बीजूं प्रतिक्रमण | Bijun Pratikraman

बीजूं प्रतिक्रमण

प्रतिक्रमण-आवश्यक /

/ ५१

बीजूं प्रतिक्रमण

संवत्सरीना दिवसे करवातुं प्रतिक्रमण
अथवा लघु प्रतिक्रमण

[श्री सद्गुरुदेवनी विनयपूर्वक आज्ञा लईने अथवा तेओश्रीनी
बिराजमान न होय तो श्री सीमंधर प्रभुनी आज्ञा लईने
प्रतिक्रमण शरु करवुं.]

पाठ १ लो
देव-गुरु-धर्म मंगल

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्द्याद्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥

पाठ २ जो
दिव्यध्वनि नमस्कार

ओंकारं विन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥

पाठ ३ जो
ब्रह्मचर्य-महिमा

पात्र विना वस्तु न रहे, पावे आत्मिक ज्ञान।
पात्र थवा सेवो सदा, ब्रह्मचर्य महिमान.
(श्रीमद् राजचंद्रमांथी)

५२ /

/ सर्वसामान्य

पाठ ४ थो
सर्वज्ञनुं स्वरूप

त्रिळागगोचर समस्त गुण-पर्यायो सहित संपूर्ण लोक अने
अलोकने (छद्म द्रव्योने) जे प्रत्यक्ष जाणे छे ते सर्वज्ञदेव छे. ३०२.

हे सर्वज्ञना अभाववादी! जो सर्वज्ञ न होय तो अतीन्द्रिय
पदार्थोने (इन्द्रियगोचर नथी एवा पदार्थोने) कोण जाणे?

इन्द्रियज्ञान तो स्थूल पदार्थो के जे इन्द्रियना संबंधरूप
वर्तमान होय तेने जाणे छे, अने तेमना पण समस्त पर्यायोने ते
जाणतुं नथी. ३०३.
(स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षामांथी)

जे जाणतो अर्हतने गुण, द्रव्य ने पर्यायपणे,
ते जीव जाणे आत्मने, तसु मोह पामे लय झरे. ८०.

जे अर्हतने द्रव्यपणे, गुणपणे अने पर्यायपणे जाणे छे ते
(पोताना) आत्माने जाणे छे अने तेनो मोह अवश्य लय पामे
छे.
(श्री प्रवचनसार)

पाठ ५ मो
समयसारजी-स्तुति

(हरिगीत)

संसारी जीवनो भावमरणो टाळवा करुणा करी,
सच्चिता वहावी सुधिरा तणी प्रभु वीर! ते संजीवनो;
शोभाती देषीने सरिरुणाळीना हृदयदे करी,
मुनिझुंड संजीवनो समयप्रभुतणे भाजन भरी.
(अनुष्टुप)

फुदफुद रयुं शास्त्र, साथिया अमृते पूर्णा,
ग्रंथाधिराज! तारामां भावो ब्रह्मांडाना भर्या.

प्रतिक्रमण-आवश्यक /

/ ५३

(शिष्यारिष्ट)

अहो! वाणी तारी प्रशमरस-भावे नीतरती,
मुमुक्षुने पाती अमृतरस अंजली भरी भरी;
अनादिनो मूर्छो विषुध तणी त्याराथी वितरती,
विभावेथी थंभो स्वसुख भणी होउं परिणति.
(शार्दूलविक्रीडित)

तुं छे निश्रयथय भंग सधवा व्यवहारना भेदना,
तुं प्रज्ञाशीळी ज्ञान ने ऊंदमनी संधि सहू छेदना;
साधी साधकनो, तुं भानु जगनो, संदेश महावीरनो,
विसामो भवकाळना हद्ददनो, तुं पंथ मुक्ति तणो.
(वसंततिलका)

सुखमे तने रसनिबंध शिथिल थाय,
जाणये तने हृदय ज्ञानी तणो जणाय;
तुं रुचता, जगतनी रुचि आभसे सो,
तुं रीझतां सकलशुद्धदेव रीझे.
(अनुष्टुप)

बनावयुं पत्र कुंदनना, रत्नोना अक्षरो लपी,
तथापि फुदसुत्रोना अंकाये मूल्य ना कही.

पाठ ६ ठो
श्री आत्मसिद्धि शास्त्रनां केटलांक पदो

जे स्वरूप समज्या विना, पाम्यो दुःख अनंत;
समजायुं ते पद नमुं, श्री सद्गुरु भगवंत. १.
वैराग्यादि सकळ तो, जो सह आत्मज्ञान;
तेम ज आत्मज्ञाननी, प्राप्ति तणां निदान. ६.

[४४]

त्याग, विराग न चित्तमां, थाय ने तेने ज्ञान;
अटके त्याग विरागमां, तो भूले निज भान. ९.
सेवे सद्गुरु चरणने, त्यागी दर्द निज पक्ष;
पामे ते परमार्थने, निजपदनो ले लक्ष. ८.
सद्गुरुना उपदेश वश, समजाय न जिनरूप;
समज्या वण उपकार शो, समजये जिनवरूप. १२.
स्वच्छंद, मत आग्रह तज्युं, वर्त सद्गुरुलक्ष;
समकित तेने भाखियुं, कारण गणी प्रत्यक्ष. १७.
मानादिक शत्रु महा, निज छेदे न मराय;
जातां सद्गुरु शरणमां, अल्प प्रयासे जाय. १८.
लखुं स्वरूप न वृत्तिनुं, ग्रहणुं व्रत अभिमान;
ग्रहे नहीं परमार्थने, लेवा लौकिक मान. २८.
अथवा निश्चय नय ग्रहे, मात्र शब्दनी मांय;
लोभे सद्बलवेलना, साधनरहित थाय. २९.
ज्ञानदशा पामे नहीं, साधनदशा न कांई;
पामे तेनो संग जे, ते बुडे भवमांई. ३०.
नहि कषाय उपशांतता, नहि अंतर वैराग्य;
सरळपणुं न मध्यस्थता, ए मतार्थी दुर्भाग्य. ३२.
एक होय त्रण काळमां, परमार्थनो पंथ;
प्रेरे ते परमार्थने, ते व्यवहार समंत. ३६.
कषायनी उपशांतता, मात्र मोक्ष-अभिलाष;
भवे भेद, प्राणीदशा, त्यां आत्माभिनिवास. ३४.
भास्यो देहाध्यासथी, आत्मा देहसमान;
पण ते बन्ने भिन्न छे, प्रगट लक्षणे भान. ४८.
सर्व अवस्थाने विषे, न्यारो सदा જણाय;
प्रगटपणुं चैतन्यमय, ए ओमण सदाच. ५४.

