त-शक्तिमय, ध्रुव, शुद्ध एवं पूर्ण-सत्ता एवं दूसरी उसी श्रद्धा, ज्ञान आदि पर्याय ( मानने-जानने आदि रूप पर्याय)। आत्म-सत्ता का ऐसा परिशुद्ध-स्वरूप स्थापित हो जाने पर आत्मा की श्रद्धा, ज्ञान ( जानने-माननेवाली पर्याय ) वृत्ति का केवल एक ही काम रहा कि ‘वह आत्मा को पूर्ण एवं शुद्ध ही माने, ऐसा ही जाने एवं ऐसा ही अनुभव करे एवं अन्य सभी जड़-चेतन पदार्थों को अपने से भिन्न जाने।’ किन्तु आत्मा की इस वृत्ति में सदा से ही यह अज्ञान एवं अविश्वास रहा कि उसने अपने को ‘शुद्ध’ एवं ‘पूर्ण’ माना ही नहीं, अतएव अपनी पड़ौसी देहादि-सत्ताओं में ही मुग्ध रही। उन्हीं में अहं किया एवं उन्हीं में लीनता।
पर-सत्ताओं में ‘अहं’ की यह वृत्ति महान्-व्यभिचारिणी है, क्योंकि उसमें विश्व की अनन्त-सत्ताओं को अपने अधिकार में लेकर उनमें रमण करने की चेष्टा है। अतः विश्व की स्वतन्त्र एवं सुन्दर-व्यवस्था को समाप्त कर देने की यह हरकत विश्व का सर्व-महान अपराध हुआ और उसकी दंड-व्यवस्था में ‘निगोद’ फलित हुआ।
जीव के अनादि-अज्ञान का कारण व निवारण
परिशुद्ध कांचन-तत्त्व होने पर भी आत्मा की वृत्ति में इतना लम्बा एवं ऐसा भयंकर-अज्ञान क्यों रहा ? उसका उत्तर आत्मा से दूर कहीं अन्यत्र तलाश करना एक दार्शनिक-अपराध होगा, क्योंकि भिन्न-सत्ता की वस्तुओं में कारण-कार्य-भाव कभी भी घटित नहीं होता। अतः इसका उत्तर स्वयं आत्मा में ही निहित है और वह यह है कि आत्मा ने सदा से स्वतः ही यह अज्ञान-परिणाम किया और वह स्वयं ही अज्ञानी रहा।
जैसे-एक लौकिक-प्रश्न है कि महान्-बलशाली, पराक्रमी एवं अतुल-वैभव-सम्पन्न एक सम्राट की महारानी दरिद्री-महावत पर मुग्ध क्यों हो गई ? उसका कारण यदि हम महावत को मानें, तो सम्राट् तो उससे कहीं बहुत अधिक है फिर महावत का मोह कैसा ? अतः पूर्ण-अनुसंधान के बाद हमारा अन्तिम-समाधान यही होगा कि यह तो महारानी की अपनी स्वाधीन-परिणति ही है। उसके मनोविकार का कारण भी अत्यन्त पर-निरपेक्ष ही है। कथन में कर्मोदय आदि की सापेक्षता आ जाती है, किन्तु भाव तो निरपेक्ष ही रहता है; क्योंकि यदि कोई दूसरा आत्मा को अज्ञानी बनावे, तो कोई ज्ञानी भी बना सकेगा और पुनः कोई अज्ञानी बना देगा। इसप्रकार आत्मा किसी के हाथ की कठपुतली मात्र रह जायेगा और उसके बन्ध-मोक्ष के सभी अधिकार छिन जावेंगे और यह तो एक मखौल ही होगा।
फिर एक प्रश्न है कि इतने लंबे एवं जटिल-अज्ञान का अन्त कैसे हो ? तो यह प्रश्न स्वयं ही अपना उत्तर है। ‘अज्ञान का अन्त कैसे हो’ ज्ञान में इस सबल-विचार का उत्पाद ही अज्ञान का प्राणान्तक है, क्योंकि प्रबल-अज्ञान में ऐसा समर्थ-विचार होता ही नहीं।
अनादि-अज्ञान के प्रवाह में शुद्धात्मानुभूति-सम्पन्न किन्हीं ज्ञानी-सत्पुरुष का सुयोग मिलने पर जो महान्-उद्यमशील, आत्मा उनकी कल्याणी-वाणी को हृदयंगम करता है, उसका अनादि का अज्ञान शिथिल होकर इस समर्थ-विचार में प्रवृत्त होता है। ज्ञानी-गुरु के सुयोग एवं उनकी वाणी-मात्र से यह नहीं होता; वरन् गुरु की वाणी का मर्म जिसे अपने ज्ञान में प्रतिभासित हुआ है, उसे यह विशुद्ध-चिंतनधारा प्रारम्भ होती है।
एक प्रश्न हमारा और हो सकता है कि अज्ञानी को ज्ञान ही नहीं है, वह यह सब कैसे करता होगा ? तो ऐसा नहीं है कि उसके पास ज्ञान का अभाव है। अज्ञानी के पास ज्ञान तो बहुत है, किन्तु पर-सत्ता-सक्ति के कारण उसके ज्ञान का सूक्ष्मातिसूक्ष्म-व्यवसाय भी पर में ही होता है। किन्तु यही ज्ञान सद्गुरु-भगवन्त से आनन्द-निकेतन स्व-सत्ता की महिमा सुनकर उसके प्रति उग्र-व्यवसाय करके सम्यग्ज्ञान में परिणत हो जाता है और अतीन्द्रिय-आनन्द का वेदन करने लगता है।
अज्ञानी के ज्ञान का यह ईहात्मक-प्रश्न है कि ‘अज्ञान का अन्त कैसे हो ?’ अज्ञान को एक खुली चुनौती है। इस प्रश्न में अज्ञानी को अज्ञान का स्वरूप विदित हो चुका है। अब वह समझने लगा है कि मेरी चैतन्य-सत्ता तो अनादि-अनंत, पूर्ण, ध्रुव, अक्षयानन्द-स्वरूप एवं सर्व-संबंध-विहीन है और मेरी ही वृत्ति ने उसे नश्वर, अपूर्ण, दुःखी, अज्ञानी एवं पराधीन कल्पित किया है। यही मेरा अज्ञान था और अज्ञान आत्मा की पर्याय होने पर भी झूठा होने से कभी भी अनुशीलन के योग्य अर्थात् श्रद्धेय नहीं है, क्योंकि अज्ञान के अनुशीलन में कभी भी सही-आत्मसत्ता की उपलब्धि नहीं हो सकती।
