भ्रष्टाचार समाप्त करने की समीचीन विधि
-प्रो. वीरसागर जैन
भ्रष्टाचार की हालत आज ऐसी हो रही है कि- तू डाल-डाल मैं पात-पात | सरकार कितनी भी कोशिश करती है उसे मिटाने की, पर वह वहाँ से भी रास्ता निकालकर फिर पनपने लगता है | कथमपि मिटने का नाम ही नहीं ले रहा है | नीति-निर्धारक ही टेंशन में आ गये हैं | उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या किया जाए |
यही कारण है कि हमारे दिव्यज्ञानी ऋषि-मुनियों ने हमसे कहा है कि सुनो, प्रथम तो भ्रष्टाचार को इस दुनिया से पूरी तरह समाप्त ही नहीं किया जा सकता, सम्भव ही नहीं है | यह दुनिया है, यह ऐसी ही है, ऐसी ही थी और ऐसी ही रहेगी | संसार को मोक्षधाम में नहीं बदला जा सकता | यह अच्छी तरह समझ लो और बहुत अधिक टेंशन में मत आओ, अपना धैर्य कदापि मत खोओ | यदि हममें से कोई व्यक्ति सचमुच ही भ्रष्टाचार को इस दुनिया से पूरी तरह समाप्त करना चाहता है तो वह गलत है, अज्ञानी है |
इसी प्रकार किसी कठोर आदेश या अस्त्र-शस्त्रादि से भी भ्रष्टाचार के समूल नाश की कल्पना करना कल्पनामात्र ही है | डंडे के बल पर कभी रामराज्य नहीं आता | जबरदस्ती किसी से कुछ नहीं कराया जा सकता |
तथा जितना जो कुछ भ्रष्टाचार मिटाया जा सकता है, उसका उत्तम उपाय एक शिक्षा या आत्मानुशासन ही है, अन्य कुछ नहीं है | सम्यग्ज्ञान द्वारा उत्पन्न आत्मानुशासन ही सुशासन (good governence) का सच्चा आधार हो सकता है, अतः हमको अधिक से अधिक शिक्षा के प्रचार पर ध्यान देना चाहिए | जितनी अधिक शिक्षा बढ़ेगी, उतना ही भ्रष्टाचार कम होगा | शिक्षा के द्वारा जब व्यक्ति स्वयं भ्रष्टाचार से स्व और पर- दोनों का भयंकर विनाश अनुभव करेगा, विशेषरूप से अपनी ही महा हानि अनुभव करेगा कि उससे मेरी आत्मा पतित होती है, तब वह स्वतः ही भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाएगा |
यही कारण है कि ज्ञानी जन सदा शांतिपूर्वक उपदेश ही देते रहते हैं, आदेश आदि भी कभी नहीं देते | वे समाज-सुधारकों से भी बारम्बार कहते रहते हैं कि- आत्मा ही अपना गुरु है; आत्मा ही अपना शत्रु व मित्र है; समझे तो अपने आप से, नहीं तो किसी के बाप से; लोटा छन सकता है, कुआ नहीं; इत्यादि | हमें उनके इन वचनों का मर्म समझना होगा। यही सुशासन (good governence) का आधार है ।
सुशासन (good governence) के लिए शस्त्रादि की निरर्थकता तो हमको अवश्य ही समझ लेनी चाहिए | शस्त्रों से कभी भी ऐसे महान् कार्यों की सिद्धि नहीं होती | शस्त्रों से सामने वाले को हराया तो जा सकता है, पर जीता नहीं जा सकता | जीतने के लिए प्रेम और करुणा की भाषा ही समर्थ होती है |
अन्त में, जिसप्रकार यहाँ भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में कहा, उसीप्रकार संसार की सर्व समस्याओं के सम्बन्ध में भी हमें समझ लेना चाहिए और सदैव स्व एवं पर को ज्ञानाराधना में लगाने का उद्यम करना चाहिए |
“धवल विसूरइ णियमणइ, गरुआ भरु पिक्खेवि | हउ किं ण जुत्तउ सामिहो, खंडउ बेई करेइ ||”