प्रतिक्रमण-आवश्यक /

[५५]

जेड चेतननो भिन्न छे, केवळ प्रगट स्वभाव;
एकपणुं पामे नहि, त्रण काळ द्वय भाव. ५७.
जे संयोगो दीखिये, ते ते अनुभव देय;
दोपके नहि संयोगथी, आत्मा नित्य प्रत्यक्ष. ६४.
जदथी चेतन दीखये, चेतनथी जड थाय;
एनो अनुभव कोइने क्यारे कही न थाय. ६५.
कोई संयोगी नहीं, जेनी उत्पत्ति थाय;
नाश न तेनो कोइमां, तेथी नित्य सदाच. ६६.
चेतन जो निजभावमां, कर्ता आप स्वभाव;
वर्ते नहि निजभावमां, कर्ता कर्म-प्रभाव. ७८.
कर्मभाव अज्ञान छे, मोक्षभाव निजभाव;
अंधकार अज्ञान सम, नाशे ज्ञानप्रकाश. ८८.
जे जे कारण बंधना, तेह बंधननो पंथ;
ते कारण छेदक दशा, मोक्षपंथ भवदंत. ८८.
राग, द्वेष, अज्ञान ए, मुख्य कर्मनी ग्रंथी;
थाय निवृत्ति जेहथी, ते ज मोक्षनो पंथ. १००.
आत्मा सत् चैतन्यमय, सर्वभास रहित;
जेथी केवळ पामिये, मोक्षपंथ ते रीत. १०१.
मत दर्शन आग्रह तज्यो, वर्त सद्गुरुलक्ष;
लहे शुद्ध समकित ते, जेमां भेद न पक्ष. ११०.
वर्ते निजस्वभावना, अनुभवो लक्ष प्रतीत;
वृत्ति वर्ते निजभावमां, परमार्थ समकित. १११.
वर्धमान समकित थई, टाळे मिथ्याभास;
उदय थाय चारित्रनो, वीतरागपद वास. ११२.
केवळ निजस्वभाविनुं, वीतरागपद वास. ११२.
केवळ निजस्वभाविनुं, उपजे वर्त ज्ञान;
कहिये केवळज्ञान ते, देह छतां निर्वाण. ११३.

[५६]

कोटि वर्षनुं स्वप्न पण, जाग्रत थतां शमाय;
तेम विभाव अनादिनो, ज्ञान थतां दूर थाय. ११४.
छूटे देहाध्यास तो, नहि कर्ता तुं कर्म;
नहि भोक्ता तुं तेहनो, ए ज धर्मनो मर्म. ११५.
ए ज धर्मथी मोक्ष छे, तुं छो मोक्षस्वरूप;
अनंत दर्शन ज्ञान तुं, अभ्याबाध स्वरूप. ११६.
शुद्ध बुद्ध चैतन्यघन, स्वयंज्योति सुखधाम;
बीजुं कहिये केटलं? कर विचार तो पाम. ११०.
मोक्ष कह्यो निजशुद्धता, ते पामे ते पंथ;
समजायो संक्षेपमां, सकळ मार्ग निग्रंथ. १२३.
आत्माभाति सम रोग नहि, सद्गुरु वैद्य सुजाण;
गुरुआज्ञा सम पथ्य नहि, औषध विचार ध्यान. १२८.
जो इच्छो परमार्थ तो, करो सत्य पुरुषार्थ;
भवस्थिति आदि नाम लई, छोडो नहि आत्माथ. १३०.
सर्व जीव छे सिद्धसम, जे समझे ते थाय;
सद्गुरुआज्ञा जिनदशा, निमित्त कारणमांय. १३१.
देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत;
ते ज्ञानीना चरणमां, हो वंदन अगणित. १३२.

पाठ ७ मो

श्री अमितगति-आचार्य विरचित

सामायिक पाठनां केटलांक अवतरणो

(हरिगीत छंद)

  • सो प्राणी आ संसारना, सन्मित्र मुज वलवां अजे,
    सद्गुरुमां आनंद मानुं, मित्र के वेरी हजे;
  • सत्सुच्युं मित्रो गुणिनुं प्रसाद, मित्रतेयुं जीवेषु कृपापरत्वम्।
    माध्यस्थभावं विपरीतवृत्ती, यदा ममात्मा विदधातु देव।।१।।

प्रतिक्रमण-आवश्यक

दुखिया प्रति करुणा और दुश्मन प्रति मध्यस्थता,
शुभ भावना प्रभु चार आ, पापो हृदयमें स्थिरता.
अति ज्ञानवंत अनंत शक्ति, दोषहीन आ आत्म छे,
ए आनथी तरवार पेठे, शरीरथी विभिन्न छे;
हूं शरीरथी जुदो गणुं, ए ज्ञानबळ मुझने मळो,
ने भीषण जे अज्ञान मारुं नाथ! ते सत्वर टळो.
सुख-दुःखमां, अरि-मित्रमां, संयोग के वियोगमां,
रखूं वने वा राजभुवनने, रायतो सुभगभोगमां;
मम सर्वकाळे सर्व द्रव्यमां, आत्मवत् बुद्धि बधी,
तुं आपजे मुझ मोह क्षपी, आ दशा करुणाविधि.
प्रमादथी प्रयाण करीने, विचरतां प्रभु अर्हतां,
एकेन्द्रियादि जीवने, हणतां कदी डरतो नहीं;
छेदी विलेदी दुःख दई, में त्रास आप्यो तेमने,
करजो क्षमा मुझ कर्म हिंसक, नाथ विनवुं आपने.
*मनमें मारूं दोषित थाय तो हुं दोष अतिक्रम जाणतो,
दोषित थतुं आचारमां तो दोष व्यतिक्रम मानतो;
विषयो तणी प्रवृत्तिमां हुं अतिचारी धारतो,
विषयो तणी आसक्तिमां हुं अनाचारी समजतो.
मुझ वचन वाणी उच्चारमां, तळेवार विनिमय थाय तो,
जो अर्थ मात्र पट्ट मही, लवलेश वधघट होय तो;
यथार्थ वाणी भंगनो, दोषित प्रभु हुं आपनो,
आपी क्षमा मुझने बनावो, पात्र केवल बोधनो.

★ अर्थ :- मननी शुद्धिमां क्षति थवी, मनमां विकारभाव उत्पन्न थवो ते अतिक्रम छे; शीलव्रतनुं अर्थात् व्रतनुं प्रतिज्ञानुं उल्लंघन करवानो भाव थवो ते व्यतिक्रम छे; विषयोमां प्रवृत्त थवुं ते अतिचार छे; अने ते विषयोमां अतिशय आसक्त थवुं ते अनाचार छे.

