जो जाने निज स्वरूप को, भेद-विज्ञान जगाता है।
संयम और अहिंसा धारी, भव-सागर तर जाता है।।
क्षमा भाव से जग जीते, वीतराग हो जाती काया।
मोक्षमार्ग का पथ चुनकर, पाले आत्मज्ञान की छाया।।
अनंत काल से भटक रहा था, मिथ्यातम के घेरे में।
सुध-बुध भूला अपनी अपनी, फँसकर मोह-अंधेरे में।।
पुण्य और पापों के फल को, अपना रूप जान लिया।
अज्ञान भाव में आकर मैंने, पर को खुद ही मान लिया।।
जब आई काललब्धि सुभानी, गुरुवर से पाई जिनवानी।
भेद-विज्ञान बही जब गंगा, अंतर में प्रगटी कल्याणी॥
मैं चेतन हूँ, शुद्ध अमूर्तिक, ज्ञान-स्वभाव हमारा है।
यह शरीर तो पुद्गल का है, क्षणभंगुर सारा है।।
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्र की पावन धारा।
इन तीनों के मेल बिना न, कोई भव से उबरा तारा।।
सम्यग्दर्शन प्रथम सीढ़ी है, तत्त्वों का सच्चा श्रद्धान।
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की, सेवा ही सच्चा अभिमान।।
मूढ़ता तीन और मद आठों, शंकादिक दोष मिटाकर।
शुद्ध आत्मा का ध्यान धरे जो, भव-बंधन दूर भगाकर।।
निसर्गज या अधिगमज होकर, सम्यक्त्व जब प्रगट होए।
उपशम या क्षयोपशम से, पापों के बंधन सब खोए।।
पाँचों पापों का संहारक, अहिंसा व्रत हो अंगीकार।
सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य का, पालन हो सदा उदार।।
परिग्रह की सीमा बाँधकर, लोभ की बेड़ी को तोड़े।
संसारिक सब भोग-विलास को, हँसते-हँसते जो छोड़े।।
षट् आवश्यक नित्य निभावे, देवपूजा गुरु की सेवा।
स्वाध्याय, संयम, तप, दान से, पावे मुक्ति का मेवा।।
श्रावक के व्रत ग्यारह प्रतिमा, क्रमशः जो साध जाता है।
उत्कृष्ट संयम को पाकर वह, मुनिवर पद पा जाता है।।
क्षुल्लक ऐलक या मुनि बनकर, महाव्रत तेरह पालत हैं।
पंचसमिति, गुप्ति धारी, भव-आतप को टालत हैं।।
क्रोध, मान, माया और लोभ की, कषायों को भस्म करके।
वीतराग मुद्रा को धारे, ध्यानमग्न हो तन को तज के।।
दिव्यध्वनि झरती है जिनसे, गणधर-गण सेवा करते।
अष्टादश दोषों से विमुक्त, भवसागर से सबको तरते।।
यह जिनेन्द्र का पावन शासन, शिवपुर का रस्ता दिखलावे।
जो इसके पथ पर चल पड़ता, वह परम शांति को पावे।।
हे प्रभु! अब ऐसी कृपा करो, चरणों से वियोग न होवे।
विषयों में मेरी परिणति, कभी भूलकर भी न खोवे।।
रत्नत्रय निधि मुझको दीजे, मोह ताप का नाश करो।
मैं स्वभाव में लीन रहूँ, ऐसा मुझको आवास करो।।
यह निश्चय उर में धारे जो, भव-जलधि पार उतर जाता है।
जो जाने निज स्वरूप को, वह शाश्वत सुख को पाता है।।
लेखक
राज जैन
भोपाल, ,मध्य प्रदेश
AJ
रचनाकार: राज जैन (Raj Jain), भोपाल