बारह भावना
(ज्ञानोदय छंद)
भव-वन में जी भर घूम चुका, कण-कण को जी भर-भर देखा |
मृग-सम मृगतृष्णा के पीछे, मुझको न मिली सुख की रेखा ||(1)
झूठे जग के सपने सारे, झूठी मन की सब आशाएँ |
तन जीवन यौवन अस्थिर हैं, क्षण भंगुर पल में मुरझाएँ ||(2)
सम्राट् महाबली सेनानी, उस क्षण को टाल सकेगा क्या |
अशरण मृत काया में हर्षित, निज जीवन डाल सकेगा क्या ||(3)
संसार महा-दु:खसागर के, प्रभु! दु:खमय सुख-आभासों में |
मुझको न मिला सुख क्षणभर भी, कंचन-कामिनि-प्रासादों में ||(4)
मैं एकाकी एकत्व लिए, एकत्व लिए सब ही आते |
तन-धन को साथी समझा था, पर वे भी छोड़ चले जाते ||(5)
मेरे न हुए ये मैं इनसे, अतिभिन्न अखंड निराला हूँ |
निज में पर से अन्यत्व लिए, निज सम-रस पीनेवाला हूँ ||(6)
जिसके श्रृंगारों में मेरा, यह महँगा जीवन घुल जाता |
अत्यन्त अशुचि जड़ काया से, इस चेतन का कैसा नाता ||(7)
दिन-रात शुभाशुभ भावों से, मेरा व्यापार चला करता |
मानस वाणी अरु काया से, आस्रव का द्वार खुला रहता ||(8)
शुभ और अशुभ की ज्वाला से, झुलसा है मेरा अंतस्थल |
शीतल समकित किरणें फूटें, संवर से जागे अंतर्बल ||(9)
फिर तप की शोधक वह्नि जगे, कर्मों की कड़ियाँ टूट पड़ें |
सर्वांग निजात्म प्रदेशों से, अमृत के निर्झर फूट पड़ें ||(10)
हम छोड़ चलें यह लोक तभी, लोकांत विराजें क्षण में जा |
निज-लोक हमारा वासा हो, शोकांत बनें फिर हमको क्या ||(11)
जागे मम दुर्लभ बोधि प्रभो! दुर्नयतम सत्वर टल जावे |
बस ज्ञाता-दृष्टा रह जाऊँ, मद-मत्सर मोह विनश जावे ||(12)
चिर रक्षक धर्म हमारा हो, हो धर्म हमारा चिर साथी |
जग में न हमारा कोई था, हम भी न रहें जग के साथी ||(13)
(देव-स्तवन)
चरणों में आया हूँ प्रभुवर! शीतलता मुझको मिल जावे |
मुरझाई ज्ञान-लता मेरी, निज-अंतर्बल से खिल जावे ||(14)
सोचा करता हूँ भोगों से, बुझ जावेगी इच्छा-ज्वाला |
परिणाम निकलता है लेकिन, मानों पावक में घी डाला ||(15)
तेरे चरणों की पूजा से, इन्द्रिय-सुख की ही अभिलाषा |
अब तक न समझ ही पाया प्रभु! सच्चे सुख की भी परिभाषा ||(16)
तुम तो अविकारी हो प्रभुवर! जग में रहते जग से न्यारे |
अतएव झुकें तव चरणों में, जग के माणिक-मोती सारे ||(17)
(शास्त्र-स्तवन)
स्याद्वादमयी तेरी वाणी, शुभनय के झरने झरते हैं |
उस पावन नौका पर लाखों, प्राणी भव-वारिधि तिरते हैं ||(18)
(गुरु-स्तवन)
हे गुरुवर! शाश्वत सुख-दर्शक, यह नग्न-स्वरूप तुम्हारा है |
जग की नश्वरता का सच्चा, दिग्दर्श कराने वाला है ||(19)
जब जग विषयों में रच-पच कर, गाफिल निद्रा में सोता हो |
अथवा वह शिव के निष्कंटक- पथ में विष-कंटक बोता हो ||(20)
हो अर्ध-निशा का सन्नाटा, वन में वनचारी चरते हों |
तब शांत निराकुल मानस तुम, तत्त्वों का चिंतन करते हो ||(21)
करते तप शैल नदी-तट पर, तरु-तल वर्षा की झड़ियों में |
समतारस पान किया करते, सुख-दु:ख दोनों की घड़ियों में ||(22)
अंतर-ज्वाला हरती वाणी, मानों झड़ती हों फुलझड़ियाँ |
भव-बंधन तड़-तड़ टूट पड़ें, खिल जावें अंतर की कलियाँ ||(23)
तुम-सा दानी क्या कोई हो, जग को दे दीं जग की निधियाँ |
दिन-रात लुटाया करते हो, सम-शम की अविनश्वर मणियाँ ||(24)
हे निर्मल देव! तुम्हें प्रणाम, हे ज्ञानदीप आगम! प्रणाम |
हे शांति-त्याग के मूर्तिमान, शिव-पंथ-पथी गुरुवर! प्रणाम ||
Artist - कविश्री युगलजी बाबू जी