‘कर्ता-कर्ता’ खुद को कहता
मान भाव में यूं ही बहता,
निज को छोड़ पर में रहता
सुख को छोड़ क्यों दुख तू सहता।
ज्ञायक पर अब दृष्टि डालो
पर को ज्ञायक मत पहचानो,
पर में तो बस ज्ञेय भरा है
ज्ञायक वह जो पर से जुदा है।
खुद को जानूं, और पहचानूं
निज का मैं श्रद्धान करूं,
पर से खुद को भिन्न मैं जानूं
आतम का मैं ज्ञान करूं।
‘सच्चा सुख’ - ये क्या होता है?
यह बिन जान बहुत रोता है,
ज्यों ही जाने सच्चे सुख की परिभाषा
बाकी न रहे फ़िर कोई आशा।
मैं भी भगवान हूँ भविष्य का
ऐसा जान पुरुषार्थ करूं,
मोक्ष मेरा भी हो जाए
शिव-रमणी को मैं वरूं।
रचनाकार: सानिध्य जैन बंसल (Sanidhya Jain Bansal), इंदौर
Instagram: @theJainn