जुगल किशोर ‘युगल’
जन्मः 5 अप्रेल 1924 खुरी,जिला-बारां, (राज.)
शिक्षाः एम.ए.,साहित्यरत्न
पताः 85, आर्य समाज गली, रामपुरा, कोटा-324006
ख्यातिप्राप्त दार्शनिक विद्वान श्री जुगलकिशोर ‘युगल’ को प्रसिद्ध देव-शास्त्र-गुरु पूजा लिखने के कारण समाज में वही स्थान प्राप्त है जो हिन्दी साहित्य में ‘उसने कहा था’ कहानी के लेखक पण्डित चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ को। ‘युगल’ जी उच्चकोटि के कवि, लेखक एवं ओजस्वी वक्ता हैं। 15 वर्ष की अल्पवय में ही आप में काव्य-प्रसून अंकुरित होने लगे थे। तब राष्ट्रीय चेतना एवं स्वतन्त्रता-संग्राम का युग था। युग के प्रवाह में इनकी काव्यधारा राष्ट्रीय रचनाओं से प्रारम्भ हुई। पारम्परिक धार्मिक संस्कार तो आप में बचपन से ही थे किन्तु उन्हें सम्यक् दिशा मिली इस युग के आध्यात्मिक क्रान्ति स्रष्टा श्री कानजीस्वामी से। स्वयं श्री ‘युगल’ जी के शब्दों में- ‘गुरुदेव से ही मुझे जीवन एवं जीवनपथ मिला है।’ युगलजी दर्शन को जीवन का समग्र स्वरूप मानते हैं और दर्शन की सर्वांग क्रियान्विति चैतन्य के साक्षात्कार में स्थापित करते हैं-
ॐ
चैतन्य वाटिका
(काव्य संग्रह)
बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’
एम.ए., साहित्यरत्न
कोटा
आर्हत् साहित्य निधि ‘द्वितीय पुष्प’
प्रथमावृत्ति : 2100
ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी, दिनांक 23 जून, 2002
(जैन दर्शन एवं व्यक्तित्व विकास शिविर के पावन अवसर पर)
© प्रकाशकाधीन
मूल्य : बीस रूपये मात्र
प्राप्ति स्थान :
- अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन
द्वारा-स्वास्तिक स्टेशनर्स एवं बुक सेलर
रामपुरा बाजार, कोटा दूरभाष: 325524, 327809 - पण्डित टोडरमल स्मारक भवन
ए-4, बापूनगर, जयपुर (राज.) - श्री दिगम्बर जैन मुमुक्षु मण्डल, कोटा
श्री पोरवाल दिगम्बर जैन मन्दिर, जैन गली
रामपुरा, कोटा - आचार्य कुन्दकुन्द शिक्षण संस्थान ट्रस्ट
ए.304, पूनमअपार्टमेन्ट, वरली, मुम्बई-18
लेजर टाइप सेटिंग :
अजय कुमार गुप्ता
वेव कम्प्यूटर एवं प्रिन्टर,
गोरधनपुरा, कोटा-7
मुद्रक :
ज्योति प्रिन्टिंग प्रेस
रामपुरा बाजार
कोटा
प्रकाशक :
अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन
कोटा (राज.)
सम्पादक :
पण्डित देवेन्द्रकुमार जैन
बिजौलियां, जिला-भीलवाड़ा (राज.)