इसप्रकार अज्ञान को वह स्व-सत्ता विरोधी एवं नितान्त-मिथ्या मानकर अज्ञान एवं अज्ञान से प्रादुर्भूत, परावलम्बी पुण्य एवं पाप की वृत्तियों एवं अनन्त पर-सत्ताओं से एकत्व तोड़ता हुआ एवं समर्थ-भेदज्ञान के बल से स्व-सत्ता में ही एकत्व एवं अहं की स्थापना करता हुआ अपने अविराम-चिन्तन द्वारा जब महामहिम, आनन्द-निकेतन निज-चैतन्यसत्ता में ही अलख जगाता है, तो सदा से पुण्य-पाप जैसी पर-सत्ताओं में पड़ा श्रद्धा का अहं कंपित एवं विडोलित होकर स्खलन को प्राप्त होता है और लौटकर अपनी ध्रुव-अक्षत सत्ता में ही अहंशील होता है। स्वरूप के अहं में धारावाहिक-सक्रिय इस गौरवमय-वृत्ति को ही ‘सम्यग्दर्शन’ कहते हैं।
श्रद्धा का स्व-सत्ता में अहं परिणत होने के ही क्षण में श्रुतज्ञान की अविराम-चिंतनधारा मन का अवलम्बन तोड़ती हुई विराम को प्राप्त होकर उसी शुद्ध-चैतन्यसत्ता में एकत्व करती हुई अतीन्द्रिय- आनन्द की अनुभूति करती है। उपयोग की यह परिणति ही ‘सम्यग्ज्ञान’ है, जो अनुभूति का विलय हो जाने के उपरान्त भी भेद-विज्ञान की प्रचंड-क्षमता को लेकर सम्यग्दर्शन के साथ निरंतर बना रहता है और उसी समय किंचित्-रागांशों के अभाव से उत्पन्न अल्प-स्वरूप-स्थिरता ही ‘स्वरूपाचरण-चारित्र’ है।
इसप्रकार परम-आनन्दस्वरूप यह अनुभूति श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र की त्रिवेणी है और साक्षात्-मोक्षमार्ग है।
जैनदर्शन का यह चिंतन सचमुच कितना वैज्ञानिक है कि जहाँ वह यह प्रतिपादन करता है कि जीवन-कला का आरम्भ ही जीवन-तत्त्व (निज अक्षय सत्ता) के स्वीकार से होता है, इसीलिए साधना के प्रथम-चरण में उसने सम्यग्दर्शन को स्थापित किया और कहा कि इसके बिना सर्वबोध एवं जीवन की सर्व आचार-संहिता मिथ्या ही होती है।
आत्म-पदार्थ की अनैकान्तिक-दृष्टि
सम्यग्दर्शन जैसी जीवन की महान्-उपलब्धि एवं उसके विषय को हृदयंगम करने के लिए यदि हम आत्म-पदार्थ के द्रव्य-पर्यायस्वरूप पर अनैकांतिक-दृष्टि से विचार करें, तो निर्णय बड़ा ही सरल हो जायेगा।
यह निर्विवाद है कि आत्म-पदार्थ के दो अंश हैं-‘द्रव्य’ एवं ‘पर्याय’। आत्म-पदार्थ का ‘द्रव्य’ अंश जिसे शुद्ध-चैतन्यसत्ता, कारण-परमात्मा, परम-पारिणामिकभाव भी कहते हैं; सदा पर से भिन्न, अक्षय, अनन्तशक्तिमय, पूर्ण, ध्रुव, अत्यन्त शुद्ध एवं पूर्ण-निरपेक्ष है। उसमें कुछ भी करने का कभी भी अवकाश नहीं है और वह सदा ज्यों का त्यों रहता है। आत्मा के द्रव्यांश का यह स्वरूप प्रसिद्ध हो जाने पर अब उसका दूसरा-अंश ‘पर्याय’ शेष रह जाती है। यदि हम पर्याय की कार्य-मर्यादा पर विचार करें, तो हमारे मन में स्वाभाविक ही एक प्रश्न पैदा होगा कि ‘द्रव्य के पूर्ण एवं शुद्ध-सिद्ध हो जाने पर पर्याय को तो द्रव्य में कुछ करना ही नहीं रहा, तब फिर पर्याय का कार्य क्या होगा ?’ तो उसका एक सरल-उत्तर है कि जब आत्मा का स्वभाव ही श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र, आनन्द आदि है, तो उसकी पर्याय का कार्य भी नित्य-विद्यमान द्रव्य की श्रद्धा, उसी का अहं, उसी की अनुभूति एवं उसी की लीनता करना रहा और पर्याय का स्वरूप भी आलम्बनशीलता ही है, वह द्रव्य की रचना नहीं करती, द्रव्य में कोई अतिशय नहीं लाती; वरन् द्रव्य जैसा है, वैसी ही उसकी प्रतीति एवं अनुभूति करती है। द्रव्य तो ज्ञान एवं अज्ञान दोनों दशाओं में ज्यों का त्यों रहता है। इसप्रकार अनैकांतिक-पद्धति में आत्म-पदार्थ के दो अंश ‘द्रव्य’ एवं ‘पर्याय’ की स्वरूप-सीमा भी स्थिर हो जाती है और आत्म-पदार्थ दो अंशों में खण्डित न होकर द्रव्य-पर्यायस्वरूप पूरा बना रहता है।
गुण-पर्याय का ‘अहम्’ भी ‘मिथ्यादर्शन’
आत्मा द्रव्य-पर्यायस्वरूप होने पर भी द्रव्य और पर्याय का स्वरूप परस्पर-विरुद्ध होने के कारण श्रद्धा का अहं एक ही साथ दोनों में नहीं हो सकता। जैसे एक स्त्री का अहं एक ही साथ ‘स्व’ एवं ‘पर’ दो पुरुषों में नहीं हो सकता। नित्य-द्रव्य के अहं में ‘मैं अक्षय हूँ’ ऐसी अनुभूति होती है और अनित्य-पर्याय के अहं में ‘मैं क्षणिक हूँ’ ऐसा संवेदन होता है। पर्याय का स्वरूप भी विविध-रूपा है। वह क्षणिक है, आलम्बनवती है, वर्तमान में विकारी है, भूत एवं भविष्य का वृत्ति-समुदाय वर्तमान में विद्यमान ही नहीं है एवं समग्र ही वृत्ति-समुदाय गमनशील है, उसमें विश्राम नहीं है। पथिक को गमन में नहीं, गन्तव्य में विश्राम मिलता है; क्योंकि गन्तव्य ध्रुव एवं विश्रामस्वरूप होता है। इसीप्रकार आत्मवृत्ति को वृत्ति में नहीं ध्रुव में ही विश्राम मिलता है। वृत्तियाँ तो स्वयं ही विश्राम के लिए किसी सत्ता को तलाशती हैं। इसप्रकार समग्र ही वृत्ति-समुदाय दृष्टि (श्रद्धा) के विषय-क्षेत्र से बाहर रह जाता है। इसी अर्थ में आचार्यदेव श्री अमृतचंद्र ने कहा कि ‘‘बद्ध-स्पृष्टादि-भाव आत्मा के ऊपर ही ऊपर तैरते हैं, उनका आत्मा में प्रवेश नहीं होता।’’
इस संबंध में कुछ और भी तथ्य विचारणीय हैं। आत्मा एक अनादि-अनन्त, ध्रुव एवं अक्षय सत्ता है। गुण एवं पर्याय तो उसके लघु-अंश हैं और वह एक ही सदा इनको पीकर बैठा है। अतः गुण-पर्याय के अनन्त-सत्त्वों से भी वह एक चिन्मय-सत्ता बहुत अधिक है। पर्याय जब उस अनन्तात्मक एक का ‘अहं’ एवं ‘अनुभव’ करती है, तो उस एक की अनुभूति में अनन्त ही गुणों का स्वाद समाहित हो जाता है। इसके विपरीत एक-एक गुण-पर्याय की अनुभूति की चेष्टा स्वयं ही वस्तुस्थिति के विरुद्ध होने से कभी भी फलित नहीं हो पाती, अतः प्रतिक्षण आकुलता ही उत्पन्न करती है; क्योंकि वस्तु के प्रत्येक प्रदेश में अनन्त-गुणों की समष्टि इस तरह संगठित एवं एकमेक होकर रहती है कि उनमें से किसी एक के अनुभव का आग्रह अनंतकाल में भी साकार नहीं होता, वरन् अज्ञानी अपनी इस चेष्टा में प्रतिक्षण विफल-प्रयास होने से निरन्तर प्रचण्ड-आकुलता को उपलब्ध करता रहता है। गुण-पर्याय के अहं में अनन्त गुण-पर्याय की एकछत्र-स्वामिनी भगवती-चैतन्य-सत्ता का महान-अपमान भी होता है। अतः गुण-पर्याय का अहं भी जड़-सत्ता का महान्-अवसान भी होता है। अतः गुण-पर्याय का अहं भी जड़-सत्ताओं के अहं के समान ‘मिथ्यादर्शन’ ही है।
आत्मा के द्रव्य-गुण-पर्याय एक ही समय में ज्ञान के विषय तो बनते हैं; किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि इनको अहं भी एक ही साथ समानरूप से समर्पित किया जाये। अनेक को एकसाथ जानना एक बात है और फिर उनमें से श्रद्धा (अहं) के विषय का चयन करना बिलकुल-भिन्न दूसरी-बात है। सभी ज्ञेय ‘श्रद्धेय’ नहीं होते, वरन् आत्मा के द्रव्य-गुण-पर्यायमय परस्पर-विरुद्ध स्वरूप को जानकर ज्ञान ही यह निर्णय लेता है कि ये तीनों समानरूप से उपादेय नहीं हो सकते, वरन् तीनों में मात्र निरपेक्ष, निर्भेद एवं निर्विशेष द्रव्य-सामान्य ही ‘उपादेय’ अथवा ‘श्रद्धेय’ होने योग्य है। अन्य की उपादेयता स्पष्टरूप से मिथ्यादर्शन है।
ज्ञान का ‘अनेकान्त’ व दृष्टि का ‘एकान्त’-स्वरूप ज्वलंत-प्रश्न का सरल-समाधान
एक वार्त्ता यह भी बहुलता से चलती है कि जब एकान्त-पर्यायदृष्टि अर्थात् पर्याय का अहं ‘मिथ्या’ एवं ‘आकुलता-स्वरूप’ है, तो एकान्त-द्रव्यदृष्टि भी मिथ्या एवं आकुलतामय होना चाहिए ?
यह तर्क ठीक ऐसा ही लगता है कि गर्त में गिरना यदि एकान्त-कष्टमय है, तो सदन का निवास भी एकान्त-कष्टप्रद ही होना चाहिए; किन्तु यह तर्क तो स्पष्ट-अनुभूति के विरुद्ध है। जब अनादि से समग्र ही पर्याय-समुदाय अज्ञान, राग-द्वेष एवं अनित्यता का आयतन है और इसके समानान्तर एकमात्र निज-चैतन्य-सत्ता ही शुद्ध, पूर्ण, ध्रुव एवं आनन्द-निकेतन है, तो दोनों में से किसका अहं एवं किसका अवलम्बन श्रेयस्कर होगा ? एक बात और है और वह यह कि ज्ञान सदा अनैकांतिक ही होता है और दृष्टि ( श्रद्धा ) सदा ऐकांतिक ही होती है। द्रव्य एवं पर्याय के परस्पर-विरुद्ध दोनों पहलुओं का परिज्ञान हो जाने पर सहज ही निर्णय हो जाता है कि वृत्ति (दृष्टि) को दोनों में से कहाँ आराम मिलेगा। निश्चितरूप में ध्रुव-द्रव्य ही शाश्वत-आराममय है। इसप्रकार ध्रुव की महिमा ज्ञात हो जाने पर अनादि से क्षणिक वृत्ति-समुदाय में पड़ा श्रद्धा का ‘अहं’ विगलित होकर निज ध्रुव-सत्ता के अहं में परिणत हो जाता है।
श्रद्धा का विषय इतना स्पष्ट होने पर भी प्रमाणाभास से ग्रासीभूत-आग्रह श्रद्धा के विषय में पर्याय शामिल किये बिना तृप्त नहीं होते। किन्तु हमारा संतुलित, विशुद्ध-चिन्तन स्वयं हमें यह समाधान देगा कि श्रद्धा के विषयक्षेत्र में पर्याय के भी पदार्पण का हमारा आग्रह अविवेक तो है ही, साथ ही अत्यन्त-अव्यावहारिक भी है।
इस संबंध में एक अत्यन्त-महत्त्वपूर्ण बात सदा द्रष्टव्य है। एक प्रश्न है कि श्रद्धा का श्रद्धेय पहले से ही विद्यमान एवं पूर्ण होता है या श्रद्धा के क्षण में स्वयं श्रद्धा आदि वृत्तियाँ श्रद्धेय के साथ मिलकर उसे पूरा करती हैं और तब वह उसका श्रद्धेय होता है ?
