सकल सुरासुर पूज्य नित, सकलसिद्धि दातार।
जिन-पद बंदूं जोर कर, अशरन-जन-आधार॥१॥
चौपाई
श्रीसुख-वास-महीकुलधाम, कीरति-हर्षण-थल अभिराम।
सरसुतिके रतिमहल महान्, जय जुवतीको खेलन थान॥
अरुण वरण वांछित वरदाय, जगतपूज्य ऐसे जिन पाय।
दर्शन प्राप्त करै जो कोय, सब शिवथानक सो जन होय॥१॥
निर्विकार तुम सोमशरीर, श्रवणसुखद वाणी गम्भीर।
तुम आचरण जगतमें सार, सब जीवनको है हितकार॥
महानिंद भव मारू देश, तहां तुंग तरु तुम परमेश।
सघन-छांहि-मंडित छवि देत, तुम पंडित सेवै सुखहेत॥२॥
गर्भकूपतैं निकस्यौ आज, अब लोचन उघरे जिनराज।
मेरो जन्म सफल भयो अबै, शिवकारण तुम देखे जबै॥
जग-जन-नैन-कमल-वनखंड, विकसावन शशि शोक विहंड।
आनंदकरन प्रभा तुम तणी, सोई अमी झरन चांदणी॥३॥
सब सुरेन्द्र शेखर शुभ रैन, तुम आसन तट माणक ऐन।
दोऊ दुति मिल झलकै जोर, मानो दीपमाल दुहँ ओर॥
यह संपति अरु यह अनचाह, कहां सर्वज्ञानी शिवनाह।
तातैं प्रभुता है जगमाहिं, सही असम है संशय नाहिं॥४॥
सुरपति आन अखंडित वहै, तृण ज्यों राज तज्यो तुम वहै।
जिन छिनमैं जगमहिमा दली, जीत्यो मोहशत्रु महावली॥
लोकालोक अनंत अशेख; कीनो अंत ज्ञानसो देख।
प्रभु प्रभाव यह अद्भुत सबै, अवर देवमैं भूल न फबै॥५॥
पात्रदान तिन दिन दिन दियो, तिन चिरकाल महातप कियो।
बहुविध पूजाकारक वही, सर्व शील पाले उन सही॥
और अनेक अमल गुणरास, प्रापति आय भये सब तास।
जिन तुमशरधा सो कर टेक दृग-वल्लभ देखे छिन एक॥६॥
त्रिजग-तिलक, तुम गुणगण जेह, भवभुजंग-विष-हरमणि तेह।
जो उरकानन माहिं सदीव। भूषण कर पहरै भवि जीव॥
सोई महामती संसार, सो श्रुतसागर पहुंचे पार।
सकल लोकमें शोभा लहै, महिमा जाय जगतमें वहै॥७॥
दोहा-सुरसमूह ढोलै चमर, चंदकिरण-द्युति जेम।
नवतन-बधू-कटाक्षतैं चपल चलै अति एम॥
छिन छिन ढलकै स्वामिपर, सोहत ऐसो भाव।
किधौं कहत सिधि लच्छिसो, जिनपतिके ढिगआव॥८॥
चौपई छन्द १५ मात्रा
शीशछत्र सिंहासन तलैं, दिपै देहदुति चामर ढलै।
बाजे दुंदुभि बरसै फूल, ढिग अशोक वाणी सुखमूल॥
इहिविधि अनुपम शोभा मान, सुरनर सभा पदमनी भान।
लोकनाथ बंदै शिरनाय, सो हम शरण होहु जिनराय॥९॥
सुर-गजदंत कमल-वन-माहिं, सुरनारी-गण नाचत जाहिं।
बहुविधि बाजे बाजे थोक, सुन उछाह उपजै तिहुंलोक॥
हर्षंत हरि जै जै उच्चरै, सुमनमाल अपछर कर धरै।
यों जन्मादि समय तुम होय, जयो देव देवाराम सोय॥१०॥
तोष बढावन तुम मुखचंद, जन नयनामृत कस्न अमंद।
सुंदर दुतिकर अधिक उजास, तीन भुवन नहिं उपमा तास॥
ताहि निरखि सनयन हम भये, लोचन आज सुफल कर लये।
देखन योग जगतमें देख, उमग्यो उर आनंद विशेख॥११॥
कैयक यों मानै मतिमंद। विजितकाम विधि ईश मुकंद।
ये तो हैं वनिता-वश दीन, काम-कटक-जोतन-बलहीन॥
प्रभु आगे सुरकामिनि करै, ते कटाक्ष सब खालो परै।
यातैं मदन-विध्वंसन वीर, तुम भगवंत और नहिं धीर॥१२॥
दर्शनप्रीति हिये जव जगी, तबै आम्र-कोपल बहु लगी।
तुम समीप उठ आवन ठयो, तबसो सघन प्रफुल्लित भयो॥
अबहूं निज नैनन ढिग आय, मुख मयंक देख्यो जगराय।
मेरो पुन्य बिरख इहबार, सुफल फल्यो सबसुख दातार॥१३॥
दोहा-त्रिभुवन वनमें विस्तरो काम-दवानल जोर।
वाणी-वरषाभरण सो, शांति करहु बहु ओर॥
इंद्र मोर नाचै निकट, भक्तिभाव धर मोह।
मेघ सघन चौवीस जिन, जैवंते जग होय॥१४॥