पाठ ८ मो

श्रावक-कर्तव्य

षट् आवश्यक कर्म

देवपूजा गुरुपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः
दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने ॥१॥
(पञ्चेन्द्रियविशालिका-उपासकसंसार)

अर्थ :- जिनेन्द्रदेवनी पूजा, निर्ग्रन्थ गुरुओनी सेवा, स्वाध्याय, संयम, (योग्यतानुसार) तप अने दान—ए छ कर्म श्रावकोए प्रतिदिन करवा योग्य छे.

श्रावकना आठ मूलगुण

मद्यमांसमधुत्यागी व्यक्ताष्टोत्तरपंचकः।

नामतः श्रावकः ख्यातो नान्यथापि गृह्णीयात् ॥२॥
(पंचाध्यायी)

अर्थ :- मद्य, मांस तथा मधनो त्याग करवावाळो अने पांच *उदुम्बर फळोने छोडवावाळो गृहस्थ नामथी श्रावक कहेवाय छे पण मद्यादिकनुं सेवन करवावाळो गृहस्थ नामथी पण श्रावक कही शकातो नथी.

पाठ ९ मो

मिथ्या मि दुक्कडं

आ भव ने भवोभव थई वेरविरोध,
अंध बनी अज्ञानथी, कर्यो अतिशय क्रोध;
ते सवि मिथ्या मि दुक्कडं.

★ जे वृक्षोने तोडवाथी दूध नीकळे छे एवा वट, पीपर, ऊंबर, डूंमर, पाकर वृक्षोने क्षीरवृक्ष अथवा उदुम्बर कहे छे. तेमां सूक्ष्म तथा स्थूल त्रस जीवोनी उत्पत्ति थाय छे.
१, २ आलोचनारहि-षट्कर्मक, पानू १०१, १०.

प्रतिक्रमण-आवश्यक

जीव जमावुं छुं सवि, क्षमा करजो सदाय,
वेरविरोध टळी जजो, अक्षयपद-सुख सोय;
समभावी आत्म थशे.
भारे कर्मो जीवडा, पीसे वेरनुं ढेर,
भवाटवीमां ते भ्रमे, पामे नहि शिव-लहेर;
धर्मनो मम विचारजो.

पाठ १० मो

[परमपद प्राप्तिनो भावना भावनारूपे श्रीदेवाधिदेवना आगममां आवे छे]
(नमस्कार मंत्रनो बोलावो)

अपूर्व अवसर एवो क्यारे आवशे?
क्यारे थईशुं बाह्यांतर निर्ग्रन्थ जो?
सर्व संबंधनुं बंधन तोडीने,
विचरशुं क्व अद्वैतमां पंथ जो? अपूर्व० १.
सर्व भावथी ओदासीवृत्ति करी,
मात्र देह ते संयमहेतु होय जो;
अन्य कारणे अन्य कशुं कल्पे नहीं,
देह पण किंचित् मधुं न जोय जो. अपूर्व० २.
दर्शनमोह व्यतीत थई उपशम जो होय,
देह भिन्न केवल चैतन्यनुं ज्ञान जो;
तेथी प्रक्षीणा चारित्रमोह विलासिने,
वर्ते अहुं शुद्धस्वरूपनुं ध्यान जो. अपूर्व० ३.
आत्मस्थिरता त्रण संक्षिप्त योगनी,
मुख्यपणे तो वर्ते देहपर्यंत जो;
घोर परिषह के उपसर्गलये करी,
आवी शके नहीं ते स्थिरतानो अंत जो. अपूर्व० ४.

[सर्वसामान्य]

६० /

संयमना हेतुथी योगप्रवर्तना,
स्वरुपलक्ष जिन्न आज्ञा आधीन जो;
ते पण क्षण क्षण घटती जती स्थितिमां,
अंते थाये निजस्वरुपमां लीन जो. अपूर्व० ५.
पंच विषयमां रागद्वेष विरहितता,
पंच प्रमादे न मळे मननो लाभ जो;
द्रव्य, क्षेत्र न काळ, भाव प्रतिबंधन,
विचरखुं ऊदयाधीन पण वीतलभ जो. अपूर्व० ६.
क्रोध प्रत्ये तो वर्तने कोधस्वभावता,
मान प्रत्ये तो दीनपणानुं मान जो;
माया प्रत्ये माया साची भावनी,
लोभ प्रत्ये नहीं लोभ समान जो. अपूर्व० ७.
बहु उपसर्गकर्ता प्रत्ये पण क्रोध नहीं,
वंदे थकी तथापि न मळे मान जो;
देह जाय पण माया थाय न रोहमां,
लोभ नहीं छो प्रबल सिद्धि निदान जो. अपूर्व० ८.
नग्नभाव, मुंडभाव सह अस्रानता,
अदंतधोवन आदि परम प्रसिद्ध जो;
केश, रोम, नख के अंगे शृंगार नहीं,
द्रव्यभाव संयममय निर्ग्रथ सिद्ध जो. अपूर्व० ९.
शत्रु मित्र प्रत्ये वर्त समदर्शिता,
मान अमाने वर्त ते ज स्वभाव जो;
जितिन के मरणे नहीं न्यूनअधिकता,
भव भोगे पण शुद्ध वर्त समभाव जो. अपूर्व० १०.
ऐकाकी विचरतो वळी स्मशानमां,
वळी पर्वतमां वाघ सिंह संयोग जो;

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

६१ /

अकोळ आसन, ने मनमां नहीं क्षोभता,
परम मित्रनो जळे पायो योग जो. अपूर्व० ११.
घोर तपस्यामां पण मनने ताप नहीं,
सरस अन्नने नहीं मनने प्रसन्नभाव जो;
रजकणा के रिद्धि वैमानिक देवनी,
सर्व मान्यां पुद्गल एक स्वभाव जो. अपूर्व० १२.
(नमस्कार बोली कायोत्सर्ग पारवो)

L

पाठ १० मो प्रत्याख्यान

[ओछी साधे बे प्रतिक्रमण करे के केवळा आ प्रतिक्रमण करे
त्यारे पेहलां प्रतिक्रमण पाठ १९मां बताव्या प्रमाणे अही
प्रत्याख्यान करखुं.]