यदि श्रद्धा आदि वृत्तियाँ श्रद्धेय को पूरा करती हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि श्रद्धेय सदा ही अपूर्ण है और अपूर्ण-श्रद्धेय में श्रद्धा का सर्व-समर्पण एवं लीनता अनंतकाल में भी सम्भव नहीं है। इसप्रकार श्रद्धेय की अपूर्णता में श्रद्धा का स्वरूप सदैव संदिग्ध, भ्रान्त एवं मलिन ही रहेगा और वह कभी भी सर्व-समर्पणपूर्वक श्रद्धेय का वरण नहीं करेगी।
एक बात और है-यह तो सर्वविदित है कि वर्तमान में अज्ञानी का सर्व पर्याय-समुदाय विकारी है और स्व एवं पर, द्रव्य एवं पर्याय, विकार एवं निर्विकार आदि का तात्त्विक-चिंतन एवं विश्लेषण भी अज्ञान-दशा में ही प्रारम्भ होता है। अतः द्रव्य एवं पर्याय के तात्त्विक-विश्लेषण में पर्याय-समुदाय के विकार एवं अनित्यता का पता लग जाने पर भी उसे निर्विकारी-द्रव्य के साथ मिलाकर अनुभव करने का आग्रह तो भयंकर-अविवेक ही होगा। और क्या इस अविवेकपूर्ण-प्रयास में किसी मनोरम, रमणीक एवं परम-निर्विकार श्रद्धेय की अनुभूति एवं उपलब्धि हो सकेगी ? विकार को निर्विकार के साथ एकाकार करके अनुभव करने के प्रयास में वास्तव में दोनों कभी एकमेक तो होते ही नहीं, वरन् इस दुराग्रह में द्रव्य एकांत-विकारी ही अनुभव में आता है, कुछ विकारी एवं कुछ निर्विकारी नहीं। वास्तव में यह आग्रह शुद्ध, ‘दूध में राख मिलाकर सेवन करने’ तुल्य है। जब दूध एवं राख परस्पर-विपरीत दो तत्त्व हैं और दोनों की अत्यन्त-भिन्न अनुभूति हो सकती है, तो दोनों को मिलाकर सेवन करने का आग्रह तो मात्र बालचेष्टा ही होगा। इस चेष्टा में कभी भी शुद्ध-दूध की अनुभूति संभावित नहीं होगी एवं कुछ शुद्ध-दूध की अनुभूति और कुछ अशुद्ध-दूध की अनुभूति-ऐसा द्वैत न होकर एकांत-अशुद्धता का ही अनुभव होगा।
इसीप्रकार परम-निर्विकार द्रव्य एवं क्षणिक-विकारी पर्याय-समुदाय-दोनों परस्पर-विपरीत दो भाव होने से दोनों में से एक समय में एक का ही अहं एवं अनुभूति, अत्यन्त असंदिग्ध है। तब फिर दोनों को मिलाने का दुराग्रह क्यों ? और यह आग्रह तो तब होना चाहिए, जब एकसमय में एक के बिना दूसरे का संचेतन असम्भव हो। किन्तु दोनों भाव परस्पर-विपरीत होने से शुद्ध-चैतन्यतत्त्व की अनुभूति अशक्य एवं दुःसाध्य तो है ही नहीं, वरन् सरलतम, सुखद एवं परम-मंगलमय होती है। अतः क्षणिक एवं विकारी-पर्याय के सम्मिश्रण के बिना परम निर्विकार-द्रव्य के वेदन की अशक्यता का प्रतिपादन ज्ञान का भंयकर-क्लैव्य है, फलस्वरूप तिरस्करणीय है।
क्या है पर्याय का हेयत्व ?
वस्तुतः अज्ञानी को अपनी विशुद्ध-चिंतनधारा में जब यह पता लगता है कि “मेरी सत्ता तो नितान्त-शुद्ध एवं अक्षय है और मेरी ही वृत्ति उसे ‘अशुद्ध’ एवं ‘नश्वर’ घोषित करती रही है”, तो वृत्ति-समुदाय के मिथ्या-प्रलाप का उद्घाटन हो जाने पर वृत्ति-समुदाय में पड़ा उसका विश्वास स्खलित होकर शुद्ध-चैतन्य-सत्ता में अपने अहं की स्थापना कर लेता है। इस विश्वास में सदैव ही पर्याय के स्वर का निषेध प्रवर्तित होता है। इसी को पर्याय का हेयत्व कहते हैं। स्पष्ट-बात तो यह है कि दृष्टि में निषेधरूप भी कोई वृत्ति प्रवर्तित नहीं होती, वरन् निरन्तर निज-शुद्ध-चैतन्य-सत्ता में अहं का प्रवर्तन ही पर्याय का निषेध अथवा हेयत्व कहा जाता है। फिर भी यदि हमारा पूर्वाग्रह विकारी एवं अनित्य वृत्ति-समुदाय को परम-निर्विकार नित्य-द्रव्य के साथ मिलाकर अपने श्रद्धेय की रचना करेगा, तो उस श्रद्धेय का क्या स्वरूप होगा ? इसकी कल्पना भी संभव नहीं है। संभवतः इस मिथ्या एवं विफल-प्रयास में श्रद्धा एवं श्रद्धेय का सम्पूर्ण-सौन्दर्य ही नष्ट हो जावेगा। इसीप्रकार भावी निर्विकारी-पर्याय-समुदाय को द्रव्य में मिलाकर श्रद्धा करने का आग्रह भी समान-कोटि का मिथ्यादर्शन ही है, अतः उस अविद्यमान-सत् को विद्यमान-द्रव्य में मिलाने की विधि क्या होगी ? दूसरी वजनी-बात यह है कि कोई भी पर्याय नित्य-विद्यमान निर्विकारी निज-चैतन्य-सत्ता के अवलम्बन पर शुद्ध होती है, न कि शुद्ध-पर्याय का अवलम्बन होता है।
इस संदर्भ में एक अत्यन्त-सुन्दर-मनोवैज्ञानिक-तर्क भी हमें समाधान देगा कि जब इस विश्व की अनंत-सत्ताओं की तरह निज-चैतन्य-सत्ता भी संपूर्ण एवं सुन्दर है और विश्व की प्रत्येक सत्ता के पास जितना वैभव है, उतना ही हमारे पास भी है, तथा अन्य-सत्ताओं के स्वामी अन्य-द्रव्य ही हैं और अन्य-द्रव्य ही होने चाहिए एवं उनके स्वामित्व का हमें कोई अधिकार नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए; तो फिर संपूर्ण एवं सुन्दर स्व-सदन ( स्व-सत्ता ) का अवलंबन छोड़कर पर-सदन ( पर-सत्ता ) में प्रवेश का यत्न क्या वैध एवं विधेय होगा ? और क्या इस बलात्कार में शांति एवं आनंद की उपलब्धि हो सकेगी ? निश्चित ही नहीं होगी, वरन् यह यत्न ‘विश्व का महान्-अपराध’ घोषित किया जाएगा।
