भूलकर/भूल के अपना घर | Bhulkar/Bhul Ke Apna Ghar

भूलकर/भूल के अपना घर, जाने कितनों के घर, तुझको जाना पड़ा।।

इस जहाँँ में कई घर बनाये तूने,
रिश्तेदारी सभी से निभाई तूने।।
जिनके थे तुम पिता, उन्हीं को पिता, फिर बनाना पड़ा।।
भूलकर अपना घर…।।1।।

जो थी माता कभी, वो ही पत्नी बनी।
पत्नी से फिर तेरी भगिनी बनी।।
रिश्ते बनते रहे, और बिछड़ते रहे, ना ठिकाना मिला।।
भूलकर अपना घर…।।2।।

बनके थलचर तू सबलों से खाया गया।
बन के नभचर तू जालों फंसाया गया।।
नरकपशुओं के गम, देखकर वो सितम, तुझको रोना पड़ा।।
भूलकर अपना घर…।।3।।

इस जहां की तो वधुऐं अनेकों वरीं।
मुक्ति रानी न अब तक, मेरे मन बसी।।
जिसने इसको वरा, इस जहाँँ की धरा, पर ना आना पड़ा।।
भूलकर अपना घर…।।4।।

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