संकलन एवं संयोजन :
अजेय जैन, सी.ए.,कोटा
सम्पादक मंडल :
सुशीलकुमार जैन
ब्र.नीलिमा जैन
चिन्मय जैन
★ साहित्य प्रकाशन हेतु सहयोग राशि प्रदाता ★
-
गुप्तदान ह.कुन्दकुन्द प्रवचन प्रसारण संस्थान 21000/-
-
श्री अरिदमन लालजी सा. कोटा परिवार द्वारा 11000/-
-
गुप्तदान ह. कमलजी बोहरा, कोटा 11000/-
-
स्व. श्री रामचन्द्रजी हरिशंकरजी दुगेरिया की स्मृति में 5001/-
-
श्री जयकुमार जी जैन सा., दादाबाड़ी कोटा 5000/-
-
श्री गम्भीरमलजी धनोप्या, विज्ञाननगर, कोटा 5000/-
-
श्रीमति शान्तिदेवी जैन धर्मपत्नि श्री उत्सवचन्द जी बगड़ा 5000/-
-
श्रीमति रजनी जैन धर्मपत्नि श्री सुरेन्द्रकुमार जी जैन 5000/-
-
श्रीमति घीसीबाई धर्मपत्नि श्री राजमलजी भिण्डीवाले 5000/-
-
श्री खानसिंह जी, इन्द्राविहार, कोटा 3100/-
-
डॉ.श्री मानमल जी जैन, बल्लभबाड़ी, कोटा 1111/-
-
श्री चौथमल जी जैन, बल्लभनगर, कोटा 1111/-
-
श्री मूलचन्द दिनेशकुमार ठाई, दीपपुरा वाले, कोटा 1111/-
-
श्रीमति लीला जैन धर्मपत्नि श्री तेजमलजी जैन, डाबीवाले 1100/-
-
श्रीमति आशा जैन धर्मपत्नि श्री लाभचन्दजी, डाबीवाले 1100/-
-
श्रीमति लाली जैन धर्मपत्नि श्री महावीरप्रसादजी,डाबीवाले 1100/-
-
श्रीमति कविता जैन धर्मपत्नि श्री कैलाशचन्दजी, डाबीवाले 1100/-
-
श्रीमति अर्चना जैन धर्मपत्नि श्री अनिलकुमारजी डाबीवाले 1100/-
प्रकाशकीय
आर्हत् साहित्य निधि के दूसरे पुष्प के रूप में आदरणीय बाबू ‘युगल जी’ की पद्य रचनाओं का संकलन “चैतन्य वाटिका” अध्यात्म रसिक भव्य जीवों को सादर समर्पित है। देव-शास्त्र-गुरु एवं सिद्धपूजन आपकी कालजयी रचनायें हैं, जो हजारों जिन भक्तों को कण्ठस्थ हैं। स्वान्तः सुखाय लिखी गई आपकी पद्य रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित करने के अनेक प्रयत्न पूर्व में भी हुए, पर पूर्णता तक नहीं पहुँच पाये। अत्यन्त हर्ष और गर्व है कि मुमुक्षु जनों की इस चिर अभिलाषा को पूरा करने का प्रयास जैन युवा फेडरेशन कोटा के माध्यम से सफलीभूत हो रहा है।
साहित्यिक जीवन के प्रारम्भिक काल में आपकी रचनायें बहुआयामी रहीं, परन्तु पूज्य गुरुदेव श्रीकानजी स्वामी से तत्वबोध प्राप्त होने के पश्चात् उनकी सभी रचनायें शुद्ध चैतन्य की सुवास से सुवासित हैं। इस संकलन में केवल कुछ रचनायें प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन का सृजन है, शेष सभी उनके अध्यात्म निष्णात्त जीवन की उपलब्धियाँ हैं। अतः सभी रचनायें ‘चैतन्य’ की धुन से आप्लावित हैं। जहाँ उन्होंने जैन तत्वज्ञान के रहस्यों को अपनी रचनाओं के माध्यम से उद्घाटित किया है, वहीं प्रौढ़ साहित्यिक कृतियों का अवदान भी समाज को दिया है।
हमें पूर्ण विश्वास है कि यह कृति न केवल जैन साहित्य वरन् सम्पूर्ण हिन्दी काव्य साहित्य में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करेगी।
जैन युवा फेडरेशन एवं हमारी सहयोगी संस्थायें दिगम्बर जैन मुमुक्ष मंडल कोटा एवं कुन्दकुन्द शिक्षण केन्द्र ट्रस्ट कोटा आदरणीय बाबूजी के हृदय से आभारी हैं, जिन्होंने इस ग्रन्थ को
प्रकाशित करने की स्वीकृति सहर्ष प्रदान की एवं साथ ही इसके सुव्यवस्थित प्रकाशन में समय-समय पर अमूल्य मार्ग दर्शन प्रदान किया ।