पुनः एक अत्यन्त-हृदयग्राही-तथ्य भी हमारा ध्यान आकर्षित करेगा और वह यह कि वस्तु की वृत्ति को स्वयं वस्तु में ही विराम न मिले, यह विधान किसने बनाया ? माँ की गोदी में अपने ही बालक को धारण करने की क्षमता कब नहीं रहेगी ? और वस्तु की वृत्ति अपनी ही वस्तु के अनंत एवं अपरिमित-वैभव में संतुष्ट न हो और अन्य की ओर आकर्षित होकर अन्य सत्ताओं में अपना प्रेय एवं श्रेय तलाशती फिरे, जगत् में इससे बड़ा आश्चर्य भी क्या होगा ? सुमन की सौरभ को स्वयं अपने सुमन में संतोष नहीं, तो फिर जगत् में वह कौन-सा सुमन होगा जो इस सौरभ को अपने में शरण देगा ? और वृत्ति को वृत्तिमान में विराम न मिले, लोक में यह लचर-व्यवस्था किसने पैदा की ? निश्चित ही इस कल्पना में किसी स्वस्थ एवं सुन्दर-विश्व की उपलब्धि तो नहीं हो सकेगी। अतः वृत्ति को वृत्तिमान का अवलम्बन ही विश्व का परम-सौन्दर्य है।
सम्यक्-श्रद्धा का श्रद्धेय ‘पूर्ण’ ही होता है
शुद्ध-चैतन्यसत्ता मिथ्यादर्शन-विकारी-पर्याय-समुदाय से विकारी नहीं बनती, वरन् उस शुद्ध- चैतन्यसत्ता का अदर्शन अर्थात् अविश्वास ही मिथ्यादर्शन की विकारी-पर्याय है। इसीप्रकार वह चैतन्य-सत्ता सम्यग्दर्शनादि शुद्ध-पर्यायों के उत्पन्न होने पर शुद्ध नहीं होती, वरन् उस शुद्ध-चैतन्यसत्ता का दर्शन अर्थात् अहं ही सम्यग्दर्शन की शुद्धपर्याय है। इसप्रकार चैतन्यसत्ता की त्रैकालिक-शुद्धता एवं सर्व पर्याय-निरपेक्षता अत्यन्त-निरापद है और सर्व ही अनित्य एवं विकारी-पर्यायसमुदाय उसकी ध्रुव-परिधि के बाहर रह जाता है। यहाँ तक कि ध्रुव-सत्ता के अहं को ‘सम्यग्दर्शन’ कहा तो जाता है; किन्तु सम्यग्दर्शन वास्तव में ‘ध्रुव का अहं’ नहीं वरन् स्वयं ‘ध्रुव’ है। इसप्रकार स्वयं सम्यग्दर्शन भी सम्यग्दर्शन की परिधि ( ध्रुव ) के बाहर रह जाता है और द्रव्य-पर्याय-स्वरूप पूरे आत्म-पदार्थ में सम्यग्दर्शन का विषय पदार्थ का अनंत-गुणात्मक सामान्य-द्रव्यांश ही होता है, किन्तु अंश होने से वह अपूर्ण नहीं वरन् स्वयं ही पूर्ण है; क्योंकि उसे परद्रव्य एवं अपनी पर्याय की भी कोई अपेक्षा नहीं होने से वह अत्यंत-निरपेक्ष है और इसलिए वह पूर्ण है। दृष्टि ( श्रद्धा ) भी उसमें अंश की नहीं वरन् पूर्ण की प्रतीति करती हुई स्वयं पूर्ण है। इसप्रकार दोनों अंशों की पूर्णता ही वस्तु की पूर्णता है।
ध्रुव को अंश मानकर श्रद्धा करना प्रकारान्तर से ‘मिथ्यादर्शन’ ही है। जैसे ग्यारह के अंक में एक के दोनों अंक अपने-अपने में पूर्ण ही हैं। इसप्रकार दोनों की पूर्णता ही ग्यारह की पूर्णता है। यदि एक के दोनों अंक अपूर्ण हों, तो ग्यारह का पूर्णांक ही उपलब्ध नहीं होगा; क्योंकि दो अपूर्ण स्वयं तो कभी भी पूरे होते ही नहीं, किन्तु दोनों मिलकर भी किसी एक पूर्ण-स्वरूप को निष्पन्न नहीं कर सकते। यह वस्तु-स्वभाव की स्वयंसिद्ध-विलक्षणता ही है।
वास्तव में सम्यग्दर्शन को जो ‘ध्रुव का अहं’ कहा जाता है, वह ज्ञान का व्यवहार है, किन्तु सम्यग्दर्शन स्वयं अपने को ‘ध्रुव का अहं’ स्वीकार नहीं करता, वरन् ‘ध्रुव’ स्वीकार करता है। अपने समक्ष-विद्यमान ‘ध्रुव’ में ‘मैं ध्रुव हूँ’ ऐसी उसकी अभेद-स्वीकृति होती है और इस अभेद-स्वीकृति को ही ‘ध्रुव का अहं’ कहते हैं।
‘अहंमय ध्रुव’ श्रद्धा का श्रद्धेय नहीं होता। श्रद्धा का श्रद्धेय इतना पूर्ण एवं सर्वोपरि होता है कि वह उसमें अपने को मिलाने का अवकाश नहीं पाती। वास्तव में ‘पूर्ण’ में ‘पूर्ण के अंह’ के मिलने की भी कोई गुंजाइश नहीं है, अतः उस पूर्ण में ‘पूर्ण के अहं’ का भी त्रिकाल-अभाव है और जिसमें कुछ मिलाया जा सके, वह पूर्ण कैसा ? अतः यदि श्रद्धा का स्वर यह हो कि ‘मैं पूर्ण का अहं हूँ,’ तो इस स्वर में ‘पूर्ण का अहं’ नहीं, वरन् ‘अहं का अहं’ प्रवर्तित होता है और वह तो स्पष्ट-मिथ्यादर्शन ही है।
यदि श्रद्धा को अपने में ही, पर्याय को पर्याय में ही विश्राम मिल जाता है, तो फिर वह आलंबन क्यों तलाशती है ? और यदि वह आलबंन तलाशती ही रही, तो इसका अर्थ यह है कि उसे स्वयं अपने में विराम नहीं मिला। अतः स्वयं ‘अहं’ एवं ‘अहं’ की मिलावटवाला पूर्ण-श्रद्धा का आलंबन नहीं होता, वरन् निरपेक्ष, पूर्ण उसका आलम्बन होता है। अतः श्रद्धा में स्वयं श्रद्धा का भी अत्यन्त-तिरोभाव होकर एकमात्र ‘पूर्ण’ का वर्चस्व ही आर्विभूत रहता है। उसमें ज्ञान की भाँति ‘मुख्य’ एवं ‘गौण’ की कोई व्यवस्था नहीं है।