चौपाई
भविजन-कुमुदचंद सुखदैन, सुरनरनाथ-प्रमुख-जगजैन।
ते तुम देख रमैं इह भांति, पहुप गेह लह ज्यों अलि पांत॥
शिरधर अंजुलि भक्तिसमेत, श्रीगृहप्रति परिदक्षण देत।
शिवसुख की सी प्रापति भई, चरणछांहसो भवतप गई॥१५
वह तुम-पद-नख-दर्पण देव, परम पूज्य सुंदर स्वयमेव।
तामें जो भवि भागविशाल, आनन अविलोकै चिरकाल॥
कमला कीरति कांति अनूप, धीरज प्रमुख सकल सुखरूप।
वे जगमंगल कौन महान्, जो न लहै वह पुरुष प्रधान॥१६॥
इंद्रादिक श्रीगंगा जेह उत्पति थान हिमाचल येह।
जिनमुद्रा-मंडित अतिलसै, हर्ष होय देखे दुख नसै॥
शिखर ध्वजागण सोहैं एम, धर्म सुत-रुवर पल्लव जेम।
यों अनेक उपमाआधार, जयो जिनेश जिनालय सार॥१७॥
शीश नवाय नमत सुरनार, केश-कांति-मिश्रित मनहार।
नखउद्योत वरतै जिनराज, दशदिश-पूरित किरण समाज॥
स्वर्ग-नाग-नरनायक संग, पूजत पाय-पद्म अतुलंग।
दुष्ट कर्मदल दलन सुजान, जैवंतो वरतो भगवान्॥१८॥
सो कर जागै जो धीमान, पंडित सुधी सुमुख गुणवान।
आपन मंगलहेत प्रशस्त, अवलोकन चाहैं कछु वस्त॥
और वस्तु देखें किस काज, जो तुम मुख राजै जिनराज।
तीनलोकको मंगलथान, प्रेक्षणीय तिहुं जगकल्यान॥१९॥
धर्मोदय तापस-गृहकीर, काव्यबंध वन पिक, तुम वीर।
मोक्ष-मल्लिका मधुप रसाल, पुन्यकथा कंज सरसि मराल॥
तुम जिनदेव सुगुण मणिमाल। सर्वहितंकर दीनदयाल।
ताको कौन न उन्नतकाय, धरै किरीट माहिं हर्षाय॥२०॥
केई वांछै शिवपुर बास, केई करै स्वर्गसुख आस।
पचै पंचानल आदिक ठान, दुख बधै जस बँधै अयान॥
हम श्रीमुखवानी अनुभवैं, सरधा पूरव हिरदै ठवैं।
तिस प्रभाव आनन्दित रहैं, स्वर्गादि सुख सहजे लहैं॥२१॥
न्होन महोच्छव इन्द्रन कियो, सुरतिय मिल मंगल पढ लियो।
सुयश शरद चंद्रोपम सेत, सो गंधर्व गान कर लेत॥
और भक्ति जो जो जिस जोग, शेष सुरन कीनी सुनियोग।
अब प्रभु करैं कौनसो सेव, हम चित भयो हिंडोला एव॥२२॥
जिनवर जन्मकल्यानक द्योस, इंद्र आप नाचै कर होस।
पुलकित अंग पिता-घर आय, नाचत विधिमें महिमा पाय॥
अमरी वीन बजावैं सार, धरी कुचाग्र करत झंकार।
इहिविधि कौतुक देख्यो जबै, औसर कौन कह सकै अबै॥२३॥
श्रीपति-बिंब मनोहर एम, विकसत वदन कमलदल जेम।
ताहि हेर हरखे दृग दोय, कह न सकूं इतनो सुख होय॥
तब सुरसंग कल्यानक काल, प्रगटरूप जावै जगपाल।
इकटक दृष्टि एक चितलाय, वह आनंद कहा क्यों जाय॥२४॥
देख्यो देव रसायन धाम, देख्यो नव निधिको विसराम।
चिंतारयन सिद्धिरस अबै, जिनगृह देखत देखे सबै॥
अथवा इन देखे कछु नाहिं, यम अनुगामो फल जगमाहिं।
स्वामी सरचो अपूरव काज, मुक्तिसमीप भई मुझ आज॥२५॥
अब विनवै भूपाल नरेश, देखे जिनवर हरन कलेश।
नेत्रकमल विकसे जगचंद्र, चतुर चकोर करण आनंद॥
थुति जलसो यों पावन भयो. पापताप मेरो मिट गयो।
मो चित है तुम चरणनमाहिं, फिर दर्शन हूज्यो अब जाहिं।२६
छप्पय छंद।
इहिविधि बुद्धिविशाल राय भूपाल महाकवि॥
कियो ललित थुतिपाठ हिये सब समझ सकै नवि॥
टीकाके अनुसार अर्थ कछु मनमैं आयो।
कहीं शब्द कहिं भाव जोड भाषा जस गायो॥
आतम पवित्रकारण किमपि, बालख्याल सो जानियो।
लीज्यो सुधार ‘भूधर’ तणी, यह विनती बुध मानियो॥२७
इति समाप्त।
Artist: कविवर भूधरदास
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३३९ से ३४३