‘चैतन्य वाटिका’ के रूप में बाबू जी की पद्यात्मक रचनाओं के संकलन की परिकल्पना और संकलन एवं संयोजन का श्रम साध्य कार्य हमारे युवा साथी श्री अजेय जैन चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट के अथक प्रयासों से ही एक माह के अल्पसमय में सम्पन्न हो पाया । पं० देवेन्द्र कुमार जी बिजौलियाँ ने इसके सम्पादन का दायित्व ग्रहण कर हमें अनुग्रहीत किया, उसके लिए हम व्यक्तिगत रूप से उनके और आचार्य कुन्दकुन्द शिक्षण संस्थान ट्रस्ट, मुम्बई के आभारी हैं । पं० देवेन्द्र कुमार जी बिजौलियाँ अध्यात्म के प्रख्यात विद्वान व प्रवचनकार हैं, उन्होंने पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी के प्रवचनों के हिन्दी अनुवाद व सम्पादन का श्रम साध्यकार्य भी सम्भाला हुआ है ।
सामग्री के संकलन एवं यथा सम्भव शुद्ध मुद्रण के कार्य में ब्र.नीलिमा जैन, प्राध्यापक श्री सुशील कुमार जैन, प्रो. श्री सन्तोष कुमार जैन एवं श्री चिन्मय जैन का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ है, उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हैं ।
जैनदर्शन एवं व्यक्तित्व विकास शिविर के मंगलप्रसंग पर इस कृति के प्रकाशन की प्रेरणा और वित्तीय साधन जुटाने के भार से हमें मुक्त रखने के लिए हम कुन्दकुन्द शिक्षण केन्द्र ट्रस्ट और दिगम्बर जैन मुमुक्षु मंडल कोटा के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं । इस ग्रन्थ के प्रकाशन की योजना मुमुक्षु समाज के समक्ष रखते ही तत्काल कम से कम मूल्य पर इसे उपलब्ध कराने हेतु आर्थिक सहयोग के वचन प्राप्त होने लगे सहयोग कर्त्ताओं की सूची पुस्तक के अन्त में प्रकाशित की जा रही है । हम उन सभी सहयोग कर्त्ताओं के आभारी हैं ।
आदरणीय बाबूजी का चिन्तन व लेखन अत्यन्त गहन है,
अल्पज्ञता के कारण कोई मुद्रण सम्बन्धी अशुद्धि रही हो तो हम उसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं।
इस ग्रन्थ की सुन्दर एवं शुद्ध लेजर टाइप सेटिंग का कार्य श्री अजय जी गुप्ता मैसर्स वेव कम्प्यूटर कोटा द्वारा किया गया है एवं सुन्दर मुद्रण का श्रेय ज्योति प्रिन्टिंग प्रेस, कोटा को जाता है।
इनके अतिरिक्त इस मंगलकार्य में प्रत्यक्ष एवं परोक्षरूप में सहयोग करने वाले सभी सज्जनों के प्रति हम हृदय से आभारी हैं। विशेष रूप से हम श्री ज्ञानचन्द जी जैन अध्यक्ष दिगम्बर जैन मुमुक्षु मंडल कोटा के आभारी हैं जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन में समय-समय पर विशेष सहयोग प्रदान किया।
आदरणीय बाबूजी के गहन एवं स्पष्ट चिन्तन की इस काव्यधारा में अवगाहन कर अधिकाधिक जिज्ञासु अपना जीवन आनन्दमय बनायें इसी मंगल भावना के साथ प्रस्तुत प्रकाशन पाठकों को समर्पित है…
दिनांक 23 जून, 2002
जिनेन्द्र कुमार जैन
मंत्री
अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन
शाखा-कोटा (राज.)
सम्पादकीय
अध्यात्म मनीषी बाबू जुगलकिशोरजी ‘युगल’, कोटा से सम्पूर्ण तत्वप्रेमी समाज सुपरिचित है। ‘केवल रवि किरणों से …’ जैसी अलभ्य काव्यकृति के प्रणेता आदरणीय ‘बाबूजी’ सचमुच अध्यात्म जगत की एक निधि हैं, जिनसे अध्यात्म जगत गौरवान्वित है। स्वभाव से अत्यन्त कोमल, किन्तु सिद्धान्तों के प्रति अचलमेरु सम व्यक्तित्व के धनी बाबूजी जैन तत्वज्ञान के गहन चिन्तक, सफल काव्यविद्, ओजस्वी प्रवचनकार एवं वात्सल्य से ओत-प्रोत महान् तत्वज्ञ हैं। अत्यन्त सरल किन्तु सुदृढ़ साहित्यिक भाषा में जैन तत्वज्ञान का विवेचन/ लेखन आपकी मौलिक विशेषता है जो श्रोता/पाठक के हृदय में व्याप्त चिर अज्ञानतम की परतों को उधेड़ते हुए उसे शुद्ध चिद्रूप की मंगलमय अनुभूति के सुरम्य आलोक से आलोकित करने में सक्षम है। अध्यात्म जैसा रूक्ष विषय भी आपकी वाणी/लेखनी का सहचार पाकर मधुर अमृत के समान बनकर चैतन्य परिणति को परितृप्त कर देता है।