‘ध्रुव’-तत्त्व श्रद्धा के लिए मुख्य-तत्त्व नहीं, वरन् वह उसका सर्वस्व ही है। इसीलिए सम्यग्दर्शन स्वयं अपने को मिटाकर ध्रुव का दर्शन करता है। वह अपने को ‘गौण’ की कक्षा में भी नहीं रखता। वास्तव में अपने को बचाकर श्रद्धेय को अपना समर्पण करने की वार्ता तो एकदम-छल एवं छद्म है। स्वयं को मिटाये बिना समर्पण का स्वरूप ही नहीं बन सकता। इसीलिए सम्यग्दर्शन की दुनियाँ में ‘सम्यग्दर्शन’ संज्ञावाली कोई वस्तु ही नहीं है। राधा ने जगत् में राधा को कभी देखा ही नहीं। उसकी दुनियाँ कृष्ण की बनी थी। श्रद्धा की इस अनंत-शून्यता में ही ‘ध्रुव’ की मंगलमय-बस्ती बसती है और इसीलिये श्रद्धा का यह अद्वैत अनंत-आनन्दमय होता है।
इस पद्धति में आत्मा को मात्र ध्रुव मानने से उसमें पर्याय का अभाव नहीं हो जाता, वरन् ‘ध्रुव एवं ध्रुव की श्रद्धा’, ‘पूर्ण एवं पूर्ण का अहं’, इसप्रकार दोनों अंशों की निरपेक्ष-पूर्णता में आत्म-पदार्थ द्रव्य-पर्यायस्वरूप पूर्ण ही बना रहता है, जैसे शरीर के प्रत्येक अंग की पूर्णता ही शरीर की पूर्णता है। यदि शरीर के सभी अंग अधूरे हों, तो सब अधूरे-अंगों से एक पूर्ण-शरीर तो निष्पन्न नहीं हो सकता। इसीप्रकार ‘आधा-द्रव्य एवं आधी-पर्याय’ यह पदार्थ का स्वरूप नहीं, वरन् ‘पूर्ण-द्रव्य एवं पूर्ण-पर्याय’-यह पदार्थ का स्वरूप होता है।
वास्तव में ध्रुव को अंश माननेवाली श्रद्धा में पूर्णता की प्रतीति ही नहीं होगी, फलस्वरूप अनुभूति में आनन्द की निष्पत्ति ही नहीं होगी; वरन् अंश अर्थात् अपूर्ण की प्रतीति होने से सदा ही ऐसा लगता रहेगा कि आत्मा में अभी कुछ कमी है। निश्चय ही श्रद्धा आदि वृत्तियों का कार्य ध्रुव-आत्मा में कुछ करना नहीं, वरन् उसे ध्रुव-मात्र मानना होता है। ‘मैं ध्रुव हूँ’ यही सम्यग्दर्शन का स्वर है। सम्यग्दर्शन की काया ‘ध्रुव’ से ही निर्मित है। उसमें सर्वत्र ‘ध्रुव’ ही पसरा है। अनित्यता उसमें है ही नहीं। उसे विश्व में ध्रुव के अतिरिक्त अन्य-सत्ता का स्वीकार ही नहीं है। उसका विश्व ही ध्रुव है।
यदि दृष्टि में ध्रुव के अतिरिक्त अन्य-सत्ता का भी स्वीकार हो, तो दृष्टि का स्वभाव ‘अहं’ होने के कारण उसे अन्य-सत्ता में अहं हुए बिना नहीं रहेगा और यही अहं ‘मिथ्यादर्शन’ है।
‘मेरी सत्ता ध्रुव है’,-सम्यग्दर्शन को द्रव्य-पर्याय का यह भेद भी बर्दाश्त नहीं है। दृष्टि (श्रद्धा) का स्वरूप ही ऐसा है। उसे ज्ञान की तरह स्व-पर का भेद करना नहीं आता, उसे तो अहं करना आता है। उसके लोक में कोई ‘पर’ है ही नहीं। वह मिथ्या होती है, तब भी उसे सब स्व ही दिखाई देता है, तब सम्यक् होने पर तो उसकी परिधि में अन्य-भावों का प्रवेश कैसे सम्भव है? और तो और, सम्यग्दर्शन के घर में स्वयं सम्यग्दर्शन के रहने के लिए भी कोई जगह नहीं है। उसने अपना कोना-कोना ध्रुव के लिए खाली कर दिया है।
सौराष्ट्र के सन्त ने भव के अन्त के लिए ‘ध्रुव’ का यह मंगल-सूत्र लोक को दिया। उन्होंने सम्यग्दर्शन के जिस स्वरूप का अनुसंधान किया, वह इस युग का एक आश्चर्य है। सम्यग्दर्शन के इस सूक्ष्म एवं अद्भुत-स्वरूप का इस युग को स्वप्न भी नहीं था। वास्तव में श्री कानजीस्वामी इस युग में सम्यग्दर्शन के उद्घाटक हैं और वह भवान्तक-सम्यग्दर्शन इस युग को उनका सबसे महान्-वरदान है। इसके स्वरूप का बोध उनके बिना सम्भावित ही नहीं था।
उन सत्पुरुष ने सम्यग्दर्शन के संबंध में प्रचलित सभी भ्रान्तियों को प्रक्षालित कर दिया। कोई कहते थे कि “सच्चे देव-शास्त्र-गुरु-धर्म की श्रद्धा ही सम्यग्दर्शन है”, तो कोई “सात तत्त्व की श्रद्धा को सम्यग्दर्शन कहते थे।” किसी ने तो यहाँ तक कहने का दुस्साहस किया कि “जैनकुल में जन्म ही सम्यग्दर्शन है।” कहीं से आवाज आई कि “सम्यग्दर्शन काललब्धि आने पर अपने-आप होता है, उसके लिए पुरुषार्थ अपेक्षित नहीं है और उत्पन्न हो जाने पर भी स्वयं को उसका पता नहीं चलता।” किन्तु उन महापुरुष ने रहस्योद्घाटन किया कि इनमें से एक भी सम्यग्दर्शन का स्वरूप नहीं है। इतना ही नहीं इन सबकी समग्रता में भी प्रचंड अन्तर-पुरुषार्थ के बिना सम्यग्दर्शन नहीं होता। यह भी नितांत-असत्य है कि ‘सम्यग्दर्शन होने पर स्वयं को उसका पता नहीं चलता।’ सम्यग्दर्शन का उद्भव होने पर साधक को निज शुद्ध-चैतन्य-सत्ता की लीनता में अतीन्द्रिय-आनन्द का प्रत्यक्ष-संवेदन होता है। आगम का अक्षर-अक्षर इसका साक्षी है।
उन सन्त ने सम्यग्दर्शन के इस ‘निश्चय-पक्ष’ का ही विवेचन नहीं किया, वरन् उसके व्यावहारिक-पक्ष का भी प्रबल-समर्थन किया। उन्होंने कहा “सम्यग्दृष्टि मिथ्यात्व, अन्याय एवं अभक्ष्य का सेवन नहीं करता। उसका लोक-जीवन बड़ा पवित्र होता है। वह स्वप्न में भी अतत्त्व एवं असत्य का समर्थन नहीं करता। वही सच्चे देव-गुरु-धर्म का सच्चा-उपासक होता है। जीवन में इस विशुद्धि के प्रादुर्भाव के बिना सम्यग्दर्शन नहीं होता। उसका जन्म पवित्र-मनोभूमि में ही होता है।‘’
सम्यग्दर्शन की गरिमा को गाते-गाते वे सन्त विभोर हो जाते हैं। वे कहते हैं-‘‘सम्यग्दर्शन जीवन की कोई महान्-उपलब्धि है। वह जीवन-तत्त्व एवं जीवनकला है। उसके बिना जीवन, मृत्यु का ही उपनाम है। ज्ञान में स्व-पर का भेद समझने की क्षमता होने पर सम्यग्दर्शन हर परिस्थिति में हो सकता है। सातवें नरक की भयंकरता अथवा स्वर्गों की सुषमा उसमें बाधक नहीं होती। कर्मकाण्ड के कठिन-विधान उसकी उत्पत्ति में मदद नहीं करते। उसे घर नहीं छोड़ना है, देह का विसर्जन नहीं करना है; वरन् घर एवं देह में रहकर ही उनसे अहं को तोड़ना है। इसीलिए सम्यग्दर्शन सरल है। कठिन की कल्पना ही कठिनाई है। सम्यग्दर्शन अनुकूल अथवा प्रतिकूल-परिस्थिति का दासत्व स्वीकार नहीं करता। इसीलिए नरक एवं स्वर्ग के विषम-वायुमण्डल में भी ‘मैं नारकी नहीं’, ‘मैं देव नहीं’; वरन् ‘मैं तो अक्षय चैतन्य-तत्त्व हूँ’-ऐसे अविराम-संचेतन में उसका जन्म हो जाता है। इसीलिए वह हर गति में होता है।’’
इस युग में सम्यग्दर्शन श्री कानजीस्वामी की एक ऐसी शोध है, जिसने मृत्यु की ओर बढ़ते युग के चरण जीवन की ओर लौटा दिये हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उस संत के सम्यग्दर्शन ने मृत्यु को ही मारकर विश्व से उसकी सत्ता ही समाप्त कर दी है।
‘सम्यक्चारित्र’ का सौन्दर्य
सम्यग्दर्शन एवं सम्यग्ज्ञान की तरह पूज्य गुरुदेव ने चारित्र का भी एक प्राञ्जल-स्वरूप प्रस्तुत किया। वे चारित्र के महान्-उपासक हैं। चारित्रवन्त दिगम्बर-सन्तों के अन्तर-बाह्य-स्वरूप का वर्णन करते-करते वे अघाते नहीं हैं। सहस्रों बार उनके अन्तस्तल से ये उद्गार सहज ही निकल पड़ते हैं कि “ऐसे वन-विहारी नग्न दिगम्बर वीतराग-सन्तों के दर्शन हमें कब प्राप्त हों और वह अवसर कब आवे जब उस आनंदमय नग्न-दिगम्बर-दशा की हमें उपलब्धि हो।’’ कुन्दकुन्द एवं अमृतचन्द्र जैसे अनन्त-भावलिंगी-सन्तों के चरणों में उनका मस्तक सदा नत रहता है। आनन्द में झूलते दिगम्बर-सन्तों के हृदय के मर्म को आज वे ही पहिचान पाये हैं। मुनित्व के बाह्य-इतिवृत्तों में मुनि का आत्मा खो गया था। चारित्र को कठिन एवं कष्टसाध्य माना जाता था। चारित्र के उस महान-उपासक की वाणी के माध्यम से चारित्र का सही स्वरूप आज निखरा है। कोरे शुभ-अनुष्ठानों की काली-कारा में चारित्र जैसे जीवन-तत्त्व को कैद करने के सभी प्रयत्न आज उस सन्त ने विफल कर दिये हैं। उन्होंने शंखनाद फूँका ‘‘चारित्र न तो घर-बार आदि बाह्य-संयोगों का वियोग-मात्र है और न कर्मकाण्ड की छलांगें। न कोरा-नग्नत्व ही चारित्र है। न महाव्रत, समिति आदि का पराश्रित-शुभाचार। उपसर्ग एवं परिषह झेलना भी चारित्र नहीं, तो इन्द्रियों का दमन एवं भयंकर-कायक्लेश भी नहीं; वरन् स्वरूप में अन्तर्लीन आनन्द-वृत्ति ही चारित्र है।’’
श्री कानजीस्वामी ने चारित्र के अनिवार्य-सहचर शुभाचार का भी, जिसे व्यवहार-चारित्र कहते हैं, पूरा समर्थन किया। उन्होंने कहा- “शुभाचार, जो मात्र मंदकषाय की ही पर्याय है, उसे चारित्र मानना तो मिथ्यादर्शन है ही, किन्तु वीतरागचारित्र के अनिवार्य-सहचर शुभाचार का सत्त्व ही स्वीकार न करना भी समान-कोटि का मिथ्यादर्शन ही है।’’ मुनित्व की भूमिका में उग्र-चारित्र के साथ रहनेवाले शेष-कषायांश इतने मंद हो जाते हैं कि उनकी अभिव्यक्ति 28 मूलगुणरूप शुभाचार के रूप में होती है। अतएव श्री कानजीस्वामी कहते हैं कि यद्यपि नग्नता मुनित्व नहीं, किन्तु मुनि नग्न ही होते हैं और अन्तरंग-परिग्रह के अभाव के साथ उनके तिल-तुष मात्र भी बाह्य-परिग्रह नहीं होता। मुनि का स्वरूप जमाने के अनुसार नहीं बदलता, वरन् उनका त्रैकालिक-स्वरूप एक ही होता है।
उन्होंने व्यवहार-चारित्र का बड़ा स्पष्टीकरण किया और कहा कि ‘‘व्यवहार ( शुभभाव ) का कोई चारित्र नहीं है, वरन् वह तो अचारित्रभाव में चारित्र का आरोप-मात्र है; क्योंकि अन्तरंग वीतराग-चारित्र के साथ वह शुभभाव-भूमि नियम से होती है तथा उस शुभभाव-भूमि के प्रकट हुए बिना वीतराग-चारित्र भी प्रकट नहीं होता। इसी अनुरोध से मन्द-कषायरूप उस अचारित्रभाव को भी ‘चारित्र’ कहने की एक पद्धति है और इसी पद्धति को ‘व्यवहारनय’ कहते हैं। किन्तु वस्तुतः चारित्र तो आनन्दमय-वीतरागभाव ही है और वही मोक्षमार्ग है। मन्द-कषायरूप व्यवहारचारित्र ‘चारित्र’ का विकार मात्र है। वह थोड़ा भी चारित्र नहीं है और सर्व ही बन्धस्वरूप है।’’
