भेदग्यान | Bhedagyan

जो इतना दिखते मुझमें हैं,
क्या कर सकते हो मुझसे कभी,
निश्चय से तो “मैं” मुझमें ही हूँ,
हूँ परम उदात्त,अत्यंत-धीर,
स्व-पर प्रकाशीण ।

जो दिखते इतने मुझमें हैं,
वे “स्वकीयकर्मोदयात्”
दृष्टि से तो “मैं” अकर्ता तत्त्व,
सविवेक ज्ञान में रहे सदा।

यह “मैं” हूँ,
एक, शुद्ध, निर्मल हूँ,
ज्ञान-दर्शन पूर्ण हूँ,
पर यह भी हूँ “मैं” नहीं,
हूँ अभेद, एक, ज्ञायक
चिन्मात्र, अनादि, अखंड ज्योति।

जो इतना दिखते मुझमें हैं,
“हाँ” वे तो मुझसे भिन्न सभी,
हूँ क्षण-क्षण जाननहार स्वयं,
बस ज्ञाता-ज्ञायक-ज्ञान सही।
AJ

रचनाकार: रिया जैन (Riya Jain), सोनगढ़, गुजरात
Instagram: @vishuddhihihi