आप इस युग के सर्वश्रेष्ठ अध्यात्म वेत्ता चैतन्य विहारी पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के अनन्यतम शिष्य हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पूज्य गुरुदेवश्री के तत्वज्ञान का एक-एक सूत्र आज आपके अन्तस्तल में जीवंत है और अध्यात्म पिपासुओं को गुरुदेव श्री के विरह का आभास नहीं होने देता है। आप गुरुदेवश्री को जीवन और जीवन पथ प्रदाता मानते हैं। स्वयं आपके शब्दों में ‘गुरुदेव से ही मुझे जीवन और जीवन पथ मिला है।’ तथा
“श्री कानजीस्वामी इस युग के एक शुद्ध आध्यात्मिक क्रान्तिदृष्टा पुरुष हैं। उन्होंने जिस क्रान्ति का सूत्रपात किया,
ऐसी क्रान्ति पहिले शताब्दियों में भी नहीं हुई। जैन-लोक-जीवन की श्वासें, रूढ़ि, अन्धविश्वास, पाखंड एवं कोरे कर्मकांड की कारा में घुट रही थीं। इसके आगे धर्म कोई वस्तु ही नहीं रह गया था। इन महापुरुष ने शुद्ध जिनागम का मन्थन कर इन जीवन-विरोधी तत्त्वों को अधर्म घोषित किया और इस निकृष्ट युग में शुद्ध आत्म-धर्म की प्राण-प्रतिष्ठा की।” (1)
“सौराष्ट्र के सन्त ने भव के अन्त के लिए ‘ध्रुव’ का यह मंगलसूत्र लोक को दिया। उन्होंने सम्यग्दर्शन के जिस स्वरूप का अनुसंधान किया वह इस युग का एक आश्चर्य है। सम्यग्दर्शन के इस सूक्ष्म एवं अद्भुतस्वरूप का इस युग को स्वप्न भी नहीं था। वास्तव में श्री कानजीस्वामी इस युग में सम्यग्दर्शन के आविष्कर्त्ता हैं और यह भवान्तक सम्यग्दर्शन इस युग को उनका सबसे महान वरदान है। उसके स्वरूप का बोध उनके बिना सम्भवित नहीं था।” (2)
लोकेषणा से दूर आपका सहज, सरल एवं निश्छल व्यक्तित्व; साधर्मी वात्सल्य, विषमतम परिस्थितियों में दूरदर्शी निर्णय की क्षमता, अध्यात्म के साथ-साथ भक्तिरस से अभिसिंचित हृदय, विलासितामुक्त जीवनचर्या, असीम शारीरिक स्वास्थ्य की प्रतिकूलता के मध्य भी तत्वज्ञान की अविराम चिंतनधारा आपके जीवन की अनुकरणीय विशेषतायें हैं।
आपका लेखन बहुआयामी है। आपने जहाँ अध्यात्म के उत्कर्ष को स्पर्श किया है वही भक्तिरस एवं सदाचार भी आपकी लेखनी व वाणी में अछूते नहीं रहे हैं।
यद्यपि आप अध्यात्म को जीवन प्राण-जीवन तत्व मानते हैं; तथापि अध्यात्म का अतिरेक आपको सह्य नही है। अध्यात्म के अतिरेक में जिनभक्ति की पावन परम्पराओं में समागत विकृतियों एवं दूषित आचार प्रवृत्ति के आप कट्टर विरोधी हैं।
(1) ‘चैतन्य विहार’ पृष्ट -13 , (2) ‘चैतन्य विहार’ पृष्ट -38
आप तत्वज्ञान को एक अनूठी जीवन-कला मानते हैं और उसे ही जीवन का मूलाधार भी, स्वयं आपके शब्दों में
“तत्व-ज्ञान सर्व समस्याओं के समाधान की एक अद्भुत जीवन कला है। वही जीवन का सर्व प्रथम कर्म और सर्वप्रथम धर्म है। उसके बिना जीवन असीम वैभव के बीच भी दरिद्री और अशांत है और उसके प्रादुर्भाव में सर्व जागतिक वैभव के बिना भी वह अकेला ही परमेश्वर है।” (3)
आपकी लेखनी से प्रसूत काव्यधारा में अध्यात्म, दर्शन, भक्ति, वैराग्य एवं लोक मांगल्य के विविध पुष्प विकसित हुए हैं ।
जहाँ आपने अध्यात्म के उत्कृष्ट ग्रन्थ श्री नियमसार का पद्यानुवाद किया है वही नीरवनिर्झर तथा अमूल्य तत्वविचार जैसी अनुप्रेक्षणीय कृतियों का सृजन भी आपके द्वारा हुआ है।
