अन्न ग्रहण करने से पहले,
मन में सम्यक् करूँ विचार ।
ढाई द्वीप के मुनिराजों का,
नवधा भक्ति मय होय आहार।।
व्रती सभी, साधर्मी जन अरु,
दीन दु:खी जो करुणा पात्र।
क्षुधा मिटे अरु साता पावें,
मोक्षमार्ग के बनें सुपात्र ।।
शक्ति जो भी अब मैं पाऊँ,
स्व-पर कल्याणक भावना भाऊँ ।
अतिथि कोई न भूखा जावे,
संविभाग कर लोभ घटाऊँ ।।
तृष्णा-शक्ति, ईर्ष्या तज कर,
सहजहिं वात्सल्य भाव बढ़ाऊँ।
ज्ञानमृत का भोग करूँ कब,
ऐसा अपना स्वरूप लखाऊँ ।।
स्वाद से पहले स्वास्थ्य को देखूँ,
भक्ष्य-अभक्ष्य विवेक धराऊँ।
अनिष्ट कारक भोजन तज कर,
राग अरु रोग को दूर भगाऊँ।।
रचनाकार: अनुभव जैन (Anubhav Jain), पुणे