सम्यग्दृष्टि को जीवन में सदा ही चारित्र के प्रादुर्भाव की उग्र-भावना प्रवर्तित होती है। उसे भले ही पुरुषार्थ की निर्बल-गति के कारण चारित्र नहीं होता; किन्तु वह कभी भी चारित्र की आनन्दमय-वृत्ति के प्रति उदासीन एवं प्रमादी भी नहीं होता। अतः निश्चित ही उसे इस भव अथवा भवान्तर में चारित्र का उदय होता है। मोक्षमार्ग की क्रमिक-भूमिकाओं का उल्लंघन करके जल्दबाजी करने से चारित्र नहीं आता, वरन् शुद्ध-चैतन्य-तत्त्व की उग्र-भावना से ही जीवन में चारित्र का उदय होता है।
श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र का तो विशद-विवेचन श्री कानजीस्वामी की वाणी में हुआ ही है, किन्तु साथ ही जैनदर्शन के आधारभूत-सिद्धान्त-निश्चय-व्यवहार, निमित्त-उपादान एवं आर्हत्-दर्शन का प्राण ‘अनेकान्त’ आदि का जो अत्यन्त-प्रामाणिक, आगम-सम्मत एवं सतर्क-प्रतिपादन हुआ है, वह चित्त को चकित कर देता है। सम्भवतः जैनदर्शन का आधारभूत कोई सिद्धांत ऐसा नहीं है, जिसमें उनके ज्ञान एवं वाणी का व्यवसाय नहीं हुआ हो, अध्यात्म का ऐसा सांगोपांग-विवेचन तो शताब्दियों में नहीं हुआ। बयालीस वर्ष से अध्यात्म की बरसातें करती हुई उनकी प्रज्ञा ने अज्ञान की जड़ें हिला दी हैं। तीर्थंकरों एवं वीतरागी-सन्तों के हृदय का मर्म खोलकर उन्होंने हमें तीर्थंकरों के युग तक पहुँचा दिया है। उनकी प्रज्ञा ने आगम के गम्भीर-रहस्यों की थाह लेकर जो मर्म निकाले हैं, वह इस युग का एक आश्चर्य-सा लगता है। वाणी का यह कमाल कि बयालीस-वर्ष के धारावाहिक-प्रवचनों में कहीं भी पूर्वापर-विरोध नहीं है। आत्म-प्रसिद्धि, नय-प्रज्ञापन एवं अध्यात्म-संदेश जैसी साहित्यिक-निधियाँ उनकी निर्मल एवं पैनी-प्रज्ञा के ऐसे प्रसव हैं; जिन्हें देखकर आज के युग का बौद्धिक-अहं उनके चरणों की धूल में धूसरित होकर गर्व का अनुभव करेगा।
उनके प्रवचनों से कल्पनातीत आध्यात्मिक-साहित्य का सर्जन हुआ है। शाश्वत-शान्ति के विधि-विधानों से भरे उनके आध्यात्मिक-साहित्य ने भारतीय-साहित्य का शीश विश्व में ऊँचा किया है। वह साहित्य युग-युग तक शान्ति के पिपासुओं को सच्ची-शान्ति का दिशा-निर्देशन करता रहेगा।
उन्होंने जिस आध्यात्मिक-क्रान्ति को जन्म दिया है, उसने युग के प्राण मौत के मुँह से निकाल दिये हैं। आज जन-जन के श्वास-प्रश्वास में अमरत्व का संचार होने लगा है। आज के त्रस्त जन-जीवन को उनकी वाणी में सही राह एवं राहत मिली है। अतः निष्पक्ष-दृष्टि से स्वीकार करें तो श्री कानजीस्वामी का युग भारतीय-इतिहास एवं श्रमण-संस्कृति का निश्चित ही एक स्वर्ण-युग है।
उन्होंने भारतीय-इतिहास में एक बेजोड़-अध्याय जोड़ा है। वे उस क्रान्ति के उन्नायक-महामानव हैं, जिसका जन्म रक्त में नहीं विरक्त में होता है। जिस क्रान्ति के उदय में आत्मा क्लान्ति का नहीं, वरन् मंगलमय-शान्ति का संवेदन करता है। लक्ष-लक्ष मानवों ने उनकी इस शान्तिवाहिनी-क्रान्ति का समर्थन किया है और उसके सत्य को परखकर उसमें दीक्षित हुए हैं। आज लोक का यह स्वयं कि “यदि यह मुक्तिदूत नहीं होता, तो हमारी क्या दशा होती ? लोक-हृदय की सच्ची-अभिव्यजंना है। निःसन्देह श्री कानजी-स्वामी लोक-मांगल्य की प्रतिष्ठा करनेवाले एक लोकदृष्टा एवं लोकसृष्टा युगपुरुष हैं।
इन महापुरुष का अन्तर जैसा उज्ज्वल है, बाह्य भी वैसा ही पवित्र है। उनकी अत्यन्त-नियमित दिनचर्या, सात्त्विक एकरूप एवं परिमित-आहार, आगमसम्मत सत्य-सम्भाषण, करुण एवं सुकोमल-हृदय उनके विरल-व्यक्तित्व के अभिन्न-अवयव हैं। 87 वर्ष की अतिवृद्ध-अवस्था में भी उनकी दिनचर्या इतनी नियमित एवं संयमित रही कि एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाता। ‘‘समयं गोयम ! मा पमायए’’ (अर्थात् हे गौतम ! एक समय के लिए भी प्रमाद मत करो) अर्धमागधी-आगम में भी झंकृत हुई वीर-वाणी उनके जीवन में अक्षरशः चरितार्थ हुई है। शुद्धात्मतत्त्व का अविराम-चिन्तन एवं स्वाध्याय ही उनका जीवन है। जैन-श्रावक के पवित्र-आचार के प्रति वे सदैव-सतर्क एवं सावधान हैं। उसका उल्लंघन उन्हें सह्य नहीं है। उनके जीवन का प्रत्येक-स्थल अनुकरणीय है। निश्चित ही वे इस जगत् के वैभव हैं और युग उन्हें पाकर गौरवान्वित हुआ है।
वे युगपुरुष युगों-युगों तक मुक्ति का संदेश प्रसारित करते हुए युग-युग जीवें, यही आज युग के अन्तस् की एकमात्र-कामना है।
मैं उन युगपुरुष की 87वीं जयन्ती के पुण्य-पर्व पर अपनी श्रद्धा के अनन्त सुमन उनके चरणों में चढ़ाता हूँ।