अपने जीवन-प्राण पूज्य गुरुदेव के प्रथम सानिध्य से लौटते हुए आपके द्वारा ट्रेन में रची गई देव-शास्त्र-गुरु पूजा न मात्र मुमुक्षु समाज वरन् सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज का हृदय हार बन चुकी है और प्रायः समस्त पूजा संग्रह में उसे ससम्मान सम्मिलित किया जाता रहा है ।
पूजन के एक ही छन्द में अरिहन्त बनने की सम्पूर्ण प्रक्रिया एवं प्रतिज्ञा का जो सुन्दर समावेश हुआ है वह अपने आप में अद्वितीय है ।
क्षण भर निज-रस को पी चेतन, मिथ्या-मल को धो देता है।
काषायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है।।
अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल रवि जगमग करता है।
दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह ही अर्हन्त अवस्था है।।
यह अर्घ समर्पण करके प्रभु ! निज गुण का अर्घ बनाऊँगा।
और निश्चित तेरे सदृश प्रभु ! अर्हन्त अवस्था पाऊँगा।। (3) ‘चैतन्य विहार’ पृष्ट -3
इसी प्रकार मुनिराज का स्वरूप तो इतनी भावपूर्ण भाषा में अभिव्यक्त हुआ है कि जिसकी गरिमा को अभिव्यक्त करने हेतु शब्द कोष में शब्द नहीं हैं
हे गुरुवर! शाश्वत सुख-दर्शक, यह नग्न स्वरूप तुम्हारा है।
जग की नश्वरता का सच्चा, दिग्दर्शन करने वाला है।।
जब जग विषयों मे रच-पच कर, गाफिल निद्रा में सोता हो।
अथवा वह शिव के निष्कंटक, पथ में विष-कंटक बोता हो।।
हो अर्द्ध निशा का सन्नाटा, वन में वनचारी चरते हों।
तब शान्त निराकुल मानस तुम, तत्वों का चिन्तन करते हो।।
करते तप शैल-नदी-तट पर, तरु-तल वर्षा की झड़ियों में।
समता-रस पान किया करते, सुख-दुःख दोनों की घड़ियों में।।
अन्तर् ज्वाला हरती वाणी, मानों झड़ती हों फुलझड़ियाँ।
भव-बन्धन तड़-तड़ टूट पड़ें, खिल जावें अन्तर की कलियाँ।।
तुम-सा दानी क्या कोई हो, जग को दे दीं जग की निधियाँ।
दिन-रात लुटाया करते हो, सम-शम की अविनश्वर मणियाँ।
इसी प्रकार आपकी नवीन द्वितीय भक्ति काव्य कृति ‘सिद्ध पूजा’ तो इस युग के भक्ति साहित्य की अद्वितीय कृति है। जिसमें सम्पूर्ण तत्वज्ञान भक्तिरस की अजस्रधारा के रूप में प्रवाहित हुआ है। इस काव्य कृति में सम्पूर्ण जैन तत्वज्ञान के बीज विद्यमान हैं। जयमाला में शुद्ध चिद्रूप के विस्मरण से उत्पन्न चतुर्गति दुखों का एवं शुद्ध चिद्रूप की अनुभूति से संप्राप्त सिद्धदशा तक का अनूठा विवेचन हुआ है। ज्ञानी की भक्ति में मात्र भक्ति ही नहीं किन्तु मंगलमय मुक्ति का महान प्रयोजन एवं उछलता पौरुष निहित होता है, जिसका दिग्दर्शन निम्न छंदों में हुआ है-
निज लीन परम स्वाधीन बसो, प्रभु! तुम सुरम्य शिव-नगरी में,
प्रति पल बरसात गगन से हो, रसपान करो शिव गगरी में.
ये सुरतरूओं के फल साक्षी, यह भव-संतति का अंतिम क्षण,
प्रभु ! मेरे मंडप में आओ, है आज मुक्ति का उद्घाटन.
तथा
उछलता मेरा पौरुष आज, त्वरित टूटेंगे बंधन नाथ !
अरे ! तेरी सुख-शय्या बीच, होगा मेरा प्रथम प्रभात.
जिनेन्द्र देव की भक्ति का इससे उत्कृष्ट अन्य क्या उद्देश्य हो सकता है ?
भक्ति से लौकिक ऐश्वर्य की चाह वाले भोले भक्तों की अज्ञानता पर आपके कवि हृदय से प्रसूत निम्न व्यंग विचारणीय है
तुमको पहिचाना तुम झट बेटा देते हो
और डाकिनी भूत तुरत ही हर लेते हो
कभी-कभी तो तुमको यह कौतूहल आता
अरे फेर देते सहसा ही जज का माथा
इसीलिए आवश्यकता भगवान तुम्हारी
ब्लेक-मार्केटिंग में रखते लाज हमारी
और नहीं तो हमको तुमसे मतलब भी क्या
दुनियां में बस इसीलिए भगवान बच गया ।
तुम्हें जानकर जग तुमसे अनजान रह गया।
वस्तुतः लौकिक संयोगों की उपलब्धि आत्मा के पुरुषार्थ का नहीं वरन् पुण्योदय का फल है । इस तथ्य का उद्घाटन करने वाली काव्य पंक्तियाँ स्मरणीय हैं ।