पाठ १२ मो

जिनवृजननी वाणी

सीमंधर मुखथी फूलडां झरे,
एनी फुदफुद गंधे माज रे,
जिनजननी वाणी भली रे…सीमंधर०
वाणी भली मन लागे रणी,
जेमां सार-समय शिरताज रे,
जिनजननी वाणी भली रे…सीमंधर०
गुंथ्यां पाहुड ने गुंथ्युं पंचास्ति,
गुंथ्युं प्रवचनसार,
जिनजननी वाणी भली रे.
गुंथ्युं नियमसार, गुंथ्युं रयणसार,
गुंथ्यो समयनो सार रे,
जिनजननी वाणी भली रे…सीमंधर०

[सर्वसामान्य]

६२ /

स्यादवाद केरी सुवासे भरेलो,
जिनजननो ओंकारनाद रे,
जिनजननी वाणी भली रे.
वंदुं जिनेश्वर, वंदुं हुं फुदफुद,
वंदुं ऐ ओंकारनाद रे,
जिनजननी वाणी भली रे…सीमंधर०
हुंढे हजो, मारा भावे हजो,
मारा ध्याने हजो जिनवाध रे,
जिनजननी वाणी भली रे.
जिनेश्वरदेवनी वाणीना वायरा,
वाजो मने दिनरात रे,
जिनजननी वाणी भली रे…सीमंधर०

L

पाठ १३ मो

अंतिम मंगल

तद्यति प्रीतिचेतेन येन वार्तापि हि श्रुता।
निश्चितं स भवेद्भूयो भावनिर्वाणभाजनम् ॥ २३ ॥
[पद्मनंदिपंचविंशतिका—एकत्वसप्तति]

अर्थ :—जे जीव प्रसन्नचित्तथी आ चैतन्यस्वरुप आत्मानी
वात पण सांभळी छे ते भव्य पुरुष भविष्यमां थनारी मुक्तिनुं
अवश्य भाजन थाय छे.

सर्वमंगलमांगल्यं

सर्वकल्याणकारकं।

प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्॥

इति बीजुं प्रतिक्रमण पूर्ण थयुं।

प्रतिक्रमण-आवश्यक

नमोः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते।
चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावांतरच्छिदे॥
णवि होदि अप्पमत्तो ण पमत्तो जाणगो दु जो भावो।
एवं भणंति सुद्धं णादं जो सो सो चेव॥
भावयेदभेदविज्ञानमिदमित्यक्षरारया।
तावदावत्त्वराख्यात्वा ज्ञानं ज्ञाने प्रतिष्ठते॥
भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन।
अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन॥
आत्मा ज्ञानं स्वयं ज्ञानं ज्ञानादन्यत्करोति किम्।
परभावस्य कर्ताऽहं मोहोऽयं व्यवहारिणाम्॥

(स्वाध्याय माटे)

उपादान-निमित्तांना दोहा

प्रश्न :-

गुरु-उपदेश निमित्त बिन, उपादान बलहीन;
ज्यों नर दुर्जे पाँव बिन अलबेलो आधीन। १.
हाँ जोये था एक ही, उपादानसो काज;
थके सहाई पौन बिन, पानी माहि जहाज। २.

अर्थ :-

गुरुना उपदेशना निमित्त वगर उपादान (आत्मा पोते) बळ वगरनुं छे, जेम भाड़ना चालवा माटे बीजा पग वगर चाले नहीं तेम.

जे एम ज जाणे छे के-एक उपादानथी ज काम थाय (ते बराबर नथी..) जेम पाणीमां वहाण पवननी मदद वगर थाके छे तेम.

उत्तर :-

ज्ञान नैन क्रियारथ धारो, दोउ शिवमग धार;
उपादान निजसें ह्वै, तहाँ निमित्त व्यवहार। ३.

अर्थ :-

सम्यग्दर्शन पूर्वक ज्ञान अने ते ज्ञानमां चारित्ररूप (स्थिरतारूप) क्रिया ते बने शिवमार्ग (मोक्षमार्ग) ने धारण करे छे.
ज्यां उपादानमां (निश्चय) होय त्यां निमित्त होय ज छे ए व्यवहार छे. (परवस्तु निमित्त हाजरूप होय छे एम परनुं ज्ञान करवुं तेने व्यवहार कहेवामां आवे छे.)

उपादान निज गुणसें ह्वै, तहाँ निमित्त पर होय;
भेदज्ञान परमाध विधि, विरला बुझे कोय। ४.

अर्थ :-

ज्यां पोताना गुण उत्पन्न थवा तैयार होय त्यां तेने अनुकूल पर निमित्त होय एवी रीते भेदज्ञानना प्रवीण पुरुष जाणे छे. अने तेवा विरला ज बुझे छे. (मुक्त थाय छे.)

उपादान बलई नहीं, नहिं निमित्तको दाव;
एक अंसो रथ थले, रविको यहे स्वभाव। ५.

अर्थ :-

ज्यां उपादाननुं बळ छे; निमित्तनो दाव नथी, अर्थात् निमित्त कांई पण करी शकतुं नथी; जेम सूर्यनो एवो स्वभाव छे के एक अंसथी रथ थाय छे तेम.

सधे वस्तु असाहाय ह्वै, तहाँ निमित्त हे कौन;
ज्यों जहाज परवाहसें, तिरै सहज बिन पौन। ६.

नोट :-

(१) उपादान = वस्तुनी सहज शक्ति. (२) निमित्त = संबंधी कारण.
(३) दृष्टांतमां एक पेडुं सूर्यना रथनुं कह्युं तेम ज हाल पुराण वगेरे देशोमां पर्वतोमां आवती रेलगाडीओ एक ज पेडाथी चाले छे. (४) उपादान पोते पोतामां पोतानुं कार्य करे छे. निमित्त हाजरूप होय छे, पण ते उपादानने कांई मदद के असर करी शकतुं नथी एम बताव्युं.

अर्थ :-

वस्तु (आत्मा) परसहाय विना ज साधी शकाय छे, तेमां निमित्त केवुं? (निमित्त परमां कांई करतुं नथी.) जेम पाणीना प्रवाहमां वहाण पवन विना सहज तरे छे तेम.

उपादान विधि निरवचन, हे निमित्त उपदेश;
बसै जो जैसे देशमें, धरै सु तैसे भेष। ७.

अर्थ :-

उपादाननी रीत निरवचनीय छे, निमित्तथी उपदेश देवानो रीत छे. जेम जीव जे देशमां वसे ते ते देशनो वेश पहेरे छे तेम.

भैया भगवतीदास कृत

उपादान-निमित्तनो संवाद

(दोहरा)

पाद प्रणिमि जिनदेवके, एक उदित उपग्राय;
उपादान अरु निमित्तको, कहूं संवाद बनाय। १.

अर्थ :-

जिनदेवना चरणे प्रणाम करी, एक अपूर्व कथन तैयार करुं छुं. उपादान अने निमित्तनो संवाद बनावीने ते कहुं छुं. १.

प्रश्न :-

पूछत है को कोलों तहां, उपादान किह नाम;
कहो निमित्त कहिये कहा, कबके हे ठांम। २.

अर्थ :-

त्यां कोइ पुछे छे के-उपादान कोनुं नाम? निमित्त कोने कहीये? अने क्यारथी तेमनो संबंध छे ते कहो. २.

