तर्ज : आओ भाई तुम्हें सुनायें…
समझो-समझो अहो मुमुक्षु, श्री जिनेन्द्र की अमृत वाणी।
भव-आताप मिटाने को जो, शुद्ध ज्ञानमय सुधा समानी।।1।।
ओंकार वाणी को गुरु ने, चार भाग में दिया सजा।
द्रव्यं-करणं-चरणं प्रथमं, बना दिए अनुयोग महा।।2।।
चार शैलियों द्वारा इनमें, वस्तु स्वरूप दिखाया है।
भाषा-शैली, विषय भिन्न पर, तत्त्व एक दर्शाया है।।3।।
स्याद्वाद का लिया सहारा, पूर्ण विश्व का किया कथन।
किन्तु नहीं संशय उत्पादक, नहिं सिद्धांत कहीं खण्डन।।4।।
द्रव्यानुयोग में द्रव्य, तत्त्व अरु अस्तिकाय हैं बतलाये।
आश्रय करने योग्य शुद्ध आतम के गुण गुरुवर गाये।।5।।
नव तत्त्वों से भिन्न शुद्ध आतम की महिमा पहिचानें।
करें प्रतीति, अनुभव थिरता, निश्चय ही शिवपद पावें।।6।।
सूक्ष्म कथन करणानुयोग में, भेद-प्रभेद सभी गाये।
अज्ञानी नहीं समझे, जैसे घट में जलधि नहीं आये।।7।।
पर जिसको हम जान सकें नहीं, उसमें संशय व्यर्थ अरे।
है सही प्रयोजनभूत जहाँ, अप्रयोजन में क्यों झूठ कहे।।8।।
चरणानुयोग में बाह्य क्रियाओं की प्रधानता दर्शायी।
परिणामों की निर्मलता की, बाह्य विधि गुरु बतलाई ।। १ ।।
जैसे कृषक बाह्य साधन कर बीज खेत में बोता है।
बाह्य साधना कर त्यों ज्ञानी अंतर शोधन करता है ।। 10।।
पर बाहर में अटक न जाना, धर्म नहीं है बाहर में।
धर्म आत्मा का स्वभाव है, पा लेना निज अन्तर में ।। 11 ।।
प्रथमानुयोग में जीवन गाथा महापुरुषों की प्रगटाई।
पापों से हट, धर्म मार्ग में लगने की रुचि करवाई ।। 12 ।।
वीतरागता ही इनके जीवन से, भाई ! ग्रहण करो।
कमजोरी का पकड़ बहाना, राग का पोषण नहीं करो ।। 13 ।।
यों चारों अनुयोगों में कहीं निश्चय, कहीं व्यवहार प्रधान।
यत्र-तत्र है उपादान जहँ-तहँ, निमित्त का भी विधान।। 14।।
किन्तु ध्यान रखना भाई है, नय व्यवहार समझने को।
निश्चय नय वर्णित आत्म-रूप ही, लक्ष्य योग्य है रखने को ।। 15 ।।
है उपादान तैयार जहाँ, वहाँ नभ से निमित्त उतरता है।
संयोगी दृष्टि अतः तजे, वह भव से पार उतरता है।। 16।।
अतएव भव्य दृढ़ श्रद्धा कर, हैं जैनशास्त्र सत्यार्थ सदा।
नय से भावार्थ समझ इनका, पायेगा जग में दुख न कदा ।। 17 ।।
पर ज्यों अग्नि दाहक-पाचक, यदि हाथ उसी में डालेगा।
तो अग्नि का कुछ दोष नहीं, तेरा अज्ञान जलायेगा।। 18।।
बस इसी भाँति यदि शब्द जाल में, उलझ लड़ाई ठानेगा।
तो सदा जगत् में भ्रमण करे, आतम स्वरूप नहीं जानेगा ।। 19 ।।
हे आत्मन् ! सुनो सीख गुरु की, जिनवाणी का अभ्यास करो।
निज ध्रुव शुद्धातम का आश्रय कर, निज परिणति पवित्र करो।।20।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Char Anuyogmayi Jinvani