चाहत की पतवार | Chahat ki patvar

चाहत की पतवार

चाहत की पतवार बनाके,
स्व को कैसे पाओगे?
खुद को खेवनहार समझके,
भवसागर न तर पाओगे।

चाहत की जब नाव सजेगी,
मोह ही बस पतवार बनेगा।
अहंकार को सारथी करके,
आत्म कैसे उस पार तरेगा?

“हूँ आत्म छूं” ऐसे अनुभव करके,
मैं “मैं” में ही खो जाओगे।
ये संसार भले न समझें,
पर तुम सिद्धों में मिल जाओगे।

रचनाकार: सिंघई हर्षिल (Singhai Harshil), जबलपुर
Instagram: @singhaiharshil