उत्तर :-

उपादान निजशक्ति है, क्रियको मूल स्वभाव;
हे निमित्त परयोगते, बन्यो अनादि बनाव। ३.

सर्वसामान्य

अर्थ :- उपादान अपनी शक्ति से है, ते जीवनो मूल स्वभाव है; अने परसंयोग निमित्त है. तेमनो संबंध अनादिशी बनी रह्यो है. ३.

निमित्त :-

निमित्त कहे मोक्षो सवे, भगत हे जगलोक;
तेरो नाँव न जानही, उपादान सो होय. ४.
अर्थ :- निमित्त कहे है जगत्ना सर्व लोको मने जाणे छे; उपादान शुं छे तेनुं नाम पण जाणता नथी. ४.

उपादान :-

उपादान कहे रे निमित्त, तू कहा करे गुमान;
मोक्षो भजे जीव वे, जो हे सम्यग्ज्ञान. ५.
अर्थ :- उपादान कहे छे :- अरे निमित्त! तुं अभिमान शा माटे करे छे? जे जीव सम्यग्ज्ञानो (आत्माना साचा ज्ञाननी) छे ते मने जाणे छे. ५.

निमित्त :-

कहे जीव सब जगत्के, जो निमित्त सोई होय;
उपादानकी बातकी, पूछे नाहिं कोय. ६.
अर्थ :- निमित्त कहे छे :- जगत्ना सर्व जीवो कहे छे के जो निमित्त होय तो (कार्य) थाय, उपादाननी वातनुं कांई कांई पूछतुं नथी. ६.

उपादान :-

उपादान बिन निमित्त तु, कर न सके एको काज;
कहा भयो जो न लाभे, जगत् हे जिणराज. ७.
अर्थ :- उपादान कहे छे :- अरे निमित्त! एक पण कार्य उपादान विना थई शकतुं नथी. जगत् न जाणे तेथी शुं थयुं? जिणराज ते जाणे छे.

प्रतिक्रमण-आवश्यक

निमित्त :-

देव जिनेश्वर, गुरु यती, अरु जिन-आगम सार;
इहि निमित्तें जीव सब, पावत हे भवपार. ८.
अर्थ :- निमित्त कहे छे :- जिनेश्वर देव, निर्ग्रन्थ गुरु अने वीतरागना आगम उत्कृष्ट छे; ए निमित्तो वडे बधा जीवो भवनो पार पामे छे. ८.

उपादान :-

यह निमित्त फंस जीवको, भम्यो अनंती बार;
उपादान पलट्यो नहीं, तो भटक्यो संसार. ९.
अर्थ :- उपादान कहे छे :- ए निमित्तो आ जीवने अनंती वार भम्या, पण उपादान (जीव पोते) पलट्युं नहि तेथी ते संसारमां भटक्यो. ९.

निमित्त :-

के केवली के साधुके, निकट भव्य जो होय;
सो सायक सम्यक् लहे, यह निमित्तबल जोय. १०.
अर्थ :- निमित्त कहे छे :- जो केवली भगवान अथवा श्रुतकेवली मुनि पासे भव्य जीव होय तो क्षायिक सम्यक्त्व प्रगटे छे ए निमित्तनुं बळ जुओ! १०.

उपादान :-

केवली अरु मुनिराजके, पास रहे बहु लोय;
पे जोको शुद्धत्वो नहीं, सायक ताको होय. ११.
अर्थ :- उपादान कहे छे :- अने श्रुतकेवली मुनिराज पासे घणा लोको रहे छे, पण जेनो शुद्धत्वो नथी (आत्माना) सवभो थाय तेने ज क्षायिक (सम्यक्त्व) थाय छे. ११.

सर्वसामान्य

निमित्त :-

हिंसादिक पापन किये, जीव नरकमें जाहि;
जो निमित्त नहि कामको, तो एम काहे कहाहि. १२.
अर्थ :- निमित्त कहे छे :- जे हिंसादिक पापो करे छे ते नरकमां जाय छे. जो निमित्त कामनुं न होय तो एम शा माटे कहुं? १२.

उपादान :-

हिंसामें उपयोग जो, रहे ब्रह्मकी राय;
तेह नरकमें जात हे, मुनि नहिं ब्रह्म कहाय. १३.
अर्थ :- हिंसामां जेनो उपयोग (चैतन्यना परिणाम) होय अने जे आत्मा तेमां राची रहे ते ज नरकमां जाय छे, (भाव) मुनि कदापि नरकमां जता नथी. १३.

निमित्त :-

दया दान पूजा किये, जीव सुखी जग होय;
जो निमित्त जुदो कही, यह कयो मन लाय. १४.
अर्थ :- निमित्त कहे छे :- दया, दान, पूजा करे तो जीव जगत्मां सुखी थाय छे. जो निमित्त, तमे कहो छो एम, जुदुं होय तो लोको एम केम माने? १४.

उपादान :-

दया दान पूजा भली, जगत् मांहे शुभकार;
तर्ह अनुभवको आचरण, तर्ह यह बंध विचार. १५.
अर्थ :- उपादान कहे छे :- दया, दान, पूजा, वगेरे शुभभाव भले जगत्मां बाह्य सवगड़ आपे, पण अनुभवना आचरणनो विचार करतां, ए बधा बंध छे (धर्म नथी). १५.

निमित्त :-

यह तो बात प्रसिद्ध हे, सोय देख घर मांही;
नरदेही के निमित्त बिन, क्रिय मुक्ति न जाहि. १६.

प्रतिक्रमण-आवश्यक

अर्थ

—निमित्त कहे है:—ओ बात तो प्रसिद्ध है के नरदेहमा निमित्त विना जीव मुक्ति पामतो नथी. तेथी हे उपादान! तु आ बातोनो अंतरमा विचार करी जो. १६.

उपादान:

देह पींजरा जीवको, रोके शिवपुर जान;
उपादानकी शक्तिसों, मुक्ति होत रे भ्रात! १७.

अर्थ

—उपादान निमित्तने कहे है:—अरे भाई! देहतुं पींजरुं तो जीवनो मोक्ष जतां रोके छे, पण उपादाननी शक्तिथी मोक्ष थाय छे.

नोट

—अहीं देहतुं पींजरुं जीवनो मोक्ष जतां रोके छे एम कहुं छे ते व्यवहारकथन छे. जीव शरीर उपर लक्ष करी, तेमां मारापणाथी पकडाई, पोते विकारमां रोकाए छे, त्यारे शरीरनुं पींजरुं जीवनो रोके छे एम उपचारीथी कहेवाय छे. १७.

निमित्त:

उपादान सब जीवने, रोकनहारो कौन;
जाते क्यों नहिं मुक्तिमें, बिन निमित्तके डोन. १८.

