चैतन्य स्वरूप | Chaitanya Swaroop

मैं चैतन्य स्वरूप हूँ, नित-चैतन्य स्वरूप हूँ।
ध्रुव चैतन्य स्वरूप हूँ, अविकारी चिद्रूप हूँ।। टेक।।

मैं आनन्द स्वरूप हूँ, नित्यानन्द स्वरूप हूँ।
ध्रुव आनन्द स्वरूप हूँ, परमानन्द स्वरूप हूँ।। 1।।

मैं शाश्वत प्रभु रूप हूँ, अक्षय प्रभुता रूप हूँ।
अद्भुत प्रभुता रूप हूँ, चेतन प्रभुता रूप हूँ।। 2।।

मैं ध्रुव मंगल रूप हूँ, शाश्वत मंगल रूप हूँ।
मंगलमय मंगल करण, सहजहिं मंगल रूप हूँ।। 3।।

लोकोत्तम चिद्रूप हूँ, सर्वोत्तम चिद्रूप हूँ।
परमोत्तम चिद्रूप हूँ, सहज अनुत्तम रूप हूँ।। 4।।

अनन्य शरण चिद्रूप हूँ, सहज शरण चिद्रूप हूँ।
सदा शरण चिद्रूप हूँ, मैं अशरण चिद्रूप हूँ।। 5।।

मैं निरपेक्ष स्वरूप हूँ, मैं निर्ग्रन्थ स्वरूप हूँ।
मैं निर्द्वन्द्व स्वरूप हूँ, मैं निर्बन्ध स्वरूप हूँ।।6।।

मैं निष्काम स्वरूप हूँ, ध्रुव निष्कर्म स्वरूप हूँ।
मैं श्रद्धेय स्वरूप हूँ, निश्चय ध्येय स्वरूप हूँ।।7।।

सहज ज्ञानमय सहजहि ज्ञाता, सहजहिं ज्ञेय स्वरूप हूँ।
धर्म अनन्तमयी धर्मी हूँ, मैं ही धर्म स्वरूप हूँ।। 8 ।।

सहज पूर्ण शिवरूप हूँ, सदा पूर्ण शिवरूप हूँ।
अन्तर्मुख हो प्रत्यक्ष अनुभवँ, शाश्वत ज्ञायक रूप हूँ।।9।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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