अरे धनादि संयोग पुन्य के उदय जन्य सामान हैं
उनके सम्पादन में चेतन का न तनिक अहसान है
एक अथक श्रम करता लेकिन भूखा सोता रात है
और मोतियों के करण्ड में होता कहीं प्रभात है
विधि का यही विधान न इसमें श्रम का नाम निशान भी
जिससे तड़क…
भौतिक जीवन के परिर्वतन/मृत्यु के संदर्भ में आपका तत्वज्ञान पूर्ण चिंतन सचमुच मृत्यु को एक चुनौती है-
मेरी अक्षय सत्ता है रे, मैं हूँ अमरपुरी का वासी
सुधा-सिन्धु मेरा जीवन है, नहीं मुक्ति का मैं प्रत्याशी
मर्त्य लोक का मानव करता, मेरे जन्म-मृत्यु की बातें
किन्तु अरे वे तो हैं, मेरे जीवन की श्वासें-प्रश्वासें
अज्ञ विश्व ! इस पावन से तुम नहीं असंयत भाषा बोलो।
मेरे जीवन को मत तोलो ।। 1 ।।
निज परिशुद्ध चैतन्य सत्ता की विस्मृति विश्व का महानतम् अपराध एवं भवसंतति का मूल है।
लगा गधों के साथ अरे ज्यों सिंह कोई लासानी हो
या निज को अंग्रेज समझता कोई हिन्दुस्तानी हो
रे अनंत वैभव का स्वामी निपट भिखारी बन फिरता
खाक छानता चौरासी की फिर भी पेट नहीं भरता
हुई अरे नादानी में यह दीन दशा भगवान की
जिससे तड़क…
इसी प्रकार सम्पूर्ण काव्य संग्रह में तत्वज्ञान के मुक्ता-मोती यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं जिनका गहनतम परिशीलन अपेक्षित है।
काव्य के ये रंग-बिरंगे पुष्प एकमात्र चैतन्य सत्ता के ही विविधरूपों से सम्बद्ध होने के कारण प्रस्तुत कृति का ‘चैतन्य वाटिका’ एक सार्थक नाम है।
इस प्रकार यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कृति आदरणीय बाबूजी के काव्य कौशल का स्वच्छ दर्पण है।
प्रस्तुत काव्य संग्रह में सर्वप्रथम मंगलचरण के पश्चात् क्रमशः अध्यात्म, वंदना, मुक्तक एवं चतुष्पदियां, गुरुदेव श्री को समर्पित रचनाएं, पूजन एवं पद्यानुवाद संकलित किये गये हैं। कतिपय राष्ट्रीय व सामाजिक रचनायें भी सम्मिलित की गई हैं जो बाबूजी के प्रारम्भिक साहित्यिक जीवन की रचनायें हैं।
सुदीर्घकाल से ही इनके प्रकाशन की भावना आज साकार हो रही है यह अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है ।
इस सम्पूर्ण कार्य सम्पादन में मुझे ब्र. नीलिमाजी का सहयोग प्रकाशन सामग्री उपलब्ध कराने के रूप में प्राप्त हुआ है । साथ ही श्री अजेय जैन, चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट ने काफी परिश्रम पूर्वक इस कार्य को गति दी है, इनके बिना यह कार्य इतना शीघ्र हो पाना संभव नहीं था । श्री प्रो. संतोषकुमार जैन, प्राध्यापक सुशील जैन, चिन्मय जैन एवं ब्र. नीलिमा जैन ने प्रूफ संशोधन आदि में अतिशय श्रम पूर्वक सहयोग प्रदान किया एवं अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन कोटा, दिगम्बर जैन मुमुक्षु मण्डल कोटा, श्री कुन्दकुन्द शिक्षण केन्द्र ट्रस्ट कोटा एवं वीर वनिता संघ कोटा के सदस्यगण ने इस प्रशस्त कार्य को सम्पन्न करने का अवसर एवं उत्साह प्रदान किया । तदर्थ सभी का आभारी हूँ ।
आदरणीय बाबूजी का ही इसमें सबकुछ है अतः जो भी विशेषतायें हैं वे पूज्य बाबूजी की हैं और कमियों का जिम्मेदार मैं हूँ । इसलिये सुधी पाठकों से यह आग्रह है कि यदि किसी प्रकार की त्रुटि दृष्टिगोचर हो तो सूचित करने का अनुग्रह करें ।
सभी जीव इस काव्यधारा में अवगाहन कर निज चैतन्य वाटिका में विहार करें - यही भावना है।
दिनांकः 23 जून, 2002
देवेन्द्रकुमार जैन
गुरुकहान मार्केट
बिजौलियाँ, जिला-भीलवाड़ा
अपनी बात…