अर्थ

—निमित्त कहे छे:—उपादान तो बधा जीवोने छे, तो पछी तेमने रोकनार कोण छे? तेओ मुक्तिमां केम जता नथी? निमित्त नथी मळतुं तेथी तेम थाय छे. १८.

उपादान:

उपादान सु अनादिको, उलट रह्यो जग मांहि;
सुलटत ही सुधे यावे, सिद्धलोकसो जांहि. १९.

अर्थ

—उपादान कहे छे:—जगतमां उपादान अनादिथी दीवढुं रह्युं छे सुलटतुं थतां सीधुं चाले छे अर्थात् साचुं ज्ञान अने चारित्र थाय छे अने तेथी सिद्धलोकमां ते जाय छे (मोक्ष पामे छे). १९.

निमित्त:

कहुं अनादि बिन निमित्त ही, उलट रह्यो उपयोग;
ऐसी बात न संभवे, उपादान तुम जोग. २०.

अर्थ

—निमित्त कहे है:—अनादिथी निमित्त वगर उपयोग (ज्ञाननो व्यापार) शुं विवटों थई रह्यो छे? हे उपादान! ऐवी तारी बात व्याजबो संभवनथी नथी. २०.

उपादान:

उपादान कहे रे निमित्त, हमपै कछी न जाय;
ऐसे ही जिन केवली, देखे त्रिभुवनराय. २१.

अर्थ

—उपादान कहे छे:—अरे निमित्त! माराथी कही शकाय नहि; जिन केवली त्रिभुवनराय एम जे देखे छे.

नोट

—अहीं कहे छे के:—उपादानमां कार्य थाय त्यारे निमित्त स्वयं हाजर होय, पण उपादानने ते कांई करी शकतुं नथी एम अनंत ज्ञानीओ तेमना ज्ञानमां देखे छे. २१.

निमित्त:

जो देख्यो भगवानने, सो ही सांचो आदि;
हम तुम संग अनादिके, बली कलोके कादि. २२.

अर्थ

—निमित्त कहे छे:—भगवानने जे देख्युं ते ज साचुं छे ओ खरूं, पण मारो अने तारो संबंध अनादिनो छे, माटे आपणामां भगवान कोण कहेवो? (बन्ने सरखा छीये एम तो कहो). २२.

उपादान:

उपादान कहे वल बली, जोको नाश न होय;
जो उपजत विनशत रहे, बली कहावे सोय. २३.

अर्थ

—उपादान कहे छे बन्नो नाश न थाय ते भगवान; जे उपजे अने वनशे ते बलवान केवी रीते होई शके? (न ज होय).

नोट

—उपादान त्रिकाली अखंड ओकरूप वस्तु पोते छे, तेथी तेनो नाश नथी. निमित्त तो संयोगरूप छे, आवे ने जाय तेथी नाशरूप छे, तेथी उपादान ज बलवान छे. २३.

निमित्त:

उपादान तुम जोर हो, तो क्यों लेत अहार;
परनिमित्तके योगसों, जीवत सब संसार. २४.

अर्थ

—निमित्त कहे है:—हे उपादान! तारो जो जोर छे तो तु आहार शा माटे ले छे? संसारना बधा जीवो पर निमित्तना योगथी जीवे छे. २४.

उपादान:

जो आहारके जोगसों, जीवत हे जग मांहि;
तो वासी संसारक, मरत कोणे नांहि. २५.

अर्थ

—उपादान कहे छे:—जो आहारना जोगथी जगतना जीवो जीवता होय तो संसारवासी कोई जीव मरत ज नहि. २५.

निमित्त:

सुर सोम मग्नि अग्निके, निमित्त लभे ये नैन;
अंधकारमें कित गयो, उपादान देग देन. २६.

अर्थ

—निमित्त कहे है:—सूर्य, चंद्र, मग्नि के अग्निनुं निमित्त होय तो आंखो देखी शके छे; उपादान जो देखवानुं (काम) आपतुं होय तो अंधकारमां ते क्यां गयुं? (अंधकारमां केम आंखोथी देखातुं नथी?) २६.

उपादान:

सुर सोम मग्नि अग्निको, करें अनेक प्रकाश;
नेनशक्ति बिन न लखे, अंधकार सम भास. २७.

अर्थ

—उपादान कहे छे:—जोके सूर्य, चंद्र, मग्नि अने अग्नि अनेक प्रकारनो प्रकाश करे छे तोपण देखवानी शक्ति विना देखाय नहि; बधुं अंधकार जेवुं भासे छे. २७.

निमित्त:

कहे निमित्त के जेव को मो बिन जगके मांहि;
सबे हमारे वश परे, हम बिन मुक्ति न जांहि. २८.

अर्थ

अर्थ — निमित्त कहे छे : — मारा विना जगतमां जीव कोण मात्र? बधां मारे वश पड्या छे; मारा विना मुक्ति थती नथी? २८.

उपादान

उपादान कहे रे निमित्त! ऐसे बोल न बोल;
तोको तज निज भजत है, तेही करें किलोल. २८.
अर्थ — उपादान कहे छे : — अरे निमित्त! एवां वचनोन बोल. तारां उपरनी दृष्टि ने तज जे जीव पोतानुं भजन करे छे ते ज कल्लोल (आनंद) करे छे. २८.

निमित्त

कहे निमित्त हमको तजे, ते केसे शिव जात?
पंचमहाव्रत प्रगट हें, और हुं किया विख्यात. ३०.
अर्थ — निमित्त कहे छे : — अमने तजवाथी मोक्ष केवी रीते जवाय? पांच महाव्रत प्रगट छे; वळी बीजुं किया पण विख्यात छे. (तेने लोको मोक्षनुं कारण माने छे). ३०.

उपादान

पंचमहाव्रत भोगत्रय, और सकल व्यवहार;
परको निमित्त मापडे, तब पहुँचे भवपार. ३१.
अर्थ — उपादान कहे छे : — पांच महाव्रत, मन, वचन अने काय ए त्रण तरफनुं जोडाण, वळी बधा व्यवहार अने पर निमित्तनुं लक्ष ज्यारे जीव छोडे त्यारे भवपारने पहोँची शके छे. ३१.

निमित्त

कहे निमित्त जग में बडो, मोते बडो न कोय;
तीन लोकके नाथ सब, मो प्रसादतें होय. ३२.
अर्थ — निमित्त कहे छे : — जगमां हुं मोटो छुं. माराथी

मोठो कोई नथी; बधां त्रण लोकना नाथ (तीर्थंकरो) पण मारी कृपाथी थाय छे.
नोंध — सम्यग्दर्शननी भूमिकामां ज्ञानी जीवना विकल्प आवता तीर्थंकर-नामकर्म बंधाय छे, ते दृष्टांत रजु करी, पोतानुं भवावापन्नुं ‘निमित्त’ आगळ धरे छे. ३२.

