मैं भ्रमित हूँ इस मोह में, अर मोह के विद्रोह में,
जब से दिखा निज आत्मवैभव, हो गया अभिभूत मैं।
मैंने सभी परपदारथ को, मान अपना भूल की,
मैंने न जाना पर सभी को, भूल हो गई मूल की।
न जाने कब-कब किए, कैसे किए मैंने कर्म यह,
न जाने अब तक क्यों नहीं, न जाना है जिनधर्म यह।
तूफ़ान आंधी कुछ नहीं, कर सकती मेरा आपदा,
क्रमबद्ध है सब है सुनिश्चित, एक मैं शुद्धात्मा।
है चाह बस शिवधाम की, न कर्म की न काम की,
बस एक है अब मेरी वांछा, मुक्ति में विश्राम की।
न धन की अब अभिलाष है, न यश का कोई मान है,
बस आत्मानुभव की साधना ही जीवन का सम्मान है।
मैं शुद्ध हूँ मैं सिद्ध हूँ, मैं एक चेतन बुद्ध हूँ,
“झूठे हैं सब सम्बन्धी मेरे” - मान मैं भी मुक्त हूँ।
- सिद्धार्थी हर्ष जैन
रचनाकार: हर्ष जैन (Harsh Jain), बड़ा मलहरा 63
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