चैतन्य वाटिका कुछ लोकोत्तर एवं नैतिक सुमनों का एक छोटा सा बगीचा है जिसकी सुरभित परिधि में जीवन के मूल्यों का बड़ी सावधानी से निर्वाह किया गया है।
काव्य वास्तव में साहित्य का एक महत्वपूर्ण अवयव है वह मनुष्य की अनुभूति की गहराइयों की एक ऐसी समष्टि है जो अपनी सावनी छटा चातक तुल्य श्रोताओं पर विकीर्ण कर उन्हें विभोर कर देती है क्योंकि वह कल्पना प्रधान होती है, कल्पना की विलक्षण एवं मनमोहक सुगंध काव्य का प्राण होती है।
काव्य लोक की एक ऐसी विधा है जो जगत की सभी विधाओं से विलक्षण होती है जगत की सभी विधायें गुरु शिक्षण सापेक्ष होती है जबकि काव्य कला सदा से गुरु शिक्षण निरपेक्ष ही रही है। वह एक जन्मजात प्रतिभा है जो फूल की कली की तरह अभिव्यक्त होकर समय पाकर स्वयं प्रस्फुटित होती है और सजल मेघों की तरह बरस कर श्रोताओं के अंतर को मुग्ध कर देती है।
काव्य के इस महत्वपूर्ण सुरम्य क्षेत्र में कुछ मनचले तथा कथित कवियों के द्वारा कुछ तुकबन्दियों की रचना भी हो रही है। जिनमें शब्दों को तोड़ मरोड़ एवं जोड़ तोड़ करके भानुमती के कुनबे की तरह कुछ बेतुके छंदों की रचना की जाती है। ऐसे कवियों को अपनी रचनायें छपाने का अति आग्रह रहता है और इधर समाज का अधिकांश वर्ग भी काव्य के स्वरूप को न समझने के कारण उन तुकबन्दियों की ओर आकर्षित होकर उन्हें प्रकाशित करके देश व्यापी बना देता है, इस प्रकार समाज में कचरा साहित्य परिव्याप्त हो जाता है इन रचनाओं से समाज की साहित्यिक गरिमा कम हो
जाती है और समाज के सम्बन्ध में साहित्यकार एवं सामान्य लोगों की यह आस्था बन जाती है कि इस समाज में उच्चकोटि के साहित्यकार नहीं हैं। ये रचनायें वास्तव में काव्य नहीं पर काव्य के अपभ्रंश हैं और इनसे समाज का साहित्यिक स्तर काफी आहत होता है।
सोलह वर्ष के विद्यार्थी जीवन में मेरी काव्य प्रतिभा का आविर्भाव हुआ, जब विद्वान एवं कुशल काव्यकार श्री राजेन्द्र कुमार जी ‘कुमरेश’ कोटा की धार्मिक जैन पाठशाला के धर्माध्यापक पद पर पधारे, उनसे हमें काव्य रचना की काफी प्रेरणा मिली। बाल्य से ही मेरे मन में कवि बनने की तीव्र लालसा रहा करती थी और जब मैं कवियों की विविध कवितायें सुनता था तो मेरा मन विस्मय से भर जाता था कि आखिर ये लोग कवितायें कर कैसे लेते हैं! इसी विस्मय के बेरोक प्रवाह में मेरा कवित्व प्रस्फुटित हो उठा।
वह राष्ट्रीयता का युग था और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी का अहिंसक संग्राम अपने पूरे वेग से आगे बढ़ रहा था, अंग्रेजों के जुल्मों से भारत की जनता त्रस्त हो चुकी थी, अतः कवियों की कविताओं में उन जुल्मों के चित्रण एवं आजादी की गरिमा ही मुख्य विषय होते थे। मेरा कवि भी आजादी की उसी लड़ी की एक कड़ी बन गया और राष्ट्रीय रचनाओं से मेरे काव्य जीवन का प्रारंभ हुआ। उस समय कोटा भारतवर्ष में आजादी की लड़ाई के प्रमुख केन्द्रों में एक मुख्य केन्द्र था और देश में कोटा आजादी की लड़ाई के एक स्मरणीय दिवस 8 अगस्त 1942 का वीर सेनानी तुल्य माना जाता था। कोटा में उन दिनों प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था भारतेन्दु समिति के तत्वावधान में कवि सम्मेलनों की बाढ़ सी आ रही थी।
मेरे काव्य जीवन में एक अद्भुत मोड़ तब आया जब मैं पहली बार सन् 1950 के सावन शुक्लपक्ष में कोटा के अध्यात्म उद्यान के विधाता स्व. पू. बाबू ज्ञानचंद जी के साथ देश में अध्यात्म क्रान्ति के सूत्रधार युगपुरुष पू० गुरुदेव श्री कानजीस्वामी के चरणों में सोनगढ़ पहुँचा और वहाँ के प्रौढ़ शिविर का शिविरार्थी बना। कुछ ही समय में शिविर एवं पू. गुरुदेव की दिव्यवाणी के माध्यम से हमारे संपूर्ण दुराग्रह प्रक्षालित हो गये और तब से मैंने जो कुछ भी लिखा उसमें अध्यात्म के मोहक मेघों की बरसती घटायें छायी हुई हैं, यहाँ तक कि भक्ति रसिकों की सुहाती देव-शास्त्र-गुरु पूजा श्री स्व. पूज्य बा. ज्ञानचंद जी सा. की प्रेरणा से स्वर्णपुरी (सोनगढ़) से कोटा लौटते समय रेल में ही लिखी गई थी और उसके बाद मेरी मनचाही सिद्धों का स्वरूप सरसाती साहित्यिक सिद्ध पूजा की रचना भी सन् 1992 में हुई थी।
मेरे इस काव्य संग्रह के अध्यात्म-लोक के सम्पूर्ण स्त्रोत पू. गुरुदेव श्री कानजी स्वामी रहे हैं, जिनसे मुझे अविनाशी शुद्धात्म तत्व की मनोमुग्धकारी कथा सुनने को मिली। अतः इस सम्पूर्ण काव्य संग्रह के साथ इसका एक पूरा खंड उन्हीं के श्री चरणों में समर्पित है।
चूंकि मेरी रुचि अध्यात्म प्रधान रही है और समाज भी मुझसे यही अपेक्षा रखता है, अतः इस काव्य संग्रह में मेरी अनेक राष्ट्रीय एवं अन्य विषयों की तथा अनूदित रचनाओं को समाविष्ट नहीं किया गया है।
यह काव्य रचना अपने कालक्रम में स्वयमेव निर्झरित हो गई है, अतः मुझे इसकी रचना का तिलतुष मात्र भी अभिमान नहीं है, क्योंकि इसके कर्त्तत्व का श्रेय मुझे नहीं, पौद्गलिक शब्दों को है। क्योंकि कवि एवं लेखक राष्ट्र के निर्माता होते हैं अतः कवियों एवं
लेखकों से मैं लेखन एवं आचरण में नैतिकता, सदाचार एवं अध्यात्म की अपेक्षा करता रहा हूँ। मैं स्वयं जीवन में अध्यात्म की संरचना को ही जीवन की संपूर्णता मानता हुआ अपनी बात इस प्रकार पूरी करता हूँ कि
“जो चेतन के भीतर झांका, उसने जीवन देखा
बाकी ने तो खींची रे परितप्त तटों पर रेखा”
इसके प्रकाशन हेतु मैं कोटा जैन युवा फेडरेशन का अत्यन्त आभारी हूँ और अनुरोध करता हूँ कि वे इसके प्रकाश में अपने जीवन का संचालन करेंगे !
“युगल”
अनुक्रमणिका
अध्यात्म खण्ड
2. ओ चिन्मय ! 4
3. साधक की विश्व को चुनौती 7
4. मृत्यु ! 10
5. चिर संचित अरमानों का घट 13
6. चलता चल… 16
7. सुख की खोज 19
8. तुम्हें धरा पर 21
9. क्षमा पर्व 22
10. अभिशापों में वरदानों के स्वर्णिम फूल खिला करते है 25
11. मान 27
12. आत्म-ज्ञान की गाथा 28
13. निश्चयाभासी 33
14. हम 35
वन्दना खण्ड
15. सन्त-वन्दन 38
16. मंगल-कामना गीत 39
17. ऋषभावतार 41
18. भगवान महावीर के प्रति 43
19. महावीर (अतुकान्त) 47
20. अरे ओ ! शिखर सम्मेद अचल 50
21. पण्डितप्रवर टोडरमलजी के प्रति श्रद्धांजलि 52
चतुष्पदी एवं मुक्तक खण्ड 54-62
गुरुदेव खण्ड
22. स्वागत गान 64
23. तूफान 66
24. चैतन्य-विहारी 70
25. हुआ वीर के संदेशों का स्वर्णपुरी में प्रत्यावर्तन 71
26. श्रद्धांजलि (पू. श्री कानजीस्वामी के प्रति) 73
27. स्वागत-गीत (सौराष्ट्र का संत) 75
28. पू. गुरुदेव (भाया रामलाल) 77
अनुवाद खण्ड
29. अमूल्य तत्व विचार 81
30. नीरव-निर्झर 82
31. नियमसार का पद्यानुवाद 85
पूजन खण्ड
32. देव-शास्त्र-गुरु पूजन 109
33. सिद्ध पूजन 114
नैतिक खण्ड
34. 15 अगस्त 120
35. प्रेयसि 124
36. आदमी 128
37. विश्व के अर्थ तंत्रियों से 131
38. पीड़ित वधू 132
39. दारिद्र्य एवं वैभव की झाँकी 137
40. कुमारी की अभिलाषा 140
खोज: चैतन्य वाटिका, Chaitanya Vatika, चैतन्य वाटिका काव्य संग्रह, Babu Yugal Ji Kavita, Babu Yugal Ji, Jugal Kishor Yugal, बाबू युगल जी, युगलजी, जुगलकिशोर युगल