उपादान

उपादान कहे तु कहा, यहुं गतिमें ले जाय;
तो प्रसादतें जीव सब, दुःखी होई रे भाय. ३३.
अर्थ — उपादान कहे छे : — तुं शुं कहे? तुं तो जीवने चारे गतिमां लई जाय छे. भाई! तारी कृपाथी सर्व जीवो दुःखी ज थाय छे.
नोंध — निमित्ताधीन दृष्टिनुं फळ चारे गतिओ एटले संसार छे. निमित्त परलक्षे जीवने चार गतिमां लई जाय छे एम समजवुं नहि. ३३.

निमित्त

कहे निमित्त जो दुः ख सहे, सो तुम हमहें लगाय;
सुखी कौनतें होत हे, ताको देहु बताय. ३४.
अर्थ — निमित्त कहे छे : — जीव दुः ख सहन करे छे तेनो दोष तुं अमारां उपर लगावे छे, तो जीव सुखी शाथी थाय छे ते बतावी दे? ३४.

उपादान

जो सुखको तु सुख कहे, सो सुख तो सुख नाहिं;
वे सुख, दुःखके मूल हें, सुख अविनाशी नाहिं. ३५.
अर्थ — उपादान कहे छे : — जे सुखने तुं सुख कहे छे ते सुख ज नथी; ए सुख तो दुः खनुं मूळ छे, आत्माना अंतरमां अविनाशी सुख छे. ३५.

निमित्त

अविनाशी घट बधे, सुख्यों विलसत नाहिं?
शुभ निमित्तके योग बिन, परे परे विल्ललाहि. ३६.
अर्थ — निमित्त कहे छे : — अविनाशी (सुख) तो घट घट (प्रत्येक जीव) मां वसे छे, तो जीवोनो सुखनो विलास (भोगवटो) केम नथी? शुभ निमित्तना योग वगर जीव क्षणेशणे दुःखी थई रह्यो छे. ३६.

उपादान

शुभ निमित्त ईठक जीवको, मिल्यो कइ भवसार;
पै ठक सम्यक् दर्श बिन, भटकत कियो गंवार. ३७.
अर्थ — उपादान कहे छे : — शुभ निमित्त आ जीवने घणा भवोमां मळ्युं; पण एक सम्यग्दर्शन विना आ जीव गंवारपणो (अज्ञानभावे) भटक्या करे छे. ३७.

निमित्त

सम्यक् दर्श लये कहा त्वरित मुक्तिमें जाहिं;
आगे ध्यान निमित्त हे, ते शिवको पहुँचाहिं. ३८.
अर्थ — निमित्त कहे छे : — सम्यग्दर्शन थये शुं थयुं? शुं तेथी तुरंत ज मुक्तिमां जवाय छे? आगळ पण ध्यान निमित्त छे; ते शिव (मोक्ष) पदमां पहोँचाडे छे. ३८.

उपादान

छोर ध्यानकी धारणा, भोर योगकी रीति;
तोर कर्मके जलको, भोर लई शिवप्रीति. ३८.
अर्थ — उपादान कहे छे : — ध्याननी धारणा छोडीने, योगनी रीतन समेटी लईने, कर्मनी जळने तोडी, पुरुषार्थ वडे शिवपदनी प्राप्ति जीव करे छे. ३८.

निमित्तनो पराजयः—

तब निमित्त हायो तहां, अब नहिं जोर बसाय;
उपादान शिवलोकमें, पहुंच्यो कर्म खपाय. ४०.
अर्थः—तैयारे निमित्तनो त्यां हार्युं; हवे ते कांई जोर
करतुं नथी. उपादान कर्मनो क्षय करी शिवलोकमां (सिद्धपदमां)
पहोच्युं. ४०.

उपादाननी जीतः—

उपादान जीत्यो तहां, निजबल कर परकास;
सुख अनंत ध्रुव भोगवे, अंत न वरत्यो तास. ४१.
अर्थः—आ रीते पोताना बळनो प्रकाश करीने उपादान
जीत्युं. (ते उपादान हवे) अनंत ध्रुव सुखने भोगवे छे के जेनो
अंत आवतो नथी. ४१.

तत्त्वस्वरूपः—

उपादान अरु निमित्त ये, सब जीवन वीर;
जो निजशक्ति संभारही, सो पहुंचें भवतीर. ४२.
अर्थः—उपादान अने निमित्तने बेधा जीवोने होय छे,
पण जे वीर छे ते निजशक्तिने संभाळी ले छे अने भवनो पार
पामे छे. ४२.

आत्मामो महिमाः—

भैया महिमा भलकी, कैसे वरनी जाय;
वचन-अगोचर वस्तु है, कहियो वचन बनाय. ४३.
अर्थः—भैया (भगवतीदास) कहे छेः—ब्रह्मना (आत्माना)
महिमा केम वर्णव्यो जाय? ते वस्तु वचनथी अगोचर छे—क्यां
वचनो वडे बतावाय? ४३.

सरस संवादः—

उपादान अरु निमित्तको, सरस बन्यो संवाद;
समदृष्टिको सुगम है, मूरखको भकवाद. ४४.
अर्थः—उपादान अने निमित्तनो आ सुंदर संवाद बन्यो
छे; सम्यग्दृष्टि ने ते सहेलो छे, मूर्खने बकवादरूप लागे छे. ४४.

आत्माना गुणोने ओळखे ते आ स्वरूप जाणे.

जो जाने गुण ब्रह्मके, सो जाने यह भेद;
साध जिनागमसो मिले, तो मत कीज्यो छेद. ४५.
अर्थः—आत्माना गुणोने जे जाणे ते आनो मर्म जाणे;
साची जिनागमथी मळे छे. माटे भेद (संदेह) करवो नहि. ४५.

आज्ञामां संवाद रच्योः—

नगर आगरो अग्र है, जैनी जनको वास;
तिनहूं थानक रचना करी, ‘भैया’ स्वमतिप्रकाश. ४६.
अर्थः—आगरा शहर जैनी जनोना वास माटे अग्र छे. ते
क्षेत्रे आ रचना (भगवतीदास) भैयाए पोताना ज्ञान अनुसार
करी छे अथवा पोताना ज्ञानना प्रकाश माटे करी छे. ४६.

