दोहा
इस अशरण संसार में, शरण रूप व्यवहार।
नमहुँ दिगम्बर गुरु चरण, गुण गाऊँ सुखकार।। 1।।
विषय-कषायारम्भ बिन, ज्ञान-ध्यान-तप लीन।
निर्विकार मुद्रा सहज, करे मोहमल छीन।। 2।।
चौपाई
निज निर्ग्रन्थ रूप का ध्यान, प्रचुर स्वसंवेदन सुखदान ।
नग्न बाह्य में भी अविकार, साधुदशा जग में सुखकार ।। ३ ।।
तीन कषाय चौकड़ी नाशी, भव तन भोग विरक्ति विकासी ।
तृप्त रहें अपने में आप, चर्या सहज होय निष्पाप ।। ४।।
उपजें नहिं रागादि विकार, जीव विराधन नहीं दुःखकार।
वर्ते सहज ही यत्नाचार, पले अहिंसा व्रत सुखकार।। ५।।
निज में मग्न मौन अविकार, मृषा कथन होवे न लगार।
क्वचित् कदाचित् सत्योपदेश, नहिं आसक्ति वहाँ भी लेश ।। ६ ।।
अपना वैभव लखा अपार, पर पदार्थ लख जगे न प्यार।
सहज अचौर्य महाव्रत होय, वंदनीय है मुनिपद सोय ।। ७ ।।
ध्यावें सदा शुद्ध चिद्रूप, परम ब्रह्म परमात्म स्वरूप।
ब्रह्मचर्य वर्ते अविकार, लगें नहीं किंचित् अतिचार।। ८।।
अपनी निधि अपने में धार, भये अकिंचन मुनि सुखकार ।
तिल तुष मात्र परिग्रह नाहिं, तुष्ट रहें निज आतम माँहि ।। ९ ।।
नहिं आकुलता नहीं प्रमाद, नहिं अनुबन्ध रूप अवसाद।
सहज गमन लागे नहीं दोष, ईर्या समिति पले निर्दोष ।। १० ।।
प्राणिमात्र प्रति मैत्री भाव, हित-मित-प्रिय वच हों सुखदाय ।
भाषा समिति सहज ही होय, तारण-तरण ऋषीश्वर सोय ।। ११ ।।
अनाहारी शुद्धातम ध्यावें, स्वयं-स्वयं में तृप्त रहावें।
दोष छियालीस लगे न कोय, धनि युक्ताहारी मुनि सोय ।। १२ ।।
त्यागोपादानशून्य स्वभाव, भिन्न सभी भासें परभाव।
तँह किंचित् ममत्व नहीं जान, हो सयत्न निक्षेप आदान।। 13 ।।
जानत सब जीवन की जात, होवे नाहीं उनका घात।
प्रासुक भूमि माँहिं मल डारें, निर्मल आत्म स्वरूप संभारें।। 14 ।।
नाना इन्द्रिय विषय निहार, हर्ष-विषाद न जिन्हें लगार।
परम जितेन्द्रिय श्री मुनिराय, सहज नमन होवे सुखदाय।। 15 ।।
चेतनपद परस्यो अविकार, उपज्यो आनन्द अपरम्पार।
जड़ स्पर्श में राग या द्वेष, होवे नहीं सहज लवलेश।। 16।।
स्वाद निजानन्द रस को पाय, बाह्य स्वाद फीके दिखलाय।
नीरस तो नीरस ही रहे, सरस स्वाद भी नीरस भये।। 17।।
अहो अगंध स्वरूप अनूप, परमानन्दमय शुद्ध चिद्रूप।
नहीं सुगन्ध लगे सुखरूप, भासे नहिं दुर्गन्ध दुःखरूप।। 18 ।।
सुन्दरतम शुद्धात्म स्वरूप, शाश्वत शोभा लखी अनूप।
बाह्यरूप नहिं मन को मोहें, अविकारी मुनि जग में सोहें।। 19 ।।
राग-रागिनी शब्द कुशब्द, सुनते भी मुनि हो नहीं क्षुब्ध।
अंतर आत्मप्रसिद्धि जगाय, सहज उदास रहें मुनिराय।। 20 ।।
ध्यावें आत्मरूप अविकार, साम्यभाव वर्ते सुखकार।
ज्ञायकपने स्वयं को जोय, भिन्न ज्ञेय भासे सब लोय।। 21 ।।
इष्ट-अनिष्ट विकल्प न आय, नहीं विषमता हो दुःखदाय।
सामायिक यह मंगलरूप, होय सहज मुनि को शिवरूप।। 22 ।।
दर्शायो आतम उत्कृष्ट, जग में पूज्य पंच पद इष्ट।
हो स्तुति वंदन बहुमान, वर्ते सहज भेद-विज्ञान।। 23 ।।
नहीं अतिक्रमे शुद्ध चिद्रूप, सहज होय प्रतिक्रमण अनूप।
क्रिया ज्ञानमय नित अविकार, दुखदायक अतिचार विडार ।। 24 ।।
निमित्त रूप आगम अभ्यास, आप आप जाने सुखरास।
कायोत्सर्ग मुद्रा धरि नित्य, देखें आत्मस्वरूप पवित्र ।। 25 ।।
नहीं स्नान, नहीं शृंगार, नग्न देह शोभे अविकार ।
अन्तर बाहर सहज पवित्र, रहित वासना निर्मल चित्त ।। 26 ।।
देहाश्रित निद्रा भी अल्प, जागृत सहज रहें अविकल्प।
स्वाश्रय से लुंचे सु कषाय, केशलोंच बाहर सुखदाय ।। 27 ।।
खड़े-खड़े हो अल्पाहार, एकबार संयम चित्त धार।
न हो दन्तवन हिंसारूप, धन्य जैन मुनि मंगलरूप।। 28।।
नभ समान निर्लेप असंग, ध्यावें शुद्ध चिद्रूप अनंग ।
दर्शावें जग में सुखकार, ध्रुव मंगल शुद्धातम सार।। 29।।
परम शान्त मुनिवर आदर्श, मोह विनाशक मुनि का दर्श।
धन्य भाग्य जब दर्शन पाऊँ, हो निर्ग्रन्थ स्वरूप सु ध्याऊँ ।। 30 ।।
दोहा- रत्नत्रय शोभित अहो, धन्य साधु निर्ग्रन्थ।
साधें आत्मस्वरूप निज, दर्शावें शिवपंथ ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह