जैसे कुछ रज के कण आकर किसी कुंडल का चुम्बन कर लें,
या सुमनों के मन में आकर तीक्ष्ण शूल कोई तन धर लें।
या उड़कर आए कोई वस्त्र निर्ग्रन्थ साधु के ही तन पर,
या कालिख सम्मिलित हो किसी कीली पर लगे रोगन पर।
कौन है वह मूर्ख जो रज को कुंडल को एक कह देगा?
या सुमनों का साथी ही जो शूल-संग को कह देगा।
या कह देगा श्री मुनि को कोई वस्त्र सहित व्यक्तित्व वहाँ,
वह कौन मूर्ख ही होगा जो कालिख को रोगन कह देगा?
न मानो रज-कण को कुंडल, कर्म जीव को न मानो।
न मानो शूलों को कोमल, भिन्न सत्त्व को पहचानो।
मत मानो अंबर साधु का, संयोगों को जानो क्षणभर।
न मानो कालिख को रोगन, अपनत्व दिखाओ चेतन पर।
जिनका भक्षण किया स्याल ने, उनको किसका बल होगा?
जो रहने दें मृत सर्प गले में, उनको क्या संबल होगा?
यूँ नहीं कि तन के बल से उन्होंने यह स्थिति साधी होगी,
जब भेदज्ञान हो अंतर में, न आधि नहीं व्याधि होगी।
अपने को अपना मानोगे तो परिपूर्ण हो जाओगे।
पर की जो इच्छा आई तो याचकता में मर जाओगे।
अपना आसन है सिद्धशिला, तुम पर-पद इच्छा छोड़ो तो।
भेदज्ञान की असि से अपने मिथ्या बंधन तोड़ो तो।
भेदज्ञान एक अमृत है, अपने घट में आने तो दे।
हर चिंता दूर खड़ी होगी, तू अपनापन जाने तो दे।
रचनाकार: तेजस जैन (Tejas Jain), खनियाधाना
Instagram: @tejas___.Jain