रचनाकालः—

संवत विक्रम भूपको, सत्रहसें पंचास;
फाल्गुन पहिले पक्षमें, दशों दिशा परकाश. ४७.
अर्थः—विक्रम राजाना संवत १७५० ना फाल्गुनना प्रथम
पक्षमां दशे दिशामां आनो प्रकाश थयो. ४७.
कृति उपादान—निमित्त संवाद

श्री सद्गुरुदेव-उपकारदर्शन

अहो! अहो! श्री सद्गुरु, करुणासिंधु अपार;
आ पामर पर प्रभु कर्यो, अहो! अहो! उपकार.
शुं प्रभु चरण छेदन, आत्माथी सो हीन;
ते तो प्रभुऐ अपियो, वर्तुं चरणधीन.
आ देहादि आजथी, वर्तुं प्रभु अधीन;
दास दास हुं छेदन, आप प्रभुनी दीन.
पट् खानक समझानीने, भिन्न बतार्यो आप;
ज्ञानथकी तरवारवत, ओ उपकार अमाप.
जे स्वरूप समज्या विना दुःष अनंत;
समजायुं ते पद नथी, श्री सद्गुरु भगवंत.
परम पुरुष प्रभु सद्गुरु, परमज्ञान सुखधाम;
जेओए आंयुं भान निज, तेने सदा प्रणाम.
देह छतां जैनी दशा, वर्तुं देहातीत;
ते ज्ञानीना चरणमां, हो वंदन अगणित.

प्रतिज्ञा-स्तुति

हे परमाकृपालु देव! जन्म, जरा, मरणादि सर्व दुःखोंनो
अत्यंत क्षय करनारो वीतराग पुरुषो मुळ मार्ग आप श्रीमदे
अनंत कृपा करी मने आप्यो, ते अनंत उपकारनो प्रतिउपकार
वालवामां हुं सर्वथा असमर्थ छुं; वळी आप श्रीमद् कइ पण लेवाने
सर्वथा निःस्पृह छा; जेथी हुं मन, वचन, कायानी एकाग्रताथी
आपना चरणारविंदमां नमस्कार करुं छुं, आपनी परमभक्ति अने
वीतराग पुरुषोना मुळ धर्मनी उपासना मारा हृदयने विषे भवपर्यंत
अखंड जाग्रत रहो एटलं मांगु छुं ते सफल थाओ.

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

गुरुदेव प्रत्यें क्षमापना-स्तुति

[उत्तम क्षमावाणी—पर्व : भादरवा वद १]

गुरुदेव! तारां चरणमां फेरी करी हूं वंदना,
स्थापी अनंतनांत तुज उपकार मारा हृदयमां. १.

करीने कुपाठवृत्ति, प्रभु! नित राखजो तुम चरणमां,
रे! धन्य छे ए जीवन जे वीते शीतल तुज छायामां. २.

गुरुदेव! अविनय कंई थयो, अपराध कंई पण जे थया,
करजो क्षमा अम बाळने, ए दीनभावे याचना. ३.

मन-वचन-काय थी थया जाण्ये-अजाण्ये दोष जे,
करजो क्षमा सो दोषनी, हे नाथ! विनवुं आपने. ४.

तारी चरणसेवा थी सो दोष सहेजे जाय छे,
कोपादि भाव दूरे थई भालो क्षमादिक थाय छे. ५.

गुरुवर! नवुं हुं आपने, अम जीवनना आधारने,
वैराग्यपूरित ज्ञान-अमृत सींचनारा मेघने. ६.

मिथ्यात्वभावे मूढ थई निजतत्त्व नेहिं जाण्युं अरे!
आपी क्षमा ए दोषनी आ परिभ्रमण टाळो हवे. ७.

सम्यक्त्व-आदिक धर्म पामूं, तुज चरण-आश्रय वदे;
जय जय प्रभो! आपनो, सो भक्त शासनना थदे. ८.

तात्त्विक सुवाक्य

दंसणमूलो धम्मो। धर्मनुं मूळ दर्शन छे.
समयसार जिनराज छे, स्याद्वाद जिन-वचन.
हुं सच्चिदानंद परमात्मा छुं.
स्वस्थपस्थित सद्गुरुदेवोना प्रभावना-उदय जगतनुं कल्याण करो,
जयवंत वर्तो.
आत्मा पोतपणुं छे अने परपणुं नथी ऐवी जे दृष्टि ते ज खरी
अनेकांतदृष्टि छे.
वळे साधन बार अनंत कियो, तदपि कछु हाथ हजु न पयो;
अब क्यों न बिचारत हे मनसे, सहु और रहा उन साधनसे.
दुर्लभ मनुष्यपणुं पामीने जे विषयोमां रमे छे ते राबने माटे
रत्नने बाळे छे.
महापुरुषोना आचरण जोवा करतां तेनुं अंतःकरण जोवुं ए वधारे
परीक्षा छे.
गमे तेवा तुच्छ विषयमां प्रवेश छतां उज्ज्वल आत्माओना स्वतः
वेग वैराग्यमां झंपलावेलुं ज होय छे.
ज्ञानथी ज राग-द्वेष निर्मूळ थाय. ज्ञाननुं मुख्य साधन विचार छे.
विचारदशानां मुख्य साधन सत्पुरुषनां वचननुं यथार्थ ग्रहण छे.
गम पड्या विना आगम अनर्थकारक थई पडे छे. संत विना
अंतनां अंतमां पण परमातो नथी.
अंतरनुं सुख अंतरनी स्थितिमां छे, स्थिति थवा माटे बाह्य
पदार्थोनुं आश्रय भूल. समश्रेणी रहेली दुर्लभ छे, निम्मित्तीनां
वृत्ति करी फरी थई जाय छे. न थवा अचल गंभीर उपयोग
राख.

[सर्वसामान्य]

शुद्ध उपयोग ए धर्म; भावे भवनो अभाव.
क्रिया छे कर्म, उपयोग छे धर्म, परिणाम छे बंध; मूढ जे
मिथ्यात्व, लोकना संभारवो नहीं—आ उत्तम वस्तु ज्ञानीओने मने
आपी.
तुज पासेथी स्पर्शो एवो मुक्तिने पण धन्य छे.
जेना पूजनथी सद्धि छे अने जनी सद्धि छे, तेने आत्माना धर्मनी
सद्धि नथी.
अहो! श्री सद्गुरुप! अहो! तेमना वचनमृत,
मुद्रा अने सत्समागम! वारंवार अहो!! अहो!!
जेनां ज्याता शासनना अनादिनिधनम्.
घातचतुष्टयनी क्रिया सातमीमां होय, ४थीमां न होय.
निरंजन ज्ञानमयी परमात्मद्रव्य उपादेय छे.
शिवमय, अनुपम-ज्ञानमय शुद्धात्मस्वरूप उपादेय छे.
शुद्धात्मद्रव्यनी प्राप्तिना उपादेयना निर्विकल्प समाधि उपादेय छे.
केवलज्ञानादि गुणरूप जे शुद्धात्मस्वरूप छे ते आराधना योग्य छे.
विदेहां सिद्धु एक अखंडस्वभाव शुद्धात्मत्व ज सत्य छे.


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2448.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है